Expert Speak Raisina Debates
Published on Dec 16, 2025 Updated 4 Days ago

नवंबर 2025 में थाई विदेश मंत्री की नई दिल्ली यात्रा ने भारत–थाईलैंड रिश्तों में नए अध्याय की शुरुआत की. यह सिर्फ बातचीत नहीं बल्कि साझा सुरक्षा और व्यावहारिक सहयोग की दिशा में एक ठोस कदम था.

भारत–थाईलैंड: दिल्ली में साझेदारी का नया दौर

हाल ही में थाई विदेश मंत्री सिहासक फुआंगकेतकिओ की नई दिल्ली यात्रा भारत–थाईलैंड संबंधों के लिए अहम रही. रणनीतिक साझेदारी घोषित होने के सात महीने बाद हुई इस यात्रा से साफ हुआ कि दोनों देश अब सिर्फ़ वादों पर ही नहीं बल्कि ठोस सहयोग की ओर बढ़ना चाहते हैं. क्षेत्र में सीमा तनाव, म्यांमार की अस्थिरता और साइबर ठगी जैसी चुनौतियों के बीच यह यात्रा सामान्य कूटनीति से आगे थी और इस बात की कसौटी थी कि क्या दोनों देश मिलकर साझा समस्याओं पर व्यावहारिक रूप से काम कर सकते हैं.

  • नवंबर 2025 की यात्रा से भारत–थाईलैंड रिश्तों में नया अध्याय शुरू हुआ।
  • यह यात्रा साझा सुरक्षा और व्यावहारिक सहयोग का ठोस संकेत थी।
  • दोनों देश वादों से आगे बढ़कर ठोस सहयोग की ओर बढ़ रहे हैं।

सीमा-पार अपराध

पहले की उच्च-स्तरीय बैठकों के विपरीत, यह यात्रा ऐसे समय में हुई जब पूरे क्षेत्र में चिंता बढ़ रही है. थाईलैंड को कंबोडिया के साथ अपनी पूर्वी सीमा पर नए दबाव का सामना करना पड़ रहा है, वहीं म्यांमार में जारी संघर्ष का असर थाईलैंड की सुरक्षा और सीमा प्रबंधन पर साफ़ दिख रहा है. इसके साथ ही, थाईलैंड–म्यांमार–कंबोडिया क्षेत्र में सक्रिय अंतरराष्ट्रीय अपराध गिरोहों ने अपनी गतिविधियाँ तेज़ कर दी हैं. इन साइबर ठगी और अपराध नेटवर्कों में फँसकर भारत के सैकड़ों नागरिक धोखाधड़ी का शिकार हुए हैं, जिससे भारत भी इस समस्या से सीधे प्रभावित हुआ है. इसी पृष्ठभूमि में 30 नवंबर से 2 दिसंबर 2025 तक थाई विदेश मंत्री की तीन दिन की भारत यात्रा को समझना ज़रूरी है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के साथ उनकी बातचीत केवल औपचारिक नहीं थी, बल्कि क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता से निपटने के लिए ज़रूरी और रणनीतिक थी.

“साइबर ठगी, जिसे पहले मामूली समस्या माना जाता था, अब मानव तस्करी, डिजिटल धोखाधड़ी और संगठित अपराध से जुड़ा एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय खतरा बन चुकी है।”

 

भारत–थाईलैंड की इस मंत्रिस्तरीय मुलाक़ात में आर्थिक मुद्दों से ज़्यादा सुरक्षा सहयोग पर ज़ोर दिखा, जो हाल के वर्षों में पहली बार हुआ. साइबर ठगी, जिसे पहले मामूली समस्या माना जाता था, अब मानव तस्करी, डिजिटल धोखाधड़ी और संगठित अपराध से जुड़ा एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय खतरा बन चुकी है. थाईलैंड का खुफिया जानकारी साझा करने का प्रस्ताव और बैंकॉक में ऑनलाइन ठगी के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत को साथ जोड़ने का न्योता यह दिखाता है कि अकेले कार्रवाई अब काफ़ी नहीं है. भारत के लिए इस क्षेत्र में सक्रिय होना मजबूरी है क्योंकि 2022 से अब तक म्यांमार, कंबोडिया और लाओस के ठगी केंद्रों से सैकड़ों, शायद 2,500 से ज़्यादा, भारतीयों को बचाया जा चुका है. भौगोलिक स्थिति और ख़ुफिया क्षमता के कारण थाईलैंड इस चुनौती से निपटने में भारत का सबसे अहम साझेदार है. इसके साथ ही सीमा तनाव और समुद्री सुरक्षा पर हुई बातचीत भी महत्वपूर्ण रही. थाई विदेश मंत्री द्वारा भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से इन मुद्दों पर चर्चा यह दिखाती है कि थाईलैंड भारत को सिर्फ़ कूटनीतिक साझेदार नहीं बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता लाने वाली शक्ति मानता है. ASEAN में बढ़ती अनिश्चितता के बीच, बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर क्षेत्र में भारत की भूमिका थाईलैंड के लिए उभरती असुरक्षाओं के संतुलन के रूप में देखी जा रही है.

