तुर्की के सस्ते, युद्ध में अपनी क्षमता साबित कर चुके और भू-राजनीतिक तौर पर ताक़तवर ड्रोन, अफ्रीका में जंगों का स्वरूप बदल रहे हैं. गठबंधनों को परिवर्तित कर रहे हैं और सुरक्षा के नए जोखिम पैदा कर रहे हैं.
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अफ्रीकी देश माली में जहां जिहादी लड़ाके, देश के तमाम शहरों में सैनिक चौकियों पर सिलसिलेवार तरीक़े से हमला करके तबाही मचा रहे हैं, ऐसे में वहां की सैन्य सरकार- अपनी सीमित क्षमता और अंतरराष्ट्रीय समर्थन के अभाव में- देश को इस्लामिक जिहादियों के हाथ में चले जाने से रोकने के लिए पुरज़ोर कोशिश कर रही है. 2012 से ही माली के सुरक्षा बलों को कई जिहादी संगठनों से जूझना पड़ रहा है. इनमें सबसे ताक़तवर संगठन ग्रेटर सहारा में इस्लामिक स्टेट (ISGS) और जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन (JNIM) हैं.
जिहादियों के साथ कभी दो क़दम आगे, तो कभी दो क़दम पीछे की लड़ाई तो जारी है ही, जिहादियों पर बढ़त हासिल करने के लिए बेक़रार फ़ौजी सरकार, देश के तमाम हिस्सों पर अपना नियंत्रण दोबारा स्थापित करने के लिए लगातार तुर्की के ड्रोन की मदद ले रही है.
पहले 2020 और फिर 2021 में माली की फ़ौज ने लगातार दो तख़्ता-पलट करके सत्ता पर क़ब्ज़ा जमाया था. फिर भी देश का सुरक्षा संकट बढ़ता ही जा रहा है. जिहादियों के साथ कभी दो क़दम आगे, तो कभी दो क़दम पीछे की लड़ाई तो जारी है ही, जिहादियों पर बढ़त हासिल करने के लिए बेक़रार फ़ौजी सरकार, देश के तमाम हिस्सों पर अपना नियंत्रण दोबारा स्थापित करने के लिए लगातार तुर्की के ड्रोन की मदद ले रही है.
हक़ीक़त तो ये है कि तुर्की के ड्रोन का इस्तेमाल करने वाला माली, अफ्रीका का इकलौता देश नहीं है; उसके पड़ोसी मुल्क बर्किना फासो और नाइजर- दोनों ही एलायंस ऑफ साहेल स्टेट्स (AES) के सदस्य हैं- ने अपने अपने इलाक़ों में उपद्रवियों से मुक़ाबला करने के लिए तुर्की के ड्रोन तैनात किए हैं. जुलाई 2024 में पर्मानेंट स्ट्रैटेजिक फ्रेमवर्क फ़ॉर दि डिफेंस ऑफ दि पीपुल ऑफ अज़ावद (CSP-DPA) के बाग़ी शिविरों पर एक के बाद एक ड्रोन हमले करके माली की सेना ने कम से कम बीस सशस्त्र लड़ाकों का काम तमाम कर दिया था. नवंबर 2023 में बर्किना फ़ासो के सुरक्षा बलों ने जिबा शहर पर क़रीब तीन हज़ार आतंकियों के हमले को ड्रोन की मदद से सफलतापूर्वक नाकाम कर दिया था.
इससे पहले इथियोपिया की अबिये अहमद की हुकूमत ने भी टिगरे में अपने ख़िलाफ़ हुई बग़ावत से निपटने के लिए तुर्की के ड्रोन्स का इस्तेमाल किया था. इसके अलावा तुर्की के ड्रोन्स ने लीबिया की राष्ट्रीय एकता सरकार को मार्शल ख़लीफ़ा हफ़्तार के आक्रामक अभियान से निपटने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की थी. ऐसे में ये हैरानी की बात नहीं है कि अफ्रीकी नेता इन ड्रोन को ‘गेम चेंजर्स’ कहकर इनकी वाहवाही करते हैं.
