बेरोज़गार युवाओं को नकद भत्ता देने की योजनाएं अचानक क्यों बढ़ने लगी हैं- क्या यह बदलती अर्थव्यवस्था की मजबूरी है या चुनावी रणनीति? पढ़िए, ये योजनाएं युवाओं को सशक्त बना रही हैं या रोजगार संकट पर सिर्फ अस्थायी मरहम हैं.
राज्य सरकारों द्वारा किया जाने वाला नकद हस्तांतरण भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में सामाजिक सुरक्षा और गरीबी हटाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है. हालांकि, ऐसे अधिकांश कार्यक्रम महिलाओं और किसानों से जुड़े होते हैं ताकि चुनावी लाभ पाया जा सके लेकिन अब नकद हस्तांतरण लाभार्थियों का एक नया वर्ग उभर रहा है, जो है- बेरोज़गार युवा. क़रीब दस राज्य सरकारें अपने बेरोज़गार युवाओं को नकद राशि बांटती हैं, जो हैं- बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु. नकद आधारित नीतियों पर काम करने वाली संस्था प्रोजेक्ट DEEP के एक विश्लेषण के मुताबिक, अभी लागू 11 कार्यक्रमों में से क़रीब छह 2022 और 2024 के बीच शुरू हुए हैं. कोविड-19 के कारण पैदा हुई आर्थिक दिक्क़तों के बाद, विश्व स्तर पर और भारत में भी, नकद हस्तांतरण एक लोकप्रिय नीति साबित हुई है.
नकद सहायता वाली ये योजनाएं मुख्य रूप से पढ़े-लिखे बेरोज़गार युवाओं को केंद्र में रखकर बनाई गई हैं क्योंकि ज़रूरी योग्यता होने के बावजूद श्रम बाज़ार में उन्हें जगह नहीं मिल पा रही है. उदाहरण के लिए, कर्नाटक की युवा निधि योजना डिग्रीधारकों को 3,000 रुपये और डिप्लोमाधारकों को 1,500 रुपये का मासिक बेरोज़गारी भत्ता दो साल के लिए देती है. इसी तरह, हरियाणा में सक्षम युवा योजना के माध्यम से स्कूली शिक्षा पूरी कर चुके किशोरों को 1,200 रुपये, स्नातकों को 2,000 रुपये और स्नातकोत्तरों को 3,500 रुपये का मासिक भत्ता दिया जाता है. बिहार में मुख्यमंत्री निश्चय स्वयं सहायता भत्ता योजना पहले केवल स्कूली शिक्षा पूरी कर चुके किशोरों पर लागू थी लेकिन पिछले साल चुनाव से ठीक पहले इसे बढ़ाकर स्नातक तक कर दिया गया क्योंकि युवा बेरोज़गारी एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बनकर उभरी थी. बिहार में अनुपात के हिसाब से देश की सबसे बड़ी युवा आबादी रहती है, लेकिन यह राज्य रोज़गार-निर्माण के लिए संघर्ष करता रहा है, जिस कारण यहां से पलायन भी खूब होता है.
यह सही है कि इनमें से ज़्यादातर योजनाओं में कोई शर्त नहीं रखी गई है लेकिन कुछ कार्यक्रमों को कौशल विकास या कार्य-आधारित प्रशिक्षण से जोड़ा गया है जिनको अक्सर ‘नकद +’ नज़रिया कहा जाता है. इसमें नकद सहायता के साथ-साथ व्यावसायिक प्रशिक्षण या कौशल विकास पर भी ध्यान दिया जाता है. भारत में, जहां शिक्षा, कौशल और श्रम बाज़ार की ज़रूरतों के बीच असंतुलन एक प्रमुख चुनौती के रूप में मौजूद है, वहां नकद सहायता को कौशल विकास से जोड़ना विशेष रूप से ज़रूरी है. राजस्थान की मुख्यमंत्री युवा संबल योजना में लाभार्थियों के लिए कौशल विकास और इंटर्नशिप अनिवार्य शर्त है. बिहार सरकार की योजना में भाषा, संचार कौशल, बुनियादी कंप्यूटर ज्ञान और व्यवहार कुशलता में प्रशिक्षण ज़रूरी है. हरियाणा में मासिक हस्तांतरण के अलावा, लाभार्थियों को सरकारी विभागों, बोर्डों या निगमों से काम दिए जाते हैं, जिनमें उनको मानदेय भी मिलता है. इनसे युवाओं को कामकाज का व्यावहारिक अनुभव मिलता है.
