Author : Prarthana Sen

Published on May 23, 2022 Updated 21 Hours ago

बिना समुचित मूल्यांकन किये संरचनात्मक हस्तक्षेपों (स्ट्रक्चरल इंटरवेन्शन्स) के निर्माण ने मानव-निर्मित आपदाओं को जन्म दिया है.

डैम का क़हर: क्या ‘अरुणाचल’ में बने बांध पड़ोसी राज्य ‘असम’ में बाढ़ से होने वाले नुक़सान को बढ़ा रहे हैं?

हिमालय की नदी प्रणालियों द्वारा उत्पन्न वार्षिक बाढ़ वैश्विक जल चक्र (हाइड्रोलॉजिकल साइकल) का एक अभिन्न अंग है. असम की वार्षिक बाढ़ भी इससे अलग नहीं है. इस प्रत्याशित परिघटना की वजह उसका अनोखा नदीय भूदृश्य है. ऐसे पर्याप्त वैज्ञानिक सबूत हैं जो बताते हैं कि यह राज्य बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों को उपजाऊ बनाने वाली गाद और दूसरे पोषक तत्वों के लिए ब्रह्मपुत्र के चढ़ते पानी पर ऐतिहासिक रूप से निर्भर रहा है. इस परिघटना ने मृदा निर्माण के रूप में पारिस्थितिकी तंत्र की एक महत्वपूर्ण मददगार सेवा मुहैया करायी. साथ ही, मिट्टी का उपजाऊपन बढ़ाने के रूप में प्रोविजिनिंग (भोजन वगैरह उपलब्ध कराने वाली) सेवा मुहैया करायी. समय के साथ, अल्पकालिक आर्थिक हितों को पूरा करने के लिए ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों पर बांध परियोजनाओं और तटबंधों के रूप में संरचनात्मक हस्तक्षेप (स्ट्रक्चरल इंटरवेन्शन) सामने आये हैं. ऐसा करते हुए दीर्घकालिक पारिस्थितिकीय चिंताओं को ध्यान में नहीं रखा गया. नदी की दिशा और प्रवाह व्यवस्था (फ्लो रेजीम) को समझे बिना ‘नदी को निर्देशित’ करने के रिडक्शनिस्ट (जटिलता में न जाने वाले) इंजीनियरिंग लक्ष्यों के साथ, इन संरचनात्मक हस्तक्षेपों ने नदी तल को ऊंचा किया, तेज़ मानसून के दौरान प्रवाह व्यवस्था की चौड़ाई को बाधित किया, और ब्रह्मपुत्र व उसकी सहायक नदियों दोनों के जलस्तर को बढ़ाया. इस मानव-निर्मित परिघटना ने उस वार्षिक पारिस्थितिकीय परिघटना को बदल दिया जिसने पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाएं मुहैया करायीं.

अरुणाचल में रंगानदी बांध एक ऐसी बहुउद्देशीय परियोजना है जो रंगानदी से बिजली बनाने और पर्यटन स्थल के रूप में सेवा देने की इच्छा रखती है, पर यह बाढ़ नियंत्रण का पहलू अपने साथ समेटे हुए नहीं है.

यह लेख असम में बाढ़ की आपदा में योगदान देने वाले बड़े कारक, अरुणाचल प्रदेश की बहुउद्देशीय परियोजनाओं, पर ग़ौर करता है. सुबनसिरी लोअर हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट और दिबांग बहुउद्देशीय परियोजना को जिन विभिन्न उपयोगों के लिए बनाया गया, उनमें से एक बाढ़ नियंत्रण भी था. हालांकि, अरुणाचल में रंगानदी बांध एक ऐसी बहुउद्देशीय परियोजना है जो रंगानदी से बिजली बनाने और पर्यटन स्थल के रूप में सेवा देने की इच्छा रखती है, पर यह बाढ़ नियंत्रण का पहलू अपने साथ समेटे हुए नहीं है. इस लेख में यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि चाहे इन बांधों में बाढ़ से सुरक्षा का पहलू शामिल हो या न हो, एक रणनीति के बतौर बाढ़ की रोकथाम एक छलावे से ज़्यादा कुछ नहीं है.

