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Published on Feb 19, 2026 Updated 0 Hours ago

मोबाइल गेम्स के रिवॉर्ड, स्ट्रीक और लूट-बॉक्स जैसी तकनीकें अब सिर्फ मनोरंजन नहीं रहीं- वे हमारे व्यवहार और मानसिक सेहत को प्रभावित कर रही हैं. आख़िर यह मुद्दा इतना गंभीर क्यों होता जा रहा है और हमें अभी क्या समझने की ज़रूरत है? जाने इस लेख में.

रिवॉर्ड और लूट-बॉक्स: जानें मोबाइल गेम्स का ‘डार्क पैटर्न’

BGMI और Free Fire जैसे कई लोकप्रिय मोबाइल गेम में हर दिन लॉगिन के साथ रिवॉर्ड मिलना सामान्य बात है. हर दिन लॉगिन करें, बोनस पाएं और लगातार लॉगिन करते रहे- किसी एक दिन आप ऐसा न कर सके तो आपको खेल फिर से शुरू करना पड़ सकता है और आपके सारे बोनस भी ख़त्म हो सकते हैं. इस तरह, मोबाइल एक तरह का ‘पॉकेट पैनोप्टिकॉन’ भी है, यानी ऐसा फोन, जो नोटिफिकेशन देकर और समय-समय पर रिवॉर्ड के ज़रिये आपका व्यवहार तय करता है. पैनोप्टिकॉन शब्द जेरेम बेंथम ने दिया है जिन्हें 18वीं सदी की जेल को देखकर यह शब्द सूझा था. बाद में मिशेल फूको ने इसे नए रूप में सबके सामने रखा और ऐसे सिस्टम के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया जिसमें व्यवहार को जबरन नहीं बल्कि लगातार दिए जाने वाले संकेतों, निगरानी और खुद के नियमों से तय किया जाता है. अब यह निगरानी मोबाइल से हो रही है और नोटिफिकेशन, समय-समय पर मिलने वाले रिवॉर्ड और नुक़सान करने वाले प्रोत्साहन हमारी दिनचर्या को प्रभावित करते हैं.

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मुताबिक, देश में इंटरनेट कनेक्शन साल 2014 के 25.15 करोड़ की तुलना में सितंबर 2025 तक बढ़कर 101.8 करोड़ हो गए थे और अब 89.1 प्रतिशत घरों में कम-से-कम एक स्मार्टफोन है. 15 से 29 वर्ष की उम्र वाले नौजवानों में क़रीब-क़रीब सबके हाथों में मोबाइल और इंटरनेट है. ऐसे में, ऑनलाइन गेमिंग उनके लिए हमेशा उपलब्ध है. सर्वेक्षण के अनुसार, 2024 में 232 अरब रुपये की कमाई गेमिंग से हुई है. अनुमान यह भी है कि साल 2023 में भारत में गेम खेलने वालों की संख्या 56.8 करोड़ थी. इससे पता चलता है कि ऑनलाइन गेम कितना बढ़ चुका है.

फरवरी 2026 में गाजियाबाद में तीन बहनों ने आत्महत्या की, जिसकी जांच अभी चल रही है लेकिन इसमें ऑनलाइन गेमिंग की उनकी आदतों और इससे दिमागी संतुलन बिगड़ने की बात कही जा रही है. इससे लोगों में चिंताएं बढ़ गई हैं. हालांकि, इस तरह की बहसें जब होती हैं, तो सिर्फ़ ऑनलाइन गेमिंग पर प्रतिबंध लगाने की मांग की जाती है, जबकि इसके ‘डार्क पैटर्न’ पर अधिक बात होनी चाहिए जो यूजर्स की स्वतंत्रता छीन लेता है और उनको उन विकल्पों को चुनने के लिए प्रोत्साहित करता है जो वह नहीं चुनना चाहता. हमें यह भी समझना चाहिए कि इससे किस प्रकार असुरक्षा और नुक़सान बढ़ सकता है.

मोबाइल एक तरह का ‘पॉकेट पैनोप्टिकॉन’ भी है, यानी ऐसा फोन, जो नोटिफिकेशन देकर और समय-समय पर रिवॉर्ड के ज़रिये आपका व्यवहार तय करता है. पैनोप्टिकॉन शब्द जेरेम बेंथम ने दिया है जिन्हें 18वीं सदी की जेल को देखकर यह शब्द सूझा था.