भारत में, जहां शिक्षा, कौशल और श्रम बाज़ार की ज़रूरतों के बीच असंतुलन एक प्रमुख चुनौती के रूप में मौजूद है, वहां नकद सहायता को कौशल विकास से जोड़ना विशेष रूप से ज़रूरी है. राजस्थान की मुख्यमंत्री युवा संबल योजना में लाभार्थियों के लिए कौशल विकास और इंटर्नशिप अनिवार्य शर्त है.
देश में कौशल और रोज़गार के बीच कितनी असमानता है, यह 2024-25 के आर्थिक सर्वेक्षण में साफ़-साफ़ दिखा था, जिसमें बताया गया था कि केवल 8.25 प्रतिशत स्नातक ही अपनी योग्यता के अनुसार काम खोज पाते हैं, जबकि लगभग 50 प्रतिशत स्नातक ऐसे ‘प्राथमिक’ या ‘अर्ध-कुशल’ पदों पर काम कर रहे हैं, जिसके लिए उस डिग्री की ज़रूरत नहीं है, जो उनके पास है. सर्वेक्षण में बताया गया था कि श्रम बाज़ार की ज़रूरतों के अनुसार शिक्षा और कौशल विकास नीतियों में सुधार किया जाना चाहिए.
शिक्षित युवाओं में बेरोज़गारी- वैश्विक और भारतीय संदर्भ
बेशक, राज्यों के ये कार्यक्रम शिक्षित युवाओं को श्रम बाज़ार की ख़ामियों से बचाने की कोशिश करते हैं लेकिन भारत एक महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी रह रही है. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट बताती है कि 2021 में कुल जनसंख्या का 27 फीसदी हिस्सा युवाओं का था जो 2036 तक घटकर 23 फीसदी तक हो सकता है. भारत में हर साल लगभग 70-80 लाख लोग श्रम-बल में जुड़ते हैं. ऐसे में, जनसांख्यिकीय लाभांश को पाने के लिए इन नए नौजवानों के लिए रोज़गार पैदा करना ज़रूरी है.
भारत में पढ़े-लिखे नौजवानों में बेरोज़गारी की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है क्योंकि उच्च शिक्षा जिस तरह बढ़ी है, उतनी तेजी से नौकरियां पैदा नहीं हो सकी हैं. आवधिक बल श्रम सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में बेरोज़गारी दर सबसे अधिक शिक्षित युवाओं में है. स्नातकों में बेरोज़गारी दर क़रीब 13 प्रतिशत है, जबकि अशिक्षितों में क़रीब-क़रीब शून्य है. भारतीय नौजवान भी व्यावसायिक रोज़गार की तुलना में शिक्षा और दफ़्तरी कामकाज को ही अधिक महत्व देते हैं.
देश में कौशल और रोज़गार के बीच कितनी असमानता है, यह 2024-25 के आर्थिक सर्वेक्षण में साफ़-साफ़ दिखा था, जिसमें बताया गया था कि केवल 8.25 प्रतिशत स्नातक ही अपनी योग्यता के अनुसार काम खोज पाते हैं, जबकि लगभग 50 प्रतिशत स्नातक ऐसे ‘प्राथमिक’ या ‘अर्ध-कुशल’ पदों पर काम कर रहे हैं, जिसके लिए उस डिग्री की ज़रूरत नहीं है, जो उनके पास है.
भारत में शिक्षा, रोज़गार या प्रशिक्षण से दूर रहने वाले नौजवानों का अनुपात काफ़ी अधिक है. यह 2024 में क़रीब 25 प्रतिशत था जबकि वैश्विक औसत 20 प्रतिशत है. हालांकि, ‘ग्लोबल साउथ’ की यह सामान्य समस्या है जैसे - ब्राजील में ऐसे नौजवानों का अनुपात क़रीब 20 प्रतिशत है तो दक्षिण अफ्रीका में लगभग 34 प्रतिशत. सीमित रोज़गार-निर्माण, शिक्षा व व्यावसायिक प्रशिक्षण की कमज़ोर व्यवस्था और लैंगिक विषमता जैसी मुश्किलों ने इन देशों में नौजवानों को श्रम बाज़ार से दूर किया है.
