समुद्र धरती को ठंडा और संतुलित रखने में बड़ी भूमिका निभाता है लेकिन जलवायु परिवर्तन की वजह से वही सबसे ज्यादा खतरे में है. पढ़िए कैसे समुद्र को बचाना अब जलवायु परिवर्तन और धरती के भविष्य को सुरक्षित रखने की सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है.
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पृथ्वी के 70 प्रतिशत से अधिक हिस्से में फैला महासागर हमारी जलवायु को नियंत्रित करता है. यह कार्बन और गर्मी को सोखने के साथ हमें ऑक्सीजन भी देता है, जिससे धरती का संतुलन बना रहता है. इसके बावजूद, दशकों तक इसके इस महत्व को वैश्विक नीतियों और संयुक्त राष्ट्र (UNFCCC) के नियमों में शामिल नहीं किया गया और यह सिर्फ वैज्ञानिकों तक ही सीमित रहा.
सतत विकास के लिए 2030 एजेंडा की स्थापना और 2015 में पेरिस समझौते के ऐतिहासिक मोड़ के एक दशक बाद, महासागर-जलवायु संपर्क अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं के हाशिये से निकलकर केंद्र में आ गया है. अब चुनौती इस प्रयास को सुसंगत शासन, प्रभावी ढंग से लागू नीतियों और अंतर-व्यवस्था एकीकरण में बदलने की है.
जलवायु मशीन के केंद्र में, महासागर ने औद्योगिक क्रांति के बाद से मानव-जनित CO2 उत्सर्जन का लगभग एक तिहाई हिस्सा सोखा है. यह पृथ्वी का सबसे बड़ा जलवायु बफर है, जो मानवीय गतिविधियों द्वारा उत्पन्न अतिरिक्त गर्मी का 90 प्रतिशत हिस्सा अपने अंदर समाहित करता है. 'बदलती जलवायु में महासागर और क्रायोस्फीयर पर इसकी विशेष रिपोर्ट' (2019) के माध्यम से, जो अंतरराष्ट्रीय जलवायु एजेंडे के भीतर एक जलवायु नियामक के रूप में महासागर की क्षमता को स्थापित करने में एक सच्चा ‘वैज्ञानिक प्रमाणिकता का प्रतीक’ साबित हुआ.
‘द ओशन एज़ अ सॉल्यूशन टू क्लाइमेट चेंज‘ नामक रिपोर्ट दर्शाती है कि महासागर-आधारित उपाय - पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण से लेकर समुद्री नवीकरणीय ऊर्जा, 2050 तक आवश्यक उत्सर्जन में कटौती का 35 प्रतिशत तक योगदान दे सकते हैं.
हालांकि, महासागर और इसकी विशाल क्षमता खतरे में है. जैसा कि IPCC द्वारा अपनी 2023 की रिपोर्ट में सुझाया गया है, ‘मानव-जनित जलवायु परिवर्तन ने महासागर और तटीय पारिस्थितिकी प्रणालियों को ऐसी स्थितियों के सामने ला खड़ा किया है जो सहस्राब्दियों में अभूतपूर्व हैं’, जिसके परिणामस्वरूप ऐसे परिणाम सामने आए हैं जिन्हें वैज्ञानिकों ने ‘घातक तिकड़ी’ के रूप में परिभाषित किया है, अर्थात्: तापमान में वृद्धि, अम्लीकरण, और ऑक्सीजन की कमी .
इसके समानांतर, IPBES वैश्विक मूल्यांकन रिपोर्ट (2019) द्वारा पहचाने गए दबावों के मानव-जनित कारकों के कारण महासागर का स्वास्थ्य और बिगड़ गया है: अत्यधिक दोहन प्रदूषण, आवास विनाश, और आक्रामक विदेशी प्रजातियां. जबकि सबसे कम उत्सर्जन करने वाले निचले 50 प्रतिशत लोग वैश्विक उत्सर्जन में केवल 13-15 प्रतिशत का योगदान करते हैं, फिर भी 3.6 बिलियन तक लोग- विशेष रूप से तटीय और छोटे द्वीप क्षेत्रों में- अत्यधिक जलवायु-संवेदनशील संदर्भों में रहते हैं और पहले से ही समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और चरम घटनाओं से असमान रूप से प्रभावित हैं.
जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC, 1992, अनुच्छेद 1.3 और 3.1) में शुरुआती मान्यता के बावजूद, महासागर-जलवायु पारस्परिक क्रियाएँ दशकों तक राजनीतिक एजेंडे में काफी हद तक हाशिये पर रहीं. एक बड़ा महत्वपूर्ण मोड़ 2015 में पेरिस समझौते (COP21) और सतत विकास के लिए 2030 एजेंडा दोनों को अपनाने के साथ आया, जिसमें सतत विकास लक्ष्य 14 - 'पानी के नीचे जीवन' शामिल था. दोनों ढांचों ने जलवायु नियमन में महासागर की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार किया, विशेष रूप से पेरिस समझौते की प्रस्तावना और अनुच्छेद 5 में.
यह राजनीतिक बदलाव महासागर समुदाय के एक अभूतपूर्व जुझारूपन से प्रेरित था, जिसमें वैज्ञानिकों से लेकर नागरिक समाज तक शामिल थे. इसका परिणाम COP21 से पहले, 2014 में 'ओशन एंड क्लाइमेट प्लेटफॉर्म' के शुभारंभ के रूप में सामने आया, जिसका उद्देश्य जलवायु वार्ताओं में महासागर को शामिल करने की वकालत करने वाले एक प्रमुख विज्ञान-नीति इंटरफेस के रूप में कार्य करना था.
वर्तमान में UNFCCC और CBD जैसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ महासागर से जुड़ी समस्याओं को स्वीकार तो कर रही हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के इन दोनों बड़े संकटों से मिलकर मुकाबला करने के लिए उनके बीच जरूरी तालमेल और मजबूत कदमों की आज भी कमी है.
तब से, महासागर धीरे-धीरे UNFCCC की प्रक्रियाओं में अधिक गहराई से जुड़ गया है. इसके प्रमुख मील के पत्थरों में ओशन पाथवे पार्टनरशिप (COP23, 2017), ब्लू कॉप (COP25, 2019), और ओशन एंड क्लाइमेट चेंज डायलॉग तथा ग्लासगो पैक्ट (COP26, 2021) की स्थापना शामिल है, जिसने सदस्य देशों (Parties) को महासागर को सभी UNFCCC प्रक्रियाओं की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए आमंत्रित किया. हाल ही में, ग्लोबल स्टॉकटेक (COP28, 2023) ने शमन और अनुकूलन में महासागर की भूमिका की पुष्टि की, जबकि महासागर को COP30 वर्ल्ड लीडर्स समिट और ग्लोबल मुतीराओ (2025) में और ऊपर उठाया गया. वैश्विक जलवायु कार्रवाई के लिए माराकेच पार्टनरशिप और इसके 'ओशन एंड कोस्टल ज़ोन' समूह, जो COPs में ओशन एक्शन डेज़ का आयोजन करते हैं, गैर-राज्य अभिनेताओं की लामबंदी को रेखांकित करते हैं.
इसके परिणामस्वरूप, ‘बिकॉज़ द ओशन‘ घोषणा (2015) या ‘ओशन फॉर क्लाइमेट‘ रिपोर्ट (2019) जैसे शुरुआती वकालत के प्रयासों के बाद, महासागर धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदानों (NDCs) में शामिल हो गया है. आज, 66 तटीय और द्वीप देशों में से 60 से अधिक ने अपने 2025 के NDCs (राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदानों) में कम से कम एक महासागर-आधारित जलवायु उपाय को शामिल किया है. फिर भी, चुनौतियां बनी हुई हैं, प्रभावी कार्यान्वयन के लिए धन की कमी है, जो मुख्य रूप से विकासशील देशों को प्रभावित कर रही है.
महासागर शमन के विकल्पों का एक महत्वपूर्ण स्रोत प्रदान करता है. ‘द ओशन एज़ अ सॉल्यूशन टू क्लाइमेट चेंज‘ (जलवायु परिवर्तन के समाधान के रूप में महासागर) नामक रिपोर्ट दर्शाती है कि महासागर-आधारित उपाय - पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण से लेकर समुद्री नवीकरणीय ऊर्जा तक - 2050 तक आवश्यक उत्सर्जन में कटौती का 35 प्रतिशत तक योगदान दे सकते हैं. हाल ही में, ‘ओशन ब्रेकथ्रूज़‘ पहल ने उस क्षमता को पांच क्षेत्रीय महत्वपूर्ण बिंदुओं में बदला है: समुद्री संरक्षण, शिपिंग डीकार्बोनाइजेशन (नौवहन कार्बन-मुक्ति), समुद्री नवीकरणीय ऊर्जा, जलीय खाद्य पदार्थ, और तटीय पर्यटन. ये पहल निवेशकों और गैर-राज्य अभिनेताओं के लिए महासागर-आधारित शमन प्रयासों को बड़े पैमाने पर बढ़ाने की आवश्यकता पर प्रकाश डालती हैं.
जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता की हानि आपस में जटिल रूप से जुड़ी हुई ऐसी चुनौतियां हैं, जिन्हें पेरिस समझौते के तहत 1.5 centigrade के लक्ष्य और कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचे तक पहुँचने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है. फिर भी, महासागर शासन अभी भी काफी हद तक अलग-अलग दायरों में काम करता है. UNFCCC और जैव विविधता पर कन्वेंशन (CBD) के तथाकथित ‘सिस्टर कन्वेंशन’ पूरक उद्देश्यों को साझा करते हैं, संस्थाओं में मजबूत तालमेल और सही रणनीति न होने से ऐसी कार्बन-मुक्ति तकनीकें (जैसे mCDR) लागू हो सकती हैं, जो पर्यावरण और प्राकृतिक जीवों के रहने के स्थानों को भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं.
सफल क्रियान्वयन के लिए जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के अलग-अलग नियमों को आपस में जोड़ना होगा, इस दिशा में साल 2028 का 'ग्लोबल स्टॉकटेक' दुनिया के तमाम देशों के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होगा, जहाँ उन्हें ठोस कदमों से यह साबित करना होगा कि वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए महासागर का स्वस्थ होना कितना अनिवार्य है.
महासागर जलवायु और जैव विविधता व्यवस्थाओं को जोड़ने के लिए एक प्राकृतिक ‘ब्लू थ्रेड‘ प्रदान करता है. वर्तमान में UNFCCC और CBD जैसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ महासागर से जुड़ी समस्याओं को स्वीकार तो कर रही हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के इन दोनों बड़े संकटों से मिलकर मुकाबला करने के लिए उनके बीच जरूरी तालमेल और मजबूत कदमों की आज भी कमी है. इस दिशा में कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक ढांचे के लक्ष्य 8 और 11 काफी महत्वपूर्ण हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण में होने वाले बदलावों को रोकना और महासागरों में बढ़ रहे अम्लीकरण के घातक प्रभावों को कम करके प्रकृति को बचाना है. और COP28 का संयुक्त बयान स्पष्ट रूप से महासागर को संबोधित करता है.
राष्ट्रीय रणनीतियों (NDCs और NBSAPs) को एक समान संरेखित करना इन वैश्विक प्रतिबद्धताओं को कार्य में बदलने का एक महत्वपूर्ण अवसर होगा, साथ ही प्रकृति-आधारित दृष्टिकोणों और समुद्री संरक्षित क्षेत्रों जैसे समाधानों को एकीकृत करेगा, जो जलवायु और जैव विविधता दोनों को लाभ पहुंचाते हैं. इन तालमेलों को हाल ही में अपनाए गए राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से परे जैव विविधता संधि (BBNJ समझौता) के साथ या विश्व व्यापार संगठन और अंतर्राष्ट्रीय सीबेड प्राधिकरण के भीतर चल रही वार्ताओं के तहत विकसित करना होगा.
दुनिया के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ महासागर के संकट पर बातचीत करने की नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी सरकारी नीतियों को पूरी ईमानदारी के साथ जमीन पर लागू करने की है. इसके सफल क्रियान्वयन के लिए जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के अलग-अलग नियमों को आपस में जोड़ना होगा, इस दिशा में साल 2028 का 'ग्लोबल स्टॉकटेक' दुनिया के तमाम देशों के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होगा, जहाँ उन्हें ठोस कदमों से यह साबित करना होगा कि वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए महासागर का स्वस्थ होना कितना अनिवार्य है.
गौथियर कार्ल ओशन एंड क्लाइमेट प्लेटफॉर्म के कार्यकारी निदेशक हैं.
सारा बेनबालिट ओशन एंड क्लाइमेट प्लेटफॉर्म की संचार अधिकारी हैं.
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Gauthier Carle is Executive Director of the Ocean & Climate Platform. He works to translate scientific knowledge into concrete policy action, strengthening the integration of ...
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Sara Benbalit is Communications Officer at the Ocean & Climate Platform. She works on strategic and creative communications to integrate the ocean into global climate ...
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