ऑनलाइन गेमिंग के इस ‘डार्क पैटर्न’ में हर दिन के रिवॉर्ड, जीत, पैसों का भुगतान करके टाइमर ख़त्म करना, पुरस्कार विज्ञापन, सीमित समय के लिए सीमित उपलब्धता जैसी शर्तें होती हैं. हालांकि, हमने मुख्य रूप से पैसे वाली गेमिंग के आर्थिक ख़तरों को देखते हुए कार्रवाई की है लेकिन सर्वेक्षण साफ़-साफ़ बताते हैं कि जुए से कहीं अधिक बड़ा मामला डिजिटल नुक़सान का है. इस पर काम करना होगा, और स्कूलों में डिजिटल साक्षरता, माता-पिता का मार्गदर्शन, टेली- MANAS, NIMHANS के SHUT कार्यक्रम जैसे उपाय अपनाने होंगे.

ऑनलाइन गेमिंग से बढ़ता दबाव

भारत में गेमिंग से होने वाले नुक़सान पर जब भी बहस होती है तो आमतौर पर चर्चा पैसों वाली गेमिंग और जुए की ही होती है. यह अधूरी बहस है क्योंकि इसमें हर दिन प्रभावित हो रहे जीवन की बात नहीं की जाती. कई ऐसी तकनीकें, जो यूजर्स को खेलने के लिए मजबूर करती हैं और उनके ख़र्च भी बढ़ाती हैं, वे केवल कुछ ख़ास सट्टेबाजी एप्स में ही नहीं होतीं बल्कि मुफ़्त में उपलब्ध दूसरे गेम में भी होती हैं. ऐसे में, असली सवाल यह है कि कुछ इंटरफेस और इनाम क्या यूजर्स को ऐसा व्यवहार अपनाने के लिए मजबूर कर रहे हैं, जो वे अपनाना नहीं चाहते. नीचे सूची-1 में बताई गई हर विशेषता ‘डार्क पैटर्न’ नहीं है, लेकिन वह किस तरह डार्क पैटर्न बन सकती है, यह इससे पता चलता है.

सूची 1-  एंगेजमेंट और पैसों का लेन-देन, जो डार्क पैटर्न बन सकते हैं

थीम

यह कैसा दिखता है

यह क्या करता है

समय और ध्यान

रोजाना लॉगिन पुरस्कार; स्ट्रीक मैकेनिज्म; ऊर्जा तंत्र या समय सीमा; पुरस्कृत विज्ञापन

बार-बार आने के लिए प्रोत्साहित करता है; न खेलने पर रीसेट और खेल में नुक़सान के रूप में दंड देता है;  प्रतीक्षा करवाता है और फिर यूजर्स को ‘लूप’ में धकेलकर राहत बेचता है; ध्यान से खेलने पर कमाई का एहसास कराता है

हालांकि, इनमें से कोई भी प्रक्रिया अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन इनसे यूजर्स की स्वतंत्रता कम हो सकी है और उनमें व्यवहार संबंधी दिक्कतें आ सकती हैं.

कमाई के तरीके

प्रीमियम इन-गेम करेंसी;  रैंडम आइटम ड्रॉप;  संयोग-आधारित क्राफ्टिंग

असली दुनिया की क़ीमतों को साफ़ नहीं बताती; सीमित समय के ऑफर नकली ज़रूरत पैदा करते हैं और पे-टु-विन डिज़ाइन ख़र्च करने का दबाव बनाता है.

‘गाचा’ और लूट-बॉक्स जैसी डिज़ाइन

मनचाहे कैरेक्टर या आइटम के लिए ‘पुल’ चुकाना

यह लूट-बॉक्स जैसा दिखता है. हालांकि, इनको अक्सर कानूनी तौर पर जुआ नहीं माना जाता, फिर भी यह जुए की तरह काम करता है, क्योंकि इसमें भुगतान करके उत्पाद नहीं ख़रीदा जाता, बल्कि मौका ख़रीदा जाता है.

ख़र्च

‘व्हेल्स’

अधिक ख़र्च करने वाले कुछ लोग ज़्यादा कमाई कर सकते हैं, प्रोब्लेमेटिक गेमिंग से जुड़ी विशेषताएं शेयर करते हैं और कमज़ोर यूजर्स के बीच पहुंच बनाने वाले बिजनेस मॉडल पर सवाल उठाते हैं.

बड़े सर्वे वाले अध्ययन लूट-बॉक्स ख़र्च को जुए की गंभीर समस्या से जोड़ते हैं; एक विश्लेषण में छोटी लेन-देन को गेमिंग डिसऑर्डर और जुए की बीमारी से जोड़ा गया है, क्योंकि दूसरी लेन-देन की तुलना में लूट-बॉक्स से आदत बिगड़ने का अधिक ख़तरा होता है.

