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राष्ट्रीय स्तर पर HIV औसत में गिरावट के बावजूद भारत के पूर्वोत्तर में नशीले पदार्थों से प्रभावित इलाके बताते हैं कि सीमा पर कार्रवाई के साथ-साथ नुकसान में कमी और मज़बूत स्वास्थ्य प्रणाली भी आवश्यक है.
Image Source: Getty Images
भारत में ह्यूमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस (HIV) महामारी के प्रसार पर नक्शा उस समय तक आश्वस्त करने वाला लगता है जब तक कि आंख ऊपर में दाहिने कोने तक नहीं जाती है. राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो 2023 में भारत में HIV के अनुमान के मुताबिक वयस्कों (15-49) में प्रसार 0.2 प्रतिशत था और करीब 25.4 लाख लोग HIV से प्रभावित थे. उस आंकड़े के मुताबिक 2010 से नए संक्रमण में लगभग 44 प्रतिशत कमी आई थी. इस दौरान एक्वायर्ड इम्यूनोडेफिशिएंसी सिंड्रोम या एड्स से जुड़ी मौतों में भी लगभग 79 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है. हालांकि ये आंकड़े पूर्वोत्तर में एक बहुत ही अलग वास्तविकता को छिपाते हैं. मिज़ोरम, नागालैंड और मणिपुर जैसे राज्य इसके प्रसार के मामले में देश में सबसे ऊपर है. यहां वयस्कों के प्रभावित होने की दर क्रमश: 2.7, 1.3 और 1 प्रतिशत है जो कि भारत के औसत से कई गुना ज़्यादा है. अकेले मिज़ोरम में पिछले तीन दशकों के दौरान 32,000 से ज़्यादा HIV-पॉज़िटिव के मामले और 5,500 से ज़्यादा मौतें दर्ज की गई है.
इसके पीछे यहां का भूगोल ज़िम्मेदार है. भारत के पूर्वोत्तर राज्य म्यांमार और व्यापक गोल्डन ट्राएंगल से सटा एक संकीर्ण गलियारा बनाते हैं जो अफीम की खेती और तेज़ी से बढ़ते सिंथेटिक ड्रग के उत्पादन के लिए दुनिया के सबसे कुख्यात क्षेत्रों में से एक है. वैसे तो पहाड़ी ढलान मक्के और झूम कृषि के लिए मददगार हैं लेकिन वही अफीम की खेती को भी सहारा देती हैं. अफीम की फलियों को काटकर किसान रस निकालते हैं जिसे हेरोइन में बदला जाता है और पुराने नारकोटिक्स रूट के ज़रिए इस क्षेत्र में ले जाया जाता है. मणिपुर, असम और पड़ोसी राज्यों में मादक पदार्थों के ख़िलाफ़ हाल के अभियानों के दौरान बड़ी मात्रा में ज़ब्ती हुई है. कस्टम विभाग और कानून लागू करने वाली दूसरी एजेंसियों ने केवल 2024-25 में पूर्वोत्तर में सैकड़ों किलोग्राम मेथाम्फेटामाइन टैबलेट, हेरोइन और गांजा बरामद किया है. इसके समानांतर नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट (NDPS) के मामले भी बढ़ रहे हैं. 1 दिसंबर को आयोजित होने वाले विश्व एड्स दिवस के लिए भारत के सामने तत्काल चुनौती ये है कि क्या ड्रग्स के ख़िलाफ़ युद्ध में लगाई गई ऊर्जा के बराबर इन अर्थव्यवस्थाओं की छाया में रहने वाले लोगों की रक्षा करने के लिए लगातार प्रयास हो सकते हैं.
पूर्वोत्तर HIV महामारी से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र है।
HIV एक रेट्रोवायरस है जो शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) को निशाना बनाता है. धीरे-धीरे वो सामान्य संक्रमण का मुकाबला करने की शरीर की क्षमता को कमज़ोर कर देता है. यदि वायरस का निदान नहीं किया जाता है और एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी (ART) से उसका इलाज नहीं किया जाता है तो इम्यून सिस्टम इस हद तक कमज़ोर हो जाता है कि मरीज़ को गंभीर (जो कि अक्सर जानलेवा होता है) संक्रमण और कैंसर हो जाता है. इस अवस्था को एड्स के नाम से जाना जाता है और इसे केवल वायरस की उपस्थिति से ही नहीं बल्कि शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को हुए नुकसान से भी परिभाषित किया जाता है. नीतिगत दृष्टिकोण से ये अंतर इसलिए मायने रखता है क्योंकि समय पर इलाज के साथ HIV से अब एक दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में निपटा जा सकता है जबकि एड्स संकेत देता है कि स्वास्थ्य प्रणाली निदान करने, इलाज शुरू करने या लोगों को देखभाल में बनाए रखने में नाकाम रही है.
