अब युद्ध कौशल बहुत हद तक डेटा पर निर्भर होता जा रहा है. एज कंप्यूटिंग एक ऐसी तकनीक है जो सेना को युद्ध के मैदान के करीब रहकर जानकारी को प्रोसेस करने और सुरक्षित रखने में मदद करती है. इससे जानकारी एक जगह से दूसरी जगह प्रेषित करने में लगने वाला समय कम हो जाता है और फ़ैसले तेज़ी से लिए जाने में मदद मिलती है.
Image Source: Wikimedia Commons
ऑपरेशन सिंदूर भारतीय सेना की युद्ध रणनीति के लिए एक बड़ा बदलाव लेकर आया है. इस ऑपरेशन में सेना ने आधुनिक तकनीक और बेहतर कमांड का इस्तेमाल किया, जिससे पाकिस्तान के ख़िलाफ़ उन्हें युद्ध में बढ़त मिली. इस दौरान यह भी साफ़ हुआ कि तेज और भरोसेमंद कम्युनिकेशन कितना ज़रूरी है, क्योंकि सेना ने ज़मीन, हवा, पानी, साइबर और अंतरिक्ष जैसे सभी मोर्चों पर एक साथ कई ख़तरों का सामना किया. भविष्य में युद्ध के लिए तैयार रहने के लिए, भारतीय सेना को अपने संचार नेटवर्क को और मज़बूत बनाना होगा.
सेना के लिए यही वह विभाग है जहां एज कंप्यूटिंग बहुत काम आ सकती है. यह तकनीक डेटा को युद्ध के मैदान के पास ही प्रोसेस और स्टोर करने में मदद करती है, जिससे समय और संसाधन दोनों में बचत हो सकती हैं और ज़रूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई करने की काबलियत भी हासिल होती है. दुनिया भर की सेनाएं 5G और नई कंप्यूटिंग क्षमताओं का इस्तेमाल करके एज कंप्यूटिंग पर प्रयोग कर रही हैं. इस लेख में हम इसी एज कंप्यूटिंग के फ़ायदों और भारतीय सेना के लिए इसके महत्व के बारे में चर्चा करेंगे.
आजकल ज़्यादातर सैन्य संचार या कम्युनिकेशन क्लाउड कंप्यूटिंग पर निर्भर हैं. इसमें संवेदनशील सैन्य डेटा को दूर के सर्वर पर स्टोर और प्रोसेस किया जाता है, जो अक्सर उस जगह से बहुत दूर होते हैं जहां डेटा का स्रोत होता है. सेना के लिए यह तरीक़ा तीन बड़ी समस्याएं पैदा करता है जिसमे लेटेंसी (विलंबता), सिक्योरिटी (सुरक्षा) और कनेक्टिविटी शामिल है.
दुनिया भर की सेनाएं 5G और नई कंप्यूटिंग क्षमताओं का इस्तेमाल करके एज कंप्यूटिंग पर प्रयोग कर रही हैं. इस लेख में हम इसी एज कंप्यूटिंग के फ़ायदों और भारतीय सेना के लिए इसके महत्व के बारे में चर्चा करेंगे.
पहली और सबसे बड़ी समस्या है नेटवर्क कनेक्टिविटी की. क्लाउड कंप्यूटिंग के लिए तेज और स्थिर इंटरनेट की ज़रूरत होती है. लेकिन सैन्य अभियान अक्सर दूर-दराज या सीमावर्ती इलाक़ों में होते हैं जहां इंटरनेट कनेक्शन बहुत अच्छा नहीं होता अथवा नेटवर्क कवरेज लिमिटेड होती है. ऐसे में क्लाउड कंप्यूटिंग ठीक से काम नहीं कर पाती.
दूसरी बड़ी समस्या है विलंबता, यानी डेटा को भेजने और प्राप्त करने में लगने वाला समय. युद्ध में एक-एक सेकंड की कीमत होती है. डेटा इकट्ठा करने और उस पर फ़ैसला लेने में जितना कम समय लगे, उतना अच्छा होता है. क्लाउड सिस्टम में डेटा को दूर के सर्वर तक जाकर वापस आने में देरी हो सकती है, जिससे फ़ैसले लेने में भी अक्सर देरी होती है.
