Author : Priya Noronha

Expert Speak Raisina Debates
Published on Apr 17, 2026 Updated 3 Days ago

समुद्र की गहराई में छिपा खनिजों का खजाना दुनिया की ऊर्जा जरूरतें पूरी कर सकता है लेकिन इसके साथ पर्यावरण का बड़ा खतरा भी जुड़ा है. जानें क्यों भारत को इस मौके और जोखिम के बीच संतुलन बनाकर समझदारी से कदम बढ़ाना होगा.

समुद्र में छिपा है खजाना: किसे मिलेगा असली फायदा?

दुनिया में साफ ऊर्जा और नई तकनीक के बढ़ने से जरूरी खनिजों की मांग तेजी से बढ़ रही है. जमीन में खनिज कम हो रहे हैं और सप्लाई पर राजनीति का असर है इसलिए देश गहरे समुद्र में खनन पर ध्यान दे रहे हैं. यह सिर्फ खनन नहीं बल्कि साझा संसाधनों के सही उपयोग से भी जुड़ा है.

डीप-सी माइनिंग का अर्थ है समुद्र की तलहटी से आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण खनिजों-जैसे मैंगनीज, निकल, तांबा, कोबाल्ट, टाइटेनियम, मोलिब्डेनम, जिंक, सीसा, लोहा, सोना, चांदी और दुर्लभ पृथ्वी तत्व-का निष्कर्षण. स्थलीय भंडारों के अलावा, ये खनिज आमतौर पर बहुधात्विक नोड्यूल, फेरोमैंगनीज क्रस्ट और समुद्र तल के विशाल सल्फाइड (SMS) के रूप में पाए जाते हैं. मध्य प्रशांत महासागर में क्लेरियन-क्लिपर्टन क्षेत्र में ही लगभग 21 अरब टन बहुधात्विक नोड्यूल मौजूद हैं, जिनमें निकल, कोबाल्ट और मैंगनीज की मात्रा सभी स्थलीय भंडारों से अधिक है. समुद्र तल के खनिजों का मूल्य लगभग 8 से 16 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के बीच आंका गया है.

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, 2040 तक महत्वपूर्ण खनिजों की कुल मांग छह गुना तक बढ़ सकती है. 2017 से 2022 के बीच, लिथियम की मांग तीन गुना, कोबाल्ट की 70 प्रतिशत और निकल की 40 प्रतिशत तक बढ़ सकती है (नेट-जीरो परिदृश्य में). वहीं, स्थलीय खनिजों की गुणवत्ता घट रही है, खनन लागत बढ़ रही है और आपूर्ति श्रृंखलाएं कुछ क्षेत्रों तक सीमित हैं. यदि डीप-सी माइनिंग  व्यावसायिक रूप से संभव हुआ, तो यह आपूर्ति में विविधता लाने का प्रभावी तरीका हो सकता है. विश्व बैंक का अनुमान है कि स्वच्छ ऊर्जा की मांग पूरी करने के लिए 2050 तक कोबाल्ट, ग्रेफाइट और लिथियम जैसे खनिजों का उत्पादन 500 प्रतिशत तक बढ़ेगा.

स्थलीय भंडारों के अलावा, ये खनिज आमतौर पर बहुधात्विक नोड्यूल, फेरोमैंगनीज क्रस्ट और समुद्र तल के विशाल सल्फाइड (SMS) के रूप में पाए जाते हैं. मध्य प्रशांत महासागर में क्लेरियन-क्लिपर्टन क्षेत्र में ही लगभग 21 अरब टन बहुधात्विक नोड्यूल मौजूद हैं, जिनमें निकल, कोबाल्ट और मैंगनीज की मात्रा सभी स्थलीय भंडारों से अधिक है. समुद्र तल के खनिजों का मूल्य लगभग 8 से 16 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के बीच आंका गया है.

हालांकि, इसकी आर्थिक व्यवहार्यता निश्चित नहीं है. तकनीकी-आर्थिक आकलनों के अनुसार, अनुकूल कीमतों और रॉयल्टी की स्थिति में बहुधात्विक नोड्यूल खनन लाभदायक हो सकता है, लेकिन यह धातुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अप्रमाणित लागत अनुमानों पर बहुत निर्भर करता है. उदाहरण के लिए, कोबाल्ट की कीमतें 2016 से 2018 के बीच तीन गुना से अधिक बढ़ीं, लेकिन बाद में तेजी से गिर गईं.