सुबनसिरी लोअर हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट (एसएलएचईपी)

तय योजना के अनुसार सुबनसिरी लोअर हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को अगले साल चालू होना है. असम-अरुणाचल की सीमा पर स्थित इस परियोजना का एक हंगामेदार इतिहास रहा है. इसके विरोध में असम जातीयतावादी युवा छात्र परिषद (एजेवाईसीपी) और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) जैसे राजनीतिक धड़ों ने बड़ा आंदोलन किया. 2021 में, उफनाती सुबनसिरी नदी ने बांध की सुरक्षा दीवार को तोड़ते हुए एसएलएचईपी के बिजलीघर को जलमग्न कर दिया. सुरक्षा दीवार टूटने से नदी के निचले बहाव की ओर बसे लोगों में डर पैदा हुआ और अरुणाचल प्रदेश से लगे असम के धेमाजी, बिश्वनाथ तथा लखीमपुर जिलों में प्रदर्शन भड़क उठा. आसू की अगुवाई में हुआ विरोध परियोजना के सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित कर पाने में नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (एनएचपीसी) की अयोग्यता को लेकर था.

बांध की प्लानिंग से जुड़े संरक्षा और सुरक्षा के मुद्दों ने नीचे के इलाकों में ठीक ही चिंता पैदा की है. साथ ही, प्राकृतिक आपदा की वजह से एसएलएचईपी के ढह जाने का डर भी उभारा है, क्योंकि परियोजना जहां स्थित है वह जगह भूस्खलन और बाढ़ की उच्च आशंका वाली है.

सुबनसिरी लोअर प्रोजेक्ट की प्लानिंग का चरण कई तरह की सीमाबद्धताओं से ग्रसित है. पूरा का पूरा हिमालय टेक्टोनिक हलचल वाले क्षेत्र के तहत आता है. नतीजतन, इस क्षेत्र में किसी अन्य बांध अवसंरचना की तरह एसएलएचईपी अवसंरचना भी प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम के अधीन है. बड़ी चिंता की बात यह है कि बांध का भूकंपीय डिजाइन मानदंड 8.5 से अधिक तीव्रता वाले भूकंपों को झेल पाने के लिए अपर्याप्त है. बांध की प्लानिंग से जुड़े संरक्षा और सुरक्षा के मुद्दों ने नीचे के इलाकों में ठीक ही चिंता पैदा की है. साथ ही, प्राकृतिक आपदा की वजह से एसएलएचईपी के ढह जाने का डर भी उभारा है, क्योंकि परियोजना जहां स्थित है वह जगह भूस्खलन और बाढ़ की उच्च आशंका वाली है.

दिबांग बहुउद्देश्यीय परियोजना (दिबांग एमपीपी)

दिबांग बहुउद्देश्यीय परियोजना (दिबांग एमपीपी) भारत के महत्वाकांक्षी जलविद्युत लक्ष्यों का एक और प्रतीक है. ऐसा अनुमान है कि यह पूरा होने के बाद दुनिया का सबसे ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी डैम होगा. चूंकि अरुणाचल सरकार द्वारा पेश किये गये पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और बांध-संबंधी अन्य प्रस्ताव ख़ामियों से भरे हुए थे, परियोजना को सात साल लंबे इंतज़ार के बाद ही पर्यावरणीय मंज़ूरी मिली. दिबांग नदी की टोपोग्राफी (स्थलाकृति) की मॉडलिंग और वार्षिक विश्लेषण पर आधारित पर्याप्त ग्राउंड डाटा की अनुपलब्धता जैसे अन्य कारक, प्राकृतिक ख़तरे के जोखिमों की पहचान और वर्गीकरण की बाधा से पार पाना विफल बनाते हैं.

नीचे असम में रहने वाले समुदाय 3000 मेगावाट की इस परियोजना से प्रभावित होने की जद में हैं. बाढ़ नियंत्रण इस परियोजना का एक प्राथमिक उद्देश्य है, लेकिन इसे लेकर संदेह है कि क्या बांध की भंडारण क्षमता पर्याप्त है. बांध की भंडारण क्षमता पर किसी उपलब्ध डाटा का अभाव भी है. इसके अलावा, अगर गाद जमा होने के मामले में दिबांग एमपीपी की नियति भी डीवीसी जलाशयों जैसी हुई, तो बांध की जल धारण क्षमता और ज़्यादा कम हो जायेगी. इस तरह, दिबांग एमपीपी के नीचे असम में बाढ़ नियंत्रण के उद्देश्य को पूरा कर पाने में विफल हो जाने की आशंका को कोई भी पूरी तरह ख़त्म नहीं कर सकता.

