Published on Apr 29, 2022 Updated 1 Days ago

दुनिया भर की राज्यसत्ताओं पर फ्रंटियर टेक्नोलॉजी के प्रभावों के आकलन के बाद इनके परिवर्तनकारी स्वरूप का पता चला है. राज्यसत्ताएं फ़्रंटियर टेक्नोलॉजी के एकीकृत ढांचे की तलाश में हैं.

‘प्रजातंत्र, प्रौद्योगिकी और भू-राजनीति’

यह लेख रायसीना फाइल्स 2022 नामक सीरिज़ का हिस्सा है.


टेक्नोलॉजी मौजूदा भू-राजनीति के केंद्र में है. यही वैश्विक गठजोड़ों को आकार दे रही है और विश्व स्तरीय जुड़ावों की रूपरेखा तैयार कर रही है. ख़ासतौर से फ़्रंटियर प्रौद्योगिकी बेहद तेज़ रफ़्तार से चौथी औद्योगिक क्रांति का आग़ाज़ सुनिश्चित कर रही है. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI), ब्लॉकचेन और 5जी जैसी उभरती टेक्नोलॉजी इन बदलावों की अगुवाई कर रही है. दुनिया भर की राज्यसत्ताओं पर फ्रंटियर टेक्नोलॉजी के प्रभावों के आकलन के बाद इनके परिवर्तनकारी स्वरूप का पता चला है. राज्यसत्ताएं फ़्रंटियर टेक्नोलॉजी के एकीकृत ढांचे की तलाश में हैं. इससे किसी एक सेक्टर में तरक़्क़ी से दूसरे सेक्टर में भी विकास की नींव पड़ जाएगी. इन अगुवा तकनीकों की क्षमताओं की बात करें तो 2035 तक वैश्विक आर्थिक मूल्य में 5जी के 13 खरब अमेरिकी डॉलर का स्तर छू लेने की उम्मीद है. साथ ही उस कालखंड तक इसके ज़रिए 2.2 करोड़ नौकरियां भी पैदा होने के आसार हैं. दूसरी ओर AI के ज़रिए 2030 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में 15 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के योगदान का अनुमान जताया गया है.[i] यूरोप से लेकर एशिया तक के देशों में फ्रंटियर टेक्नोलॉजी में निवेश करने को लेकर होड़ मच चुकी है. चीन और अमेरिका इस प्रतिस्पर्धा की अगुवाई कर रहे हैं. सबको उम्मीद है कि आने वाले समय में भू-राजनीति और राज्यसत्ताओं के आचरण पर इन तकनीकों का सामरिक रूप से निर्णायक प्रभाव होने वाला है.

आज के ज़माने में प्रौद्योगिकी- अंतरराष्ट्रीय सहयोग और प्रतिस्पर्धा- दोनों को संचालित कर रही है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में टेक-आधारित भागीदारियां प्रचलन में आती जा रही हैं. यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन द्वारा डी-10 (5जी और दूसरी उभरती तकनीकों की वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखला तैयार करने के लिए 10 लोकतांत्रिक देशों का गठजोड़) के प्रस्ताव से ये बात ज़ाहिर तौर पर सामने आई है

आज के ज़माने में प्रौद्योगिकी- अंतरराष्ट्रीय सहयोग और प्रतिस्पर्धा- दोनों को संचालित कर रही है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में टेक-आधारित भागीदारियां प्रचलन में आती जा रही हैं. यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन द्वारा डी-10 (5जी और दूसरी उभरती तकनीकों की वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखला तैयार करने के लिए 10 लोकतांत्रिक देशों का गठजोड़) के प्रस्ताव से ये बात ज़ाहिर तौर पर सामने आई है.[ii]  ये क़वायद क्वॉड्रिलैटरल सिक्योरिटी डायलॉग (क्वॉड) देशों के बीच मार्च 2021 में हुई रज़ामंदी से मेल खाती है. क्वॉड देश 5जी की तैनाती और उपकरणों के आपूर्तिकर्ताओं में विविधता लाने के लिए सहयोग के अवसरों की तलाश करने पर सहमत हुए थे. निजी क्षेत्र और उद्योग जगत के साथ क़रीबी तालमेल बिठाकर इस क़वायद को आगे बढ़ाने पर रज़ामंदी हुई थी.[iii] सितंबर में इस सहमति पर दोबारा मंथन किया गया था. ऐसा ही एक प्रस्ताव “टी-12” यानी तकनीकी रूप से विकसित और समृद्ध लोकतांत्रिक देशों का समूह तैयार करने से जुड़ा है.[iv] जी20 और क्वॉड जैसे प्रभावशाली बहुपक्षीय और क्षेत्रीय समूहों पर भी प्रौद्योगिकी का दबदबा देखा जा सकता है. ये तमाम समूह उभरती तकनीकों के क्षेत्र में तालमेल बिठाने के लिए सभी ज़रूरी क़दम बढ़ा रहे हैं. इन घटनाक्रमों से मौजूदा दौर में टेक्नोलॉजी की प्रभावशाली भूमिका स्पष्ट हो गई है.

