Author : Arpan Tulsyan

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Published on Jul 24, 2025 Updated 4 Days ago

क्यूएस रैंकिंग में भारत की उछाल खुशी की ख़बर तो है, लेकिन कुछ सवाल बने हुए हैं. क्या ये भारतीय शिक्षा प्रणाली में वास्तविक सुधार को दर्शाता है, या फिर रैंकिंग में सुधार पहले से प्रतिष्ठित सिर्फ कुछ संस्थाओं की वजह से हुआ है? क्या शिक्षा में अब भी असमानता बनी हुई है?

शिक्षा में भारत की वैश्विक छलांग: क्या ये उड़ान समावेशी है या केवल चंद सितारों की?

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दुनियाभर के विश्वविद्यालयों को रैंकिंग देने के मामले में क्वाक्वेरेली साइमंड्स (क्यूएस) को सबसे भरोसेमंद और प्रतिष्ठित संस्था माना जाता है. विश्वविद्यालय रैंकिंग के 2026 के संस्करण में कुल 54 भारतीय उच्च शिक्षा संस्थान (एचईआई) शामिल हुए हैं, जिसमें भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली ने देश में अब तक का सर्वोच्च 123वां स्थान हासिल किया है. इतना ही नहीं शिक्षा की गुणवत्ता के मामले में भी भारत चौथे स्थान पर रहा. भारत से आगे सिर्फ अमेरिका, ब्रिटेन और चीन हैं. अपने संबोधन में, भारत के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बताया कि इस साल भारतीय संस्थानों की रैंकिंग में पांच गुना वृद्धि हुई है. 2014 में सिर्फ 11 भारतीय विश्वविद्यालय इसमें शामिल थे, जो 2026 में बढ़कर 54 हो गए हैं. उन्होंने इसका श्रेय राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी), 2020 के तहत शुरू किए गए परिवर्तनकारी सुधारों को दिया. इस लेख का उद्देश्य उनके दावे का आलोचनात्मक विश्लेषण करना है. इस संदर्भ में एक केंद्रीय प्रश्न उठता है: क्या कुछ विशिष्ट संस्थानों की सफलता को भारतीय उच्च शिक्षा की व्यापक कामयाबी माना जा सकता है. 

रैंकिंग सिस्टम में क्या-क्या बदला? 

भारतीय संस्थानों की वैश्विक रैंकिंग में सुधार में दो समानांतर बदलावों का योगदान रहा है. क्यूएस रैंकिंग ने विश्वविद्यालयों का और ज़्यादा समग्र मूल्यांकन करने के लिए अपनी कार्यप्रणाली को बेहतर किया है. अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान नेटवर्क, स्थिरता और रोज़गार के परिणामों जैसे नए संकेतकों ने रैंकिंग को और अधिक बहुआयामी बना दिया है. इसके अलावा, पूर्व संकेतकों को भी परिष्कृत किया गया है. उदाहरण के लिए, पहले रैंकिंग पद्धति में ये देखा जाता था कि कुल उद्धरणों की गणना में उस संस्थान का कितनी बार नाम है, लेकिन अब इसे बदलकर ‘प्रति संकाय (फैकल्टी) उद्धरणों की गणना’ कर दिया गया है. इससे अनुशासन और आकार का संतुलन सुनिश्चित होता है. रैंकिंग में बदलाव के इस तरीके से लिबरल आर्ट्स, सामाजिक विज्ञान, इंजीनियरिंग या तकनीकी में मज़बूत संस्थानों को फायदा होगा, क्योंकि इनके उद्धरण प्राकृतिक या जीवन विज्ञान की तुलना में कम होते हैं. इसके साथ ही कम फैकल्टी वाले छोटे संस्थानों को भी इसका लाभ होगा. इस बदलाव की वजह से ही आईआईटी दिल्ली और आईआईटी बॉम्बे की रैंकिंग में काफ़ी सुधार हुआ है. इन संस्थानों के वैश्विक शोध परिणामों को रैंकिंग में पर्याप्त रूप से जगह मिली. उन्हें रोजगार दिलाने के अपने अच्छे रिकॉर्ड का भी लाभ मिला है. नियोक्ता सर्वेक्षणों में भी इनका प्रदर्शन बेहतर रहा है.

भारत के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बताया कि इस साल भारतीय संस्थानों की रैंकिंग में पांच गुना वृद्धि हुई है. 2014 में सिर्फ 11 भारतीय विश्वविद्यालय इसमें शामिल थे, जो 2026 में बढ़कर 54 हो गए हैं. उन्होंने इसका श्रेय राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी), 2020 के तहत शुरू किए गए परिवर्तनकारी सुधारों को दिया. इस लेख का उद्देश्य उनके दावे का आलोचनात्मक विश्लेषण करना है.