केरल में हुई तबाही बांध सुरक्षा नियमनों के महत्व को ज़ाहिर करती है. 2018 में, अचानक पानी छोड़े जाने और उच्च जलाशय भंडारण जैसे कारकों ने राज्य में बाढ़ की स्थिति को और बिगाड़ दिया. इसके साथ ही, लोगों को निकाल कर सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचाने जैसी फॉलोअप कार्रवाई के अभाव ने स्थिति को और गंभीर बना दिया.

रंगानदी जलविद्युत परियोजना (आरएचईपी)

मूसलाधार मॉनसूनी बारिश के अलावा, पिछले साल रंगानदी बांध से अप्रत्याशित रूप से अतिरिक्त पानी छोड़े जाने के चलते असम के लखीमपुर जिले जैसे नीचे के इलाकों में भारी बाढ़ आयी थी. रंगानदी बांध लखीमपुर में आने वाली वार्षिक बाढ़ को गंभीर बनाना जारी रखे हुए है, इस तथ्य की पुष्टि यहां के मौजूदा सांसद प्रधान बरुआ के विचारों से हुई है. उन्होंने मुख्यमंत्री हिमंत बिश्व शर्मा से इस मुद्दे को विद्युत मंत्रालय के समक्ष उठाने का अनुरोध भी किया.

केरल में हुई तबाही बांध सुरक्षा नियमनों के महत्व को ज़ाहिर करती है. 2018 में, अचानक पानी छोड़े जाने और उच्च जलाशय भंडारण जैसे कारकों ने राज्य में बाढ़ की स्थिति को और बिगाड़ दिया. इसके साथ ही, लोगों को निकाल कर सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचाने जैसी फॉलोअप कार्रवाई के अभाव ने स्थिति को और गंभीर बना दिया. ये वो सबक हैं जो केरल की बाढ़ से सीखे जा सकते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि रंगानदी बांध के मामले में इतिहास शायद ख़ुद को दोहरायेगा. अप्रैल 2022 में, नीपको (NEEPCO) ने एक सर्कुलर जारी किया जिसमें कहा गया कि रंगानदी बांध के बढ़ते जलस्तर के कारण उत्पन्न बाढ़ की स्थिति के दौरान लोगों को हुए किसी नुक़सान के लिए वह ज़िम्मेदार नहीं होगा. असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक़, उन्हें सर्कुलर जारी होने के एक हफ़्ते तक इस बारे में पता ही नहीं चला. यह बांध सुरक्षा अधिनियम की धारा 36 (b) का साफ़ उल्लंघन है. यह क़ानून बांध प्राधिकारियों के लिए यह आवश्यक बनाता है कि वे पारदर्शिता सुनिश्चित करने और बांध की सुरक्षा को लेकर डर कम करने के लिए, प्रभावित हो सकने वाले क्षेत्रों की सभी आपदा प्रबंधन एजेंसियों के साथ परामर्श करें.

बाढ़ रोकथाम और जलविद्युत को एक में जोड़ना

बाढ़ के जोख़िम को नियंत्रित और न्यूनतम करने के उद्देश्य के उलट, अरुणाचली बांधों में जमा भारी मात्रा में पानी ने बाढ़ के जोखिम की तीव्रता को बढ़ा दिया है. हालांकि, इन बांधों ने बाढ़ पैदा करने लायक मात्रा में पानी छोड़ना जारी रखा हुआ है, लेकिन इन्हें ‘बहुउद्देश्यीय परियोजनाओं’ के रूप में पेश किया गया है जिनका प्राथमिक उद्देश्य जलविद्युत है. अरुणाचल प्रदेश की योजना प्रवाह शक्ति का इस्तेमाल करने और निर्बाध आपूर्ति के लिए बिजली उत्पादित करने की है, जिससे कि वह अपने पड़ोसियों- सिक्किम, त्रिपुरा और मिजोरम की तरह पावर सरप्लस राज्य बन सके. एक आपूर्ति-उन्मुखी प्रतिमान ने अरुणाचल प्रदेश में नीति-निर्माण को निर्देशित किया है, जहां टिकाऊ जल प्रबंधन अपनाये जाने के ऊपर जलविद्युत की तलाश को वरीयता दी गयी है.