वैश्विक व्यवस्था में दरार

​निश्चित रूप से डिजिटल टेक्नोलॉजी से मानवता को काफ़ी लाभ पहुंचा है. बहरहाल तकनीकी तरक़्क़ी कई तरह के दुष्प्रभाव भी साथ लाई है. आज हम जिस तकनीकी वातावरण में जी रहे हैं वो टकरावों और संघर्षों का मैदान बन गया है. टेक्नोलॉजी गहरी अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा को भी हवा दे रही है. इससे वैश्विक व्यवस्था में दरार आ रही है. हमारे डिजिटल संसार की परिकल्पना से जुड़ी क़वायदों से ये साफ़ हो चुकी है. वैश्विक डिजिटल व्यवस्था के प्रतिस्पर्धी दृष्टिकोण, अलग-अलग क़ायदे और भिन्न-भिन्न मानक और प्रोटोकॉल्स से इन मतभेदों की साफ़-साफ़ झलक मिलती है.[v] मुमकिन है कि कोविड-19 महामारी ने विश्व व्यवस्था में दरार से जुड़े इन रुझानों की रफ़्तार और बढ़ा दी हो. महामारी के चलते वैश्विक व्यवस्था में आई रुकावटों से डिजिटल संसार का एक नया नॉर्मल सामने आया है. अक्सर ये नया रुझान पुरानी डिजिटल व्यवस्थाओं के ख़िलाफ़ खड़ा दिखाई देता है. इन बदलावों के चलते उभरती प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में वैश्विक मानकों और प्रोटोकॉल्स की नए सिरे से समीक्षा की ज़रूरत आन पड़ी है. इस क़वायद से इनसे हासिल होने वाले फ़ायदों की रफ़्तार बढ़ेगी और इनके चलते पैदा होने वाले जोख़िमों में कमी लाई जा सकेगी. विश्व के देशों में (जिनमें दुनिया का अगुवा लोकतंत्र अमेरिका भी शामिल है) अंतर्मुखी रुझान देखे जा रहे हैं. धीरे-धीरे दुनिया के तमाम देशों ने व्यापार पर कई तरह के शासकीय नियंत्रण लगा दिए हैं. इनमें नियमन, निर्यात नियंत्रण, इकाइयों का सूचीकरण और स्थानीयकरण से जुड़ी क़वायदें शामिल हैं. दरअसल, राज्यसत्ताएं अहम तकनीकों तक ख़ुद की पहुंच सुनिश्चित करना चाहती हैं. इन क़दमों से अक्सर निर्यात से जुड़े एकाधिकारों का जन्म होता है. इनसे व्यापार और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अस्थिर होती है और ये वैश्विक स्तर पर मौजूदा व्यापार संतुलन के शीर्ष पर सवार हो जाती है. उत्पादन और संसाधनों के नियंत्रण के साथ-साथ सेमीकंडक्टर्स और धरती से मिलने वाली दुर्लभ सामग्रियों की आपूर्ति के संदर्भ में दुनिया में एक नई तरह की भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा आकार ले रही है. ये टेक्नोलॉजी के चलते पैदा होने वाली भू-राजनीतिक रस्साकशी की चुनिंदा मिसालों में से हैं. मुमकिन है इस पूरी क़वायद से वैश्विक व्यवस्था में बदलाव को भी हवा मिल रही हो.

राज्यसत्ताएं अहम तकनीकों तक ख़ुद की पहुंच सुनिश्चित करना चाहती हैं. इन क़दमों से अक्सर निर्यात से जुड़े एकाधिकारों का जन्म होता है. इनसे व्यापार और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अस्थिर होती है और ये वैश्विक स्तर पर मौजूदा व्यापार संतुलन के शीर्ष पर सवार हो जाती है.

आज दुनिया के देश तकनीक पर एक-दूसरे की निर्भरता का फ़ायदा उठाने की ताक में हैं. वो अपनी भू-राजनीतिक प्रतिद्वंदिताओं के निपटारे के लिए इसका इस्तेमाल करना चाहते हैं. मिसाल के तौर पर साइबर से जुड़ा संसार (जिसकी कोई सरहद नहीं है और जो दुनिया को क़रीब लाने का माद्दा रखती है) धीरे-धीरे इस बढ़ती प्रतिस्पर्धा और टकराव का मैदान बनता जा रहा है. इतना ही नहीं अहम बुनियादी ढांचों और सेवाओं पर बढ़ते साइबर हमलों से अपने वजूद की रक्षा करने की देशों की क्षमताओं के सामने चुनौतियां खड़ी हो रही हैं. इसके साथ ही रक्षा और आक्रमण से जुड़े संतुलन और टकरावों की रफ़्तार भी नए सिरे से तय करने की ज़रूरत खड़ी हो जाती है.

टेक्नोलॉजी और दुनिया के लोकतंत्र

दुनिया के लोकतंत्र आज टेक्नोलॉजी से जुड़ी दो अहम चुनौतियों का सामना कर रहे हैं: पहला, टेक्नोलॉजी के मोर्चे पर वर्चस्व हासिल करने की एकाधिकारवादी हुकूमतों की निर्णायक क़वायद और दूसरा, ‘बिग टेक’ के ख़तरे. निश्चित रूप से प्रौद्योगिकी से लोकतांत्रिक समाजों को बड़ा लाभ हुआ है. टेक्नोलॉजी ने उन्हें अपने नागरिकों तक पहुंच बनाने और प्रशासन में सुधार लाने के औज़ार मुहैया कराए हैं. हालांकि दूसरी तरफ़ इसने उनके सुरक्षा वातावरण को पेचीदा भी बना दिया है. इसमें ‘बिग टेक’ (सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स और टेक्नोलॉजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियां) ने अहम भूमिका निभाई है.