2010–23 के बीच भारत में नए संक्रमण 44% और एड्स मौतें 79% घटीं।
ये अंतर उस समय तक नहीं दिखता है जब तक कि हम उन्हें राज्यों पर लागू नहीं करते. तालिका 1 दिखाती है कि पूर्वोत्तर किस तरह राष्ट्रीय परिदृश्य से पूरी तरह अलग है. राष्ट्रीय स्तर पर 0.2 प्रतिशत वयस्कों में प्रसार की तुलना में मिज़ोरम में ये आंकड़ा 2.73 प्रतिशत (राष्ट्रीय औसत से लगभग 13.6 गुना), नागालैंड में 1.37 प्रतिशत (लगभग सात गुना) और मणिपुर में 0.87 प्रतिशत (चार गुना से ज़्यादा) है. मेघालय (0.43 प्रतिशत) और त्रिपुरा (0.37 प्रतिशत) की दर राष्ट्रीय औसत की तुलना में लगभग दोगुना है जबकि अरुणाचल प्रदेश (0.25 प्रतिशत) की दर राष्ट्रीय औसत से थोड़ा ज़्यादा है. केवल असम (0.13 प्रतिशत) और सिक्किम (0.11) राष्ट्रीय औसत से नीचे है. पंजाब (जिसे यहां गैर-पूर्वोत्तर तुलनात्मक राज्य के रूप में शामिल किया गया है) में इंजेक्शन के माध्यम से ड्रग्स के उपयोग का पुराना इतिहास है और वहां वयस्कों में प्रसार की दर 0.42 प्रतिशत है जो कि मेघालय के लगभग बराबर और त्रिपुरा से ज़्यादा है. पंजाब इस बात का उदाहरण है कि पूर्वोत्तर अलग-थलग नहीं है बल्कि एक व्यापक पैटर्न का हिस्सा है जहां नशीले पदार्थों से प्रभावित सीमा और ड्रग्स परिवहन के रास्ते में मौजूद राज्यों पर HIV का ज़रूरत से ज़्यादा बोझ है.
तालिका 1: जहां HIV का सबसे ज़्यादा असर: चुनिंदा भारतीय राज्यों में वयस्कों में प्रसार और नए संक्रमण
स्रोत: HIV एस्टीमेट 2023 फैक्टशीट, राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO); लेखक के द्वारा संकलित
*वयस्कों में प्रसार 15-49 की उम्र में लागू.
*PLHIV का अर्थ HIV के साथ जीने वाले लोग.
तालिका 2 से पता चलता है कि 2010 और 2023 के बीच पूरे भारत में HIV संक्रमण के नए मामलों में लगभग 44 प्रतिशत जबकि एड्स से जुड़ी मौतों में करीब 79 प्रतिशत की कमी आई. मणिपुर, मिज़ोरम और नागालैंड मोटे तौर पर इसी पैटर्न को दिखाते हैं या उससे थोड़ा पीछे हैं. इन तीनों राज्यों में एड्स से जुड़ी मौतों में 69-78 प्रतिशत की भारी कमी आई है. असम और मेघालय इस मामले में बीच की स्थिति में हैं. वहीं दूसरे छोर पर अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा हैं जहां नए संक्रमण में क्रमश: 470 और 524 प्रतिशत और मौतों में क्रमश: 214 और 300 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. इस बढ़ोतरी का एक कारण शायद ये है कि सिस्टम पहले से मौजूद मामलों को अधिक देख रहा है क्योंकि भारत का 2023 का HIV अनुमान नियमित कार्यक्रम के आंकड़ों और अधिक परीक्षण पर बहुत ज़्यादा निर्भर है. अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और पंजाब जैसे राज्यों में इस मॉडल को फिर से संतुलित करना पड़ा क्योंकि ART पर पहले से निर्भर लोगों की संख्या पुराने सर्वे आधारित अनुमानों से अधिक थी. ये इस बात का मज़बूत संकेत है कि पहले के चरणों में संक्रमण की गिनती कम की गई थी. इसके साथ-साथ NACP-V (राष्ट्रीय एड्स एवं STD नियंत्रण कार्यक्रम का पांचवां चरण) ने अधिक मामले वाले पूर्वोतर के ज़िलों में समुदाय आधारित स्क्रीनिंग और लक्ष्य आधारित परीक्षणों को तेज़ किया है. इस तरह बेहतर जानकारी और अधिक सक्रिय ढंग से संक्रमण का पता लगाने पर दर में निश्चित रूप से उछाल आता है.