पर्यावरणीय प्रभाव आकलन का अपर्याप्त होना या न होना

गाद संबंधी डाटा का अभाव और अपर्याप्त पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) स्थिति को और जटिल बनाते हैं. उदाहरण के लिए, दिबांग एमपीपी आवश्यक पर्यावरणीय एवं सामाजिक चिंताओं का समाधान नहीं कर पाया, जिसके बाद 2013 और 2014 में उसे वन सलाहकार समिति से एक के बाद एक नामंज़ूरी का सामना करना पड़ा. इसकी ईआईए रिपोर्ट प्रोजेक्ट के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन जैसे बेहद अहम अवयवों पर विचार करने में विफल रही. एसएलएचईपी की ईआईए रिपोर्ट परियोजना स्थल से केवल 10 किलोमीटर की दूरी से इकट्ठा किये गये डाटा पर आधारित थी. इसने नीचे के धेमाजी और लखीमपुर जैसे इलाकों पर प्रभावों की अनदेखी कर दी, जो महज 40 किलोमीटर की दूरी पर हैं. यह रिपोर्ट भी प्रोजेक्ट के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को अनदेखा करती है. यह इस क्षेत्र में मौजूद वायु प्रदूषण के स्रोतों जैसे खनन, वाहन यातायात तथा घरेलू ईंधन जलाये जाने को ही कवर करती है. और भी ज़्यादा दिलचस्प यह है कि रंगानदी बांध का निर्माण बिना किसी ईआईए या किसी अन्य आकलन के किया गया, जो एक बड़ी चिंता का विषय है. इसलिए यह किसी आश्चर्य की बात नहीं कि नॉर्थ ईस्ट डायलॉग फोरम चाहता है कि यह परियोजना बंद हो. चूंकि परियोजना के पर्यावरणीय परिणाम अनजाने हैं, यह परियोजना विकास के नियमों और प्रक्रियाओं के घोर उल्लंघन की ओर इशारा करता है.

यह किसी आश्चर्य की बात नहीं कि नॉर्थ ईस्ट डायलॉग फोरम चाहता है कि यह परियोजना बंद हो. चूंकि परियोजना के पर्यावरणीय परिणाम अनजाने हैं, यह परियोजना विकास के नियमों और प्रक्रियाओं के घोर उल्लंघन की ओर इशारा करता है.

निष्कर्ष

पूर्वोत्तर में हाइड्रोलॉजिकल डाटा की अपर्याप्तता या अनुपलब्धता इस क्षेत्र में प्रभावी बाढ़ प्रबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करती है. उदाहरण के लिए, डाटा-अभावग्रस्त पार-सीमाई ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन के पास नदी की गाद को लेकर पर्याप्त डाटा नहीं है. बाढ़ प्रबंधन को लेकर फ़ैसले करने में ग़लतियों से बचने के लिए जानकारियों में इस तरह की कमी को दूर करना महत्वपूर्ण है. ऊपरी धारा में गाद का जमाव बैकवाटर इफेक्ट के ज़रिये निर्माण के ऊपर की ओर बाढ़ की स्थिति को और गंभीर बना सकता है, जैसा कि पश्चिम बंगाल स्थित फरक्का बैराज के मामले में अक्सर कहा जाता है कि यह उच्च प्रवाह के दौरान बिहार में बाढ़ लाता है. दुर्भाग्य से पूर्वोत्तर में ऐसा कोई आकलन नहीं किया गया है. इस तरह के संरचनात्मक हस्तक्षेपों की पर्याप्त व अद्यतन सूचनाओं तथा समग्र मूल्यांकन की ज़रूरत है, जो कि स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग और नवशास्त्रीय (नियोक्लासिकल) अर्थशास्त्र की रिडक्शनिस्ट दृष्टि में आ पाने से रह जाते हैं.

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