वैज्ञानिक खोजों की चोरी के बारे में तो आपने सुना ही होगा लेकिन ज़रा सोचिए, अगर कोई आपके शरीर से जुड़ी संवेदनशील जानकारी या रिसर्च डेटा ही हैक कर ले तो क्या होगा? समझिए यही डर आज “साइबर जैवसुरक्षा” को किस तरह ज़रूरी बनाता है ताकि हमारी सेहत, डेटा और विज्ञान सुरक्षित रह सकें.
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यह लेख ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 : साझा जोखिम के युग में विज्ञान के साथ खड़े रहना’ शृंखला का हिस्सा है.
साल 2025 में ब्रिटेन में नर्सरी स्कूलों पर हुए साइबर हमले के कारण 8,000 से अधिक बच्चों की संवेदनशील निजी जानकारियां लीक हो गईं. इसके कारण विशेष साइबर सुरक्षा दिशा-निर्देश जारी किए गए और बच्चों की जानकारी संभालने वालों के लिए ‘UK जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन’ के तहत डेटा सुरक्षा के सख़्त नियम बनाए गए.
यही वज़ह है कि विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 की थीम-‘स्वास्थ्य के लिए एकजुट. विज्ञान के साथ खड़े रहें’ की अहमियत बढ़ जाती है. दुनिया के तमाम साझेदारों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में डेटा सुरक्षा की ज़रूरत को देखते हुए इस पर अपनी एकजुटता दिखाई है. यह विषय वैश्विक वैज्ञानिक पारिस्थितिकी तंत्र में एक बड़े बदलाव का संकेत है. इसमें प्रयोगशालाओं के नतीजों से ही नहीं, वैज्ञानिक ज्ञान और जानकारियों का भंडारण व प्रसार करने वाले तंत्रों की सच्चाई से अधिक विश्वास बनता है. चूंकि डिजिटल और जैविक ढांचों पर हमारी निर्भरता बढ़ने लगी है, इसलिए इनको सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने की ज़रूरत अधिक समझी जाती है.
जीनोमिक डेटा के डिजिटलीकरण, स्वायत्त प्रयोगशालाओं, क्लाउड कंप्यूटिंग और वैश्विक डेटा साझेदारी के कारण अब जीव विज्ञान और डिजिटल प्रणालियां एक हो रही हैं.
जीनोमिक डेटा के डिजिटलीकरण, स्वायत्त प्रयोगशालाओं, क्लाउड कंप्यूटिंग और वैश्विक डेटा साझेदारी के कारण अब जीव विज्ञान और डिजिटल प्रणालियां एक हो रही हैं. इसने न सिर्फ़ विज्ञान और नवाचार को आगे बढ़ाया है, बल्कि नए प्रकार के ख़तरे भी पैदा किए हैं, जिसे पारंपरिक सुरक्षा नीतियों से हल नहीं किया जा सकता. इसलिए, जैविक डेटा से जुड़े बुनियादी ढांचों की सुरक्षा के लिए साइबर जैवसुरक्षा एक प्रमुख क्षेत्र बन गया है.
‘वन हेल्थ’, यानी ‘एक स्वास्थ्य’ का मतलब है, इंसान, पशु और पर्यावरण की सेहत आपस में गहराई से जुड़ी हुई है. यह सोच जैव प्रौद्योगिकी के भविष्य के लिए सुखद है, पर साइबर जैवसुरक्षा से जुड़ा वैचारिक ढांचा अब भी शुरुआती अवस्था में है. जैसे- ग्लोबल अर्ली वार्निंग सिस्टम जैसे प्लेटफ़ॉर्म से अब जूनोटिक रोगों की निगरानी आसानी से होने लगी है, पर इस तरह की व्यवस्था पर निर्भरता के अपने जोखिम भी हैं. जैसे, यदि किसी प्लेटफ़ॉर्म पर साइबर हमला होता है, तो रोग निगरानी, व्यक्तिगत डेटा और अनुसंधान संबंधी डेटा पर ख़तरा बढ़ जाएगा.
साइबर जैवसुरक्षा, जो जैवसुरक्षा का ही अगला पड़ाव है, जैविक जानकारी, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और विभिन्न साइबर-भौतिक ढांचे की सुरक्षा करता है, इसलिए रोग निगरानी प्लेटफ़ॉर्म की सुरक्षा, संवेदनशील जैविक जानकारियों का संरक्षण और कई उभरती प्रौद्योगिकियों (जैसे- सिंथेटिक बायोलॉजी, AI, इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स आदि) से पैदा हो रहे ख़तरों से निपटने में इसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए. कोविड-19 महामारी ने भी जूनोटिक रोगों की निगरानी करने वाले डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की सुरक्षा की ज़रूरत बताई है.