आज की दुनिया अपने लिए संचार से जुड़े अवसरों के मामलों में बिग टेक पर निर्भर है. बहरहाल, ये बिग टेक कंपनियां जिन राष्ट्रीय क्षेत्राधिकारों में काम करती हैं, अक्सर उनकी तरफ़ किसी भी तरह की जवाबदेही का इज़हार नहीं करतीं. इसकी बजाए इन बिग टेक कंपनियों ने अक्सर अपने अमेरिकी, पश्चिमी या चीनी मूल का ही ख़ुलासा किया है. नतीजतन कुछ लोगों ने उनके बर्ताव को लोकतांत्रिक राजव्यवस्थाओं में विदेशी दख़लंदाज़ियों के तौर पर परिभाषित किया है. डॉ. समीर सरन और शशांक मट्टू के मुताबिक “संप्रभु संविधानों द्वारा बताए गए नियमों और क़ायदों के परे अपने कामकाज का संचालन करने वाले सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स अब बग़ैर किसी जवाबदेही के चिंताजनक रूप से प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं.”[vi] नतीजतन बिग टेक के ये दोहरे मापदंड राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए चुनौती साबित होते हैं और लोकतंत्र की बुनियाद को अस्थिर करते हैं.

डिजिटल प्रौद्योगिकियों के उभार ने डिजिटल संप्रभुता के विचार को नए सिरे से परिभाषित किया है. मोटे तौर पर इसे घरेलू टेक्नोलॉजी के बूते एक टिकाऊ डिजिटल इकोसिस्टम खड़ा करने और दूसरे देशों पर अपनी तकनीकी निर्भरताओं में कटौती करने की राज्यसत्ताओं की क़ाबिलियत के तौर पर समझा जाता है.[vii] दरअसल संप्रभुता का विचार (लोकतंत्र के विपरीत) ज़्यादा से ज़्यादा पाबंदियां आयद करने की राज्यसत्ता की विशेषताओं पर ज़ोर देता है. नतीजतन डिजिटल दायरे में संप्रभुता की परिकल्पना से जुड़े कुछ कारकों के विस्तार और चीन जैसी एकाधिकारवादी राज्यसत्ताओं द्वारा अपने हितों पर आधारित इनकी व्याख्याओं से डिजिटल संप्रभुता के नए मॉडलों का उभार हुआ है. आज अमेरिका और चीन डिजिटल संप्रभुता के 2 वैकल्पिक मॉडलों के प्रतिनिधि बन गए हैं. 2017 में चीन ने अपना राष्ट्रीय ख़ुफ़िया क़ानून पारित किया था. इसके तहत वहां की कंपनियों के लिए चीनी ख़ुफ़िया एजेंसियों के साथ सूचना साझा करना अनिवार्य हो गया था. अहम बात ये है कि ये क़ानून घरेलू और अंतरराष्ट्रीय- दोनों मोर्चों पर अपना प्रभाव छोड़ता है. चीनी क़ानून का अंतरराष्ट्रीय प्रभाव उन देशों की डिजिटल संप्रभुता का उल्लंघन करता है जहां चीनी टेक कंपनियां कार्यरत हैं.[viii] चीन डिजिटल संप्रभुता के वैकल्पिक मॉडल के तौर पर उभरा है. साथ ही वहां जिस तरह से टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होता है, उसने लोकतंत्र के सिद्धांतों को ही पलटकर रख दिया है. अगली पीढ़ी के दूरसंचार नेटवर्क से हुआवेई को दूर रखने की अमेरिकी कोशिशों के चलते प्रतिस्पर्धी प्रौद्योगिकीय मिश्रण सामने आया है. भू-राजनीतिक तौर पर इसका असर लाज़िमी है.

आज अमेरिका और चीन डिजिटल संप्रभुता के 2 वैकल्पिक मॉडलों के प्रतिनिधि बन गए हैं. 2017 में चीन ने अपना राष्ट्रीय ख़ुफ़िया क़ानून पारित किया था. इसके तहत वहां की कंपनियों के लिए चीनी ख़ुफ़िया एजेंसियों के साथ सूचना साझा करना अनिवार्य हो गया था. अहम बात ये है कि ये क़ानून घरेलू और अंतरराष्ट्रीय- दोनों मोर्चों पर अपना प्रभाव छोड़ता है.

बिग टेक दुष्प्रचार और झूठी सूचनाओं के प्रचार-प्रसार में भी शामिल रहा है. भारत में इसकी बानगी देखने को मिलती रही है. यहां कुछ आपत्तिजनक सामग्रियों को हटाने के लिए सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म्स की अक्सर सरकार से भिड़ंत होती रही है.[ix] ज़ाहिर तौर पर भावी लोकतंत्रों पर बिग टेक का एक निर्णायक प्रभाव, बिग टेक और लोकतांत्रिक राज्यसत्ताओं के बीच स्थापित आपसी संपर्कों की तबाही के रूप में देखने को मिल सकता है. दुनिया के देशों ने अपने राष्ट्रीय हितों के अनुकूल, बिग टेक कंपनियों पर अतिरिक्त पाबंदियां लगाने के मक़सद से अपने रुख़ों का नए सिरे से निर्धारण किया है.

‘बिग टेक’ पर नकेल कसने के लिए दुनिया भर में कई तरह के प्रयास किए गए हैं. नाइजीरिया ने जून 2021 में ट्विटर पर पाबंदी लगा दी;[x] भारत ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचारसंहिता) नियम लागू किए है;[xi] जबकि ऑस्ट्रेलिया ने न्यूज़ मीडिया बारगेनिंग कोड पर अमल करना शुरू किया है.[xii] ज़ाहिर है कि अगर लोकतांत्रिक देशों को बिग टेक से ख़तरा महसूस होता है तो वो उनके नियमन के लिए क़दम उठाएंगे चाहे इसके नतीजे के तौर पर टकराव ही क्यों न देखने को मिले.[xiii] राज्यसत्ताओं द्वारा एकाधिकारवादी बिग टेक के साथ मासूमियत से पेश आने के दिन अब बीत चुके हैं.[xiv] एक ओर बेरोकटोक संचार के दायरे और राष्ट्रीय सरहदों से आर-पार निकल जाने की इनकी ख़ूबियों से स्थिर व्यवस्था रेखांकित होती है, तो वहीं दूसरी ओर बिग टेक कंपनियां अक्सर अपनी ताक़त और प्रभाव के राजनीतिकरण में उलझती रही हैं. नतीजे के तौर पर इसका राज्यसत्ताओं की घरेलू राजनीति पर असर देखने को मिलता रहा है. भविष्य की तकनीक से संचालित होने वाली व्यवस्था में बिग टेक कंपनियों के स्वामित्व और उनके नियंत्रण को उन कारकों के तौर पर देखा जा रहा है जो प्रभावकारी भू-राजनीति को आकार देने का काम करेंगी.[xv]

