मोबाइल गेम्स के रिवॉर्ड, स्ट्रीक और लूट-बॉक्स जैसी तकनीकें अब सिर्फ मनोरंजन नहीं रहीं- वे हमारे व्यवहार और मानसिक सेहत को प्रभावित कर रही हैं. आख़िर यह मुद्दा इतना गंभीर क्यों होता जा रहा है और हमें अभी क्या समझने की ज़रूरत है? जाने इस लेख में.
BGMI और Free Fire जैसे कई लोकप्रिय मोबाइल गेम में हर दिन लॉगिन के साथ रिवॉर्ड मिलना सामान्य बात है. हर दिन लॉगिन करें, बोनस पाएं और लगातार लॉगिन करते रहे- किसी एक दिन आप ऐसा न कर सके तो आपको खेल फिर से शुरू करना पड़ सकता है और आपके सारे बोनस भी ख़त्म हो सकते हैं. इस तरह, मोबाइल एक तरह का ‘पॉकेट पैनोप्टिकॉन’ भी है, यानी ऐसा फोन, जो नोटिफिकेशन देकर और समय-समय पर रिवॉर्ड के ज़रिये आपका व्यवहार तय करता है. पैनोप्टिकॉन शब्द जेरेम बेंथम ने दिया है जिन्हें 18वीं सदी की जेल को देखकर यह शब्द सूझा था. बाद में मिशेल फूको ने इसे नए रूप में सबके सामने रखा और ऐसे सिस्टम के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया जिसमें व्यवहार को जबरन नहीं बल्कि लगातार दिए जाने वाले संकेतों, निगरानी और खुद के नियमों से तय किया जाता है. अब यह निगरानी मोबाइल से हो रही है और नोटिफिकेशन, समय-समय पर मिलने वाले रिवॉर्ड और नुक़सान करने वाले प्रोत्साहन हमारी दिनचर्या को प्रभावित करते हैं.
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मुताबिक, देश में इंटरनेट कनेक्शन साल 2014 के 25.15 करोड़ की तुलना में सितंबर 2025 तक बढ़कर 101.8 करोड़ हो गए थे और अब 89.1 प्रतिशत घरों में कम-से-कम एक स्मार्टफोन है. 15 से 29 वर्ष की उम्र वाले नौजवानों में क़रीब-क़रीब सबके हाथों में मोबाइल और इंटरनेट है. ऐसे में, ऑनलाइन गेमिंग उनके लिए हमेशा उपलब्ध है. सर्वेक्षण के अनुसार, 2024 में 232 अरब रुपये की कमाई गेमिंग से हुई है. अनुमान यह भी है कि साल 2023 में भारत में गेम खेलने वालों की संख्या 56.8 करोड़ थी. इससे पता चलता है कि ऑनलाइन गेम कितना बढ़ चुका है.
फरवरी 2026 में गाजियाबाद में तीन बहनों ने आत्महत्या की, जिसकी जांच अभी चल रही है लेकिन इसमें ऑनलाइन गेमिंग की उनकी आदतों और इससे दिमागी संतुलन बिगड़ने की बात कही जा रही है. इससे लोगों में चिंताएं बढ़ गई हैं. हालांकि, इस तरह की बहसें जब होती हैं, तो सिर्फ़ ऑनलाइन गेमिंग पर प्रतिबंध लगाने की मांग की जाती है, जबकि इसके ‘डार्क पैटर्न’ पर अधिक बात होनी चाहिए जो यूजर्स की स्वतंत्रता छीन लेता है और उनको उन विकल्पों को चुनने के लिए प्रोत्साहित करता है जो वह नहीं चुनना चाहता. हमें यह भी समझना चाहिए कि इससे किस प्रकार असुरक्षा और नुक़सान बढ़ सकता है.
मोबाइल एक तरह का ‘पॉकेट पैनोप्टिकॉन’ भी है, यानी ऐसा फोन, जो नोटिफिकेशन देकर और समय-समय पर रिवॉर्ड के ज़रिये आपका व्यवहार तय करता है. पैनोप्टिकॉन शब्द जेरेम बेंथम ने दिया है जिन्हें 18वीं सदी की जेल को देखकर यह शब्द सूझा था.
ऑनलाइन गेमिंग के इस ‘डार्क पैटर्न’ में हर दिन के रिवॉर्ड, जीत, पैसों का भुगतान करके टाइमर ख़त्म करना, पुरस्कार विज्ञापन, सीमित समय के लिए सीमित उपलब्धता जैसी शर्तें होती हैं. हालांकि, हमने मुख्य रूप से पैसे वाली गेमिंग के आर्थिक ख़तरों को देखते हुए कार्रवाई की है लेकिन सर्वेक्षण साफ़-साफ़ बताते हैं कि जुए से कहीं अधिक बड़ा मामला डिजिटल नुक़सान का है. इस पर काम करना होगा, और स्कूलों में डिजिटल साक्षरता, माता-पिता का मार्गदर्शन, टेली- MANAS, NIMHANS के SHUT कार्यक्रम जैसे उपाय अपनाने होंगे.