संभावनाओं से भरी अर्थव्यवस्था

हालाँकि यात्रा के दौरान सुरक्षा के मुद्दे ज़्यादा हावी रहे लेकिन आर्थिक सहयोग भारत–थाईलैंड संबंधों की बुनियादी आधारशिला बना रहा. दोनों देशों ने व्यापार बढ़ाने की बात दोहराई और थाईलैंड ने एक बार फिर 30 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य पर ज़ोर दिया लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे पीछे है. थाईलैंड के वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, 2024 में भारत उसका 11वाँ सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था. भारत–थाईलैंड आर्थिक गलियारा अब भी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाया है. कई वस्तुओं पर ऊँचे शुल्क और कृषि, प्रोसेस्ड फूड तथा ऑटोमोबाइल पुर्ज़ों जैसे क्षेत्रों में गैर-शुल्क बाधाएँ व्यापार को रोकती हैं. साथ ही,आरसीईपी (Regional Comprehensive Economic Partnership) के बाद भारत की सतर्क व्यापार नीति के कारण थाईलैंड की भारतीय बाज़ार से जुड़ी उम्मीदें और जटिल हो गई हैं.

“भारत के लिए इस क्षेत्र में सक्रिय होना मजबूरी है क्योंकि 2022 से अब तक म्यांमार, कंबोडिया और लाओस के ठगी केंद्रों से सैकड़ों, शायद 2,500 से ज़्यादा, भारतीयों को बचाया जा चुका है।”

कनेक्टिविटी भी, भले ही बातचीत का अहम हिस्सा रही हो, लगातार देरी का शिकार बनी हुई है. भारत–म्यांमार–थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग अब तक पूरा नहीं हो सका है क्योंकि म्यांमार में संघर्ष और कमजोर शासन के कारण काम रुका हुआ है. थाईलैंड इस परियोजना को अपनी “लुक वेस्ट” नीति के लिए बहुत ज़रूरी मानता है और भारत भी इसके महत्व को दोहराता रहा है लेकिन म्यांमार की बिगड़ती स्थिति के चलते इसका पूरा होना अभी अनिश्चित है इसलिए यह यात्रा जहाँ संभावनाओं को साफ करती है, वहीं यह भी दिखाती है कि आर्थिक सहयोग में आगे बढ़ने के लिए धैर्य और मज़बूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की ज़रूरत होगी.

हिंद-प्रशांत क्षेत्र से जुड़ा रणनीतिक अर्थ

 औपचारिक बयानों के पीछे एक गहरी रणनीतिक सोच भी दिखाई देती है. स्रेत्ता सरकार के तहत थाईलैंड की विदेश नीति इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अधिक व्यावहारिक हो गई है, जहाँ वह चीन से इतर भी अपने साझेदार बढ़ाना चाहता है. साथ ही, थाईलैंड आसियान की ‘सहयोगी तटस्थता’ की नीति से जुड़ा हुआ है जिससे भारत उसके लिए एक उपयुक्त साझेदार बनता है जो न तो दखल देने वाला है, न ही दबाव बनाने वाला बल्कि विकास और आसियान की केंद्रीय भूमिका का समर्थक है. भारत के लिए भी थाईलैंड ‘एक्ट ईस्ट नीति’ में अहम स्थान रखता है. यह मुख्यभूमि दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुँच का सेतु है, आसियान की आपूर्ति श्रृंखलाओं का प्रवेश द्वार है और बंगाल की खाड़ी में एक समुद्री पड़ोसी भी है. इसलिए भारत द्वारा थाईलैंड को ‘महत्वपूर्ण समुद्री पड़ोसी’ कहना केवल औपचारिकता नहीं बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी रणनीतिक मौजूदगी मजबूत करने का संकेत है.