हाल के वर्षों में तुर्की, सुरक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा खिलाड़ी बनकर उभरा है. 2024 में तुर्की का रक्षा और एयरोस्पेस निर्यात 7.1 बिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक जा पहुंचा था. यही नहीं, इन निर्यातों में अफ्रीका की हिस्सेदारी यक़ीनी तौर पर काफ़ी अधिक रही है. तुर्की पहले केवल ट्यूनीशिया और मॉरिटानिया को ही हथियारों का निर्यात करता था. हालांकि, अब उसने कम से कम 18 अफ्रीकी देशों को अपनी सैन्य सेवाओं का निर्यात करना शुरू किया है, जो पहले के मुक़ाबले 103 प्रतिशत अधिक है.
हाल के वर्षों में तुर्की, दुनिया का सबसे बड़ा ड्रोन निर्यातक देश बन गया है और अफ्रीका उसके लिए सबसे नया और तेज़ी से बढ़ता बाज़ार है.
हाल के वर्षों में तुर्की, दुनिया का सबसे बड़ा ड्रोन निर्यातक देश बन गया है और अफ्रीका उसके लिए सबसे नया और तेज़ी से बढ़ता बाज़ार है. असेलान, बेकर, तुर्किश एरोस्पेस इंडस्ट्रीज़ (TAI) और हावेलसन, लेनटेकेन और रोकेटसन जैसी तुर्की की कई कंपनियां दूसरे सैन्य हथियारों के अलावा ड्रोन का बढ़-चढ़कर निर्यात कर रही हैं. इनमें इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस सिस्टम, लड़ाकू हेलीकॉप्टर, मिसाइलें, नौसैनिक हथियार और बारूदी सुरंग साफ़ करने वाले औज़ार शामिल हैं.
इनमें से बेकर द्वारा विकसित लड़ाकू ड्रोन और ख़ास तौर से बायरकटार TB2 और अकिन्सी मॉडल बेहद लोकप्रिय हो गए हैं. तुर्की के इन ड्रोन्स को दुनिया के तमाम इलाक़ों में इस्तेमाल किया जा रहा है: अफ्रीका (इथियोपिया, टोगो, नाइजर, लीबिया) और यूरोप (पोलैंड, यूक्रेन) से लेकर मध्य पूर्व (संयुक्त अरब अमीरात और क़तर), और एशिया तक (किर्गिज़स्तान, अज़रबैजान, पाकिस्तान) में तुर्की के ड्रोन्स की भारी मांग है. तुर्की के रक्षा और एयरोस्पेस निर्माताओं के संगठन SaSAD के मुताबिक़, 2023 में उनके निर्यात रिकॉर्ड 5.5 अरब डॉलर तक पहुंच गए थे और अब तुर्की ने 2025 के अंत तक इसे 10 अरब डॉलर पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. तेज़ी से फैलते इस सेक्टर को तुर्की की लगभग 1500 घरेलू कंपनियों का सहारा मिल रहा है, जिसमें लगभग एक लाख लोग काम कर रहे हैं.
तुर्की के ड्रोन को बाज़ार में एक ख़ास बढ़त ये हासिल है कि ये अमेरिका और इज़राइल जैसे देशों के स्थापित निर्माताओं के ड्रोन से तुलनात्मक रूप से काफ़ी सस्ते पड़ते हैं. इसके अलावा, तुर्की की हथियार निर्यात की व्यवस्थाएं भी काफ़ी असंगठित हैं. वहीं अमेरिका और अधिकतर यूरोपीय देशों की तुलना में उसके नियम क़ायदे भी उतने सख़्त नहीं है. इन बातों के मेल ने उन देशों के बीच तुर्की के ड्रोन को लेकर काफ़ी दिलचस्पी जगा दी है, जिनके पास ज़्यादा महंगी सैन्य तकनीक के लिए रक्षा बजट नहीं है. इसका नतीजा ये हुआ है कि तुर्की, दुनिया में मानवरहित विमानों (UAV) का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है और उसने चीन और अमेरिका जैसे देशों को भी पीछे छोड़ दिया है, और फिलहाल ये प्रगति धीमी होने का संकेत नहीं दे रही है. इसके उलट, सैन्य ड्रोन का निर्यात तुर्की की सरकार की विदेश नीति का अहम हिस्सा बन गई है.