जैविक प्रणालियां और सूचनाओं में तालमेल ने इसमें घुसपैठ व हेरफेर का ख़तरा बढ़ा दिया है. ये ख़तरे विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 की थीम को लेकर चुनौतियां भी पैदा करती हैं- क्योंकि डेटा सटीक होने चाहिए, प्रणालियां मज़बूत होनी चाहिए और प्रक्रियाएं सुरक्षित होनी चाहिए. यदि इनका उल्लंघन होता है, तो वैज्ञानिक अनुसंधानों पर भी सवाल उठने लगेंगे.
निश्चय ही, महत्वपूर्ण जानकारियां साझा करने के प्रयास किए जा रहे हैं, पर साइबर जैव सुरक्षा को ‘वन हेल्थ’ में शामिल करने के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा को नए रूप में समझने की ज़रूरत होगी और डेटा विश्वसनीयता को जैव सुरक्षा का एक ज़रूरी हिस्सा मानना होगा. इसके लिए ख़तरनाक रोगों पर काम करने वाले प्रयोगशालाओं के ख़तरों का प्रबंधन करना होगा. साथ ही, कृषि और पारिस्थितिकी निगरानी ढांचे की क्षमता में सुधार और साइबर जैव सुरक्षा के लिए सभी हितधारकों में साझेदारी बढ़ाना आवश्यक होगा.
यह जोखिम केवल आधुनिक तकनीकों तक सीमित नहीं है. ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस, न्यूरोटेक्नोलॉजी, यहां तक कि इमर्सिव डिजिटल टेक्नोलॉजी के विकास से भी साइबर जैवसुरक्षा जुड़ी हुई है. जैसे- ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस दिमाग के संकेतों को सीधे डिजिटल संकेतों में बदल देता है. यदि इन संकेतों से कोई छेड़छाड़ होती है, तो संभव है कि व्यक्ति के विचार, इरादे, यहां तक कि उसके शारीरिक हाव-भाव भी बदल जाएं. इसका अर्थ है कि जैविक डेटा ही नहीं, तंत्रिका और संज्ञात्मक जानकारियां भी साइबर जैवसुरक्षा में शामिल होती हैं. स्वास्थ्य सेवाओं और शोध में इन तकनीकों को शामिल करने से नए ख़तरे पैदा हो सकते हैं, इसलिए इनको अपनाने से पहले इनसे जुड़ी चुनौतियों का पता लगाना आवश्यक है.
जैविक प्रणालियां और सूचनाओं में तालमेल ने इसमें घुसपैठ व हेरफेर का ख़तरा बढ़ा दिया है. ये ख़तरे विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 की थीम को लेकर चुनौतियां भी पैदा करती हैं- क्योंकि डेटा सटीक होने चाहिए, प्रणालियां मज़बूत होनी चाहिए और प्रक्रियाएं सुरक्षित होनी चाहिए. यदि इनका उल्लंघन होता है, तो वैज्ञानिक अनुसंधानों पर भी सवाल उठने लगेंगे.
साफ़ है, जैविक डेटा के प्रबंधन की अपनी चुनौतियां हैं, क्योंकि इसे इसकी प्रकृति के कारण ही पहचाना जाता है. इसके अलावा, यह डेटा केवल एक व्यक्ति से जुड़ा नहीं होता, बल्कि पूरी आबादी को प्रभावित करता है. एक तरफ़, वैज्ञानिक प्रगति के लिए दुनिया भर में डेटा साझा करने की ज़रूरत है, तो दूसरी तरफ़, इसके दुरुपयोग से जुड़ी चिंताएं भी हैं. इसी कारण डेटा संप्रभुता एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है. देश जहां रणनीतिक और सुरक्षा उद्देश्यों के लिए संवेदनशील जैविक डेटा पर नियंत्रण चाहते हैं, वहीं डेटा-राष्ट्रवाद पर अधिक ज़ोर देने से विश्व का वैज्ञानिक पारिस्थितिकी तंत्र बिखर सकता है. विकासशील देशों के लिए यह नुकसानदेह हो सकता है.
