-
CENTRES
Progammes & Centres
Location
एआई ने युद्ध को मैदानों से उठाकर डेटा, एल्गोरिदम और धारणा की दुनिया में पहुंचा दिया है. अब लड़ाई सिर्फ़ हथियारों की नहीं बल्कि जानकारी और नियंत्रण की हो गई है.
जो देश युद्ध में AI और AI की दुनिया में युद्ध—दोनों समझ लेगा, वही भविष्य की असली ताक़त बनेगा.
कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब ऐसी प्रभावी ताक़त है जो युद्ध के तौर-तरीकों को बदलने लगी है. सेनाओं द्वारा सूचनाएं जुटाने, फ़ैसले लेने और युद्ध करने के तरीकों में अब बुनियादी तौर पर बदलाव आ रहा है. इंसानी सैनिकों की जगह लेने के बजाय AI ‘ताक़त बढ़ाने’ के कारक के रूप में काम करती है. यह सही है कि इसके इस्तेमाल से सैनिकों की गति, सटीकता और रणनीतिक दूरदर्शिता में सुधार हो रहा है पर इससे नई नैतिक और भू-राजनीतिक चुनौतियां भी पैदा हुई हैं. हाल के दिनों में संघर्षों में AI के उपयोग की कई ख़बरें आई हैं. इज़रायली सुरक्षा बलों ने ‘लैवेंडर’ नामक AI प्रणाली (और एक सहायक प्रणाली गॉस्पेल भी) का उपयोग निगरानी डेटा के विश्लेषण में किया और गाज़ा संघर्ष में हमास के हज़ारों ठिकानों व इमारतों की पहचान की ताकि उनको निशाना बनाया जा सके. रूस-यूक्रेन संघर्ष में भी AI से लैस ड्रोन अथवा एफपीवी स्वार्म का खूब इस्तेमाल किया गया.
युद्ध पर AI का प्रभाव दो अलग-अलग मोर्चों पर दिखता है, जो आपस में जुड़े हुए भी हैं- ‘युद्ध में AI’ और ‘AI की दुनिया में युद्ध’. इस पहलू को समझना और दोनों को साथ-साथ विकसित करना भविष्य की राष्ट्रीय सुरक्षा की आधारशिला बनने जा रहा है.
“स्वचालित ड्रोन, उपकरणों के रखरखाव, लक्ष्य साधने और फ़ैसले लेने में AI की मदद अब महज़ किताबी बातें नहीं रह गई हैं.”
जैसे-जैसे इंसान की हर गतिविधि में AI शामिल हो रही है, ‘युद्ध में AI’ और ‘AI की दुनिया में युद्ध’ के बीच का अंतर किताबी अवधारणा से कहीं अधिक भविष्य की ताक़त, बचाव और अस्तित्व को तय करने लगा है. ये दोनों दिखने में एक जैसे लग सकते हैं लेकिन ये सैन्य रणनीति, नैतिकता और नीति को अलग-अलग रूपों में बनाने का काम करते हैं. एल्गोरिदम के युग में सुरक्षित और संप्रभु बने रहने की इच्छा रखने वाले किसी भी देश के लिए इस अंतर को समझना बहुत ज़रूरी है.
इन दोनों में अंतर न कर पाना ख़तरनाक हो सकता है. अगर कोई देश AI को सिर्फ़ एक हथियार समझता है तो वह अधिक से अधिक स्मार्ट हथियार बनाने पर ही अपना ध्यान लगाएगा. मगर उसके लिए असली चुनौती AI-आधारित दुनिया के साथ तालमेल बिठाने की है, जहां सूचना, धारणा प्रबंधन और नियंत्रण उसके लिए वरदान होंगे. इस अंतर को समझकर कोई भी देश अपने लिए संतुलित नीति बना सकता है यानी AI को रक्षा क्षेत्र में ज़िम्मेदारी के साथ शामिल कर सकता है, साथ ही अपने समाज, शासन और कूटनीति को उन दिनों के लिए तैयार कर सकता है, जिनमें AI की वज़ह से बड़े बदलाव आने वाले हैं.
