मिनटों में सामान घर पहुंचाने की सुविधा ने ज़िंदगी आसान बना दी है- जानें कैसे यह छोटी-सी सुविधा बड़े बदलाव लेकर आई है. जी हां, हर क्लिक पर ऑर्डर आता है लेकिन उसके साथ बढ़ता है पैकेजिंग कचरा और डिलीवरी वाहनों का धुआँ. और आखिर में यही तेज़ सुविधा हमारी हवा, पानी और स्वास्थ्य पर भारी पड़ रही है.
मिनटों में लगभग कुछ भी घर तक पहुँचाने के वादे पर आधारित वैश्विक क्विक-कॉमर्स बाज़ार दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते रिटेल क्षेत्रों में से एक बन चुका है. लेकिन सुविधा का यह नया दौर कई तरीकों से प्रदूषण बढ़ा रहा है, परिवहन से होने वाले उत्सर्जन में वृद्धि, एकल-उपयोग पैकेजिंग का फैलाव, और कचरे तथा ई-कचरे का इतना अधिक उत्पादन कि मौजूदा प्रणालियाँ पहले से ही उस पर बोझ महसूस कर रही हैं. 2018 की एक विश्व बैंक रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक वैश्विक स्तर पर हर साल पैदा होने वाला कचरा 2.5 अरब टन से अधिक हो जाएगा. लेकिन 2022 तक ही यह 2.56 अरब टन से आगे निकल चुका था.
क्विक कॉमर्स और मिनटों में डिलीवरी की बढ़ती उपलब्धता ने उपभोक्ताओं के व्यवहार को मूल रूप से बदल दिया है. जब खरीदना बेहद आसान हो जाता है और लागत लगभग नगण्य लगने लगती है, तो उपभोग तेज़ी से बढ़ता है और उसके साथ कचरा भी बढ़ता है. आधुनिक सुविधा-आधारित व्यापार के संदर्भ में, सस्ती और सहज होम डिलीवरी ने सिर्फ खपत नहीं बढ़ाई है, बल्कि उपभोक्ताओं की पसंद और आदतों को स्थायी रूप से बदल दिया है. हाइपरकंज़्यूमरिज़्म (अतिउपभोग) उस उपभोग पैटर्न को दर्शाता है जो वास्तविक जरूरत से कहीं अधिक होता है, कुछ साल पहले तक ऐसा संभव नहीं था कि आप एक सॉफ्ट ड्रिंक, स्मार्टफोन या हेडफोन ऑर्डर करें और वह कुछ ही मिनटों में आपके पास पहुँच जाए.
अनुमान है कि डिलीवरी से जुड़े उत्सर्जन में 21 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हो सकती है, जबकि डिलीवरी ट्रैफिक 32 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) ने चेतावनी दी है कि 2060 तक वैश्विक प्लास्टिक कचरा तीन गुना हो सकता है, और सुविधा-आधारित व्यापार इसका एक प्रमुख कारण बन सकता है.
भारत का क्विक-कॉमर्स बाज़ार इसका बड़ा उदाहरण है. ब्लिंकिट, ज़ेप्टो और स्विगी इंस्टामार्ट जैसे प्लेटफॉर्म ने लगभग 3.65 अरब अमेरिकी डॉलर के मूल्य वाला क्षेत्र खड़ा किया है, जो 2031 तक बढ़कर 6.64 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है. हालांकि यह सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है; यूरोप, उत्तरी अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया में भी अल्ट्रा-फास्ट डिलीवरी मॉडल तेजी से फैल रहे हैं. अलग-अलग क्षेत्रों में एक समान बात यह है कि इसका पर्यावरण पर भारी असर पड़ता है, बार-बार और कम मात्रा में होने वाली डिलीवरी का मतलब है प्रति वस्तु अधिक वाहन, हर ऑर्डर पर अधिक पैकेजिंग, प्रति उपभोग इकाई अधिक उत्सर्जन, और पारंपरिक खुदरा मॉडल की तुलना में प्रति घर अधिक कचरा. अनुमान है कि डिलीवरी से जुड़े उत्सर्जन में 21 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हो सकती है, जबकि डिलीवरी ट्रैफिक 32 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) ने चेतावनी दी है कि 2060 तक वैश्विक प्लास्टिक कचरा तीन गुना हो सकता है, और सुविधा-आधारित व्यापार इसका एक प्रमुख कारण बन सकता है.