आखिरी समस्या है साइबर हमलों और विदेशी सर्विलांस के चलते डेटा चोरी का ख़तरा. कई संघर्ष वाले इलाकों में साइबर सुरक्षा मज़बूत नहीं होती, जिससे क्लाउड पर भेजा गया डेटा आसानी से चोरी हो सकता है. उदाहरण के लिए जैसे, जनवरी 2024 में रूसी सेना ने यूक्रेन की राजधानी कीव में लगे वेबकैम हैक कर लिए थे, जिनसे उन्हें यूक्रेन के एयर डिफेंस सिस्टम के ठिकानों की जानकारी मिल गई. इस जानकारी का इस्तेमाल करके उन्होंने उन जगहों पर सटीक हमला किया. सैन्य जानकारी बहुत गोपनीय होती है और अगर यह लीक हो जाए तो मिशन और जवानों की सुरक्षा को भारी ख़तरा होता है.
इसलिए, भले ही क्लाउड कंप्यूटिंग के कुछ फ़ायदे हैं, पर युद्ध के नित नए बदलते मोर्चे पर यह तकनीक पर्याप्त नहीं है और क्लाउड सिस्टम के परे तकनीक ज़रूरी है. ऐसे में, भविष्य में सैन्य बढ़त बनाए रखने के लिए एक नए तरीक़े की ज़रूरत है जो युद्ध में जीत के लिए आवश्यक है.
एज कंप्यूटिंग इन सभी मुश्किलों का एक शानदार समाधान बनकर उभरा है. यह तकनीक डेटा को इकट्ठा करने, स्टोर करने, विश्लेषण करने और उससे फ़ैसला लेने की पूरी प्रक्रिया को एक तरह से विकेंद्रीकृत कर देती है. दूर के सर्वर पर डेटा भेजने के बजाय, एज कंप्यूटिंग डेटा को वहीं पर प्रोसेस करती है, जहां उसका स्रोत है. यह सब मुमकिन हो पाया है उन आधुनिक उपकरणों, सेंसर और कंप्यूटरों की वजह से. उन्हें सीधे वहीं इनस्टॉल किया जाता है जहां डेटा बनता है, जिसे नेटवर्क का "एज" कहा जाता है.
साइबर हमलों और विदेशी सर्विलांस के चलते डेटा चोरी का ख़तरा. कई संघर्ष वाले इलाकों में साइबर सुरक्षा मज़बूत नहीं होती, जिससे क्लाउड पर भेजा गया डेटा आसानी से चोरी हो सकता है. उदाहरण के लिए जैसे, जनवरी 2024 में रूसी सेना ने यूक्रेन की राजधानी कीव में लगे वेबकैम हैक कर लिए थे, जिनसे उन्हें यूक्रेन के एयर डिफेंस सिस्टम के ठिकानों की जानकारी मिल गई. इस जानकारी का इस्तेमाल करके उन्होंने उन जगहों पर सटीक हमला किया.
एज क्लाउड सिस्टम ख़ास तौर पर उन जगहों के लिए बनाए गए हैं जहां इंटरनेट धीमा है या जहां नेटवर्क आता-जाता रहता है, जैसा कि सीमावर्ती या दुश्मन के इलाक़ों में. इस तकनीक का सीधा-सीधा यह मतलब है कि नेटवर्क में गड़बड़ी होने पर भी ज़रूरी मिशन बिना किसी रुकावट के जारी रह सकते हैं.
एज कंप्यूटिंग का एक और बड़ा फ़ायदा यह है कि यह फ़ैसले लेने में लगने वाले समय को बहुत कम कर देता है. इस तकनीक से डेटा को कैप्चर करने और उसके प्रोसेस करके परिणाम पाने तक के समय में बहुत हद तक कमी आ जाती है. जब युद्ध के दौरान हर एक पल मायने रखता है, तो समय की यह बचत बहुत कीमती साबित होती है. उस समय जबकि गलती की गुंजाइश बहुत कम होती है और कमांडरों को तुरंत फ़ैसला लेना होता है वहां एज सिस्टम बहुत तेज़ी से काम करते हैं और मददगार साबित होते हैं.
एज कंप्यूटिंग संवेदनशील डेटा को भी सुरक्षित रखता है, क्योंकि इस तकनीक में जानकारी को दूर-दूर तक बड़े नेटवर्क या एक ही सर्वर पर बार-बार भेजना नहीं होता. इससे डेटा के चोरी होने का ख़तरा बहुत कम हो जाता है. इसके अलावा, डेटा को कहीं और भेजने से पहले या AI सिस्टम की ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल करने से पहले उसे एन्क्रिप्ट (सुरक्षित) किया जा सकता है, जिससे इस पूरी प्रक्रिया में सुरक्षा की एक और परत जुड़ जाती है.