‘युद्ध में AI’ का मतलब है, पारंपरिक सैन्य ढांचे के भीतर सेनाओं द्वारा AI का सामरिक और कार्रवाई में उपयोग. इसमें AI की मदद से सैन्य ताक़त ही नहीं, निगरानी, लॉजिस्टिक, लक्ष्य पर निशाना साधने की क्षमता, रख-रखाव और फ़ैसले लेने की प्रक्रिया में इंसानों की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है. यह प्रत्येक सेंसर को स्मार्ट, प्रत्येक फ़ैसला को तेज़ और प्रत्येक प्रणाली को अधिक अनुकूल बनाता है. OODA लूप (सैन्य रणनीति का एक मॉडल, जिसमें अवलोकन, अनुकूलन, निर्णय और कार्य के आधार पर फ़ैसला लिया जाता है) इंसानी गति से काफ़ी ज्यादा बंधा हुआ है, जैसा कि सीरिया, इराक आदि में अमेरिकी सैन्य हमलों में हमने देखा है लेकिन वास्तविक समय में लक्ष्य पर हमला करने के लिए AI का उपयोग करके OODA लूप के समय को घटाया जा सकता है.
“भविष्य के युद्ध नए प्रकार के होंगे, जैसे- डेटा पर प्रभुत्व हासिल करना…”
स्वचालित ड्रोन, उपकरणों के रखरखाव, लक्ष्य साधने और फ़ैसले लेने में AI की मदद अब महज़ किताबी बातें नहीं रह गई हैं. ये सैन्य कार्रवाइयों की सच्चाई बन चुकी हैं. मल्टी-सेंसर डेटा के मशीन लर्निंग विश्लेषण के जरिये खुफ़िया जानकारी, निगरानी व टोही (ISR) के कामों में बढ़त हासिल की जा रही है. AI-सहायता प्राप्त युद्ध प्रबंधन (जैसे- ऑपरेशन सिंदूर में इंद्रजाल का इस्तेमाल) के जरिये कहीं अधिक तेज़ी से फ़ैसले लिए जा रहे हैं. इतना ही नहीं, ख़तरे का पता लगाने या जवाबी कार्रवाइयों में गड़बड़ियों को जांचने में भी AI का इस्तेमाल करके साइबर सुरक्षा को मज़बूत बनाया जा रहा है. ‘युद्ध में AI’ संबंधी सोच में, नियमों से जुड़ी नैतिकता, जवाबदेही और नियंत्रण पर ज़ोर दिया जाता है, जैसे- ह्यूमन-इन-द-लूप (इंसान व मशीन के साथ-साथ काम करने) में, सशस्त्र संघर्ष संबंधी नियमों में और स्वचालित हथियारों के इस्तेमाल में.
‘AI की दुनिया में युद्ध’ का मतलब AI हथियारों का इस्तेमाल नहीं है बल्कि AI युग में युद्ध लड़ना है. यह इस बात से जुड़ा है कि जब समाज, अर्थव्यवस्थाएं और नियंत्रण बनाने वाले तंत्र एल्गोरिदम पर निर्भर हो जाते हैं, तब युद्ध की प्रकृति कैसे बदल जाती है. ऐसी AI दुनिया में दुश्मन देश की चौकी पर क़ब्ज़ा करना हो या लक्ष्य साधना, दोनों का अर्थ डेटा ही होता है.