लोकतांत्रिक समाजों और तानाशाही हुकूमतों के बीच तकनीक से जुड़ी प्रतिस्पर्धा

कोविड-19 महामारी से आर्थिक मोर्चे पर तनाव पैदा हुआ है. इसने कई लोकतांत्रिक समाजों को उनके रणनीतिक लक्ष्यों से भटका दिया है. इतना ही नहीं तकनीकी मोर्चे पर अपने जीवंत बुनियादों और नवाचार के फलते-फूलते इकोसिस्टम के बावजूद लोकतांत्रिक समाजों के सामने परेशान कर देने वाली हक़ीक़त मुंह बाए खड़ी है: दरअसल, इन देशों के पास डिजिटल टेक्नोलॉजी के अनेक हिस्सों में अब पहले की तरह बढ़त नहीं रह गई है.[xvi]  डिजिटल तकनीक अब पहले की तरह लोकतांत्रिक मूल्यों को आगे नहीं बढ़ा रही है. 2 दशक पहले डिजिटल क्रांति के शुरुआती दौर में इनके बारे में जो सोचा गया था वो अब उससे अलग रुख़ दिखा रही हैं.[xvii]

इसके विपरीत एकाधिकारवादी हुकूमतें अपने गठजोड़ों को पक्का करते हुए आगे निकल गई हैं. अमेरिका और चीन के बीच की टेक प्रतिस्पर्धा ने जता दिया है कि दूसरे लोकतंत्रों के पास भी इससे बचने का रक्षा कवच मौजूद नहीं है. धीरे-धीरे प्रौद्योगिकी से जुड़ी क़वायद एक के लिए नफ़े तो दूसरे के लिए नुक़सान का सबब बन गई है. नतीजतन तानाशाही हुकूमतें डिजिटिल टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी बढ़त हासिल करती जा रही हैं. इससे उनके और लोकतांत्रिक देशों के बीच का सत्ता संतुलन नए सिरे से तय होने लगा है.[xviii]

एकाधिकारवादी हुकूमतें अपनी दमनकारी करतूतों को आगे बढ़ाने में तकनीकी मोर्चे पर हासिल अपनी महारत का इस्तेमाल कर रही हैं. स्कॉलर एलिना पोलिआकोवा और क्रिस मेसेरोल ने इसे ‘डिजिटल एकाधिकारवाद’ के तौर पर परिभाषित किया है. इसके तहत एकाधिकारवादी सरकारें डिजिटल सूचना तकनीक के ज़रिए घरेलू और विदेशी आबादी के ख़िलाफ़ निगरानी रखने, दमन करने और हेराफ़ेरी से जुड़ी क़वायदों को अंजाम देती हैं

एकाधिकारवादी हुकूमतें अपनी दमनकारी करतूतों को आगे बढ़ाने में तकनीकी मोर्चे पर हासिल अपनी महारत का इस्तेमाल कर रही हैं. स्कॉलर एलिना पोलिआकोवा और क्रिस मेसेरोल ने इसे ‘डिजिटल एकाधिकारवाद’ के तौर पर परिभाषित किया है. इसके तहत एकाधिकारवादी सरकारें डिजिटल सूचना तकनीक के ज़रिए घरेलू और विदेशी आबादी के ख़िलाफ़ निगरानी रखने, दमन करने और हेराफ़ेरी से जुड़ी क़वायदों को अंजाम देती हैं.[xix] मिसाल के तौर पर, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी शिनजियांग में वीगर नस्ल वाले अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाते हुए उनके ख़िलाफ़ चेहरे की पहचान करने, AI, बिग डेटा और जेनेटिक टेस्टिंग के लिए अलीबाबा, सेंसटाइम और मेगवी जैसी घरेलू तकनीकी कंपनियों की सेवाओं का इस्तेमाल करती रही है.[xx]

व्यवस्थित रूप से उभरती तकनीक के इस्तेमाल और दमनकारी गतिविधियों में उनकी तैनाती की चीनी क़वायद से उसका रुख़ साफ़ तौर से परिभाषित हो गया है. ये रुख़ ‘तकनीकी-राष्ट्रवाद’ से गहरे रूप से जुड़ा है.[xxi] हिलेरी मैकगिची का मानना है कि “अंतरराष्ट्रीय मानक संगठनों में अपने क्रियाकलापों और प्रभावशीलता को बढ़ाने की चीनी क़वायद ने फल देना शुरू कर दिया है. 5जी नेटवर्क से जुड़े मानकों के विकास से ये बात ख़ासतौर से सामने आई है. आगे चलकर AI और इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स (IoT) में भी इस रुझान के जारी रहने के आसार हैं.”[xxii]

एकाधिकारवादी हुकूमतों ने झूठी ख़बरें फैलाने और दुष्प्रचार के लिए टेक्नोलॉजी का भरपूर इस्तेमाल किया है. उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में घुसपैठ के लिए भी टेक्नोलॉजी का सहारा लिया है. मिसाल के तौर पर भू-राजनीतिक और टेक के मोर्चे पर चीन के बढ़ते रसूख़ के साथ-साथ घुसपैठ करने की साइबर क्षमताओं ने इसे दूसरी राज्यसत्ताओं की सियासी व्यवस्थाओं में दख़लंदाज़ी करने की ताक़त दे दी है. प्रौद्योगिकी को हथियार की तरह इस्तेमाल करने की इस प्रवृति का लोकतांत्रिक समाजों और उनके क्रियाकलापों पर सीधा प्रभाव पड़ता है.

लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के बीच गठजोड़ क़ायम करने की क़वायद

भावी वैश्विक व्यवस्था पर उभरती प्रौद्योगिकियों के प्रभाव से जुड़ी कई बातें अभी अज्ञात हैं. दूसरी ओर ज्ञात तथ्यों की बात करें तो लोकतांत्रिक देशों के बीच केवल गठजोड़ भरा रुख़ ही हमें इन चुनौतियों से पार पाने लायक बना सकता है.

राज्यव्यवस्थाओं पर प्रौद्योगिकी का परिवर्तनकारी प्रभाव पड़ना तय है. ऐसे में सरकारों के लिए इस दिशा में क़दम बढ़ाकर इसके प्रभावों की रोकथाम करना और यहां तक कि उनका नियमन करना सूझबूझ भरा उपाय है. अपने विनाशकारी प्रभावों के बावजूद कोविड-19 महामारी ने दुनिया के देशों को प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से मौजूदा चुनौतियां का निपटारा करते हुए भविष्य के लिए तैयार रहने का मौक़ा दिया है. 

प्रौद्योगिकी के घातक प्रभावों की रोकथाम से जुड़े रास्तों की तलाश में लोकतांत्रिक समाजों को ही अगुवाई करनी होगी. उन्हें निरंकुश हुकूमतों के ख़िलाफ़ अपने संघर्ष में साथ जोड़ने वाली तकनीकों की पहचान करनी चाहिए. अगर लोकतांत्रिक समाज अपने मूल्यों के संरक्षण के लिए गंभीर हैं तो उन्हें अपनी हिचकिचाहट और यथास्थितिवादी रुख़ को दूर करना होगा. उन्हें अपने सहयोगात्मक दृष्टिकोण को लेकर दृढ़ और महत्वाकांक्षी होना पड़ेगा. साथ ही ज़्यादा से ज़्यादा डेटा साझा करने होंगे, साझा मानक विकसित करने होंगे और नवाचार पर ज़ोर देना होगा. इसके अलावा साथी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को टेक के मोर्चे पर सामने खड़ी चुनौतियों से बेहतर तरीक़े से निपटने के लिए ज़रूरी औज़ार मुहैया कराने होंगे. ध्रुवीकरण की शिकार मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में बहुपक्षीय संस्थाएं अपना कामकाज चलाने के भरसक प्रयास कर रही हैं, लेकिन लोकतांत्रिक देशों को अपने प्रौद्योगिकीय गठजोड़ को आगे ले जाने के लिए ‘समान सोच और इच्छाओं वाला गठबंधन’ तैयार करना होगा. निजता, निगरानी और दुष्प्रचार से जुड़ी बुनियादी चिंताएं साझा करने वाले लोकतांत्रिक समाजों के लिए ये तमाम क़वायद निहायत ज़रूरी हैं.

इससे भी अहम बात ये है कि पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों (चाहे प्रौद्योगिकी के मोर्चे पर उन्होंने कितनी ही बढ़त बना रखी हो) को दूसरे लोकतंत्रों के लिए जगह खाली करनी होगी, ताकि ये उभरता गठबंधन समावेशी और हर किरदार के लिए फ़ायदे का सौदा बन सके. डी-10, डिजिटल स्टेबिलिटी बोर्ड और टेक्नो-डेमोक्रेसीज़ जैसे प्रस्तावों से इस सिलसिले में आगे के रास्तों के संकेत मिलते हैं.

राज्यव्यवस्थाओं पर प्रौद्योगिकी का परिवर्तनकारी प्रभाव पड़ना तय है. ऐसे में सरकारों के लिए इस दिशा में क़दम बढ़ाकर इसके प्रभावों की रोकथाम करना और यहां तक कि उनका नियमन करना सूझबूझ भरा उपाय है. अपने विनाशकारी प्रभावों के बावजूद कोविड-19 महामारी ने दुनिया के देशों को प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से मौजूदा चुनौतियां का निपटारा करते हुए भविष्य के लिए तैयार रहने का मौक़ा दिया है. चीन द्वारा महामारी से लड़ने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किए जाने की मिसाल में लोकतांत्रिक समाजों के लिए सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के सबक़ छिपे हैं. ख़ास बात ये है कि चीन ने मरीज़ों का पता लगाने, लॉकडाउन लागू करने और दूसरी पाबंदियों के लिए पोजिशनिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया है. अनेक एकाधिकारवादी हुकूमतों के लिए महामारी प्रतिबंधात्मक प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल को मांझने और उनकी व्यावहारिकता की पड़ताल करने का मौक़ा लेकर आई. बहरहाल ऐसी तकनीकों का बदस्तूर इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक समुदाय के लिए गहरी चिंता का सबब बन गया है. कुछ लोकतांत्रिक देश इन ख़तरों को समय से पहले भांपकर उनका निपटारा करने की जद्दोजहद में जुट गए हैं. मिसाल के तौर पर क्वॉड से जुड़े लोकतांत्रिक समूह द्वारा बेहतर स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए ‘बिल्ड बैक बेटर’ से जुड़ा रुख़ अगली महामारी के लिए बेहतर तैयारी का संकल्प जताते हुए एक मज़बूत हिंद-प्रशांत तैयार करने की दिशा में प्रतिबद्धता जताता है. क्वॉड के भीतर के सहकारी कार्यक्रमों जैसे एक्सिलरेटिंग कोविड-19 थेरेप्यूटिक इंटरवेंशंस एंड वैक्सीन्स और ग्लोबल इनफ़्लूएंज़ा सर्विलांस एंड रिस्पॉन्स सिस्टम- के लिए सभी लोकतांत्रिक सदस्य देशों द्वारा प्रौद्योगिकी के मोर्चे पर गंभीर प्रतिबद्धताएं दिखाने की दरकार है. साझा चुनौतियों से निपटने का यही माकूल तरीक़ा हो सकता है.

