Author : Nilanjan Ghosh

Expert Speak India Matters
Published on Feb 03, 2026 Updated 1 Days ago

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 दिखाता है कि भारत वैश्विक चुनौतियों के बीच भी मज़बूती से आगे बढ़ रहा है. समझें, कैसे विकास, सुधार और नई सोच भारत को सिर्फ़ टिकाऊ नहीं बल्कि ज़्यादा अहम बना रहे हैं.

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26: भारत की नई विकास कहानी

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 (ES) ऐसे समय में पेश किया गया है जब वैश्विक ‘पॉलीक्राइसिस’ और गहराती जा रही है-भू-राजनीतिक बिखराव, व्यापार का हथियारकरण और अतिग से पीछे हटने की प्रवृत्ति साफ़ दिखती है. इस वैश्विक निराशा के बीच भारत एक उजले सितारे की तरह उभरता है. बीते वर्षों में सर्वेक्षण केवल राजकोषीय आँकड़ों की रिपोर्ट से आगे बढ़कर विकास और प्रगति की रणनीतिक दिशा बताने वाला दस्तावेज़ बन चुका है. इस वर्ष का सर्वेक्षण भी अपवाद नहीं है बल्कि यह और आगे बढ़ते हुए भारत के उदय के लिए एक नया वैचारिक ढांचा प्रस्तुत करता है.

यह बात विकास की कहानी में आए बड़े बदलाव से स्पष्ट होती है-रक्षात्मक लचीलापन (Resilience) से आक्रामक और महत्वाकांक्षी अनिवार्यता (Indispensability)” की ओर. बिखरी हुई दुनिया में आर्थिक सुरक्षा ही रणनीतिक स्वायत्तता की नींव है.

बीते वर्षों में सर्वेक्षण केवल राजकोषीय आँकड़ों की रिपोर्ट से आगे बढ़कर विकास और प्रगति की रणनीतिक दिशा बताने वाला दस्तावेज़ बन चुका है. इस वर्ष का सर्वेक्षण भी अपवाद नहीं है बल्कि यह और आगे बढ़ते हुए भारत के उदय के लिए एक नया वैचारिक ढांचा प्रस्तुत करता है.

सर्वेक्षण साफ़ करता है कि यह बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था की मज़बूत मैक्रोइकॉनॉमिक स्थिति के कारण संभव हुआ है. FY26 के लिए वास्तविक GDP वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है और मध्यम अवधि में संभावित वृद्धि दर 7 प्रतिशत तक पहुँचने की बात कही गई है-जो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक है. इसके पीछे राजकोषीय समेकन है, जिसमें FY26 तक राजकोषीय घाटे को GDP के 4.4 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखा गया है. खाद्य कीमतों में गिरावट के चलते खुदरा महंगाई का 1.7 प्रतिशत तक आ जाना भारत को एक आदर्श स्थिति में खड़ा करता है-तेज़ विकास और कम महंगाई.

अनिवार्यता का नया रणनीतिक सिद्धांत

अध्याय 16 में प्रस्तुत Strategic Indispensability का सिद्धांत एक चरणबद्ध ढांचा बताता है-‘आयात प्रतिस्थापन’ से ‘रणनीतिक लचीलापन’ और फिर ‘रणनीतिक अनिवार्यता’ की ओर. यह तभी संभव है जब भारतीय उत्पाद और सेवाएँ वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (GVCs) में इस तरह जुड़ें कि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक ऐसा अहम और अपूरणीय केंद्र बन जाए.

सर्वेक्षण मानता है कि उद्यमिता की मूल ऊर्जा को जगाना ज़रूरी है और इसमें राज्य की भूमिका अहम है. केवल सरकार की भूमिका घटाकर निजी निवेश को“क्राउड इन करना पर्याप्त नहीं है. असल बाधा संसाधनों की नहीं बल्कि राज्य क्षमता की है. इसलिए प्रशासनिक सुधारों के ज़रिये राज्य क्षमता बढ़ाने पर ज़ोर दिया गया है. सर्वेक्षण एक उद्यमशील राज्य की वकालत करता है जो सोच-समझकर जोखिम ले, अनिश्चितता को व्यवस्थित करे और ईमानदार भूल व भ्रष्टाचार में फर्क कर सके, ताकि नौकरशाही का जोखिम-भय कम हो.

केवल सरकार की भूमिका घटाकर निजी निवेश को“क्राउड इन करना पर्याप्त नहीं है. असल बाधा संसाधनों की नहीं बल्कि राज्य क्षमता की है. इसलिए प्रशासनिक सुधारों के ज़रिये राज्य क्षमता बढ़ाने पर ज़ोर दिया गया है.

