पूर्वी समुद्री गलियारा (EMC) भारत से रूस तक तेज़, सस्ता और सुरक्षित समुद्री व्यापार मार्ग है जो पारादीप और कोलकाता जैसे बंदरगाहों के जरिए बंगाल की खाड़ी को बड़ा आर्थिक केंद्र बना सकता है. जानिए कैसे बदल रहा है यह भारत का समुद्री भविष्य.
Image Source: Pexels
पूरी दुनिया की राजनीति और कारोबार का केंद्र अब धीरे-धीरे हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र की तरफ बढ़ रहा है. इसमें बंगाल की खाड़ी, दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी एशिया को जोड़ने वाले एक बहुत ही जरूरी समुद्री रास्ते के रूप में सामने आ रही है. इस इलाके में दुनिया की करीब 22 प्रतिशत आबादी रहती है और यहाँ की कुल अर्थव्यवस्था (जीडीपी) लगभग 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है. इस पूरी योजना के केंद्र में 'पूर्वी समुद्री गलियारा' (EMC) है. यह एक ऐसा नया समुद्री रास्ता है जो भारत के पूर्वी बंदरगाहों को सीधे रूस के सुदूर पूर्वी हिस्से (विशेषकर व्लादिवोस्तोक) से जोड़ता है. पहले भारत और रूस के बीच व्यापार स्वेज नहर और यूरोप के नोवोरोस्सियस्क जैसे बंदरगाहों से होता था, जो बहुत लंबा था और जहाँ राजनीतिक तनाव का खतरा रहता था. लेकिन यह नया गलियारा हिंद-प्रशांत से होते हुए एक सीधा और सुरक्षित समुद्री विकल्प देता है.
इस नए समुद्री रास्ते (EMC) की कामयाबी सिर्फ बड़े इरादों से नहीं, बल्कि हमारे मुख्य बंदरगाहों की काम करने की क्षमता पर टिकी है. इसमें ओडिशा का पारादीप बंदरगाह और कोलकाता का श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह (हल्दिया डॉक कॉम्प्लेक्स समेत) सबसे खास हैं. ये दोनों बंदरगाह इस पूरे रास्ते में एक-दूसरे की कमियों को पूरा करते हुए मुख्य आधार का काम करते हैं. इनमें से एक बंदरगाह भारी मात्रा में औद्योगिक सामान और कच्चे माल को संभालने का काम करता है, तो दूसरा बंदरगाह उस सामान को आस-पास के क्षेत्रों और छोटे बाजारों तक पहुँचाने (लास्ट-माइल कनेक्टिविटी) में मदद करता है. इन बंदरगाहों के काम को समझकर यह लेख दिखाता है कि कैसे यह पूर्वी गलियारा बंगाल की खाड़ी को आपस में जुड़े हुए और एक बेहद महत्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्र में बदल सकता है.
पूर्वी समुद्री गलियारे (EMC) को बनाने की मुख्य वजह यह कड़वी सच्चाई है कि दुनिया भर में सामान पहुँचाने के रास्ते सुरक्षित नहीं रह गए हैं. चेन्नई से व्लादिवोस्तोक जाने वाला पुराना रास्ता तय करने में करीब 35 से 40 दिन लग जाते हैं. लाल सागर में चल रही आपसी लड़ाइयों और सुरक्षा के खतरों की वजह से अब यह पुराना रास्ता बहुत महँगा और अनिश्चित हो गया है.
यह एक ऐसा नया समुद्री रास्ता है जो भारत के पूर्वी बंदरगाहों को सीधे रूस के सुदूर पूर्वी हिस्से से जोड़ता है. पहले भारत और रूस के बीच व्यापार स्वेज नहर और यूरोप के नोवोरोस्सियस्क जैसे बंदरगाहों से होता था, जो बहुत लंबा था और जहाँ राजनीतिक तनाव का खतरा रहता था. लेकिन यह नया गलियारा हिंद-प्रशांत से होते हुए एक सीधा और सुरक्षित समुद्री विकल्प देता है.
इसके विपरीत, EMC रास्ता इस सफर को सिर्फ 24 दिनों का बना देता है, जबकि यूरोप के रास्ते भारत से रूस के सुदूर पूर्वी हिस्से तक सामान पहुंचाने में 40 दिन से ज़्यादा का समय लगता है. समय में 35प्रतिशत और दूरी में 40 प्रतिशत की यह बचत ज़रूरी सामानों की कुल कीमत को काफी कम कर देती है. लाल सागर में हूती विद्रोहियों के हमलों के कारण दिसंबर 2023 से फरवरी 2024 के बीच वहाँ से होने वाले कंटेनर व्यापार में 90 प्रतिशत की भारी गिरावट आई. इस वजह से यह पुराना रास्ता बेहद असुरक्षित और महंगा हो गया है, क्योंकि अब जहाज़ों को 'केप ऑफ गुड होप' के रास्ते घूमकर जाना पड़ रहा है. इससे दूरी 11,000 समुद्री मील बढ़ गई है, इस संकट ने मुख्य रास्तों पर जहाजरानी की कीमतों को करीब पाँच गुना बढ़ा दिया है, और जे.पी. मॉर्गन रिसर्च का अनुमान है कि इससे दुनिया भर में ज़रूरी चीज़ों की महँगाई 0.7 प्रतिशत तक बढ़ सकती है. भारत के बढ़ते स्टील और ऊर्जा उद्योगों के लिए, जो रूस से आने वाले कोकिंग कोल और कच्चे तेल पर बहुत निर्भर हैं, यह EMC रास्ता एक सुरक्षित और किफायती विकल्प देता है. रसद (लॉजिस्टिक्स) का यह बदलाव भारत के लिए एक रक्षा कवच की तरह काम करता है, जो पश्चिमी देशों के पुराने रास्तों के बढ़ते खतरों के बीच भारत के उद्योगों को बिना रुके कच्चा माल पहुँचाने में मदद करता है.