क्वॉड उभरती प्रौद्योगिकियों के मामले में हिंद-प्रशांत के लोकतांत्रिक देशों में सहकारी एजेंडे की अगुवाई कर रहा है. मार्च 2021 में क्वॉड के तमाम नेता अहम और उभरती प्रौद्योगिकी पर कार्यदल के गठन पर रज़ामंद हुए थे. इसका मक़सद आपसी तालमेल को बढ़ाते हुए ये सुनिश्चित करना है कि प्रौद्योगिकी मानकों का संचालन साझा हितों और मूल्यों के ज़रिए हो

निष्कर्ष

अगले कुछ दशकों की भू-राजनीति का आकार शक्ति की 2 धुरियों के बीच की प्रौद्योगिक प्रतिस्पर्धा से तय होगा. इसमें एक ओर चीन है तो दूसरी ओर अमेरिका की अगुवाई वाला गठबंधन. इसमें अटलांटिक के आर-पार अमेरिका के यूरोपीय सहयोगियों और ऑस्ट्रेलिया, भारत, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे हिंद-प्रशांत के भागीदारों की भूमिका निर्णायक हो सकती है. मुमकिन है कि यही उभरती भू-राजनीति समान रूप से आर्थिक और सियासी  हक़ीक़तों को भी आकार दे सकती है. इससे सामरिक मोर्चे पर नए सिरे से समीक्षा सामने आ सकती है. ख़ासतौर से उन्नत तकनीकों में चीन के नवाचार और AI, बिग डेटा, 5जी, नैनो टेक्नोलॉजी, बायोटेक्नोलॉजी, रोबोटिक्स, IoT और क्वॉन्टम कम्प्यूटिंग के क्षेत्रों में तरक़्क़ी से जुड़ी क़वायदों में शक्ति संतुलन का नए सिरे से निर्धारण करने की क्षमता है. इसमें भावी वैश्विक व्यवस्था में प्रभाव के संतुलन को प्रभावित करने की क़ाबिलियत भी मौजूद है. प्रौद्योगिकी के मोर्चे पर चीन की तरक़्क़ी हाईटेक सेक्टर में उसकी कामयाबियों से जुड़ी क्रांति का हिस्सा हैं. दरअसल चीन अपने “मेड इन चाइना 2005” कार्यक्रम के ज़रिए इन क्षेत्रों में तरक़्क़ी की क़वायदों में लगा है. इस कार्यक्रम का मक़सद चीन में उन्नत औद्योगिक आधार और सहज आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ा लक्ष्य हासिल करना है. साथ ही दोनों में बेहतर तालमेल के ज़रिए एकीकृत व्यवस्था क़ायम करना भी एक प्रमुख लक्ष्य है. औद्योगिक विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखला की मौजूदा व्यवस्थाओं (अमेरिकी अगुवाई वाली) पर निर्भर दूसरे औद्योगिक देशों के लिए तकनीकी मोर्चे पर आमूलचूल बदलाव लाने की चीनी क़वायद न सिर्फ़ आंख खोल देने वाली, बल्कि अस्थिरता लाने वाली क़वायद भी है. इसमें भविष्य के लिए ख़तरे की आशंका मौजूद है.

हिंद-प्रशांत के देशों को इस बात का पहले ही एहसास हो चुका है, लिहाज़ा वहां सहयोग में मज़बूती लाने की कोशिशें शुरू भी हो चुकी हैं. बाइडेन प्रशासन की हिंद-प्रशांत रणनीति में हिंद-प्रशांत आर्थिक ढांचे (IPEF) के लिए एक योजना पेश की गई है. इसके तहत व्यापार के ऊंचे मानकों, डिजिटल अर्थव्यवस्था के प्रशासन, सुरक्षा में बढ़ोतरी और लोचदार आपूर्ति श्रृंखला को बढ़ावा देने की बात की गई है. इसके अलावा पारदर्शी और ऊंचे मानदंडों वाले बुनियादी ढांचे के साथ-साथ डिजिटल कनेक्टिविटी तैयार करने की क़वायद पर भी ज़ोर दिया गया है.[xxiii] IPEF के तहत क्षेत्रीय लोकतंत्रों को एक समान उद्देश्यों के दायरों से बांधने का लक्ष्य रखा गया है और इसके लिए टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर बल दिया गया है. भू-राजनीतिक नज़रिए से देखें तो इसके ज़रिेए चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का जवाबी सामरिक ढांचा पेश करने की कोशिश की गई है.

