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दुनिया में अब हथियार नहीं, बल्कि भोजन और सप्लाई चेन भी दबाव बनाने के औज़ार बन गए हैं. चिप्स की जगह रेयर अर्थ से लेकर गेहूं–सोयाबीन तक सब राजनीति का हिस्सा बन चुका है. ऐसे माहौल में खाद्य कॉरिडोर देशों को भू-राजनीतिक खेल से बाहर निकलने का नया रास्ता दिखाते हैं.
दुनिया भर के देशों में आर्थिक नीतियों के माध्यम से रणनीतिक लाभ उठाने की प्रवृत्ति ने सप्लाई चेन को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने को पहले से ज़्यादा सामान्य बना दिया है. रेयर अर्थ, सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों जैसी ख़ास चीज़ों के अलावा कृषि फसलों को भी साधन के रूप में इस्तेमाल करके फायदा उठाने के मामले में नहीं छोड़ा गया है. हाल ही में अमेरिका-चीन व्यापार गतिरोध के दौरान चीन ने अमेरिकी सामानों (जिनमें कृषि फसल का बड़ा हिस्सा भी शामिल था) पर 22 अरब अमेरिकी डॉलर का जवाबी टैरिफ लगाया है. इसके परिणामस्वरूप चीन को भेजे जाने वाले अमेरिका के महत्वपूर्ण कृषि निर्यात (जैसे कि सोयाबीन, पोर्क, बीफ, सीफूड, कपास, चिकन और मक्का शामिल हैं) पर भारी शुल्क लगाया गया है. इसके अलावा ये भी पाया गया कि जिन उत्पादों पर टैरिफ लगाया गया है वो रिपब्लिकन पार्टी के झुकाव वाले राज्यों से निर्यात किए जाते हैं. इस तरह सीधे तौर पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर राजनीतिक दबाव बनाया गया है. हालांकि पिछले दिनों राष्ट्रपति ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बातचीत के बाद अमेरिका ने चीन के सामानों पर टैरिफ 57 प्रतिशत से घटाकर 47 प्रतिशत किया जिसके बदले में चीन ने अमेरिकी सोयाबीन की ख़रीद जारी रखने और रेयर अर्थ के निर्यात की अनुमति का फैसला लिया. इसी तरह का आदान-प्रदान कुछ महीने पहले अमेरिका और भारत के बीच देखा गया जहां भारत ने अपनी घरेलू कृषि आवश्यकताओं के लिए साफ तौर पर लक्ष्मण रेखा खींचने का निर्णय लिया.
पिछले कुछ वर्षों में फूड वैल्यू चेन में रुकावट पैदा करने वाले दूसरे भू-राजनीतिक दबाव भी देखे गए हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से कीमत में बढ़ोतरी हुई, फसलों में जोखिम बढ़ गया और गेहूं एवं सूरजमुखी के तेल जैसी प्रमुख खाद्य वस्तुओं की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हुई है. विशेष रूप से मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका (MENA) रीजन में आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हुई हैं. इसी तरह यमन के हूतियों के हमले की वजह से लाल सागर के शिपिंग रूट और स्वेज़ नहर में नाकेबंदी ने उपभोक्ताओं और उत्पादकों के लिए फूड कमोडिटी के बाज़ार में अस्थिरता पैदा की है. इसके अलावा आने वाले दिनों में यूरोपियन यूनियन के वनों की कटाई संबंधी नियम (जो वनों की कटाई वाले क्षेत्रों से आयात होने वाले खाद्य उत्पादों पर प्रतिबंध लगाता है) कुछ हद तक व्यापार गतिशीलता को नया रूप दे सकते हैं.
कृषि वैल्यू चेन में बार-बार आने वाले इन झटकों को देखते हुए कई देशों ने अब अपनी खाद्य प्रणाली में आत्मनिर्भरता और संप्रभुता हासिल करने का प्रयास शुरू कर दिया है. रूस ने अपनी ‘खाद्य सुरक्षा डॉक्ट्रिन’ के ज़रिए कई खाद्य उत्पादों में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य तय किया है, वहीं चीन का ‘खाद्य सुरक्षा कानून’ प्रमुख अनाज के मामले में ‘पूरी तरह से आत्मनिर्भरता’ हासिल करना चाहता है. हालांकि भीतर की तरफ ये रुख वैश्विक अर्थव्यवस्था में व्यवस्थागत जोखिम बढ़ा सकता है. रिसर्च से पता चलता है कि व्यापार उदारीकरण ने वास्तव में खाद्य सुरक्षा बढ़ाई है क्योंकि खाद्य उत्पाद अधिक किफायती बन जाते हैं जिससे आहार से जुड़ी विविधता को प्रोत्साहन मिलता है. ये भी पाया गया है कि खाद्य निर्यात पर पाबंदी से जहां अल्पकाल में खाद्य पदार्थों के दाम कम हो सकते हैं, वहीं इससे दीर्घकाल में खाद्य उत्पादन के मामले में कीमत में अनिश्चितता और बाज़ार अस्थिरता की स्थिति पैदा हो सकती है.
इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास (UNCTAD) के एक अध्ययन से पता चला है कि दुनिया में पोषण सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण अनाज और वनस्पति तेल के एक बड़े हिस्से का अभी भी बड़ी मात्रा में व्यापार होता है. दुनिया में उपजने वाले गेहूं का 25 प्रतिशत, मक्के का 14 प्रतिशत और चावल का 10 प्रतिशत हर साल सीमा के पार जाता है. ये बड़ी संख्या में अर्थव्यवस्थाओं (विशेष रूप से जो आयात पर निर्भर हैं) के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में व्यापार की मुख्य भूमिका को रेखांकित करता है.
रेखाचित्र 1: खाद्य असुरक्षा बनाम आयात निर्भरता अनुपात
स्रोत: UNCTAD
बढ़ती भू-आर्थिक अस्थिरता के कारण कृषि संसाधनों तक पहुंच में सुधार, लागत में कमी, खाद्य उपलब्धता सुनिश्चित करने, दाम स्थिर करने और बाज़ार तक उत्पादकों को पहुंच प्रदान करने के लिए कुशल तौर-तरीकों की आवश्यकता है. इसके लिए भौतिक संपर्क के साथ-साथ कृषि में निवेश की भी ज़रूरत है. कृषि में निवेश में बढ़ोतरी का सीधा संबंध खाद्य सुरक्षा, ग़रीबी में कमी और उत्पादन के स्तर से है लेकिन विकासशील देशों में कृषि में निवेश के स्तर में पिछले कुछ दशकों के दौरान कमी आई है. दुनिया की बढ़ती आबादी को भोजन उपलब्ध कराने और प्रसंस्करण, भंडारण एवं बाज़ार तक पहुंच जैसी सेवाओं के लिए आवश्यक निवेश के स्तर में अभी भी बहुत कमी है. कृषि में निवेश को 2050 तक 50 प्रतिशत या प्रति वर्ष 83 अरब अमेरिकी डॉलर बढ़ाने की आवश्यकता है. इसके अलावा कृषि व्यवसाय के विकास के लिए सिंचाई, विद्युतीकरण और सड़कों जैसी सार्वजनिक कल्याण की चीज़ों में भी सुधार की ज़रूरत है.
“कृषि वैल्यू चेन में बार-बार आने वाले इन झटकों को देखते हुए कई देशों ने अब अपनी खाद्य प्रणाली में आत्मनिर्भरता और संप्रभुता हासिल करने का प्रयास शुरू कर दिया है.”
कृषि कॉरिडोर जैसी स्थानिक विकास पहल (SDI) निवेश आकर्षित करके और अलग-अलग क्षेत्रों में कृषि व्यवसाय का अवसर उत्पन्न कर कृषि वैल्यू चेन का कायाकल्प कर सकती है. कॉरिडोर से लगे क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का विकास, फूड पार्क और कोल्ड-चेन लॉजिस्टिक में निवेश को आकर्षित कर सकता है. जैसे-जैसे सप्लाई चेन की रुकावटों का समाधान किया जाएगा, वैसे-वैसे निजी निवेश के लिए एक अनुकूल माहौल उभरेगा. इसके अलावा स्थिर सप्लाई चेन और सीमा पार के बाज़ार तक संपर्क के साथ किसान और कृषि व्यवसाय, मूल्य बढ़ाने वाली फसल और प्रसंस्करण गतिविधियों में निवेश शुरू करते हैं. उदाहरण के लिए, प्रस्तावित भारत-UAE खाद्य कॉरिडोर न केवल मिडिल ईस्ट के देशों के लिए खाद्य सुरक्षा बढ़ाएगा बल्कि भारतीय उत्पादकों के लिए स्थिर बाज़ार भी मुहैया कराएगा और वैल्यू चेन में निवेश के अवसर पैदा करेगा. डीपी वर्ल्ड और एमार जैसी UAE की कई कंपनियां कृषि उत्पादों के लिए आधुनिक भंडारण और लॉजिस्टिक समाधान मुहैया कराने के उद्देश्य से पहले से ही भारत में निवेश कर रही हैं.
“कृषि में निवेश को 2050 तक 50 प्रतिशत या प्रति वर्ष 83 अरब अमेरिकी डॉलर बढ़ाने की आवश्यकता है.”