सोशल डिज़ाइन पैटर्न

गिल्ड; क्लान्स; टीम इवेंट

असली कम्युनिटी को बढ़ावा दे सकते हैं, लेकिन शेड्यूल्ड रेड के ज़रिये सोशल बॉन्ड को ज़िम्मेदारी बना सकते हैं.

सोशल एक्विजिशन पैटर्न

रेफरल लैडर; रिवार्ड को न्योता देना

खिलाड़ियों को एक्विजिशन चैनलों में बदलता है.

सामाजिक मनोविज्ञान

मेटापरसेप्शन संबंधी चिंताएं

सुबूत बताते हैं कि देने वाले इस बात को लेकर चिंतित रहते हैं कि रिवार्ड पाने वालों की नज़र में वह कैसे दिखेंगे, जिससे यह तय होता है कि वे क्या शेयर करते हैं और कैसे शेयर करते हैं;  इसे सामाजिक संबंधों और स्टेटस के आधार पर पड़ने वाला हल्का दबाव बताया गया है, जो किशोरों और नौजवानों को प्रभावित करता है.

लॉक इन

संक-कॉस्ट प्रभाव; प्रगति का ढांचा

लंबी प्रगति शृंखला, संग्रहणीय सेट और तुरंत ख़त्म होने का माहौल बनाकर यूजर्स को अंत की तलाश में उलझाए रख सकते हैं.

कैसीनो से मिलता-जुलता प्रेजेंटेशन

गाचा सिस्टम में रैंडम रिवॉर्ड प्रेजेंटेशन

हल्की गलती,  एनिमेटेड शो और घूमने वाले बैनर एक बार फिर कोशिश करने की इच्छा जगाते हैं.

स्रोत- लेखक द्वारा कई संदर्भों से संकलित > व्हेल्स, FOMO, रेफरल रिवार्ड्स, माइक्रोट्रांजेक्शन, गाचा, लूट-बॉक्स, MNORPGs, डार्क पैटर्न

लूट-बॉक्स को लेकर ब्रिटेन में जो कुछ चल रहा है, उसे पता चलता है कि नीतियां बनाने को लेकर वहां दबाव है. वहां इस बात पर भी बहस चल रही है कि क्या ये जुए के कानूनी मानदंडों को पूरा करते हैं?  आर्थिक नुक़सान और यूजर्स की सुरक्षा को लेकर वहां चिंताएं बनी हुई हैं. अमेरिका में फोर्टनाइट पॉइंट्स को लेकर एपिक गेम्स के ख़िलाफ़ फेडरल ट्रेड कमीशन की कार्रवाई भी यही बताती है कि सरकारें चालाकी से तैयार किए गए इन इंटरफेस डिज़ाइन और गेम में न चाहते हुए भी ख़रीदारी करने को मजबूर करने वाले मुद्दों को अब उपभोक्ता सुरक्षा के रूप में देखने लगी हैं.

भारत इतना बड़ा देश है कि ऑनलाइन गेम पर प्रतिबंध लगाना समस्या का समाधान नहीं हो सकता. इसके बजाय अधिकारों का सम्मान करने वाली नीति बनानी चाहिए, जिसमें ऑनलाइन गेमिंग से बाहर निकलना आसान हो, इस पर ख़र्च करना काफ़ी मुश्किल हो और इसका उपयोग अधिक सुरक्षित हो.

दिक्कत यह है कि गेम ही नहीं, इस तरह की तकनीकें सोशल मीडिया में भी देखी जा सकती हैं, जहां लगातार स्क्रॉल करने की सुविधा होती है. इस पर भी बात होनी चाहिए, तभी भारत बेहतर सुरक्षा उपायों की ओर बढ़ सकता है.

गेम में बुराई नहीं, इसकी बुराई ख़त्म करें

भारत में ऑनलाइन गेमिंग की बहस दो मुद्दों पर टिकी है- या तो प्रतिबंध लगाएं- यह तब होता है, जब कोई गलत ख़बर आती है, या फिर आत्म-संतुष्टि के लिए इसे जारी रखा जाए, क्योंकि गेमिंग ‘सिर्फ़ मनोरंजन’ है. दोनों में ही इस बात पर गौर नहीं किया जाता कि-,भारत को अब बिहेवियर हेल्थ और डिजिटल स्वच्छता पर ध्यान देना चाहिए. यह सार्वजनिक स्वास्थ्य और उपभोक्ता सुरक्षा से जुड़ा मामला है.