क्वॉड उभरती प्रौद्योगिकियों के मामले में हिंद-प्रशांत के लोकतांत्रिक देशों में सहकारी एजेंडे की अगुवाई कर रहा है. मार्च 2021 में क्वॉड के तमाम नेता अहम और उभरती प्रौद्योगिकी पर कार्यदल के गठन पर रज़ामंद हुए थे. इसका मक़सद आपसी तालमेल को बढ़ाते हुए ये सुनिश्चित करना है कि प्रौद्योगिकी मानकों का संचालन साझा हितों और मूल्यों के ज़रिए हो.[xxiv] भावी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को आकार देने, जुड़ाव और संचालन के साझा नियम बनाए रखने और एक स्थिर वैश्विक व्यवस्था तैयार करने में प्रौद्योगिकी पर निर्भरता लाज़िमी है. उभरती प्रौद्योगिकियों पर क्वॉड का ज़ोर इसी बात को दर्शाता है. फ़्रंटियर टेक्नोलॉजी ने प्रौद्योगिकी के व्यापक ढांचे के तहत अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्रों के एकीकरण की अहमियत को सबके सामने ला दिया है. संसाधन जुटाने से लेकर आपूर्ति श्रृंखलाओं के ज़रिए होने वाले निर्यातों तक इनका विस्तार हो गया है.

मुमकिन है कि राष्ट्रों की अलग-अलग आर्थिक और सैन्य क्षमताओं के हिसाब से उनका क्रम महामारी के चलते पहले ही तय हो चुका हो, लेकिन उनका भावी सफ़र प्रौद्योगिकी (मौजूदा और उभरती) के हिसाब से ढलने की उनकी क्षमताओं से तय होगा. इससे भी अहम बात ये है कि अर्थव्यवस्थाओं के विभिन्न सेक्टरों के बीच तकनीकी एकीकरण का स्तर मोटे तौर पर उनके विकास का संचालन करने वाला प्रमुख कारक होगा. 

इसने भविष्य के लोकतंत्रों के लिए भीतरी तौर पर विभिन्न सेक्टरों के बीच बढ़ते जुड़ावों की ज़रूरतों का संकेत दिया है. इस सिलसिले में स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन और कारोबार जैसी भावी अर्थव्यवस्थाओं में गठजोड़ ज़रूरी है. दूसरी ओर बाहरी तौर पर उनके उत्पादन आधारों के साथ बाहरी आपूर्ति श्रृंखलाओं के जुड़ावों की दरकार है. इसके साथ ही आपूर्ति श्रृंखलाओं में रुकावटों की रोकथाम भी ज़रूरी हो जाती है. दोनों ही क़वायदें आपस में जुड़ी हुई है. ये राज्यसत्ताओं के बीच सहकारी लोकतांत्रिक प्रयासों से परवान चढ़ सकती हैं. इस व्यवस्था को प्रभावकारी बनाने के लिए प्रौद्योगिकी का भरपूर इस्तेमाल अकेला सबसे महत्वपूर्ण कारक बन सकता है. इसके अलावा हिंद-प्रशांत में दोनों धुरियों के देशों द्वारा भू-राजनीतिक परिदृश्य को नया आकार देने में भी ये क़वायद अहम साबित हो सकती है.

महामारी ने कई सेक्टरों में प्रतिस्पर्धा के नियम फिर से तय कर दिए हैं. अब जबकि दुनिया के देश महामारी के प्रभावों से मज़बूत होकर उबरने लगे हैं (महामारी के बाद की रफ़्तार का सहारा लेते हुए) तब वैश्विक राजनीति और आर्थिक व्यवस्था का क्रम नए सिरे से तय होगा. मुमकिन है कि राष्ट्रों की अलग-अलग आर्थिक और सैन्य क्षमताओं के हिसाब से उनका क्रम महामारी के चलते पहले ही तय हो चुका हो, लेकिन उनका भावी सफ़र प्रौद्योगिकी (मौजूदा और उभरती) के हिसाब से ढलने की उनकी क्षमताओं से तय होगा. इससे भी अहम बात ये है कि अर्थव्यवस्थाओं के विभिन्न सेक्टरों के बीच तकनीकी एकीकरण का स्तर मोटे तौर पर उनके विकास का संचालन करने वाला प्रमुख कारक होगा. इस पूरी आपाधापी में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के सबसे बड़े निर्धारकों में से एक इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रौद्योगिकी पर वैश्विक रक्षा क्षेत्र की निर्भरता कितनी तेज़ी और गहनता के साथ आगे बढ़ती है. यूक्रेन-रूस जंग ने जता दिया है कि न तो जंग बीते दिनों की बात हुई है और ना ही तकनीक पर उनकी निर्भरता. हक़ीक़त तो ये है कि जंग में प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल का दायरा पहले के मुक़ाबले और बढ़ा ही है. प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बढ़त हासिल कर लेने से जंग के हालात तेज़ी से बदले जा सकते हैं, सही सूचनाएं हासिल की जा सकती हैं या अपने से बड़े दुश्मन के ख़िलाफ़ भी अपनी हिफ़ाज़ती क़वायद मज़बूत की जा सकती है. यूक्रेन संकट के बाद के कालखंड में यूरेशियाई महाद्वीप (या शायद बाहर भी) में छोटे देश अपने से कहीं बड़े शत्रुओं के मुक़ाबले अपनी तकनीकी क्षमताओं को मज़बूत बनाकर अपनी ताक़त बढ़ाने पर ध्यान देंगे. मुमकिन है यूरेशिया का मौजूदा संकट प्रौद्योगिकी को हथियार की तरह इस्तेमाल करने की प्रवृति को पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा शिद्दत से आगे बढ़ा दे.


[i]Ariel Kastner, “7 views on how technology will shape geopolitics,” World Economic Forum, https://www.weforum.org/agenda/2021/04/seven-business-leaders-on-how-technology-will-shape-geopolitics/.