चूंकि रैंकिंग सिस्टम में किए गए ये बदलाव भारत के बहु-विषयक शिक्षण, अनुसंधान और नवाचार के अनुरूप थे. भारत के व्यापक नीतिगत दृष्टिकोण के साथ-साथ वैश्विक साझेदारियों के साथ तालमेल बिठा रहे थे, इसलिए ये संस्थान रणनीतिक और सक्रिय रूप से इस दृष्टिकोण के साथ सामंजस्य बिठाने में सक्षम हुए और वैश्विक मान्यता प्राप्त की. राष्ट्रीय सुरक्षा नीति लागू होने के बाद कई विश्वविद्यालयों ने अपने विदेशी सहयोग, अनुसंधान साझेदारियों और संयुक्त प्रकाशनों में भी वृद्धि की है. इसका फायदा ‘अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान नेटवर्क’ में दिखा और भारतीय संस्थानों के कुल स्कोर में सुधार हुआ है.

भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों का क्या फायदा? 

हालांकि रैंकिंग में सुधार का लाभ अभी भी आईआईटी और कुछ शीर्ष विश्वविद्यालयों तक ही सीमित हैं, फिर भी इससे शिक्षा में प्रणाली स्तर पर बेहतर प्रदर्शन के संकेत मिल रहे हैं. आठ नए भारतीय संस्थानों ने क्यूएस-26 रैंकिंग में प्रवेश किया है. ये इस साल किसी भी देश के लिए नई प्रविष्टियों की सबसे अधिक संख्या है. इस वर्ष के मूल्यांकन में भाग लेने वाले करीब 50 प्रतिशत भारतीय संस्थानों ने अपनी वैश्विक स्थिति में सुधार किया है. इनमें दिल्ली विश्वविद्यालय, वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (वीआईटी), वेल्लोर और चंडीगढ़ विश्वविद्यालय जैसे सार्वजनिक और निजी दोनों विश्वविद्यालय शामिल हैं. ऐसे में ये कहा जा सकता है कि भारतीय संस्थाओं का बेहतर होना सिर्फ आईआईटी तक ही सीमित नहीं है.

फिर भी, सबसे ज़्यादा दिखाई देने वाली तरक्की कुछ खास शीर्ष-स्तरीय संस्थानों में ही देखी जा रही है. ये वो संस्थान हैं, जिन्होंने अपने उद्देश्यों का राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के साथ तालमेल बिठाया है. दूसरे संस्थान खुद को बदलते राष्ट्रीय और वैश्विक मानकों के अनुकूल ढालने में चुनौतीपूर्ण और धीमी गति से आगे बढ़ रहे हैं. हालांकि, उच्च शिक्षा के पारिस्थितिकी तंत्र में प्रगति की गति असमान बनी हुई है, लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने तेज़ रफ्तार पकड़ी है. अग्रणी विश्वविद्यालयों द्वारा किए जा रहे विकास ने मध्यम-स्तरीय संस्थानों के सामने एक महत्वाकांक्षी खाका पेश किया है.

 भारत एक प्रमुख पैमाने पर पिछड़ रहा है, और ये है छात्र-शिक्षक अनुपात. भारत में तृतीयक स्तर पर छात्र-शिक्षक अनुपात का राष्ट्रीय औसत 24:1 है, जबकि आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) का औसत 16:1 है.

इस प्रगति के बावजूद कई महत्वपूर्ण चुनौतियां अभी भी बनी हुई है. भारत एक प्रमुख पैमाने पर पिछड़ रहा है, और ये है छात्र-शिक्षक अनुपात. भारत में तृतीयक स्तर पर छात्र-शिक्षक अनुपात का राष्ट्रीय औसत 24:1 है, जबकि आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) का औसत 16:1 है. कई विश्वविद्यालय लगातार कम कर्मचारियों जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं, जिसका असर शिक्षा की गुणवत्ता और शोध परिणामों पर पड़ता है. वैश्विक छात्रों यानी दुनिया के अलग-अलग देशों के छात्रों की विविधता के मामले में भी भारतीय संस्थानों की रैंकिंग खराब है. हालांकि इसे बढ़ाने के लिए कई पहल की गई हैं, फिर भी विदेशी छात्रों का नामांकन लक्ष्य से कम है. 2024-25 में करीब 72 हज़ार विदेशी छात्रों ने नामांकन कराया था, जबकि स्टडी इन इंडिया (एसआईआई) कार्यक्रम के तहत 2 लाख छात्रों का लक्ष्य रखा गया था. इसके अलावा, एनईपी में जिस भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (एचईसीआई) की बात कही गई है, उसकी स्थापना में देरी एक और गंभीर चुनौती पेश करती है. इस आयोग का काम उच्च शिक्षा संस्थानों का नियमन करना होगा. इन खामियों को दूर करना प्रणालीगत सुधार के लिए आवश्यक है, जिससे ये सुनिश्चित किया जा सके कि भारत की रैंकिंग में सुधार सिर्फ कुछ वैश्विक स्तर की संस्थाओं तक ही सीमित न रहे, बल्कि इसके साथ एक प्रणालीगत सुधार भी हो. 