इस संदर्भ में विनियमन-मुक्ति (Deregulation) को विकास का एक बड़ा चालक माना गया है. सर्वेक्षण राज्यों में 630 से अधिक सुधारों के क्रियान्वयन और अनुपालन बोझ घटाने के लिए गठित टास्क फोर्स की भूमिका को रेखांकित करता है. महत्वपूर्ण बात यह है कि यहाँ विनियमन-मुक्ति को राज्य की वापसी नहीं, बल्कि परिणामों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए राज्य क्षमता को मज़बूत करने के रूप में परिभाषित किया गया है.

AI, सेक्टरल विकास और व्यापार

AI रणनीति को सर्वेक्षण ने बॉटम-अप दृष्टिकोण के रूप में देखा है, न कि पश्चिम की तरह संसाधन-भारी फ्रंटियर मॉडल की दौड़ के रूप में. इसके लिए AI इकोनॉमिक काउंसिल, फ्रुगल AI, छोटे और उपयोग-विशेष मॉडल तथा डिजिटल पब्लिक गुड्स पर ज़ोर दिया गया है. इससे तकनीक के कारण होने वाले रोज़गार नुकसान के जोखिम भी कम हो सकते हैं.

उत्पादन क्षेत्र के संदर्भ में आर्थिक सर्वेक्षण यह स्पष्ट करता है कि केवल लागत-प्रतिस्पर्धा पर आधारित रणनीति भारत को दीर्घकालिक वैश्विक बढ़त नहीं दिला सकती. इनपुट लागत में कमी आवश्यक अवश्य है, लेकिन यह अपने आप में पर्याप्त शर्त नहीं है. वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में टिकाऊ और सम्मानजनक स्थान हासिल करने के लिए गुणवत्ता, मानकीकरण और तकनीकी परिष्कार उतने ही महत्वपूर्ण हैं. इसी कारण सर्वेक्षण उन्नत विनिर्माण (Advanced Manufacturing) की ओर रणनीतिक संक्रमण की आवश्यकता पर बल देता है. उन्नत विनिर्माण न केवल उच्च उत्पादकता और बेहतर गुणवत्ता मानकों को सुनिश्चित करता है, बल्कि पूरी उत्पादन प्रणाली में अनुशासन, विश्वसनीयता और नवाचार को भी संस्थागत रूप देता है.

इस संदर्भ में इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्रों में लागू की गई उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं को सकारात्मक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है. इन योजनाओं के माध्यम से भारत ने वैश्विक कंपनियों को आकर्षित किया, घरेलू उत्पादन क्षमता का विस्तार किया और निर्यात उन्मुख विनिर्माण को गति दी. विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स में भारत का वैश्विक निर्यात मानचित्र पर उभरना और फार्मा क्षेत्र में मूल्यवर्धित उत्पादन की ओर बढ़ना यह दर्शाता है कि लक्षित औद्योगिक नीति, यदि सही ढंग से लागू की जाए, तो संरचनात्मक परिवर्तन ला सकती है.

आने वाले वर्षों में भारत की विकास कहानी विनिर्माण और सेवाओं के गहरे अंतर्संबंध से आकार लेगी, जहाँ दोनों एक-दूसरे को पूरक बनकर अर्थव्यवस्था की उत्पादकता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को नई ऊँचाई देंगे.

इसके समानांतर, सर्वेक्षण यह भी स्वीकार करता है कि उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे सशक्त और स्थिर विकास इंजन सेवाएँ रही हैं. वर्तमान में सेवाएँ सकल मूल्य वर्धन (GVA) में 50 प्रतिशत से अधिक का योगदान देती हैं और रोजगार, निर्यात तथा विदेशी मुद्रा अर्जन का प्रमुख स्रोत बनी हुई हैं. भविष्य की ओर देखते हुए, सर्वेक्षण सेवाक्षेत्र के अगले विकास चरण को उच्च-मूल्य सेवाओं के विस्तार से जोड़ता है. इसमें ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs), पेशेवर परामर्श सेवाएँ, डिज़ाइन, डिजिटल समाधान और “विनिर्माण का सेवाकरण” जैसी गतिविधियाँ शामिल हैं. यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि आने वाले वर्षों में भारत की विकास कहानी विनिर्माण और सेवाओं के गहरे अंतर्संबंध से आकार लेगी, जहाँ दोनों एक-दूसरे को पूरक बनकर अर्थव्यवस्था की उत्पादकता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को नई ऊँचाई देंगे.

वैश्विक व्यापार नीति की अनिश्चितता के बीच, सेवाएँ और रिकॉर्ड निर्यात भारत के लिए फिलहाल एक बफर प्रदान करते हैं. लेकिन दीर्घकाल में “हार्ड करेंसी” अर्थव्यवस्था बनने के लिए विनिर्माण को गहराई देना और वस्तु निर्यात में स्थायी अधिशेष हासिल करना ज़रूरी होगा.