[ii] Lucy Fisher, “Downing Street plans new 5G club of democracies,” The Times, May 29, 2020, https://www.thetimes.co.uk/article/downing-street-plans-new-5g-club-of-democracies-bfnd5wj57.

[iii] Fact Sheet: Quad Leaders’ Summit, The White House, https://www.whitehouse.gov/briefing-room/statements-releases/2021/09/24/fact-sheet-quad-leaders-summit/.

[iv] Jared Cohen and Richard Fontaine, “Uniting the Techno-Democracies: How to Build Digital

Cooperation,” Foreign Affairs 99, no. 6, (2020): 112-122.

[v] Ryan Hass, Patricia M. Kim, Emilie Kimball, Jesscia Brandt, David Dollar, Cameron F. Kerry, Aaron Klein, Joshua P. Meltzer, Chris Meserole, Amy J. Nelson, Pavneet Singh, Melanie W. Sisson, Thomas Wright, “U.S.-China technology competition,” Brookings, https://www.brookings.edu/essay/u-s-china-technology-competition/.

[vi] Samir Saran and Shashank Mattoo, “Big Tech vs. Red Tech: The Diminishing of Democracy in the Digital Age,” Observer Research Foundation, February 15, 2022, https://www.orfonline.org/research/big-tech-vs-red-tech/.

[vii] Ciaran Martin, “Geopolitics and Digital Sovereignty,” in Perspectives on Digital Humanism, ed. Hannes Werthner, Erich Prem, Edward A. Lee and Carlo Ghezzi (Springer, Cham, 2021), 227–231.

[viii] Geeta Mohan, “How China’s Intelligence Law of 2017 authorises global tech giants for espionage,” India Today, July 27, 2020, https://www.indiatoday.in/news-analysis/story/china-national-intelligence-law-2017-authorise-companies-espionage-india-1705033-2020-07-27.

[ix] Sameer Patil, “Big Tech: The phony knight of democracy,” Observer research Foundation, February 18, 2022, https://www.orfonline.org/expert-speak/big-tech-the-phony-knight-of-democracy/.

[x] Danielle Paquette, “Nigeria suspends Twitter after the social media platform freezes president’s account,” The Washington Post, June 4, 2021,  https://www.washingtonpost.com/world/2021/06/04/nigeria-suspends-twitter-buhari/.

[xi] Government of India, Ministry of Electronics and Information Technology, Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules 2021, (New Delhi: Ministry of Electronics and Information Technology, 2021)  https://www.meity.gov.in/writereaddata/files/Intermediary_Guidelines_and_Digital_Media_Ethics_Code_Rules-2021.pdf.

[xii] “News media bargaining code,” Australian Communications and Media Authority, Australian Government, https://www.acma.gov.au/news-media-bargaining-code.

[xiii] Kastner, “7 views on how technology will shape Geopolitics”.

[xiv] Tim Wu, The Curse of Bigness: How Corporate Giants Came to Rule the World (UK: Atlantic Books, 2020).

[xv] Kastner, “7 views on how technology will shape Geopolitics”.

[xvi] Sameer Patil, Inserting India into U.S. – Israel Defence Technology Cooperation, Mumbai, Gateway House, 2021, https://www.gatewayhouse.in/wp-content/uploads/2021/04/DefTech_Doc-04.pdf.

[xvii] Marie Lamensch, “Authoritarianism Has Been Reinvented for the Digital Age,” Centre for International Governance Innovation, July 9, 2021, https://www.cigionline.org/articles/authoritarianism-has-been-reinvented-for-the-digital-age/.

[xviii] Alina Polyakova and Chris Meserole, Exporting digital authoritarianism: The Russian and Chinese Models, August 2019, Brookings, https://www.brookings.edu/wp-content/uploads/2019/08/FP_20190827_digital_authoritarianism_polyakova_meserole.pdf.

[xix] Alina Polyakova and Chris Meserole, “Exporting digital authoritarianism: The Russian and Chinese Models”.

[xx] IPVM Team, “Alibaba Uyghur Recognition as a Service,” IPVM, December 16, 2020,  https://ipvm.com/reports/alibaba-uyghur.

[xxi] Efekan Bilgin and Alphonse Loh comment on “Techno-nationalism: China’s bid for global technological leadership,” LSE Blog, comment posted on September 28, 2021, https://blogs.lse.ac.uk/cff/2021/09/28/techno-nationalism-chinas-bid-for-global-technological-leadership/.

[xxii] Hilary McGeachy, US-China Technology Competition: Impacting a Rules-Based Order, 2019, United States Studies Centre, https://united-states-studies-centre.s3.amazonaws.com/uploads/ad0/b5e/9d4/ad0b5e9d410fbcf8c00ffef859dec3a6e55e9708/US-China-technology-competition-impacting-a-rules-based-order.pdf.

[xxiii] The White House, Indo-Pacific Strategy of the United States, (Washington DC: The White House, 2022),  https://www.whitehouse.gov/wp-content/uploads/2022/02/U.S.-Indo-Pacific-Strategy.pdf.

[xxiv] “Quad Critical and Emerging Technology Working Group,” Australian Government, https://www.internationalcybertech.gov.au/node/137.

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.

Authors

Sameer Patil

Sameer Patil

Dr Sameer Patil is Senior Fellow, Centre for Security, Strategy and Technology and Deputy Director, ORF Mumbai. His work focuses on the intersection of technology ...

Read More +
Vivek Mishra

Vivek Mishra

Vivek Mishra is a Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. His research interests include America in the Indian Ocean and Indo-Pacific and Asia-Pacific regions, particularly ...

Read More +