क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म आमतौर पर आगे भेजी गई डिलीवरी से होने वाले उत्सर्जन की रिपोर्ट देते हैं, लेकिन वे लौटाए गए सामान की वापसी यात्रा, बदले गए ऑर्डर, और फेंके गए कचरे के परिवहन को अक्सर शामिल नहीं करते. पर्यावरणीय नुकसान परिवहन और कचरा स्थलों दोनों पर होता है-लैंडफिल गैस, कचरा जलाने से जहरीली राख, और मिट्टी-भूजल में प्रदूषण; बिना अलग कचरे से मीथेन व विषैले तत्व निकलते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार खुले में कचरा जलाने से होने वाला वायु प्रदूषण श्वसन रोग, हृदय रोग और अन्य दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा हुआ है. कचरा स्थलों के आसपास रहने वाले समुदाय सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, लेकिन क्विक कॉमर्स के इस पहलू पर बहुत कम चर्चा होती है.
इलेक्ट्रिक डिलीवरी वाहनों पर स्विच करना, अपने लाभों के बावजूद, इस समस्या को पूरी तरह हल नहीं कर सकता. नियामक स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक्स और पैकेजिंग के लिए विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व ढांचों को सख्ती से लागू करने की जरूरत है. भारत में ई-कचरे से जुड़े नियम मौजूद हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन समस्या के पैमाने के अनुरूप नहीं है.
2022 में रिकॉर्ड 62 मिलियन टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ (जो 2010 की तुलना में 82 प्रतिशत अधिक है) और अनुमान है कि 2030 तक यह 82 मिलियन टन तक पहुँच जाएगा, जैसा कि द ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर 2024 में बताया गया है. विश्वसनीय डेटा मिलना कठिन है, लेकिन वर्तमान अनुमान बताते हैं कि केवल 22.3 प्रतिशत ई-कचरे का औपचारिक रूप से पुनर्चक्रण होता है. कुछ मामलों में इसे बिना अलग किए हुए कचरे के साथ जला दिया जाता है, जिससे आसपास के क्षेत्रों में खतरनाक PM10 कण और भारी धातुएँ फैलती हैं. इसके बावजूद, वर्तमान में वैश्विक स्तर पर दुर्लभ पृथ्वी तत्वों की कुल मांग का केवल एक प्रतिशत ही ई-कचरे के पुनर्चक्रण से पूरा हो पाता है.
ई-कचरा पुनर्चक्रण क्षमता से लगभग पाँच गुना तेज़ी से बढ़ रहा है, जिससे हवा और पानी की गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ सकता है, खासकर उन देशों में जहाँ कचरे का निर्यात नहीं होता और उसे देश के भीतर ही संभालना पड़ता है. प्लेटफॉर्म के स्तर पर रूट ऑप्टिमाइज़ेशन, इलेक्ट्रिक वाहन बेड़े और पैकेजिंग से जुड़े नियम प्रति डिलीवरी उत्सर्जन को कम करने में मदद कर सकते हैं. लेकिन एक अधिक गंभीर समस्या अक्सर चर्चा में नहीं आती-कचरा स्वयं ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का एक बड़ा स्रोत है. इलेक्ट्रिक डिलीवरी वाहनों पर स्विच करना, अपने लाभों के बावजूद, इस समस्या को पूरी तरह हल नहीं कर सकता. नियामक स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक्स और पैकेजिंग के लिए विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (Extended Producer Responsibility) ढांचों को सख्ती से लागू करने की जरूरत है. भारत में ई-कचरे से जुड़े नियम मौजूद हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन समस्या के पैमाने के अनुरूप नहीं है.
मिनटों में डिलीवरी वास्तव में कभी मुफ्त नहीं होती; इसके पर्यावरणीय खर्च को सिर्फ अतिरिक्त डिलीवरी शुल्क लेकर संतुलित नहीं किया जा सकता. इसकी वास्तविक कीमत है, खराब होती हवा की गुणवत्ता, भरते हुए लैंडफिल, और उन लोगों का स्वास्थ्य जो उस कचरे को छांटते और संभालते हैं जिसे सुविधा पीछे छोड़ जाती है.
कृष्णा वोहरा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर इकोनॉमी एंड ग्रोथ में जूनियर फेलो हैं.
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Krishna Vohra is a Junior Fellow in Climate and Energy at the Centre for Economy and Growth. His research spans across resource governance, circular economy, ...
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