साफ़ है, साइबर जैवसुरक्षा को लेकर ज़रूरी नीतियां बनाए बिना वैज्ञानिक ज्ञान में विश्वसनीयता और स्वास्थ्य एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रभावशीलता ख़तरे में बनी रहेगी.
साइबर जैव सुरक्षा के क्षेत्र में मापदंड बनाने वाले अंतरराष्ट्रीय संस्थानों का पहले से ही अभाव है. जैवसुरक्षा को लेकर हुए जैविक हथियार सम्मेलन या अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य विनियमन जैसे अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन और मानदंड साइबर जैवसुरक्षा की चिंताएं दूर नहीं करते. इसी तरह, जैविक विविधता सम्मेलन में बनाए गए नियम भी साइबर जैवसुरक्षा के लिहाज़ से काफ़ी नहीं हैं.
विभिन्न देशों में जैव सुरक्षा से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मानदंडों को लागू करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कई तरह के प्रयास किए जा रहे हैं, जैसे राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगिकी सुरक्षा नीतियां, जैव-अर्थव्यवस्था रणनीतियां, साइबर नीतियां आदि. भारत में इस तरह के ज्यादातर काम विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) करता है. मगर साइबर जैवसुरक्षा की चुनौतियों का समाधान करने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक और समन्वित नीतियों की ज़रूरत है, इसलिए, भारत निम्नलिखित अनुशंसाओं पर आगे बढ़ सकता है-
जैविक डेटा को महत्वपूर्ण इन्फ्रास्ट्रक्चर मानना- DBT जैविक डेटा और संबंधित अनुसंधान ढांचों को महत्वपूर्ण संरचना मान सकता है, ताकि मौजूदा डेटा मानदंडों के अलावा डेटा की साइबर सुरक्षा को प्राथमिकता मिल सके.
जैविक डेटा सुरक्षा में वैश्विक मानकों का विकास- विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को बायोमेट्रिक डेटा सुरक्षा में मानकों को आगे बढ़ाना चाहिए. हालांकि, भारत में इसकी शुरुआत DBT द्वारा इस क्षेत्र में ज़िम्मेदारी लेने और ऐसे मानक बनाने से हो सकती है, जिनसे निजता, समानता और लाभ साझा करने सहित जैव डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके.
‘वन हेल्थ’ में साइबर जैवसुरक्षा को शामिल करना- राष्ट्रीय ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण में साइबर जैवसुरक्षा को शामिल करना चाहिए, ताकि स्वास्थ्य सुरक्षा में साइबर ढांचे की मज़बूती पर ज़ोर दी जा सके. इसके लिए DBT भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन रिस्पॉन्स टीम के साथ मिलकर काम कर सकता है.
सार्वजनिक-निजी भागीदारी बनाना- आज के प्रौद्योगिकी युग में नीतियां बनाने की कामों में निजी संगठनों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता. चूंकि इन्फ्रास्ट्रक्चर और नवाचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा निजी क्षेत्र के पास है, इसलिए साइबर जैवसुरक्षा को लेकर सार्वजनिक-निजी भागीदारी महत्वपूर्ण बन जाती है. इससे सूचना साझा करने और अच्छी प्रथाओं को अपनाने में सहूलियत मिलेगी. यहां भी DBT जापान जैसे अन्य देशों के साथ साझेदारी की सोच सकता है, जो पहले से ही लोटस/साकुरा कार्यक्रम के माध्यम से भारत के साथ सहयोग कर रहे हैं.
साफ़ है, साइबर जैवसुरक्षा को लेकर ज़रूरी नीतियां बनाए बिना वैज्ञानिक ज्ञान में विश्वसनीयता और स्वास्थ्य एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रभावशीलता ख़तरे में बनी रहेगी. न सिर्फ़ आधुनिक प्रौद्योगिकियों में मौजूद जोखिमों के लिए, बल्कि भविष्य में विकसित होने वाली तकनीकों के लिए भी साइबर जैवसुरक्षा पर ध्यान दिया जाना चाहिए.
(श्राविष्टा अजयकुमार सेंटर फॉर सिक्योरिटी, स्ट्रैटेजी ऐंड टेक्नोलॉजी में एसोसिएट फेलो हैं)
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Shravishtha Ajaykumar is an Associate Fellow at the Centre for Security, Strategy, and Technology. Her research areas include Chemical, Biological, Radiological, and Nuclear (CBRN) strategy ...
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