नौजवान पुरुषों की तुलना में युवा महिलाएं शिक्षा और रोज़गार में ज़्यादा पीछे हैं. इन महिलाओं का प्रतिशत 48.4 है जबकि पुरुषों का 9.8. श्रम बल में लैंगिक असमानता कई कारणों से दिखती है जिनमें मुख्य रूप से सामाजिक प्रतिबंध और उपयुक्त नौकरियों की कमी महत्वपूर्ण है. किसी देश के न्यायसंगत और टिकाऊ आर्थिक विकास को यह स्थिति लंबे समय तक प्रभावित करती है.
अधिकांश विकसित देशों में बेरोज़गारी भत्ता तब दी जाती है, जब नौकरी छूट जाए. इससे संकट में घिरे परिवारों को मदद मिलती है. शोध से पता चलता है कि इस तरह की योजनाएं अर्थव्यवस्था को स्थिर करने में सहायक हो सकती हैं लेकिन यदि भत्ता उदारता से बांटी जाए तो बेरोज़गारी का समय लंबा भी हो सकता है जिससे समग्र बेरोज़गारी दर बढ़ सकती है. रोज़गारहीन विकास, बार-बार के आर्थिक झटकों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते असर को देखें तो कई देशों में बेरोज़गारी भत्ते सामाजिक सुरक्षा के महत्वपूर्ण कारक बन सकते हैं.
आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 ने सरकारों द्वारा परिवारों को दी जाने वाली नकद राशि में वृद्धि की ओर इशारा करते हुए चेतावनी दी है कि बेशक ऐसी योजनाएं क्षणिक लाभ देती हैं लेकिन इनकी रूपरेखा, निरंतरता और दायरा, राज्य की अर्थव्यवस्था को कमज़ोर कर सकते हैं.
‘ग्लोबल साउथ’ के देशों ने युवा बेरोज़गारी से निपटने के लिए अपने-अपने उपाय अपनाने शुरू भी कर दिए हैं. जैसे, चिली की यूथ एंप्लॉयमेंट सब्सिडी (यह सबसे कमज़ोर परिवारों के श्रमिकों को सहायता देती है) और दक्षिण अफ्रीका की सोशल रिलीफ ऑफ डिस्ट्रेस ग्रांट योजना (यह बेरोज़गारों को कुछ समय तक मासिक लाभ देती है) जैसी योजनाओं से रोज़गार पाने की संभावना 25 प्रतिशत तक बढ़ी है.
भारत में मौजूदा बेरोज़गारी भत्ता योजनाओं के श्रम बाज़ार या कौशल विकास पर पड़ने वाले प्रभाव को जांचने के लिए कुछ ही अध्ययन हुए हैं. कर्नाटक सरकार के मुताबिक, उसकी युवा निधि योजना से संबंधित कौशल-आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम ‘युवा निधि प्लस’ में नौजवानों की भागीदारी बहुत कम है जो बताती है कि उनमें कौशल विकास के प्रति रुचि कम है. राजस्थान में ऑडिट रिपोर्ट बताती है कि मुख्यमंत्री युवा संबल योजना के 41 प्रतिशत लाभार्थी 21 से 25 वर्ष वाले नौजवान हैं जो बेरोज़गारी भत्ता पाने के लिहाज़ से बहुत छोटी उम्र है. इनसे इन योजनाओं की रूपरेखा और लक्ष्य को लेकर चिंताएं पैदा होती हैं.
साफ़ है, महिलाओं को लक्ष्य बनाकर शुरू की गई योजनाओं की तरह आने वाले समय में राज्य सरकारों को पढ़े-लिखे बेरोज़गार युवाओं के लिए भी योजनाएं बनानी होंगी. आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 ने सरकारों द्वारा परिवारों को दी जाने वाली नकद राशि में वृद्धि की ओर इशारा करते हुए चेतावनी दी है कि बेशक ऐसी योजनाएं क्षणिक लाभ देती हैं लेकिन इनकी रूपरेखा, निरंतरता और दायरा, राज्य की अर्थव्यवस्था को कमज़ोर कर सकते हैं. इतना ही नहीं, ये विकास को आगे बढ़ाने वाले सरकारी निवेश को भी प्रभावित कर सकते हैं. इसका मतलब यह भी है कि ये कार्यक्रम सम्मानजनक रोज़गार पैदा करने वाली नीतियों का विकल्प नहीं बन सकते.
सुनैना कुमार ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी की निदेशक और वरिष्ठ फेलो हैं
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Sunaina Kumar is Director - CNED and Senior Fellow at the Observer Research Foundation. She previously served as Executive Director at Think20 India Secretariat under ...
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