विशेष खाद्य कॉरिडोर कृषि उत्पादन क्षेत्रों, प्रसंस्करण केंद्रों, लॉजिस्टिक चेन और सीमा पार के बाज़ार को जोड़कर कृषि सामानों और मूल्यवर्धित उत्पादों की बिना रुकावट आपूर्ति भी सुनिश्चित करते हैं. मोज़ाम्बिक़ में बिएरा एग्रीकल्चर ग्रोथ कॉरिडोर (BAGC), कृषि क्षेत्रों को दार एस सलाम के बंदरगाह से जोड़ने वाला तंज़ानिया का सदर्न एग्रीकल्चर ग्रोथ कॉरिडोर (SAGCOT) और लैटिन अमेरिका में एंडियन और अमेज़न कॉरिडोर मौजूदा कॉरिडोर में शामिल हैं. कुछ प्रमुख कॉरिडोर को नीचे की तालिका में शामिल किया गया है:
तालिका 1: कृषि उपज के लिए आर्थिक गलियारा
स्रोत: FAO रिपोर्ट, EU
इन विशेष खाद्य कॉरिडोर ने खाद्य सुरक्षा और कनेक्टिविटी के मामले में बहुत लाभ प्रदान किया है. उदाहरण के लिए 2022 में रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान स्थापित सॉलिडैरिटी लेन का उद्देश्य काला सागर के बंदरगाहों की नाकेबंदी के बावजूद व्यापार जारी रखना था. कॉरिडोर के ज़रिए 61 अरब यूरो और 199 मिलियन टन सामान (ज़्यादातर कृषि उत्पाद जैसे कि अनाज और तिलहन) के व्यापार को आसान बनाकर इस कॉरिडोर ने यूक्रेन की अर्थव्यवस्था के लिए जीवन रेखा के रूप में काम किया. इसी तरह एशिया में ग्रेटर मेकॉन्ग सबरीजन (GMS) कॉरिडोर ने फसलों की कटाई के बाद के नुकसान को कम करने के लिए खेतों तक सड़क नेटवर्क, छोटी नहरों, कोल्ड चेन की सुविधा और सीमा पार लॉजिस्टिक केंद्रों के ज़रिए आख़िरी मील तक कनेक्टिविटी में सुधार कर कृषि के प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों के बीच जलवायु अनुकूल कृषि आधारित वैल्यू चेन का निर्माण किया.
रेखाचित्र 2: EU सॉलिडैरिटी लेन
स्रोत: VOA News
क्षेत्रीय विशेष खाद्य कॉरिडोर में ये क्षमता है कि वो बंटी हुई फूड सप्लाई चेन को समन्वित लॉजिस्टिक, रेगुलेटरी सामंजस्य और बुनियादी ढांचा प्रदान करके सुव्यवस्थित इकोसिस्टम में बदलें. ये कॉरिडोर आम तौर पर कस्टम की कागज़ी कार्यवाही को सक्षम बनाकर, सीमा चौकियों पर लागत एवं समय में कटौती करके और आपसी मान्यता प्राप्त स्वास्थ्य एवं पौधों की सुरक्षा से संबंधित (SPS) उपायों को बढ़ावा देकर व्यापार को आसान बनाते हैं.
“विशेष खाद्य कॉरिडोर कृषि उत्पादन क्षेत्रों, प्रसंस्करण केंद्रों, लॉजिस्टिक चेन और सीमा पार के बाज़ार को जोड़कर कृषि सामानों और मूल्यवर्धित उत्पादों की बिना रुकावट आपूर्ति भी सुनिश्चित करते हैं.”
जिस समय आधारभूत जीवन रेखा की वजह से कूटनीतिक गतिरोध खड़ा हो रहा है और इनका उपयोग सौदेबाज़ी के रूप में किया जा रहा है, उस समय खाद्य कॉरिडोर फिर से पकड़ बनाने और खाद्य पदार्थों को हथियार-मुक्त बनाने के लिए एक तौर-तरीका प्रदान करते हैं. इन कॉरिडोर के ज़रिए व्यापार मार्गों की विविधता, क्षेत्रीय मेल-मिलाप और पारदर्शिता, दबाव-राजनीति के ख़िलाफ़ सुरक्षा प्रदान कर सकती है. दुनिया भर के लोगों की भलाई के रूप में खाद्य सुरक्षा को स्थिरता और अच्छी तरह से तैयार तौर-तरीकों की आवश्यकता है ताकि कुछ देशों के हित में शासन कला का शोषण रोका जा सके.
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Shruti is an Associate Fellow at the Centre for Development Studies, Observer Research Foundation (ORF), where her research examines the intersections between policy, economic diplomacy ...
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