HIV फैलाव का पैटर्न पुराने और नए हॉटस्पॉट दोनों दर्शाता है।
तालिका 2: कुछ राज्यों में नए HIV संक्रमण में कमी और कुछ राज्यों में बढ़ोतरी: HIV और एड्स से होने वाली मौतों में बदलाव (2010-2023)
स्रोत: HIV एस्टीमेट 2023 फैक्टशीट, राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO); लेखक के द्वारा संकलित
जो पैटर्न उभर कर सामने आ रहा है वो पुराने केंद्रों और नए मोर्चों का है. ऐसा लगता है कि मणिपुर, मिज़ोरम और नागालैंड में परीक्षण और एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी में लगातार निवेश ने मौतों को काफी कम किया है (क्योंकि HIV वाले लोग लंबे समय तक जीते हैं) और नए संक्रमण को गिरावट की तरफ धकेला है, भले ही कुल मिलाकर प्रसार ज़्यादा है. इसके विपरीत त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर से बाहर पंजाब जैसे राज्य उभरते केंद्रों की तरह लगते हैं. इन राज्यों की स्वास्थ्य प्रणाली के निदान और इलाज की क्षमता की तुलना में HIV के मामले तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं. इसके कारण संक्रमण और मौतों में एक साथ बढ़ोतरी हुई है. एड्स को समाप्त करने के लिए भारत के प्रयासों को विपरीत दिशाओं में खींचा जा रहा है. बहुत अधिक बोझ वाले कुछ राज्यों में चलाए गए अभियान स्पष्ट रूप से लोगों का जीवन बचा रहे हैं जबकि कुछ अन्य राज्यों में जोखिम के नए केंद्र संकेत देते हैं कि रोकथाम, नुकसान कम करने और इलाज के प्रयास बदलते ड्रग्स और यौन नेटवर्क के हिसाब से नहीं चल रहे हैं.
हाल के आंकड़े बताते हैं कि ये पूरी तरह “सुई” वाली महामारी नहीं है, भले ही नशीले पदार्थों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है. मिज़ोरम में असुरक्षित यौन व्यवहार का योगदान अब लगभग दो-तिहाई HIV संक्रमण में है जबकि लगभग 30 प्रतिशत मामलों के पीछे अभी भी नस के ज़रिए नशीला पदार्थ (IDU) लेना और सुई का साझा इस्तेमाल है. असम ठीक इसके विपरीत है. असम राज्य एड्स नियंत्रण समिति के नए आंकड़े बताते हैं कि इंजेक्शन के ज़रिए ड्रग्स के इस्तेमाल (IDU) ने असुरक्षित यौन संबंध को पीछे छोड़ दिया है, 2023-24 में HIV संक्रमण के नए मामलों में इसका योगदान लगभग 65 प्रतिशत था.
रेखाचित्र 1: कुछ राज्यों में नए HIV संक्रमण में कमी और कुछ राज्यों में बढ़ोतरी: HIV और एड्स से होने वाली मौतों में बदलाव (2010-2023)
स्रोत: HIV एस्टीमेट 2023 फैक्टशीट, राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO); लेखक के द्वारा बनाया गया चित्र
तालिका 2 में दिखाया गया है कि कैसे नए संक्रमणों और मौतों में बदलाव आया है, वहीं रेखाचित्र 1 में बताया गया है कि समय के साथ ये दबाव कैसे बढ़ता गया है. वैसे तो भारत में वयस्कों के बीच HIV प्रसार में कमी आई है लेकिन पूर्वोत्तर के कई राज्य विपरीत दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. मिज़ोरम के वयस्कों में प्रसार की दर 1.79 से 2.73 प्रतिशत हो गई है. मेघालय और त्रिपुरा भी इसी तरह का बढ़ता रुझान दिखा रहे हैं और इस दौरान मामले लगभग तीन गुना या उससे भी ज़्यादा हो गए हैं. वहीं अरुणाचल प्रदेश में प्रसार की दर 0.04 से 0.25 प्रतिशत हो गई है जो कि छह गुना बढ़ोतरी है. असम, सिक्किम और पूर्वोत्तर के बाहर पंजाब में धीमी लेकिन लगातार बढ़ोतरी दिख रही है और 2023 तक पंजाब में प्रसार की दर दोगुनी से ज़्यादा बढ़कर 0.42 प्रतिशत हो गई है. केवल मणिपुर (एक अलग अर्थ में) और नागालैंड राष्ट्रीय रुझान को दिखाते हैं. कुल मिलाकर पहला रेखाचित्र एक ऐसा भारत दिखाता है जहां HIV का प्रसार कम हो रहा है जबकि पूर्वोत्तर के कई राज्यों में ये मामले बढ़ रहे हैं.