भविष्य के युद्ध नए प्रकार के होंगे, जैसे-
नए प्रकार के इन युद्धों ने नागरिक व सेना और शांति व संघर्ष के बीच का अंतर ख़त्म कर दिया है. युद्ध अब उन तकनीकों की मदद से हो रहे हैं जो आधुनिक जीवन को बनाए रखने में मददगार हैं. आर्थिक एल्गोरिदम और मीडिया प्लेटफॉर्म से लेकर लॉजिस्टिक नेटवर्क और फ़ैसले लेने वाले तंत्र तक, सब अब युद्ध के औजार बन गए हैं. ये बदलाव नए प्रकार के नियमों की मांग करते हैं जो न केवल सेना के लिए बनने चाहिए बल्कि उनका इस्तेमाल सामाजिक व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी होना चाहिए.
“युद्ध अब उन तकनीकों की मदद से हो रहे हैं जो आधुनिक जीवन को बनाए रखने में मददगार हैं.”
यह समझना होगा कि ‘AI की दुनिया में युद्ध’ का मतलब AI द्वारा पूरे युद्ध-क्षेत्र और समाज में किया गया बदलाव है. अब किसी देश की ताक़त उसकी मिसाइलें और टैंक नहीं हैं, बल्कि डेटा संप्रभुता, कंप्यूटिंग नियंत्रण और सूचना को आकार देने की उसकी क्षमता है. इसमें सिर्फ़ राष्ट्र की सैन्य क्षमताएं ही महत्वपूर्ण नहीं होंगी, बल्कि अन्य बातों के साथ-साथ डिजिटल अथवा तकनीकी क्षेत्र, व्यवहार बदलने वाले उपाय और आर्थिक व एल्गोरिदम संबंधी क्षेत्र भी अहमियत रखेंगे. यहां तक कि खुद देश की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका होगी.
अभी AI एक औजार है लेकिन जैसे-जैसे यह बुनियादी ढांचे, अर्थव्यवस्था और इंसानी व्यवहार को बदलने वाले माध्यमों में शामिल होती जाएगी, एक जाल के रूप में विकसित होती जाएगी जो सभी प्रणालियों को आपस में जोड़ देगी बिल्कुल तंत्रिका तंत्र की तरह. तब AI का सभी जगह क़ब्ज़ा हो जाएगा, भले ही भौतिक रूप से ऐसा न हो.
ये दोनों मोर्चे अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक-दूसरे को मज़बूत बनाते हैं. ‘युद्ध में AI’ का इस्तेमाल तुरंत फ़ायदा पहुंचाता है लेकिन AI की दुनिया के अनुसार युद्ध की तैयारी न करने पर किसी भी देश के सामने अपने बुनियादी ढांचे, डेटा और शासन-तंत्र पर हमले का ख़तरा बना रहेगा.
यदि केवल पहले विकल्प को अपनाया जाएगा तो नैतिकता और रणनीति की पकड़ से तकनीक छिटक जाएगी और बहुत दूर निकल जाएगी और यदि सिर्फ़ दूसरे विकल्प पर आगे बढ़ा जाएगा तो क्षमता और सिद्धांत में तालमेल नहीं रह सकेगा. लिहाजा, इसका एकमात्र समाधान यही है कि दोनों को साथ-साथ विकसित किया जाए, अलग-अलग संस्थानों के साथ, लेकिन नज़रिया समान हो.
AI तकनीक के तेज़ विकास ने दुनिया भर के नीति-निर्माताओं और नियामकों को मजबूर किया है कि वे अपनी राष्ट्रीय सीमाओं व भू-राजनीतिक तनाव को पीछे छोड़ते हुए आपसी समझ, मानदंड और नियम जल्द बनाएं.
