विश्व व्यापार संगठन का 14वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) होने वाला है जहां इंटरनेट से भेजे जाने वाले डेटा पर कस्टम ड्यूटी लगे या नहीं- इस पुराने नियम पर बहस हो रही है. भारत इसे बदलकर राजस्व और नीति की गुंजाइश बढ़ाना चाहता है जबकि विकसित देश इसे जारी रखना चाहते हैं- समझें क्यों यह बहस आपके डिजिटल भविष्य से जुड़ी है.
जब विश्व व्यापार संगठन (WTO) का 14वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) 26–29 मार्च 2026 को याउंडे, कैमरून में आयोजित होने वाला है तो एक बार फिर इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी से जुड़े मोराटोरियम पर ध्यान केंद्रित हो गया है. 13वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन, जो मार्च 2024 में अबू धाबी, संयुक्त अरब अमीरात में हुआ था, वहाँ इस मोराटोरियम को बढ़ाने के मुद्दे पर कड़ा विरोध देखने को मिला था. लंबी बातचीत के बाद सदस्य देशों ने अस्थायी विस्तार पर सहमति जताई, जो MC14 या 31 मार्च 2026-जो भी पहले हो-तक लागू रहेगा. जैसे-जैसे यह समय सीमा नज़दीक आ रही है, यह प्रश्न फिर से सामने आ गया है.
मई 1998 में आयोजित अपने दूसरे मंत्री स्तरीय सम्मेलन में WTO सदस्य देशों ने वैश्विक ई-कॉमर्स पर घोषणा को अपनाया. इसके तहत ई-कॉमर्स से जुड़े व्यापारिक मुद्दों का अध्ययन करने के लिए एक कार्य कार्यक्रम शुरू किया गया और इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी न लगाने पर सहमति बनी. ई-कॉमर्स के बढ़ते महत्व को देखते हुए यह मोराटोरियम इसलिए शुरू किया गया था ताकि डिजिटल व्यापार को बढ़ावा मिले और देशों के बीच ऑनलाइन लेन-देन सस्ता और आसान हो सके. इसी वजह से इसे समय-समय पर बढ़ाया जाता रहा. लेकिन पिछले लगभग 20 वर्षों में डिजिटल अर्थव्यवस्था बहुत बदल चुकी है. अब डिजिटल करेंसी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और 3डी प्रिंटिंग जैसी तकनीकों ने नई चुनौतियां पैदा कर दी है, जहाँ डेटा भेजकर दूसरे देश में सीधे उत्पादन भी संभव हो गया है.
MC14 में मोराटोरियम के भविष्य के कई संभावित रास्ते हो सकते हैं. पहला, सदस्य देश इसे अस्थायी रूप से आगे भी बढ़ाने पर सहमत हो सकते हैं, जैसा कि अब तक होता आया है, और इसके लिए नई समय सीमा तय की जा सकती है. MC14 में इस मुद्दे पर तीन संभावित फैसले हो सकते हैं. पहला, मोराटोरियम को कुछ नई शर्तों के साथ फिर से कुछ समय के लिए बढ़ा दिया जाए, जैसे इसके दायरे को साफ करना. यह विकल्प भारत के लिए अभी ज्यादा ठीक माना जा रहा है. दूसरा, इसे हमेशा के लिए लागू कर दिया जाए, जिसका अमेरिका समर्थन करता है. तीसरा, मोराटोरियम खत्म हो जाए और देश खुद तय करें कि डिजिटल ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी लगानी है या नहीं. इसलिए MC14 का फैसला काफी अहम होगा.
ई-कॉमर्स के बढ़ते महत्व को देखते हुए यह मोराटोरियम इसलिए शुरू किया गया था ताकि डिजिटल व्यापार को बढ़ावा मिले और देशों के बीच ऑनलाइन लेन-देन सस्ता और आसान हो सके. इसी वजह से इसे समय-समय पर बढ़ाया जाता रहा. लेकिन पिछले लगभग 20 वर्षों में डिजिटल अर्थव्यवस्था बहुत बदल चुकी है.
यह बहस दिखाती है कि देश डिजिटल व्यापार को अलग-अलग नजर से देखते हैं. विकसित देश मानते हैं कि मोराटोरियम से डिजिटल बाजार खुले रहते हैं, लागत कम होती है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार आसान बनता है.उनका मानना है कि हल्का नियमन (light-touch regulation) डिजिटल अर्थव्यवस्था की तेज़ वृद्धि का एक प्रमुख कारण रहा है.