डीप-सी माइनिंग  से शिपिंग, मछली पालन और समुद्री पर्यटन जैसे क्षेत्रों को फायदा हो सकता है. लेकिन इसका मालिक कौन है, यह साफ नहीं है, इसलिए संसाधनों का सही बंटवारा मुश्किल होता है. कई खनिज समुद्र में देशों की सीमा से बाहर हैं, इसलिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं उन्हें नियंत्रित करती हैं. साथ ही, सर्कुलर इकोनॉमी (जैसे रीसाइक्लिंग और कम खनिज उपयोग वाली तकनीक) भविष्य में मांग को कम कर सकती है, इसलिए डीप-सी माइनिंग  की व्यवहार्यता इन विकल्पों के विकास पर भी निर्भर करती है.

भारत और वैश्विक दक्षिण के लिए डीप-सी माइनिंग 

भारत की महत्वपूर्ण खनिजों की मांग उसके ऊर्जा परिवर्तन लक्ष्यों से जुड़ी है. भारत के संशोधित राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (2022) में उत्सर्जन तीव्रता को 45 प्रतिशत तक कम करने और 2030 तक 50 प्रतिशत बिजली गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया है. साथ ही, राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन का उद्देश्य 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करना है. लिथियम, कोबाल्ट, निकल और तांबा इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी भंडारण और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए महत्वपूर्ण हैं. हालांकि, भारत इन खनिजों के लिए अभी भी आयात पर निर्भर है, जिससे आपूर्ति बाधित होने और कीमतों में उतार-चढ़ाव का जोखिम बना रहता है.

भारत 1978 से समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCLOS) के तहत अग्रणी निवेशक का दर्जा रखता है और उसके पास अंतरराष्ट्रीय समुद्र तल प्राधिकरण (ISA) के साथ मध्य हिंद महासागर बेसिन में बहुधात्विक नोड्यूल के अन्वेषण के लिए लगभग 75,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अनुबंध है, जहां लगभग 380 मिलियन टन नोड्यूल का अनुमान है. इसके अलावा, भारत के पास सेंट्रल इंडियन रिज और कार्ल्सबर्ग रिज में बहुधात्विक सल्फाइड के अन्वेषण के लिए भी विशेष अनुबंध हैं.

चित्र: देशवार समुद्र तल खनिज भंडार और आईएसए अन्वेषण अनुबंध

Deep Sea Mining And Ocean Commons Economics Equity And The Governance

Source: The International Seabed Authority, 2022

ये गतिविधियां पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा संचालित डीप ओशन मिशन का हिस्सा हैं, जिसका पाँच वर्षों के लिए बजट 438 मिलियन अमेरिकी डॉलर (₹4,077 करोड़) है. ISA के साथ भारत की सक्रिय भागीदारी-जैसे नियम बनाने की बातचीत में शामिल होना और सही तरीके से लाभ बांटने की बात करना-उसे समुद्र के साझा संसाधनों के प्रबंधन में एक अहम और प्रभावशाली भूमिका देता है.

वैश्विक दक्षिण के वे देश, जो वर्तमान महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति श्रृंखलाओं के केंद्र में हैं-जैसे कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, इंडोनेशिया, चिली, अर्जेंटीना और दक्षिण अफ्रीका-उनके लिए डीप-सी माइनिंग  एक अवसर भी है और एक जोखिम भी. अन्वेषण से संसाधन सुरक्षा और रणनीतिक स्वतंत्रता बढ़ सकती है, लेकिन भारी शुरुआती निवेश, नियमों की अनिश्चितता और ESG (पर्यावरण, सामाजिक, शासन) से जुड़े जोखिम निवेशकों का भरोसा कम करते हैं, जिससे परियोजनाओं के लिए वित्त जुटाना मुश्किल हो जाता है और लागत बढ़ जाती है.