सैन्य एज कंप्यूटिंग अब कोई दूर का सपना नहीं है, बल्कि दुनिया भर की सेनाओं के लिए अब यह एक अहम लक्ष्य बन गया है.
उदाहरण के लिए चीन अब इस क्षमता पर बहुत काम कर रहा है. पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) एज कंप्यूटिंग पर भारी निवेश कर रही है और अलग-अलग सेंसर से मिले डेटा का इस्तेमाल ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने, निगरानी रखने और हमला करने के लिए कर रही है. चीन का रक्षा विभाग 5G नेटवर्क भी बना रहा है जिससे कम समय में डेटा प्रोसेस किया जा सके और मल्टी-एक्सेस एज कंप्यूटिंग में मदद मिले. 2017 की स्टेट कौंसिल की एक सरकारी रिपोर्ट में भी कहा गया था कि 5G कई सैन्य क्षेत्रों में "रियल-टाइम AI सहयोग" का आधार बनेगा.
एज क्लाउड सिस्टम ख़ास तौर पर उन जगहों के लिए बनाए गए हैं जहां इंटरनेट धीमा है या जहां नेटवर्क आता-जाता रहता है, जैसा कि सीमावर्ती या दुश्मन के इलाक़ों में. इस तकनीक का सीधा-सीधा यह मतलब है कि नेटवर्क में गड़बड़ी होने पर भी ज़रूरी मिशन बिना किसी रुकावट के जारी रह सकते हैं.
यह 5G नेटवर्क मल्टी-एक्सेस एज कंप्यूटिंग की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला है, जिसके बलबूते पर ड्रोन और स्वचालित गाड़ियां जैसे प्लेटफॉर्म भी अपने आप डेटा प्रोसेस और AI-आधारित विश्लेषण कर सकते हैं. चीन की महत्वाकांक्षी योजना अंतरिक्ष पर काबिज़ होने की है. चीन का "थ्री बॉडी कंप्यूटिंग कॉन्स्टेलेशन" एक ऐसा सैटेलाइट नेटवर्क है जो अंतरिक्ष में एज कंप्यूटिंग लेकर आने के लिए तैयार किया जा रहा है ताकि वहां भी रियल-टाइम डेटा प्रोसेसिंग हो सके.
संयुक्त राज्य अमेरिका भी इस तकनीक को तेज़ी से अपना रहा है. US का रक्षा विभाग एज कंप्यूटिंग से प्राप्त जानकारी को अपने ऑपरेशन में शामिल कर रहा है. डिफेंस इंफॉर्मेशन सिस्टम्स एजेंसी के अंतर्गत अमेरिकी विदेशी सैन्य ठिकानों में कई एज कंप्यूटिंग प्लेटफ़ॉर्म काम कर रहे हैं. 2025 में हुए प्रोजेक्ट कन्वर्जेंस में अमेरिकी सेना के XVIII एयरबोर्न कॉर्प्स ने भी कई एज नोड का परीक्षण किया, ताकि दूर-दराज के इलाक़ों में इनकी मदद से ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी को बढ़ाया जा सके. लॉकहीड मार्टिन F-35 लड़ाकू विमान भी एज कंप्यूटिंग का एक अच्छा उदाहरण है, क्योंकि इसमें लगा एक सिस्टम 10 टेराबाइट तक डेटा को वहीं पर प्रोसेस करके ख़तरों की पहचान कर सकता है.
बाक़ी सेनाएं भी अमेरिका और चीन की तरह इस दिशा में आगे बढ़ रही हैं.
यूरोप में, नाटो (NATO) ने "टैक्टिकल एज पर एज कंप्यूटिंग, के ज्वाइंट ऑपरेशन के दौरान लगातार संचार बनाए रखने के तरीकों का पता लगाने के लिए पर एक रिसर्च ग्रुप बनाया है. इसी तरह, ऑस्ट्रेलियाई डिफेन्स फोर्स ने भी नेक्सियम डिफेन्स क्लाउड एज के रूप में एक सुरक्षित क्लाउड कंप्यूटिंग क्षमता बनाने पर काम शुरू किया है.