भारत में गेमिंग से होने वाले नुक़सान पर जब भी बहस होती है तो आमतौर पर चर्चा पैसों वाली गेमिंग और जुए की ही होती है. यह अधूरी बहस है क्योंकि इसमें हर दिन प्रभावित हो रहे जीवन की बात नहीं की जाती. कई ऐसी तकनीकें, जो यूजर्स को खेलने के लिए मजबूर करती हैं और उनके ख़र्च भी बढ़ाती हैं, वे केवल कुछ ख़ास सट्टेबाजी एप्स में ही नहीं होतीं बल्कि मुफ़्त में उपलब्ध दूसरे गेम में भी होती हैं. ऐसे में, असली सवाल यह है कि कुछ इंटरफेस और इनाम क्या यूजर्स को ऐसा व्यवहार अपनाने के लिए मजबूर कर रहे हैं, जो वे अपनाना नहीं चाहते. नीचे सूची-1 में बताई गई हर विशेषता ‘डार्क पैटर्न’ नहीं है, लेकिन वह किस तरह डार्क पैटर्न बन सकती है, यह इससे पता चलता है.
सूची 1- एंगेजमेंट और पैसों का लेन-देन, जो डार्क पैटर्न बन सकते हैं
स्रोत- लेखक द्वारा कई संदर्भों से संकलित > व्हेल्स, FOMO, रेफरल रिवार्ड्स, माइक्रोट्रांजेक्शन, गाचा, लूट-बॉक्स, MNORPGs, डार्क पैटर्न
लूट-बॉक्स को लेकर ब्रिटेन में जो कुछ चल रहा है, उसे पता चलता है कि नीतियां बनाने को लेकर वहां दबाव है. वहां इस बात पर भी बहस चल रही है कि क्या ये जुए के कानूनी मानदंडों को पूरा करते हैं? आर्थिक नुक़सान और यूजर्स की सुरक्षा को लेकर वहां चिंताएं बनी हुई हैं. अमेरिका में फोर्टनाइट पॉइंट्स को लेकर एपिक गेम्स के ख़िलाफ़ फेडरल ट्रेड कमीशन की कार्रवाई भी यही बताती है कि सरकारें चालाकी से तैयार किए गए इन इंटरफेस डिज़ाइन और गेम में न चाहते हुए भी ख़रीदारी करने को मजबूर करने वाले मुद्दों को अब उपभोक्ता सुरक्षा के रूप में देखने लगी हैं.
भारत इतना बड़ा देश है कि ऑनलाइन गेम पर प्रतिबंध लगाना समस्या का समाधान नहीं हो सकता. इसके बजाय अधिकारों का सम्मान करने वाली नीति बनानी चाहिए, जिसमें ऑनलाइन गेमिंग से बाहर निकलना आसान हो, इस पर ख़र्च करना काफ़ी मुश्किल हो और इसका उपयोग अधिक सुरक्षित हो.
दिक्कत यह है कि गेम ही नहीं, इस तरह की तकनीकें सोशल मीडिया में भी देखी जा सकती हैं, जहां लगातार स्क्रॉल करने की सुविधा होती है. इस पर भी बात होनी चाहिए, तभी भारत बेहतर सुरक्षा उपायों की ओर बढ़ सकता है.
भारत में ऑनलाइन गेमिंग की बहस दो मुद्दों पर टिकी है- या तो प्रतिबंध लगाएं- यह तब होता है, जब कोई गलत ख़बर आती है, या फिर आत्म-संतुष्टि के लिए इसे जारी रखा जाए, क्योंकि गेमिंग ‘सिर्फ़ मनोरंजन’ है. दोनों में ही इस बात पर गौर नहीं किया जाता कि-,भारत को अब बिहेवियर हेल्थ और डिजिटल स्वच्छता पर ध्यान देना चाहिए. यह सार्वजनिक स्वास्थ्य और उपभोक्ता सुरक्षा से जुड़ा मामला है.
भारत इतना बड़ा देश है कि ऑनलाइन गेम पर प्रतिबंध लगाना समस्या का समाधान नहीं हो सकता. इसके बजाय अधिकारों का सम्मान करने वाली नीति बनानी चाहिए, जिसमें ऑनलाइन गेमिंग से बाहर निकलना आसान हो, इस पर ख़र्च करना काफ़ी मुश्किल हो और इसका उपयोग अधिक सुरक्षित हो. इसके साथ ही, ऐसी व्यवस्था भी बननी चाहिए कि जब गेम परेशानी बनने लगे, तो तुरंत सहायता भी मिल जाए.
के. एस. उपलब्ध गोपाल ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में हेल्थ इनिशिएटिव के एसोसिएट फेलो हैं.
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Dr. K. S. Uplabdh Gopal is an Associate Fellow with the Health Initiative at the Observer Research Foundation. He writes and researches on how India’s ...
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