Author : Satish Misra

Published on Jan 16, 2019 Updated 0 Hours ago

किसी विशिष्ट इंटरव्यू के लिए किस पत्रकार या किस मीडिया संस्थान को चुना जाय — यह बात प्रधान मंत्री की पसंद-नापसंद पर निर्भर करता है।

प्रधान मंत्री की छवि सुधार के प्रयास और उनका साक्षात्कार

भारतवासिओं ने नए वर्ष के पहले दिन सुबह जब अपने टी वी पर समाचार चैनल खोले तो एक सुखद आश्चर्य में पड़ गये। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी हर तरफ चर्चाओं के केंद्र में थे क्योंकि सभी प्रमुख समाचार चैनल निरपवाद रूप से, उनके विशिष्ट साक्षात्कार को प्रसारित कर रहे थे जो उन्होंने समाचार एजेंसी “एशियन न्यूज़ इंटरनेशनल” की स्वामिनी-संपादक स्मिता प्रकाश को दिया था।

यह इंटरव्यू एक ऐसी विस्तृत कवायद के रूप में था जो जनता के विश्वास को फिर से प्राप्त करने के नए तौर तरीके और हथकंडे अपनाने के लिए की गयी थी ताकि आगामी चुनावों में भाजपा को पुनः जिताया जा सके। वस्तुतः यह मीडिया को दिया गया एक इतना विस्तृत साक्षात्कार था कि इसमें लगभग सभी प्रकार के मुद्दे समाहित थे। अगले दिन, यह इंटरव्यू सभी समाचार पत्रों में मुख्य पृष्ठों के सर्वप्रमुख खबर के रूप देखा एवं पढ़ा गया। संक्षेप में, मोदी ने एक व्यापक जान सम्पर्क कवायद के अंतर्गत, मीडिया का लाजबाब उपयोग किया था।

साक्षात्कार की पूरी तैयारी की गयी थी क्योंकि इंटरव्यू में किये जाने वाले प्रश्न प्रधान मंत्री के पास पहले ही पहुँच गए थे तथा उन्होंने उन प्रश्नों के जबाब तैयार कर रखे थे एवं संभवतः उन उत्तरों को कंठस्थ भी कर लिया था या उनको शीशे का सामने बैठकर रिहर्सल भी कर लिया था। मोदी ने अनेक प्रकार के मुद्दों को छुआ था लेकिन इंटरव्यू में जबाबों से पैदा होने वाले प्रश्नों — प्रति प्रश्नों का नितांत अभाव था। यहां यह कहना फिज़ूल न होगा कि यह प्रति-प्रश्न ही इंटरव्यू करने वाले की गहराई तथा मुद्दों के बारे में उसकी समझ एवं पकड़ का परिचायक होते हैं।

मई 2014, अर्थात जब से वे सत्ता में आये हैं, तब से, वे प्रेस कांफ्रेंस से रूबरू होने से कतराते आये हैं और उन्होंने एक भी प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन नहीं किया है। इस देश के इतिहास में मोदी पहले प्रधान मंत्री हैं जिन्होंने एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है।

एक मिसाल प्रस्तुत करते हुये तथा अगर सही शब्दों का प्रयोग किया जाये तो, इस सुस्थापित परंपरा को तोड़ते हुये कि जब संसद का सत्र चल रहा हो तब कोई इंटरव्यू नहीं दिया जाता, प्रधान मंत्री ने ANI के प्रतिनिधि से नीतिगत मुद्दों पर बात करना उचित समझा।

यह प्रदर्शित करते हुए कि उनकी राजनैतिक सूझबूझ अभी तक पैनी है, मोदी ने आम जनता तक अपनी पहुँच बनाने के लिये, एक समाचार एजेंसी को इंटरव्यू देने का रास्ता अपनाया जिससे कि उनके खिलाफ बढ़ते ही जा रहे असंतोष के ज्वार को कम किया जा सके, शांत किया जा सके। मई, 2014 अर्थात जब से वे सत्ता में आये हैं, तब से, वे प्रेस कांफ्रेंस से रूबरू होने से कतराते आये हैं और उन्होंने एक भी प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन नहीं किया है। इस देश के इतिहास में मोदी पहले प्रधान मंत्री हैं जिन्होंने एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है।

मीडिया के साथ 90 मिनट तक की गई लम्बी बातचीत में यह छाप छोड़ने की कोशिश की गई कि मोदी कोई गलती कर ही नहीं सकते, वे तो एक सुपरमानव हैं। वे अकेले ही ‘नेता’ शब्द के असली अर्थ पर खरे उतरते हैं, ऐसा प्रयास था और ऐसा ही उद्देश्य था इंटरव्यू का। पूरी बातचीत में, ‘मैं’ शब्द छाया हुआ था तथा इसके साथ ही यह सन्देश देने की कोशिश की गयी थी कि “हमारी जनता को अर्थात — आम जनता को” उनकी जरूरत है, वर्ना देश रसातल में चला जायेगा, देश का सर्वनाश हो जायेगा।