इस चुनौती से निपटने के लिए हाल में कई प्रयास किए गए हैं. UNIDIR ने माइक्रोसॉफ्ट के साथ साझेदारी करके मार्च 2024 में RAISE (AI सुरक्षा और नैतिकता पर गोलमेज सम्मेलन) की शुरुआत की, ताकि AI सुरक्षा और रक्षा जैसे विषयों पर सभी साझेदारों से बातचीत आगे बढ़ाई जा सके. ‘सैन्य क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का जवाबदेह इस्तेमाल’ पर 15 और 16 फरवरी, 2023 को हेग स्थित वर्ल्ड फोरम में एक शिखर सम्मेलन भी आयोजित किया गया था, जिसे REAIM 2023 के नाम से जाना जाता है. इसमें AI के सैन्य इस्तेमाल पर चर्चा की गई थी. इसका दूसरा शिखर सम्मेलन सितंबर, 2024 में दक्षिण कोरिया के सियोल में आयोजित किया गया, जिसमें ‘कार्रवाई का ख़ाका’ तैयार किया गया, ताकि AI का उत्तरदायी इस्तेमाल और अंतरराष्ट्रीय स्थिरता, दोनों सुनिश्चित हो सके. इसने सैन्य कामों में AI के सुरक्षित और नैतिक प्रयोग को तय करने के लिए सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, प्रौद्योगिकी कंपनियों और नागरिक समाज को एक साथ लाने का काम किया है. इस ‘ख़ाका’ को अमेरिका सहित 60 देशों ने स्वीकार किया है, लेकिन चीन और भारत ने इस पर अपनी सहमति नहीं जताई है, जबकि रूस को इस सम्मेलन से बाहर रखा गया था.
“जो राष्ट्र रक्षा व सुरक्षा में AI के उपयोग के नियम, मानदंड और नैतिक आधार तय करेंगे, उनको न सिर्फ़ तकनीकी बढ़त हासिल होगी, बल्कि इस नए युग में उनको नैतिक व कूटनीतिक अधिकार भी मिल जाएगा.”
इसमें जिन प्रयासों पर सहमति बनी है, वे स्वैच्छिक हैं, यानी उसे मानना ज़रूरी नहीं है. इसीलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाध्यकारी कानून बनाने या इससे जुड़े तंत्र के निर्माण को लेकर बातचीत शुरू करने के लिए कहा जाने लगा है.
इन सभी प्रयासों के बावजूद, उभरते AI युग में और भी बहुत कुछ करने की ज़रूरत है. इससे कोई भी देश खुद को अलग नहीं मान सकता, क्योंकि स्वचालित प्रणालियों, डेटा निर्भरताओं और एल्गोरिदम आधारित निर्णय लेने से जो चुनौतियां पैदा हो रही हैं, वे किसी भौगोलिक सीमाओं से बंधी नहीं हैं. यही कारण है कि नए प्रकार के अंतरराष्ट्रीय सहयोग की मांग की जाने लगी है. स्वचालित हथियारों के इस्तेमाल और जवाबदेही तंत्रों के निर्माण के लिए स्पष्ट वैश्विक मापदंड बनाना सभी की प्राथमिकता होनी चाहिए. साझा मानदंडों के बिना, AI-संचालित तंत्रों के विस्तार या दुरुपयोग का ख़तरा बना रहेगा, जिससे वैश्विक सुरक्षा ख़तरे में पड़ सकती है. इसी तरह, विश्वास बढ़ाने के प्रयास करने भी ज़रूरी है, ताकि अविश्वास कम हो और एल्गोरिदम तनाव के उस माहौल से बचा जा सके, जिसमें AI इंसानी कूटनीति की तुलना में कहीं तेज़ी से काम करता है. इसके लिए एल्गोरिदम में पारदर्शिता लाने, नोटिफिकेशन से जुड़े प्रोटोकॉल का पालन करने और साझा परीक्षण ढांचे बनाने के प्रयास किए जा सकते हैं.