कृषि, शहरीकरण और जलवायु

कृषि के मोर्चे पर, सर्वेक्षण खाद्य सुरक्षा से आगे बढ़कर आय सुरक्षा पर ज़ोर देता है. दीर्घकालिक लचीलापन फसल विविधीकरण-खासकर दालों और तिलहनों-पर निर्भर करेगा. इसके लिए जल-गहन फसलों को बढ़ावा देने वाली विकृत सब्सिडी संरचनाओं में सुधार, स्मार्ट ट्राइबल फार्मिंग और ग्राम साझा संसाधनों के पुनर्जीवन की आवश्यकता बताई गई है.

शहरीकरण को सर्वेक्षण ने आवास की समस्या नहीं, बल्कि आर्थिक अवसंरचना के रूप में देखा है. शहरी निकायों में शासन की कमज़ोरियों के कारण समुच्चय अर्थव्यवस्थाओं (agglomeration economies) का लाभ नहीं मिल पाया है. इसलिए महापौरों को सशक्त बनाने, वित्तीय स्वायत्तता और जवाबदेही को साथ जोड़ने की बात कही गई है.

जलवायु पर, सर्वेक्षण वैश्विक उत्तर की केवल शमन-केंद्रित सोच से अलग हटकर अनुकूलन (Adaptation) को भारत की जलवायु रणनीति के केंद्र में रखता है. वित्तीय कमी को देखते हुए नवाचारी वित्तपोषण की ज़रूरत बताई गई है. साथ ही, यह भी संकेत मिलता है कि मानव पूंजी में निवेश को भी जलवायु वित्त का हिस्सा माना जाना चाहिए. एक नई और अहम बात युवाओं में डिजिटल लत और बढ़ते मोटापे को भविष्य की आर्थिक बाधा के रूप में चिन्हित करना है, जिसके लिए उम्र-आधारित नियंत्रण और चेतावनी लेबल जैसे नियामक उपाय सुझाए गए हैं.

सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह विकास, विनिर्माण, जलवायु परिवर्तन और भू-अर्थनीति जैसे अब तक अलग-अलग माने जाने वाले क्षेत्रों को एक साझा संस्थागत और नीतिगत ढांचे में जोड़ता है. इस समेकित दृष्टिकोण के माध्यम से सर्वेक्षण यह दिखाता है कि आर्थिक नीति अब केवल वृद्धि दर तक सीमित नहीं है, बल्कि वह रणनीतिक स्वायत्तता, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और दीर्घकालिक स्थिरता से भी गहराई से जुड़ी हुई है.

सर्वेक्षण की सबसे बड़ी वैचारिक नवीनता ‘आत्मनिर्भरता’ को रक्षात्मक सोच से निकालकर ‘रणनीतिक अनिवार्यता’ को एक आक्रामक भू-राजनीतिक औज़ार के रूप में पेश करना है. इंडो-पैसिफिक सदी में प्रभाव आत्मनिर्भरता से नहीं, बल्कि ऐसी वैश्विक उत्पादन भूमिका से आएगा जिसे नज़रअंदाज़ न किया जा सके.

हालाँकि, कुछ प्रश्न खुले रह जाते हैं-नौकरशाही के लिए सुरक्षित निर्णय-स्थल बनाना, नगर निकायों की कमज़ोर वित्तीय स्थिति, उच्च-मूल्य सेवाओं की जटिलताओं को कम आंका जाना, और राज्यों की राजकोषीय लोकलुभावन नीतियों को संतुलित करने के ठोस औज़ारों की कमी.

भारत की नई विकास रूपरेखा

कुल मिलाकर, आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 को केवल एक मैक्रोइकॉनॉमिक दस्तावेज़ के रूप में देखना इसके महत्व को कम आँकना होगा. यह सर्वेक्षण वस्तुतः एक रणनीतिक घोषणापत्र के रूप में उभरता है, जो भारत की भावी विकास दिशा को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है. इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह विकास, विनिर्माण, जलवायु परिवर्तन और भू-अर्थनीति जैसे अब तक अलग-अलग माने जाने वाले क्षेत्रों को एक साझा संस्थागत और नीतिगत ढांचे में जोड़ता है. इस समेकित दृष्टिकोण के माध्यम से सर्वेक्षण यह दिखाता है कि आर्थिक नीति अब केवल वृद्धि दर तक सीमित नहीं है, बल्कि वह रणनीतिक स्वायत्तता, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और दीर्घकालिक स्थिरता से भी गहराई से जुड़ी हुई है.

हालाँकि, सर्वेक्षण की एक स्पष्ट सीमा भी सामने आती है. इसके विचार और विश्लेषण जिस स्तर पर संस्थागत सुधारों और नीतिगत बदलावों की कल्पना करते हैं, उनके वास्तविक क्रियान्वयन के लिए ठोस और व्यवहारिक नीति औज़ारों की कमी महसूस होती है. ऊँचे स्तर की संस्थागत सोच और ज़मीनी प्रशासनिक व संघीय वास्तविकताओं के बीच बनी यह दूरी ही सर्वेक्षण की सबसे बड़ी चुनौती है.


निलंजन घोष ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में विकास अध्ययन के उपाध्यक्ष हैं.

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