मीडिया के साथ 90 मिनट तक की गई लम्बी बातचीत में यह छाप छोड़ने की कोशिश की गई कि मोदी कोई गलती कर ही नहीं सकते, वे तो एक सुपरमानव हैं।

मोदी इस तथ्य के प्रति सचेत हैं कि उनकी लोकप्रियता में कमी आने लगी है, जैसा कि राजस्थान, मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ जैसे हिंदी भाषी राज्यों में भाजपा में मिली हार से साफ़ हो गया है तथा यह भी सामने आ गया है की तेलंगाना एवं मिजोरम में भी भाजपा कुछ ख़ास नहीं कर पायी है, इसलिए उन्होंने देश के सबसे पुरानी पार्टी अर्थात कांग्रेस, जिसकी लोकप्रियता का ग्राफ ऊपर उठता दिखाई दे रहा है, पर फिर से जबरदस्त प्रहार करना शुरू कर दिया है। इसके चलते उन्होंने कांग्रेस वकीलों पर आरोप लगाया कि वे अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण में सर्वोच्च न्यायलय में बाधाएं डाल रहे हैं। मोदी ने उनसे कहा कि वे “शांति, सुरक्षा एवं सौहार्द के हित” में ऐसा करने से बाज आयें।

मोदी ने कांग्रेस पर आरोप लगाने की कोशिश की और कहा कि “इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि पिछले 70 साल तक सत्ता में बैठे हुए लोगों ने इस (अयोध्या) मुद्दे के समाधान को टालने की, उसमे रूकावट डालने की पूरी कोशिश की।”

यह बात चकित करने वाली ही कही जायेगी कि प्रधान मंत्री ने राम मंदिर के मुद्दे के विस्तार में जाने के लिए ऐसा समय चुना, जब सर्वोच्च न्यायलय केवल तीन दिन बाद ही उन अपीलों की सुनवाई की तारीख तय करने वाला था जिन अपीलों में रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद क मालिकाना हक़ के सम्बन्ध में इलाहाबाद उच्च न्यायलय द्वारा दिये गये आदेश को चुनौती दे गयी है। सामान्यतः, प्रधान मंत्री से यह अपेक्षा की जाती है कि जब संसद सत्र चल रहा हो, तो वे नीतिगत मुद्दों पर संसद के बाहर कुछ भी कहने से बचेंगे पर ऐसा उन्होंने करना सही नहीं समझा।

मोदी ने नोटबंदी का पक्ष लेते हुए कहा कि किसी भी बड़े बदलाव से: “ग्रोथ” अर्थात विकास की गति धीमी हो जाती है किन्तु देश की अर्थव्यवस्था के लिए यह जरूरी था। वे उन सभी लाभों का भी जिक्र करने से बचते रहे, जो उन्होने नवंबर 2016 में नोटबंदी की घोषणा करते हुए अपने देश के नाम सन्देश में गिनाये थे, लेकिन उन्होंने इस कार्यवाही के पक्ष में बोते हुए कहा कि अब टैक्स की परिधि में पहले से ज्यादा लोग आ गए हैं तथा अब ईमानदारी का वातावरण बन गया है।

नरेन्द्र मोदी, सतीश मिश्रा, मोदी
मोदी ने कांग्रेस पर आरोप लगाने की कोशिश की और कहा कि “इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि पिछले 70 साल तक सत्ता में बैठे हुए लोगों ने इस (अयोध्या) मुद्दे के समाधान को टालने की, उसमे रूकावट डालने की पूरी कोशिश की।” फ़ोटो: Press Trust of India

सबरीमाला तथा तीन तलाक़ के मुद्दों पर भाजपा के अलग-अलग रुख को सही ठहराते में चतुराई से काम लेते हुए मोदी ने कहा कि यह दोनों चीज़ें अलग-अलग हैं। उन्होंने कहा कि पकिस्तान सहित अन्य बहुत सारे इस्लामी देशों में तीन तलाक़ पर रोक है। उन्होंने कहा कि यह धर्म या परंपरा का मामला नहीं है, यह तो लैंगिक समानता तथा सामाजिक न्याय का मामला है। जहाँ तक सबरीमाला का प्रश्न है यह प्रथा, परंपरा एवं आस्था का मामला है, लैंगिक समानता का नहीं।

तीन, हिंदी भाषी राज्यों में भाजपा की हार के बाद हतोत्साहित हुये पार्टी कार्यकर्ताओं में नए जोश एवं उत्साह का संचार करने के उद्देश्य से, मोदी ने कहा कि यह हार कोई बड़ी चीज़ नहीं है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में जहाँ 15 साल के शासन के विरुद्ध सत्ता विरोधी सोच थी, वहीँ मध्य एवं राजस्थान में तो किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला है।