  1. डिज़ाइन पर नियम बनाना: गेमिंग में डार्क पैटर्न को उपभोक्ता सुरक्षा से जोड़कर देखना चाहिए. इससे ध्यान ऐसे ख़ास मैकेनिज्म बनाने पर जाएगा, जो स्वायत्तता को कम करेगा.
  2. ऑनलाइन मनी गेम्स से बाहर भी सुरक्षा उपाय: भारत ने पैसे लूटने वाले और सट्टेबाजी वाले गेम पर ज़रूर कार्रवाई की है, पर  नींद की कमी और मानसिक परेशानी फ्री-टु-प्ले गेम से भी होती हैं. इसलिए, अब ऐसे दिशा-निर्देश जारी किए जाने चाहिए, जो भारत में सभी ऑनलाइन गेम पर लागू हों, न कि केवल मनी-गेम पर. उन डार्क पैटर्न पर ज़रूर नियम बनाए जाएं, जो नाबालिगों के लिए सही नहीं हैं और जिनसे सभी यूजर्स को ख़तरा है.
  3. चीन से डिज़ाइन सीखें, निगरानी नहीं: चीन का तरीका बताता है कि देश अपने अधिकार-क्षेत्र में सिस्टम बदलने के लिए प्लेटफॉर्म पर दबाव डाल सकते हैं, लेकिन नाबालिगों के लिए समय की पाबंदी लगाना दख़ल देने वाले नियम हैं. भारत को ऐसा नहीं करना चाहिए. चीन ने हर दिन के लॉगिन रिवार्ड और बार-बार रिचार्ज जैसे प्रोत्साहनों पर प्रतिबंध लगाने का संकेत दिया है. भारत निगरानी वाली व्यवस्था बनाए बिना यूजर्स के हित के नियम बनाए और सुरक्षा उपायों वाला डिज़ाइन तैयार करे.
  4. पारदर्शिता लाना: प्रीमियम करेंसी के नाम पर रैंडम रिवार्ड को अनुमति नहीं मिलनी चाहिए. भारत को गाचा या लूट-बॉक्स जैसे तंत्रों के लिए खुलासा करने, टोकन की असल क़ीमत बताने, ख़र्च डैशबोर्ड और देर-रात बार-बार की जाने वाली ख़रीदारी पर रोक लगाने के उपाय ज़रूर करने चाहिए.
  5. स्कूलों में डिजिटल स्वच्छता: पब्लिक हेल्थ कम्युनिकेशन पर आधारित आसान, स्टैंडर्ड प्राम्प्ट्स और छोटे मॉड्यूल का उपयोग करके स्कूल स्ट्रीक मैकेनिक्स, FOMO (फियर ऑफ मिसिंग आउट) इवेंट्स, गाचा ऑड्स और ऑटोप्ले फीचर्स को समझा सकते हैं. साथ ही छात्रों को यह भी बताया जाना चाहिए कि नींद और ध्यान अच्छी सेहत के लिए ज़रूरी क्यों है.
  6. मदद पहुंचाने का रास्ता बनाना: जब गेमिंग नुक़सानदायक हो जाए, तो बिहेवियर तरीके से इसका उपाय खोजना चाहिए. इसमें समस्या को जल्द पहचानना और काउंसलिंग ज़रूरी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के ICD-11 दिशा-निर्देश में ‘गेमिंग डिसऑर्डर’ का मतलब है, खुद पर नियंत्रण न रख पाना, प्राथमिकता न तय कर पाना और दुष्प्रभावों के बावजूद गेम खेलते रहना. भारत को आर्थिक सर्वेक्षण में बताई गई सेवाओं को, जिसमें टेली- MANAS भी शामिल हैं, आगे बढ़ाना चहिए और उन्हें स्कूलों व प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल से जोड़ना चाहिए.

भारत इतना बड़ा देश है कि ऑनलाइन गेम पर प्रतिबंध लगाना समस्या का समाधान नहीं हो सकता. इसके बजाय अधिकारों का सम्मान करने वाली नीति बनानी चाहिए, जिसमें ऑनलाइन गेमिंग से बाहर निकलना आसान हो, इस पर ख़र्च करना काफ़ी मुश्किल हो और इसका उपयोग अधिक सुरक्षित हो. इसके साथ ही, ऐसी व्यवस्था भी बननी चाहिए कि जब गेम परेशानी बनने लगे, तो तुरंत सहायता भी मिल जाए.


के. एस. उपलब्ध गोपाल ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में हेल्थ इनिशिएटिव के एसोसिएट फेलो हैं.

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