देशों को अपने भरोसेमंद सहयोगियों के साथ साझा अनुसंधान व विकास को आगे बढ़ाना चाहिए और डेटाओं को सुरक्षित करना चाहिए. इस तरह के सहयोग महत्वपूर्ण AI क्षमताओं तक समान पहुंच सुनिश्चित करेंगे, साथ ही उन्हें नई परिस्थिति में ढलने और एक-दूसरे की सैन्य क्षमता बढ़ाने में भी मदद करेंगे. यह समझ लीजिए कि वैश्विक AI शासन व्यवस्था में यदि नेतृत्व करना है, तो रणनीतिक तौर पर शक्तिशाली बनना होगा, जिसका अर्थ है कि भारत को और अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की ज़रूरत है. जो राष्ट्र रक्षा व सुरक्षा में AI के उपयोग के नियम, मानदंड और नैतिक आधार तय करेंगे, उनको न सिर्फ़ तकनीकी बढ़त हासिल होगी, बल्कि इस नए युग में उनको नैतिक व कूटनीतिक अधिकार भी मिल जाएगा.
रक्षा AI परिषद (DAIC) और रक्षा AI परियोजना एजेंसी (DAIPA) का गठन यह संकेत है कि AI को सैन्य कामों में इस्तेमाल करने को लेकर भारत गंभीर है. हालांकि, उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर और अधिक शिद्दत से आगे बढ़ना होगा.
हमें असल में दोनों प्रकार के हालात- ‘युद्ध में AI’ और ‘AI दुनिया में युद्ध’ के लिए ढांचागत तंत्र बनाने होंगे. इतना ही नहीं, राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए क्षमता बढ़ानी होगी, जिसमें विभिन्न मंत्रालयों में तालमेल और सामंजस्यपूर्ण नीतियों के निर्माण के लिए राष्ट्रीय AI रक्षा परिषद (NAIDC) की स्थापना भी शामिल है. राष्ट्रीय स्तर पर AI निर्भरता ऑडिट कराने की भी ज़रूरत है, जिसमें डेटा एक्सेस, कंप्यूटिंग क्षमता और आपूर्तिकर्ता जैसे विषयों पर ख़ास तौर पर ध्यान देना होगा. रक्षा क्षेत्र में AI के उपयोग के लिए नैतिकता, इंसान व मशीन के मिलकर काम करने (ह्यूमन-इन-लूप) और सुरक्षा से जुड़े दिशा-निर्देशों पर ध्यान देने की भी आवश्यकता है. ‘युद्ध में AI’ के लिए, सशस्त्र बलों के भीतर एक AI ऑपरेशंस सेल बनाने की भी ज़रूरत है, ताकि प्रोटोटाइपिंग (आम इस्तेमाल से पहले के परीक्षण) और क्षेत्र में AI के इस्तेमाल की व्यवस्था हो सके. साथ ही, खुफ़िया, निगरानी और टोही (ISR) विश्लेषण में उच्च-क्षमता वाले प्रोटोटाइप के परीक्षण, रख-रखाव और AI सक्षम रसद सामग्रियों की व्यवस्था भी हमें करनी होंगी.
युद्ध का भविष्य केवल इस बात से तय नहीं होगा कि कौन बेहतर AI हथियार बनाता है बल्कि इस बात से तय होगा कि कौन सबसे अच्छी तरह से यह समझता है कि AI युद्ध की प्रकृति को कैसे बदल रही है. AI की दुनिया में जंग जीतने के लिए दोनों मोर्चों पर महारत हासिल करना ज़रूरी है- युद्ध के लिए AI विकसित करना होगा और AI द्वारा संचालित युद्ध में बचाव के उपाय अपनाने होंगे. जो देश इसे समझ जाएंगे, वही इस दौर में, जहां एल्गोरिदम इंसानी सेनाएं जितनी ही महत्वपूर्ण हैं, शांति, बचाव और नियंत्रण तय करेंगे.
(लेफ्टिनेंट जनरल करणबीर सिंह बरार पीवीएसएम, एवीएसएम (रिटायर्ड) हैं. वे वर्तमान में आईआईटीएम प्रवर्तक के विशिष्ट रणनीतिक सलाहकार हैं)
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
The General Officer with a career spanning almost four decades has rich experience of serving in all terrain and operational areas with tenures in J&K, ...
Read More +