भारत ने भी अपनी सेना में एज AI क्षमता वाले उपकरणों को शामिल करना शुरू कर दिया है, जिसमें स्वदेशी नवाचार पर ज़्यादा जोर दिया जा रहा है. रक्षा मंत्रालय की 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार, एज कंप्यूटिंग का इस्तेमाल करने वाले कई नेक्स्ट जनरेशन के सैन्य उपकरणों को भारत द्वारा पहले ही डिज़ाइन और टेस्ट किया जा चुका है.
एज कंप्यूटिंग का पूरा फ़ायदा उठाने के लिए, रक्षा मंत्रालय को इसे "इनोवेशंस फ़ॉर डिफ़ेंस एक्सीलेंस" पहल के अंतर्गत इसे एक मुख्य क्षेत्र बनाना चाहिए. इससे घरेलू कंपनियों और स्टार्टअप को इस क्षेत्र में इससे संबंधित सोलूशन्स बनाने में मदद मिलेगी.
इसका एक उदाहरण BLADe-S ISR प्लेटफॉर्म है, जो एज कंप्यूटिंग से चलता है और ऑडियो, वीडियो या टेक्स्ट से मिले डेटा का विश्लेषण करके तुरंत काम की जानकारी दे सकता है. चिमेरा-22 स्मार्ट कैमरा भी एक और बड़ा कदम है, जो एज AI के साथ ड्रोन या दुश्मन के ख़तरों का पता लगा सकता है. डीपकैच एज AI जैसे प्लेटफॉर्म कई कैमरों को एक साथ काम करवाने की क्षमता रखते हैं जिससे कम से कम इंसानी दख़ल से ख़तरों का पता लगाया जा सके.
निजी कंपनियों के साथ हो रही साझेदारी से भी काफ़ी उम्मीदें हैं. भारतीय कंपनियां, जैसे की आईडियाफोर्ज जो ड्रोन बनाती है, पहले ही अपने ड्रोन में डेटा प्रोसेस करने की क्षमता प्रदान कर चुकी है. इसी तरह, इंफरक्यू ने लेटेंट AI के साथ मिलकर ख़तरों को पहचानने और वर्गीकृत करने की तकनीकें बनाई हैं.
हाल ही में, भारतीय सेना ने भी एज कंप्यूटिंग को उन 33 ख़ास तकनीकों में से एक बताया है जिन्हें वह 2030 तक अपनाएगी. भारत का टेर्रिन ())))))))))))) बहुत अलग किस्म का है, इसलिए एज कंप्यूटिंग से सेना को बहुत फ़ायदा होगा और वह अलग-अलग टेर्रिन की मुश्किलों के हिसाब से ख़ुद को ढाल पाएगी. इससे सेना को उपलब्ध डेटा से एक पूरी तस्वीर मिलेगी. जैसे-जैसे भारतीय सेना ज़्यादा से ज़्यादा आपस में जुड़े हुए प्लेटफ़ॉर्म और सिस्टम तैनात करेगी, एज कंप्यूटिंग उनके बेहतर इस्तेमाल में एक अहम भूमिका निभाएगा. इससे नेटवर्क में रुकावट की स्थिति में भी बिना रुके ऑपरेशन संभव हो सकेगा
एज कंप्यूटिंग का पूरा फ़ायदा उठाने के लिए, रक्षा मंत्रालय को इसे "इनोवेशंस फ़ॉर डिफ़ेंस एक्सीलेंस" पहल के अंतर्गत इसे एक मुख्य क्षेत्र बनाना चाहिए. इससे घरेलू कंपनियों और स्टार्टअप को इस क्षेत्र में इससे संबंधित सोलूशन्स बनाने में मदद मिलेगी. भविष्य के दिनों में, जबकी जानकारी सबसे बड़ी ताक़त बनने जा रही है तब एज कंप्यूटिंग की क्षमताएं यक़ीनन हमारी सेना के लिए एक शक्तिशाली हथियार साबित होंगी.
समीर पाटिल, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फ़ॉर सिक्योरिटी, स्ट्रेटेजी एंड टेक्नोलॉजी में निदेशक हैं.
ध्रुव बनर्जी, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में एक रिसर्च इंटर्न हैं.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Sameer Patil is Director, Centre for Security, Strategy and Technology at the Observer Research Foundation. Based out of ORF’s Mumbai centre, his work focuses on ...
Read More +
Dhruv Banerjee is a Research Intern with the Observer Research Foundation. ...
Read More +