“ASEAN में बढ़ती अनिश्चितता के बीच, बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर क्षेत्र में भारत की भूमिका थाईलैंड के लिए उभरती असुरक्षाओं के संतुलन के रूप में देखी जा रही है।”

हालाँकि इस यात्रा में ज़्यादा ध्यान सुरक्षा और रणनीतिक मुद्दों पर रहा, फिर भी सांस्कृतिक और सॉफ्ट पावर से जुड़े रिश्ते भारत–थाईलैंड संबंधों की एक मज़बूत लेकिन कम दिखने वाली ताकत बने हुए हैं. बौद्ध धर्म, पुराने समुद्री व्यापार और साझा कला परंपराओं जैसे सदियों पुराने संबंधों ने भारत को थाईलैंड के लिए एक भरोसेमंद और गैर-खतरनाक साझेदार बनाया है. दूसरी बड़ी शक्तियों के साथ रिश्तों के उलट, भारत–थाईलैंड संबंधों में प्रभाव या निर्भरता की चिंता नहीं दिखती. इस यात्रा के दौरान हुए सांस्कृतिक कार्यक्रमों और साझा विरासत के ज़िक्र ने चुपचाप इसी मज़बूत आधार को और मजबूत किया.

लगातार बनी रहने वाली चुनौतियाँ

गर्मजोशी और प्रतीकात्मकता के बावजूद भारत–थाईलैंड संबंधों में अब भी कुछ बुनियादी चुनौतियाँ बनी हुई हैं. पहली चुनौती दोनों देशों की घरेलू प्राथमिकताएँ हैं. भारत का ध्यान उसकी ज़मीनी सुरक्षा चिंताओं और आंतरिक आर्थिक एजेंडे पर केंद्रित है जबकि थाईलैंड में बार-बार होने वाले राजनीतिक बदलावों ने विदेश नीति में निरंतरता को प्रभावित किया है. दूसरी बड़ी चुनौती म्यांमार है. भारत और थाईलैंड, दोनों ही म्यांमार की आंतरिक राजनीति को प्रभावित करने की सीमित क्षमता रखते हैं. वहाँ जारी संघर्ष सीमा व्यापार, कनेक्टिविटी परियोजनाओं और सुरक्षा को नुकसान पहुँचा रहा है,  साथ ही आपराधिक नेटवर्क को भी बढ़ावा दे रहा है. इसके बावजूद म्यांमार भारत के ‘एक्ट ईस्ट’ और थाईलैंड की क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अनिवार्य बना हुआ है. तीसरी चुनौती चीन की व्यापक आर्थिक मौजूदगी है जिसे ध्यान में रखते हुए भारत को संतुलन साधना पड़ता है. फिर भी, थाईलैंड की व्यावहारिक विदेश नीति भारत के लिए सहयोग की गुंजाइश बनाए रखती है.

क्यों अहम है यह यात्रा

इन तमाम सीमाओं के बावजूद, थाई विदेश मंत्री की यह यात्रा भारत–थाईलैंड संबंधों में एक नए गंभीर रुख को दर्शाती है. यह रिश्ता अब केवल बड़े कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स की उम्मीदों पर नहीं बल्कि दोनों देशों की साझा कमजोरियों और चुनौतियों पर भी आधारित है. साइबर अपराध पर कार्रवाई, क्षेत्रीय सुरक्षा और त्रिपक्षीय सहयोग पर दिया गया ज़ोर यह दिखाता है कि आज भारत और थाईलैंड जिन समस्याओं से जूझ रहे हैं, वे दस साल पहले बनी ‘एक्ट ईस्ट नीति’ के दौर की कल्पनाओं से कहीं ज़्यादा जटिल हैं.

“यह यात्रा मौजूदा समस्याओं का समाधान नहीं करती लेकिन यह साफ संकेत देती है कि दोनों पक्ष अब इनकी गंभीरता को समझते हैं।”

यात्रा को भारत–थाईलैंड संबंधों में भावनात्मक सोच से व्यावहारिक सोच की ओर बदलाव के रूप में देखा जाना चाहिए. यदि दोनों देश इस अवसर को खुफिया जानकारी साझा करने, सीमा सुरक्षा समन्वय, व्यापार सुगमता और कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में ठोस संस्थागत सहयोग में बदल पाते हैं तो यह भारत की पूर्वी विदेश नीति के सबसे अहम द्विपक्षीय संबंधों में से एक बन सकता है. यह यात्रा मौजूदा समस्याओं का समाधान नहीं करती लेकिन यह साफ संकेत देती है कि दोनों पक्ष अब इनकी गंभीरता को समझते हैं और भारत–थाईलैंड साझेदारी अब संभावनाओं से आगे बढ़कर वास्तविक कामकाज की दिशा में बढ़ रही है.


श्रीपर्णा बनर्जी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में एसोसिएट फ़ेलो हैं.

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.

Author

Sreeparna Banerjee

Sreeparna Banerjee

Sreeparna Banerjee is an Associate Fellow in the Strategic Studies Programme. Her work focuses on the geopolitical and strategic affairs concerning two Southeast Asian countries, namely ...

Read More +