Source: India Shipping News
इसके अलावा, जब हम पूर्वी समुद्री गलियारे (EMC) की तुलना 'इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर' (INSTC) और चीन के 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) से करते हैं, तो इसका रणनीतिक महत्व और भी साफ़ हो जाता है. INSTC एक बहुत ही उलझा हुआ रास्ता है जिसमें ज़मीन और समंदर दोनों शामिल हैं, और यह ईरान और मध्य एशिया जैसे राजनीतिक रूप से तनाव वाले इलाकों से होकर गुज़रता है. इसके उलट, EMC पूरी तरह से समुद्री रास्ता है, जो माल भेजने के काम को ज़्यादा भरोसेमंद और आसान बनाता है, और व्यापारिक रास्तों पर हमारा खुद का पूरा नियंत्रण रखता है. चीन के BRI के मुकाबले तो यह और भी ज़्यादा मायने रखता है. जहाँ चीन अपने BRI के ज़रिए दूसरे देशों को बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) के लिए कर्ज़ देकर और अपने बंदरगाहों पर निर्भर बनाकर अपना दबदबा बढ़ा रहा है, वहीं EMC देश की संप्रभुता (आज़ादी) और आपसी साझेदारी पर आधारित एक मॉडल है. इस तरह, EMC भारत की व्यापक कनेक्टिविटी सोच को दिखाता है-एक ऐसी सोच जो समुद्री लचीलेपन, अपनी रणनीतिक आज़ादी और बदलते हिंद-प्रशांत क्षेत्र में पड़ोसी देशों के साथ मजबूत जुड़ाव को सबसे ज़्यादा अहमियत देती है.
लाल सागर में हूती विद्रोहियों के हमलों के कारण दिसंबर 2023 से फरवरी 2024 के बीच वहाँ से होने वाले कंटेनर व्यापार में 90 प्रतिशत की भारी गिरावट आई. इस वजह से यह पुराना रास्ता बेहद असुरक्षित और महंगा हो गया है, क्योंकि अब जहाज़ों को 'केप ऑफ गुड होप' के रास्ते घूमकर जाना पड़ रहा है.
ईएमसी (EMC) को सिर्फ सामान लाने-ले जाने वाले एक साधारण रास्ते के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. यह एक ऐसा रणनीतिक जरिया है जो 'विकसित भारत 2047' के सपने के तहत भारत को दुनिया का बड़ा मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन हब बनाने में मदद करेगा. जैसे-जैसे बंगाल की खाड़ी हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच एक बेहद जरूरी आर्थिक और राजनैतिक पुल के रूप में मजबूत हो रही है, पारादीप और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे बंदरगाह एशिया के विकास की इस नई कहानी को संभालने के लिए पूरी तरह तैयार हैं.
ओडिशा का पारादीप बंदरगाह भारत के समुद्री बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) का एक मुख्य स्तंभ बनकर उभरा है. इसने वित्तीय वर्ष 2023-24 में 145.38 MMT (मिलियन मीट्रिक टन) माल संभालकर भारत के सबसे बड़े सरकारी बंदरगाह का स्थान हासिल किया है. इसमें पिछले साल के मुकाबले 7.4 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई है, जो भारत के समुद्री क्षेत्र में इसके बढ़ते महत्व को दिखाती है. इसका सबसे बड़ा फायदा इसका गहरा बंदरगाह होना है, जिसकी वजह से यह बहुत बड़े 'केप-साइज़' मालवाहक जहाज़ों को भी संभाल सकता है. पारादीप बंदरगाह ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे खनिजों से भरपूर राज्यों के उद्योगों के लिए एक 'फेफड़े' (लाइफलाइन) की तरह काम करता है. 'पीएम गति शक्ति' योजना के तहत, पारादीप को बड़ी रेल और सड़क लाइनों से जोड़ा जा रहा है ताकि इन औद्योगिक क्षेत्रों तक सामान आसानी से पहुँचे. ईएमसी (EMC) के मामले में, पारादीप मुख्य एंट्री पॉइंट की तरह काम करता है, जो रूस से आने वाले कच्चे माल को लेता है और देश में मैन्युफैक्चरिंग या दोबारा एक्सपोर्ट (री-एक्सपोर्ट) के लिए प्रोसेस करता है. बहुत भारी मात्रा में माल संभालने की क्षमता के कारण यह बंदरगाह वैसी बड़ी बचत और फायदे दे पाता है.