सुधार कार्यक्रम को जारी रखना

उच्च शिक्षा इकोसिस्टम में हालिया दिनों में मिले लाभों को दीर्घकालिक प्रणालीगत सुधारों में शामिल करना आवश्यक है. इसके लिए भारत को छह महत्वपूर्ण रणनीतियों को प्राथमिकता देनी होगी. पहला, भारत को लक्षित वित्त पोषण के ज़रिए मध्यम और राज्य स्तरीय सार्वजनिक विश्वविद्यालयों का समर्थन करना होगा. अग्रणी उच्च शिक्षा संस्थानों द्वारा इन विश्वविद्यालयों का मार्गदर्शन और अनुसंधान क्षमता निर्माण किया जाना भी ज़रूरी है. इससे समावेशी प्रगति को बढ़ावा मिलेगा और कई और संस्थानों के लिए वैश्विक रैंकिंग में प्रवेश का रास्ता साफ होगा. दूसरा, शैक्षणिक कर्मचारियों का विस्तार और समर्थन के साथ भर्ती प्रक्रिया में तेज़ी लानी होगी. इसके अलावा उन्हें अपने साथ बनाए रखने और उनका लगातार पेशेवर विकास करना होगा. तीसरा, भारत को ऐसे संस्थानों के माध्यम से क्षेत्रीय श्रेष्ठता को प्रोत्साहित करना चाहिए जो कुछ चुनिंदा विषयों—जैसे कृषि, जीवन विज्ञान या मानविकी—में उत्कृष्टता प्रदर्शन करते हैं. इसका फायदा ये होगा कि इन विषयों की वैश्विक रैंकिंग में चमक सकेंगे. प्रवासी फैकल्टी आदान-प्रदान और विजिटिंग फेलो कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करने से इन बदलावों को सही दिशा में और बढ़ावा मिल सकता है.

भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की असली परीक्षा इस बात से नहीं होगी कि सूची में कौन शीर्ष पर है, बल्कि इस बात से होगी कि इस दौरान कितने संस्थान आगे बढ़ते हैं.

चौथा, स्टडी इन इंडिया कार्यक्रम में सुधार किया जाना चाहिए, जिससे भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों की पहुंच और पहचान को मज़बूत किया जा सके. इसके लिए वीज़ा प्रक्रियाओं को सरल बनाया जा सकता है. विदेशी छात्रों के विविध समूहों को आकर्षित करने के लिए छात्रवृत्ति और वित्तीय सहायता प्रदान की जा सकती है. पांचवां, वैश्विक पाठ्यक्रम को एकीकृत करके, अंतर्राष्ट्रीय शिक्षण पद्धतियों को शामिल करने पर विचार करना चाहिए. इसके अलावा अंतर-सांस्कृतिक शिक्षण वातावरण को बढ़ावा देकर देश में अंतर्राष्ट्रीयकरण को तेज़ किया जा सकता है. ये दृष्टिकोण वैश्विक दक्षताओं को बढ़ावा देगा और भारत के युवाओं को अंतर-सांस्कृतिक सहयोग और वैश्विक करियर के लिए तैयार करेगा. अंतर्राष्ट्रीय छात्र भी भारत की और अधिक संख्या में आकर्षित होंगे. छठा, और सबसे ज़रूरी, भारत को उच्च शिक्षा पारिस्थितिकी तंत्र की प्रणालीगत नींव को भारतीय उच्च शिक्षा आयोग के माध्यम से मज़बूत करना होगा. इस आयोग ना सिर्फ नियामक ढांचों को एकीकृत करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, बल्कि संयुक्त अनुसंधान, छात्र और फैकल्टी पर भी ध्यान देना चाहिए. भारतीय संस्थानों द्वारा सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) में योगदान पर नज़र रखने के साथ-साथ रैंकिंग साक्षरता को भी बढ़ाना चाहिए.

निष्कर्ष

भारत के शीर्ष शिक्षा संस्थानों का ऊपर की ओर बढ़ना, रैंकिंग में सुधार लाना एक शुरुआत है. ये एक रिले रेस है, जहां व्यवस्थागत प्रणाली में प्रगति लाते हुए लगातार आगे बढ़ाना होगा. अगले कुछ वर्षों में, सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में संरचनात्मक कमियों को दूर करना और एक सामूहिक गति का निर्माण करना बहुत महत्वपूर्ण है. भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की असली परीक्षा इस बात से नहीं होगी कि सूची में कौन शीर्ष पर है, बल्कि इस बात से होगी कि इस दौरान कितने संस्थान आगे बढ़ते हैं.


अर्पण तुलस्यान ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोसमेसी में सीनियर फेलो हैं.

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