जाहिर है, मोदी का यह कथन उन विपक्षी दलों की एकता के प्रयासों के महत्त्व को काम करने की कोशिश थी, जो भाजपा का सामना करने के लिये संघठित हो रहे हैं। उन्होंने महागठबंधन को निशाना बनाते हुये कहा कि विभिन्न विपक्षी राजनेता सिर्फ स्वयं की बचने के लिए इक्कठा हो रहे हैं अर्थात साथ आ रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि वे लोग किसी भी एक मुद्दे पर एक स्वर में नहीं बोल सकते। प्रधान मंत्री ने कहा कि उनका एजेंडा तो मोदी हैं।

बढ़ती जा रही चुनावी असुरक्षा की चिंता को छुपाने के लिए सहस का मुखौटा पहनते हुए मोदी ने कहा कि इस बात का निर्णय तो भारत की जनता ही करेगी की चुनाव में क्या करना है और किसको चुनना है। उन्होंने जोर देते हुए कहा, “अगले चुनाव जनता बनाम गठबंधन होंगे। मोदी तो जनता के स्नेह एवं आशीर्वाद का प्रकटीकरण मात्र है।”

अपने सर्वोत्तम राजनैतिक सूझबूझ से काम लेते हुए, मोदी ने राफेल लड़ाकू विमान विवाद की दिशा बदलते हुए कहा कि संबंधित आरोप व्यक्तिशः उनके विरुद्ध नहीं था, यह तो उनकी सरकार के खिलाफ था।

यह पहला अवसर था, जब मोदी ने लिंचिंग (भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मौत के घाट उतर देना) की घटनाओं की निंदा की। उन्होंने कहा कि ऐसी कोई भी घटना किसी भी सभ्य समाज की परिचायक नहीं हैं। उन्होंने कहा कि लिंचिंग पूरी तरह से गलत और निंदनीय है। इसके साथ ही, इन घटनाओं की दार्शनिक व्याख्या करने का प्रयास करते हुए उन्होंने कहा कि यह घटनाएं सामाजिक बुराइयों का परिणाम हैं। यह पूछते हुए कि क्या यह सब (लिंचिंग) 2014 के बाद शुरू हुई हैं, मोदी ने कहा, “इस स्थिति को सुधारने के लिए हमको मिलकर काम करना चाहिए।”

अपने सर्वोत्तम राजनैतिक सूझबूझ से काम लेते हुए, मोदी ने राफेल लड़ाकू विमान विवाद की दिशा बदलते हुए कहा कि संबंधित आरोप व्यक्तिशः उनके विरुद्ध नहीं था, यह तो उनकी सरकार के खिलाफ था। उन्होंने कहा, “अगर कोई आरोप व्यक्तिशः मेरे खिलाफ है तो उन्हें ढूंढ़ने दीजिए कि किसने क्या दिया, कब दिया, कहाँ दिया, तथा कितना दियाऔर कहाँ दिया, यह प्रकरण तो सर्वोच्च न्यायलय ने ही निपटा दिया है।”

अब कुछ शब्द उस विवाद के बारे में, जो उस समय पैदा हुआ, जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने इस इंटरव्यू को “मंचित” नाटक बताया तथा कहा कि इस नाटक को एक “आज्ञाकारी पत्रकार” ने आयोजित किया इस विवाद पर कुछ शब्द कहना जरूरी हैं ताकि संबधित मुद्दे को सही परिप्रेक्ष में समझा सके।

किसी विशिष्ट इंटरव्यू के लिए किस पत्रकार या किस मीडिया संस्थान को चुना जाय — यह बात प्रधान मंत्री की पसंद-नापसंद पर निर्भर करता है। सारे प्रश्नों को इंटरव्यू देने वाले तक पहले पहुंचा देना भी अब ठीक मन जाने लगा है ताकि इंटरव्यू देने वाला व्यक्ति किसी मुद्दे से संबंधित जानकारी एवं तथ्य जूता सके, उनकी पूर्व तैयारी कर सके। यहाँ तक कोई अंतर्विरोध नहीं है। पर इसके साथ यह भी एक पत्रकार का अधिकार है कि वोह पूरक प्रश्न पूछे या पूछ सके। यहाँ यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि अगर पत्रकार पूरक या प्रति प्रश्न नहीं पूछ रहा है या नहीं पूछ पा रहा है तो वोह अपने पाठकों या दर्शकों के प्रति अपने उत्तरदायित्व को निभाने में कोताही कर रहा है। उसकी अपनी उनके (पाठकों या दर्शकों ) के प्रति जबाबदेही बनती है की उन मुददों को स्पष्ट करे जो उत्तर से स्पष्ट नहीं हो पा रहे हैं। अगर इसमें कोताही हुई है तो एक बड़ी चूक मानी जाती है। इस परिप्रेक्ष में प्रति-प्रश्नों के अभाव में, किसी भी इंटरव्यू को “नाटक” के लावा और क्या कहा जा सकता है?

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