भारत के संशोधित राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (2022) में उत्सर्जन तीव्रता को 45 प्रतिशत तक कम करने और 2030 तक 50 प्रतिशत बिजली गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया है. साथ ही, राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन का उद्देश्य 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करना है.

बड़े पैमाने पर डीप-सी माइनिंग  से वैश्विक धातु कीमतें भी गिर सकती हैं, जिससे महंगी स्थलीय खदानें घाटे में जा सकती हैं. अगर निवेश डीप-सी माइनिंग  की ओर मुड़ता है, तो पारंपरिक खनन देशों में पूंजी प्रवाह कम हो सकता है, प्रतिस्पर्धा घट सकती है, खदानें समय से पहले बंद हो सकती हैं और पर्यावरणीय समस्याएँ पीछे रह सकती हैं. इसलिए भारत को तकनीकी महत्वाकांक्षा और पर्यावरणीय सावधानी के बीच संतुलन बनाना होगा.

क्या है जोखिम?

गहरा समुद्र अभी भी सबसे कम समझे गए पारिस्थितिक तंत्रों में से एक है. दुनिया ने अभी तक बड़े पैमाने पर समुद्री खनन के पर्यावरणीय प्रभावों का पूरी तरह परीक्षण नहीं किया है. डीप-सी माइनिंग  से जैव विविधता का नुकसान, आवास का विनाश, तलछट का फैलाव, विषैले पदार्थों का उत्सर्जन और पारिस्थितिकी तंत्र में बाधा आ सकती है. इसकी भरपाई बहुत धीमी हो सकती है, खासकर बहुधात्विक नोड्यूल के मामले में, जो लाखों वर्षों में केवल कुछ मिलीमीटर ही बढ़ते हैं.

समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCLOS) गहरे समुद्र को ‘मानवता की साझा विरासत’ मानता है, जिसका अर्थ है कि इसे कोई देश अपना नहीं सकता, बल्कि सभी के हित में सामूहिक रूप से प्रबंधित किया जाना चाहिए. UNCLOS के तहत, जब गंभीर नुकसान की संभावना हो- यदि वैज्ञानिक प्रमाण पूरी तरह स्पष्ट न हों-तब भी सावधानी अपनाना जरूरी है. इससे साफ होता है कि गहरे समुद्री खनन में पर्यावरण का ध्यान रखना जरूरी है और यह कानून से जुड़ा मुद्दा बन जाता है. सवाल है कि नुकसान कैसे रोका जाए और लाभ सबको बराबर मिले. भारत को मजबूत नियम, बेहतर जानकारी और निगरानी के लिए पहले रिसर्च में निवेश करना होगा.

डीप-सी माइनिंग को अभी व्यापक कानूनी स्वीकृति नहीं मिली है. फ्रांस और पुर्तगाल ने इसे प्रतिबंधित कर दिया है, जबकि जर्मनी, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम और मैक्सिको ने इस पर रोक की मांग की है. सैमसंग SDI, गूगल और बीएमडब्ल्यू जैसी बड़ी कंपनियों ने भी डीप-सी माइनिंग  से निकाले गए खनिजों को अस्वीकार कर दिया है. इससे संकेत मिलता है कि पर्यावरण और नैतिक चिंताएँ अब कानूनों को प्रभावित कर रही हैं.

पापुआ न्यू गिनी की सोलवारा 1 परियोजना जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि अविश्वास, कमजोर स्थानीय भागीदारी और ‘ग्रीनवाशिंग’ जैसी समस्याएं परियोजनाओं को विफल कर सकती हैं. 2023 में कुक आइलैंड्स सरकार द्वारा डीप-सी माइनिंग  लाइसेंस तेजी से देने के प्रयास का मछुआरों और नागरिक समूहों ने विरोध किया.