दूसरी तरफ भारत और दक्षिण अफ्रीका जैसे कई विकासशील देश मोराटोरियम पर सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि इसके दायरे को लेकर स्पष्टता नहीं है, इससे टैरिफ से मिलने वाला राजस्व कम हो सकता है और औद्योगिक नीतियां बनाने की गुंजाइश भी घटती है. वहीं ब्राज़ील और एसीपी (ACP) समूह के देश तुरंत इसे खत्म करने के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन उनका मानना है कि आगे फैसला लेने से पहले इस मुद्दे पर और ठोस अध्ययन और डेटा की जरूरत है. ब्राज़ील अस्थायी विस्तार का समर्थन करते हुए भी अपनी पुरानी स्थिति बनाए हुए है कि यह मोराटोरियम डिजिटल सामग्री तक नहीं बढ़ाया जाना चाहिए.
अपने 2026 के संचार में ब्राज़ील ने इस बात पर जोर दिया कि मोराटोरियम का प्रभाव औद्योगिक विकास के लिए नीति-क्षेत्र, नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र और विकासशील तथा अल्पविकसित देशों के कर राजस्व पर किस प्रकार पड़ता है, इसका अध्ययन किया जाना चाहिए. साथ ही उसने दोहराया कि डिजिटल सामग्री को इसके दायरे में शामिल नहीं किया जाना चाहिए और इस विषय पर और अध्ययन की जरूरत है. ACP समूह की ओर से बारबाडोस ने भी ब्राज़ील के रुख का समर्थन किया और कहा कि आगे के निर्णयों से पहले गहन विश्लेषण होना चाहिए, जिसमें विभिन्न देशों की नीतियों और अनुभवों का अध्ययन भी शामिल हो.
दूसरी ओर, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, कोस्टा रिका, इक्वाडोर, एल साल्वाडोर, ग्वाटेमाला, इज़राइल, जापान, दक्षिण कोरिया, मैक्सिको, नॉर्थ मैसेडोनिया, नॉर्वे, पनामा, पैराग्वे, पेरू, सिंगापुर, स्विट्ज़रलैंड, ताइवान (पेंगहू, किनमेन और मात्सु का अलग कस्टम क्षेत्र) और अमेरिका सहित कई देशों के समूह ने मोराटोरियम को बनाए रखने का समर्थन दोहराया. उनका कहना है कि इसने डिजिटल क्षेत्र की वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. इस समूह ने ‘इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन’ की व्यापक व्याख्या का भी समर्थन किया, जिसमें ट्रांसमिशन और उसकी सामग्री दोनों को शामिल किया गया है.
भारत का मोराटोरियम पर रुख वर्षों से लगभग समान बना हुआ है. 2020 में दक्षिण अफ़्रीका के साथ अपने संयुक्त प्रस्ताव में भारत ने तर्क दिया था कि इस मोराटोरियम पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए या कम से कम विकासशील देशों के दृष्टिकोण से इसे स्पष्ट किया जाना चाहिए. इस प्रस्ताव में तीन प्रमुख चिंताएँ उठाई गई थीं.
भारत और दक्षिण अफ्रीका जैसे कई विकासशील देश मोराटोरियम पर सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि इसके दायरे को लेकर स्पष्टता नहीं है, इससे टैरिफ से मिलने वाला राजस्व कम हो सकता है और औद्योगिक नीतियां बनाने की गुंजाइश भी घटती है.
पहला, ‘इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन’ की स्पष्ट परिभाषा न होने से मोराटोरियम के दायरे को लेकर अस्पष्टता बनी रहती है, खासकर ऐसे समय में जब अधिक से अधिक वस्तुएँ और सेवाएँ डिजिटल रूप से उपलब्ध कराई जा रही हैं. इससे यह सवाल भी उठता है कि वास्तव में क्या चीजें पहले से ही टैरिफ और व्यापार पर सामान्य समझौता (GATT) के अंतर्गत आती हैं और क्या सेवाओं में व्यापार पर सामान्य समझौता (GATS) के तहत आती हैं.
दूसरा, टैरिफ राजस्व में संभावित कमी भारत के उस हालिया कदम के पीछे भी एक कारण रही है, जिसमें देश ने घरेलू स्तर पर मोबाइल डेटा पर कर लगाने की संभावनाओं का अध्ययन शुरू किया है. तीसरा, यह मोराटोरियम देशों की नीति बनाने की गुंजाइश घटाता है और यह तय करना मुश्किल कर देता है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था के किन हिस्सों पर शुल्क लगाया जाए.
तर्क यह है कि 1998 में शुरू किया गया यह मोराटोरियम आज की जटिल डिजिटल अर्थव्यवस्था में व्यापार, कर और विकास को प्रभावित कर रहा है. दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया भी इसी तरह की चिंता जताते हैं. 2023 में दक्षिण अफ्रीका ने कहा कि इससे वैश्विक टेक कंपनियों को अनुचित कर लाभ मिलता है और स्थानीय उद्योग कमजोर होते हैं.
2022 में इंडोनेशिया ने भी भारत और दक्षिण अफ्रीका की चिंताओं को दोहराते हुए मोराटोरियम का विरोध किया था. हालांकि, हाल ही में अमेरिका के साथ हुए उसके व्यापार समझौते के बाद उसका रुख बदल गया है. इस समझौते के तहत इंडोनेशिया को ‘स्थायी मोराटोरियम को बहुपक्षीय स्तर पर तुरंत और बिना शर्त अपनाने’ का समर्थन करना होगा.