यही नहीं, सैन्य तकनीक और ख़ास तौर से ड्रोन के एक अहम निर्यातक के तौर पर तुर्की के उभार के कई अहम परिणाम दिख रहे हैं. इससे तुर्की को सैन्य तकनीक की बिक्री, रख-रखाव और अपग्रेड के ज़रिए नए भू-राजनीतिक गठबंधन बनाने का मौक़ा मिल गया है. इसमें कोई शक नहीं कि ये विकास तुर्की की मुश्किल में फंसी अर्थव्यवस्था के लिए मददगार है और हुनरमंद कामगारों के लिए रोज़गार भी पैदा करती है. इसके साथ साथ ये तुर्की की सॉफ्ट पॉवर को भी बढ़ावा देती है. क्योंकि आज बहुत से देश, अभियान संबंधी तमाम चुनौतियों की वजह से ड्रोन के प्रभावी होने के मोहजाल के शिकार हो गए हैं.
इसके बावजूद, अफ्रीकी देशों द्वारा तुर्की के ड्रोन ख़रीदने के क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा आयम के लिए काफ़ी अहम प्रभाव दिख रहे हैं. साहेल क्षेत्र के उग्रवादियों के बीच उनकी मौजूदगी, पहले से ही चुनौतीपूर्ण माहौल में जटिलता की नई परत जोड़ती है, जिससे मौजूदा कमज़ोरियां और भी नाज़ुक बन जाती हैं. जमात नुसरत अल इस्लाम वल मुसलमीन (JNIM) द्वारा हथियारबंद ड्रोन का इस्तेमाल, इलाक़े के सलाफ़ी जिहादी संगठनों द्वारा संघर्ष बढ़ाने का एक बड़ा क़दम है. इससे पता चलता है कि जिहादियों के पास बेहद मारक हथियार आते जा रहे हैं और अब वो ड्रोन का इस्तेमाल सिर्फ़ गोपनीय जानकारी इकट्ठा करने और दुश्मन की हरकतों पर नज़र रखने के लिए नहीं बल्कि, आक्रामक अभियानों में भी कर रहे हैं. यही नहीं कारोबारी ड्रोन का सस्ते दाम में बड़े पैमाने पर उपलब्ध होने और इनको आसानी से सैन्य इस्तेमाल के लायक़ बना लेने से, इस क्षेत्र में नॉन स्टेट एक्टर्स के बढ़ते ख़तरों से निपटने के प्रयासों को भी चुनौती मिल रही है.
इसके अतिरिक्त साहेल क्षेत्र में ड्रोन का बढ़ता इस्तेमाल न केवल सैन्य चुनौती बन रहा है, बल्कि इससे मानवीय संकट का दायरा भी बढ़ता जा रहा है. उग्रवादी संगठन अक्सर धोखे देने और पर्दे के पीछे से वार की रणनीति बनाते हैं.
इसके अतिरिक्त साहेल क्षेत्र में ड्रोन का बढ़ता इस्तेमाल न केवल सैन्य चुनौती बन रहा है, बल्कि इससे मानवीय संकट का दायरा भी बढ़ता जा रहा है. उग्रवादी संगठन अक्सर धोखे देने और पर्दे के पीछे से वार की रणनीति बनाते हैं. इसके लिए वो आम लोगों की आबादी में घुल मिल जाते हैं, जिससे ड्रोन हमलों में आम लोगों के मारे जाने का जोखिम भी बढ़ जाता है.
इसीलिए, अफ्रीकी देशों की सरकारों को तुर्की के ड्रोन या फिर मानवरहित विमानों को आयात करने से पहले इन सभी पहलुओं पर ग़ौर कर लेना चाहिए. सबसे अहम बात, ये चलन दिखाता है कि नए आपूर्तिकर्ता पर निर्भरता बढ़ रही है जिससे पूरा इलाक़ा ड्रोन निर्यातकों के लिए एक नया युद्ध क्षेत्र बन गया है. वैसे तो इन ड्रोन का बेलगाम आयात, उग्रवादियों से मुक़ाबले का फ़ौरी समाधान उपलब्ध कराता है. लेकिन, आगे चलकर ये क्षेत्र के लिए घातक भी साबित हो सकता है जिसके अनदेखे और नकारात्मक परिणाम इन देशों को झेलने पड़ सकते हैं.
समीर भट्टाचार्य ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं
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Dr. Samir Bhattacharya is an Associate Fellow at Observer Research Foundation (ORF), where he works on geopolitics with particular reference to Africa in the changing ...
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