पूर्वोत्तर में HIV दर बहुत अधिक है; केवल कानून-आधारित कार्रवाई पर्याप्त नहीं।
पूर्वोत्तर के राज्यों में HIV प्रसार की दर राष्ट्रीय औसत से बहुत ज़्यादा है और ये स्पष्ट है कि केवल कानूनी रोकथाम का प्रयास पर्याप्त नहीं है. पिछले दिनों की गई कार्रवाई के दौरान बड़ी मात्रा में नशीले पदार्थ ज़ब्त किए गए हैं लेकिन इसका नतीजा HIV संक्रमण में कमी के रूप में नहीं निकला है. अगर कानूनी कार्रवाई का नतीजा कम संक्रमण के रूप में सामने लाना है तो नशीले पदार्थों पर नियंत्रण के लिए एक मिला-जुला ढांचा (जिसमें साझा स्वास्थ्य-सुरक्षा एजेंडा के तहत गृह, स्वास्थ्य एवं वित्त मंत्रालय; नशीले पदार्थों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने वाली एजेंसियां; पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय और राज्य सरकारें शामिल हों) आवश्यक होगा. साथ ही एक व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य की रणनीति भी ज़रूरी है. नुकसान में कमी लाना इसके केंद्र में होना चाहिए और इसमें ओपिओइड सबस्टीट्यूशन थेरेपी (OST) की बढ़ती कवरेज को शामिल किया जाना चाहिए. साथ ही HIV से जुड़ी सेवाओं को ट्यूबरक्लोसिस और हेपेटाइटिस कार्यक्रमों के साथ जोड़ा जाना चाहिए. असुरक्षित ढंग से सुई लगाना इस क्षेत्र में HIV महामारी को बढ़ाने वाला एक प्रमुख कारण है. इस जोखिम से शुरुआत में ही निपटने से लोगों की जान बचेगी और वायरस नियंत्रण में आएगा. इसके समानांतर समुदाय आधारित पहुंच और देखभाल को बढ़ाना भी महत्वपूर्ण हैं. पूर्वोत्तर में स्थानीय समुदायों की एकजुटता की मज़बूत परंपरा का अर्थ ये है कि गैर-सरकारी संगठन, युवा समूह, चर्च और सहकर्मियों का नेटवर्क छिपी हुई अधिक ख़तरे वाली आबादी तक पहुंचने के हिसाब से अच्छी स्थिति में है. फंडिंग और ट्रेनिंग के ज़रिए इन समूहों को सशक्त बनाने से रोकथाम के प्रयास बढ़ेंगे, बदनामी की सोच कम होगी और ये सुनिश्चित होगा कि जो लोग सबसे असुरक्षित हैं, वो पीछे नहीं छूट जाएं.
एक और प्राथमिकता सीमावर्ती ज़िलों में स्वास्थ्य क्षमता बढ़ाने और निगरानी की होनी चाहिए. पूर्वोत्तर के सीमावर्ती क्षेत्रों को स्वास्थ्य क्लिनिक, मोबाइल हेल्थ यूनिट और वास्तविक समय में बीमारी की निगरानी की आवश्यकता है. इन क्षेत्रों में निवेश से HIV के प्रकोप का जल्दी पता लगाने और तेज़ी से जवाब देने में मदद मिलेगी, विशेष रूप से जो क्षेत्र ड्रग्स के परिवहन रूट में आते हैं. अंत में, नीति निर्माताओं को सीमावर्ती क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य को राष्ट्रीय सुरक्षा एवं सामर्थ्य के रूप में देखना चाहिए. पूर्वोत्तर में नशीले पदार्थों और HIV का दोहरा संकट भारत की व्यापक स्थिरता के लिए ख़तरा है. इन सीमावर्ती राज्यों में महामारी पर नियंत्रण को राष्ट्रीय सुरक्षा के एजेंडे का हिस्सा मानने से व्यापक राजनीतिक इच्छा और संसाधन जुटाने में मदद मिलेगी. इस तरह का बदलाव एक तालमेल वाले दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है जो कानूनी कार्रवाई को स्वास्थ्य पहुंच के साथ जोड़ता है. इस तरह पूर्वोत्तर की HIV चुनौती का सीधे सामना करते हुए भारत के समग्र स्वास्थ्य सामर्थ्य में मज़बूती आएगी.
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Dr. K. S. Uplabdh Gopal is an Associate Fellow within the Health Initiative at ORF. His focus lies in researching and advocating for policies that ...
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