डीप-सी माइनिंग  मछली पालन पर भी असर डाल सकता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ खनन की संभावना है. इससे द्वीपीय अर्थव्यवस्थाओं में खाद्य सुरक्षा और रोजगार पर असर पड़ सकता है. हालांकि खनन समुद्र में होता है, लेकिन तट पर बनने वाले प्रसंस्करण संयंत्र स्थानीय समुदायों और भूमि उपयोग को प्रभावित कर सकते हैं. डीप-सी माइनिंग  से सामाजिक जोखिम भी जुड़े हैं. पापुआ न्यू गिनी की सोलवारा 1 परियोजना जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि अविश्वास, कमजोर स्थानीय भागीदारी और ‘ग्रीनवाशिंग’ जैसी समस्याएं परियोजनाओं को विफल कर सकती हैं. 2023 में कुक आइलैंड्स सरकार द्वारा डीप-सी माइनिंग  लाइसेंस तेजी से देने के प्रयास का मछुआरों और नागरिक समूहों ने विरोध किया. इससे स्पष्ट है कि बिना सही परामर्श और भागीदारी के, स्थानीय समुदाय आर्थिक लाभ के बावजूद डीप-सी माइनिंग  का विरोध कर सकते हैं.

आगे का रास्ता  

डीप-सी माइनिंग का नियम-कानून अभी पूरी तरह तय नहीं हुआ है. आगे यह तय करेगा कि समुद्र का सही इस्तेमाल होगा या उसका गलत फायदा उठाया जाएगा. भारत के पास कुछ अधिकार हैं, लेकिन वह अभी ज्यादा सक्रिय नहीं है. संसाधन, पर्यावरण और भविष्य को देखते हुए भारत को अब बड़ी और मजबूत भूमिका निभानी होगी.

वैज्ञानिक अनुसंधान और नियामक क्षमता में निवेश करना चाहिए- पर्याप्त पर्यावरणीय जानकारी के बिना व्यावसायिक डीप-सी माइनिंग  शुरू करना, अन्य जगहों पर हुई सामाजिक और पर्यावरणीय विफलताओं को दोहरा सकता है.

ISA के साथ सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए -केवल नियमों का पालन करने के बजाय, भारत को अंतरराष्ट्रीय मानकों को तय करने में योगदान देना चाहिए. UNCLOS के तहत एक अग्रणी निवेशक होने के नाते, उसे लाभ-वितरण, पर्यावरणीय मानकों और खनन से मिलने वाले लाभ के बंटवारे पर प्रभाव डालना चाहिए. 2021 में नाउरू द्वारा नियमों को जल्दी अंतिम रूप देने का दबाव यह दिखाता है कि व्यावसायिक हित कितनी तेजी से नियमों से आगे निकल सकते हैं.

सर्कुलर इकोनॉमी और जिम्मेदार स्थलीय खनन को प्राथमिकता देनी चाहिए-रीसाइक्लिंग, पुनः उपयोग और कम खनिज-आधारित तकनीकों का उपयोग न केवल डीप-सी माइनिंग  की मांग को कम कर सकता है, बल्कि आयात निर्भरता और आपूर्ति जोखिम भी घटा सकता है.

डीप-सी माइनिंग  में निवेश का समय सोच-समझकर तय करना चाहिए- कई देश डीप-सी माइनिंग  पर रोक की मांग कर रहे हैं, बड़ी कंपनियां इससे दूरी बना रही हैं, लागत अधिक है और पर्यावरणीय चिंताएं भी हैं. ऐसे में इसका भविष्य अभी अनिश्चित है. अमेरिका और चीन जैसे देश इस क्षेत्र में सक्रिय हो रहे हैं, जिससे वैश्विक दक्षिण के देशों पर जटिल प्रभाव पड़ सकते हैं. भारत को इस प्रक्रिया में एक संभावित भागीदार और न्यायसंगत शासन के समर्थक दोनों की भूमिका निभानी होगी.

घरेलू क्षमता को मजबूत करके और अंतरराष्ट्रीय नियमों को आकार देकर, भारत डीप-सी माइनिंग  को एक विकल्प के रूप में बनाए रख सकता है, जबकि कम जोखिम वाले उपाय-जैसे सर्कुलर इकोनॉमी, रीसाइक्लिंग और जिम्मेदार स्थलीय खनन-पर ध्यान केंद्रित कर सकता है. अंततः, डीप-सी माइनिंग  में भारत की भूमिका इस बात से तय नहीं होगी कि वह समुद्र से खनन करता है या नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि वह इसके नियम बनाने में कितनी सक्रिय भूमिका निभाता है.


प्रिया नोरोन्हा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च इंटर्न हैं.
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