असल मुद्दा केवल इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी का नहीं है, बल्कि यह तय करने का है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था के नियम कौन बनाएगा और उससे मिलने वाले लाभ किस तरह बांटे जाएंगे. जैसे-जैसे डेटा, सॉफ्टवेयर और डिजिटल सेवाओं का महत्व बढ़ रहा है, देशों के बीच मतभेद भी साफ दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में 14वां विश्व व्यापार संगठन मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) को अहम माना जा रहा है.
दक्षिण अफ्रीका ने 2023 के अपने संचार में यह भी कहा कि मोराटोरियम वैश्विक टेक कंपनियों को अनुचित कर लाभ देता है और विकासशील देशों में डिजिटल औद्योगिकीकरण की संभावनाओं को कमजोर करता है. इसी आधार पर दक्षिण अफ्रीका ने मोराटोरियम समाप्त करने की मांग की और कहा कि देशों को अपनी विकास प्राथमिकताओं के अनुसार कस्टम ड्यूटी लगाने का अधिकार होना चाहिए.
MC14 को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनाने वाली बात यह है कि लंबे समय से यह बहस केवल कस्टम ड्यूटी तक सीमित नहीं रही है. यह मोराटोरियम डिजिटल संप्रभुता, डेटा शासन और तकनीकी प्रतिस्पर्धा जैसे व्यापक सवालों से जुड़ गया है. जैसे-जैसे डिजिटलीकरण बढ़ रहा है, आर्थिक मूल्य का बड़ा हिस्सा अब अमूर्त परिसंपत्तियों-जैसे सॉफ्टवेयर, डाटासेट, एल्गोरिदम और डिजाइन फाइलों-में समाहित हो रहा है, जिनमें से कई इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजे जाते हैं. तथाकथित ‘Mode 5‘ सेवाओं को लेकर शुरुआती चर्चाएँ भी इस मुद्दे को और जटिल बना रही हैं.
यह स्थिति कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) प्रणालियों के बढ़ते उपयोग से और जटिल हो जाती है, क्योंकि वे सीमा-पार डेटा प्रवाह (Mode 1 सेवाएँ) और उन डिजिटल इनपुट्स पर निर्भर करती हैं जो मोराटोरियम के दायरे में आते हैं. इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि कस्टम ड्यूटी लगाई जाए या नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या देशों के पास उभरते डिजिटल क्षेत्रों को विनियमित और विकसित करने के लिए पर्याप्त नीतिगत लचीलापन बना रहेगा. भारत का स्थायी मोराटोरियम का विरोध इसी वजह से है. इसी पृष्ठभूमि में, यह संभावना कम है कि MC14 में कोई अंतिम समाधान निकल पाएगा. सबसे अधिक संभावना यही है कि मोराटोरियम को फिर से आगे बढ़ा दिया जाए, जैसा कि डब्ल्यूटीओ में अक्सर कठिन निर्णयों को टालने और मौजूदा स्थिति बनाए रखने की परंपरा रही है.
डिजिटल व्यापार से जुड़ा ई-कॉमर्स मोराटोरियम अब विश्व व्यापार व्यवस्था की बड़ी बहस का हिस्सा बन गया है. कई विकासशील देशों का मानना है कि विश्व व्यापार संगठन बदलती डिजिटल अर्थव्यवस्था और उनकी जरूरतों के अनुसार खुद को ढालने में पीछे रह गया है. असल मुद्दा केवल इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी का नहीं है, बल्कि यह तय करने का है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था के नियम कौन बनाएगा और उससे मिलने वाले लाभ किस तरह बांटे जाएंगे. जैसे-जैसे डेटा, सॉफ्टवेयर और डिजिटल सेवाओं का महत्व बढ़ रहा है, देशों के बीच मतभेद भी साफ दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में 14वां विश्व व्यापार संगठन मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) को अहम माना जा रहा है. भले ही इस बैठक में अंतिम समाधान न निकले, लेकिन इससे यह संकेत जरूर मिलेगा कि क्या डब्ल्यूटीओ डिजिटल व्यापार से जुड़े जटिल मुद्दों पर बातचीत का प्रभावी मंच बना रह सकता है या भविष्य में इसके नियम तय करने का केंद्र कहीं और शिफ्ट हो सकता है.
जाह्नवी त्रिपाठी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं.
बासु चंदोला ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर डिजिटल सोसाइटीज में एसोसिएट फेलो हैं.
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Jhanvi Tripathi is an Associate Fellow with the Observer Research Foundation’s (ORF) Geoeconomics Programme. She served as the coordinator for the Think20 India secretariat during ...
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Basu Chandola is an Associate Fellow at the Observer Research Foundation, where his work focuses on the governance of the digital economy, including artificial intelligence, ...
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