जहाँ पारादीप भारी और थोक माल को संभालता है, वहीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह आस-पास के इलाकों में सामान को आसानी से और सही तरीके से बाँटने (वितरण) का काम देखता है. करीब 66 MMT (मिलियन मीट्रिक टन) माल संभालने के साथ, कोलकाता एक अलग लेकिन उतनी ही ज़रूरी रणनीतिक भूमिका निभाता है. भारत का इकलौता बड़ा नदी-बंदरगाह होने के नाते, यह छोटी और स्थानीय सप्लाई चेनों के मुख्य केंद्र के रूप में काम करता है. कोलकाता की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह चारों तरफ से ज़मीन से घिरे उत्तर-पूर्व भारत के ‘सात राज्यों‘ (सेवन सिस्टर्स) के साथ-साथ नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों को भी सीधे जोड़ता है. ईएमसी (EMC) के ज़रिए, कोलकाता की मदद से तैयार माल और कंटेनरों को आसानी से भेजा जा सकता म्यांमार और बांग्लादेश के बंदरगाहों के साथ मिलकर कोलकाता बंदरगाह बंगाल की खाड़ी के बाज़ारों के लिए एक मुख्य वितरण केंद्र बनेगा. ईएमसी (EMC) की कामयाबी पारादीप, कोलकाता, विशाखापत्तनम और धामरा जैसे बंदरगाहों के मजबूत नेटवर्क और आपसी तालमेल पर निर्भर करती है. ये सभी बंदरगाह मिलकर अलग-अलग तरह के माल को कुशलता से संभालने, रसद का भरोसा देने और दक्षिण-पूर्वी एशिया तथा यूरेशिया के साथ व्यापारिक जुड़ाव बढ़ाने का काम करते हैं.
राजनैतिक रूप से, यह गलियारा भारत की संतुलन बनाने की नीति को दिखाता है, इसके ज़रिए भारत एक तरफ अमेरिका से अपने बढ़ते रिश्ते संभाल रहा है, तो दूसरी तरफ रूस के साथ पुरानी दोस्ती भी निभा रहा है. यह चीन के बढ़ते दबदबे (BRI) का एक सुरक्षित समुद्री जवाब भी है.
ईएमसी (EMC) की सफलता पारादीप, कोलकाता, विशाखापत्तनम और धामरा जैसे बंदरगाहों के आपसी तालमेल पर टिकी है. अब इसका मकसद सिर्फ माल भेजना नहीं, बल्कि बड़ा आर्थिक बदलाव लाना होना चाहिए. इसके लिए बंदरगाहों के पास 'विशेष आर्थिक क्षेत्र' (SEZ) बनाकर व्यापार और निर्यात बढ़ाने वाले उद्योग लगाने होंगे. साथ ही, कम गहरे पानी के जहाजों में निवेश बढ़ाकर हुगली नदी के रास्ते यातायात को और बेहतर बनाना होगा. खेती, दवाओं (फार्मा) और इंजीनियरिंग के सामानों के निर्यात के लिए एक सही रणनीति बनाकर रूस के साथ भारत के व्यापार असंतुलन (घाटे) को ठीक करने में मदद मिल सकती है. इसके साथ ही, 'पीएम गति शक्ति' के तहत डिजिटल सिस्टम को जोड़ने से रसद और बंदरगाहों का कामकाज बेहद आसान हो जाएगा.
ईएमसी (EMC) केवल एक व्यापारिक मार्ग नहीं, बल्कि बदलती दुनिया में भारत की एक सोची-समझी रणनीतिक योजना है. जब पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के कारण रूस एशिया की तरफ झुका, तो भारत उसका एक मजबूत साझीदार बनकर उभरा. राजनैतिक रूप से, यह गलियारा भारत की संतुलन बनाने की नीति को दिखाता है, इसके ज़रिए भारत एक तरफ अमेरिका से अपने बढ़ते रिश्ते संभाल रहा है, तो दूसरी तरफ रूस के साथ पुरानी दोस्ती भी निभा रहा है. यह चीन के बढ़ते दबदबे (BRI) का एक सुरक्षित समुद्री जवाब भी है. हालांकि, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध और पैसों के लेन-देन जैसी कुछ चुनौतियाँ अभी भी इसके रास्ते में खड़ी हैं.
अनसुवा बसु रे चौधरी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में नेबरहुड इनिशिएटिव की सीनियर फेलो हैं.
श्रीरूपा बसु एक स्वतंत्र शोधकर्ता हैं.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Anasua Basu Ray Chaudhury is Senior Fellow with ORF’s Neighbourhood Initiative. She is the Editor, ORF Bangla. She specialises in regional and sub-regional cooperation in ...
Read More +
Sreerupa Basu is a Research Intern at the Observer Research Foundation. ...
Read More +