Author : Prateek Tripathi

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Published on May 20, 2026 Updated 7 Days ago

AI को लेकर बड़े दावों के बावजूद कई जगह यह उम्मीद के मुताबिक काम नहीं कर पा रहा है और इसकी सीमाएं भी सामने आ रही हैं. इसलिए ग्लोबल साउथ को तकनीक के साथ-साथ मानव विकास और रोजगार को प्राथमिकता देते हुए संतुलित रास्ता अपनाना चाहिए- समझिए कि हर तकनीक प्रगति नहीं, कभी-कभी चेतावनी भी होती है.

क्या AI उतना सक्षम है जितना दावा किया जाता है?

Image Source: Getty

वर्तमान कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) क्रांति को मुख्य रूप से 2017 में ट्रांसफॉर्मर मॉडल आर्किटेक्चर के विकास और उसके बाद बड़े भाषा मॉडल (LLMs) के निर्माण ने गति दी. एआई में बाद की अधिकांश प्रगति LLMs पर आधारित रही है, जिनमें जनरेटिव एआई, डिफ्यूजन मॉडल और एजेंटिक एआई शामिल हैं. इन मॉडलों की दिखने वाली तेज प्रगति ने एआई डेवलपर्स और विशेषज्ञों द्वारा कई दावे जन्म दिए हैं, जिनमें बड़े पैमाने पर नौकरियों के खत्म होने से लेकर निकट भविष्य में आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस (AGI) हासिल होने तक की बातें शामिल हैं.

गहराई से देखने पर पता चलता है कि एआई को लेकर किए गए कई बड़े दावे सही साबित नहीं हो रहे हैं. कई क्षेत्रों में एआई और ऑटोमेशन उम्मीद के अनुसार काम नहीं कर पाए हैं. साथ ही, बड़े एआई मॉडल चलाने के लिए बहुत ज्यादा बिजली, पानी और संसाधनों की जरूरत पड़ती है, जिससे यह मॉडल महंगा और लंबे समय तक टिकाऊ नहीं दिखता. एआई कंपनियां इस पर भारी पैसा खर्च कर रही हैं और कर्ज भी बढ़ रहा है. यह ग्लोबल साउथ के देशों के लिए एक चेतावनी है. उन्हें केवल एआई पर निर्भर होने के बजाय मानव विकास, रोजगार और लोगों की जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए संतुलित विकास मॉडल अपनाना चाहिए.

GenAI के दावों और वास्तविकता की खाई

GenAI की शुरुआत के बाद से कई कंपनियों के अधिकारियों ने बार-बार दावा किया कि एआई जल्द ही उन कार्यों को स्वचालित कर देगा, जिन्हें अब तक मनुष्य करते रहे हैं, खासकर कोडिंग और रिमोट लेबर जैसे क्षेत्रों में. लेकिन कई बार ये दावे गलत साबित हुए हैं. 2025 में मॉडल मूल्यांकन और खतरा अनुसंधान (METR) द्वारा किए गए एक नियंत्रित अध्ययन के अनुसार, एआई का उपयोग करने वाले ओपन-सोर्स कोडर्स ने बिना एआई वाले कोडर्स की तुलना में कार्य पूरा करने में 19 प्रतिशत अधिक समय लिया. इसी तरह, IISc बेंगलुरु के एआई सुरक्षा केंद्र और स्केलएआई द्वारा विकसित दूरस्थ श्रम सूचकांक ने पाया कि लगभग सभी अग्रणी एआई मॉडल रिमोट लेबर कार्यों को स्वचालित करने में बेहद कमजोर हैं. सबसे बेहतर मॉडल Opus 4.6 भी केवल 4.17 प्रतिशत स्वचालन दर ही हासिल कर सका. MIT की ‘व्यवसाय में एआई की स्थिति 2025‘ रिपोर्ट के अनुसार, GenAI से जुड़े 95 प्रतिशत पायलट प्रोजेक्ट असफल रहे.

एआई कंपनियां इस पर भारी पैसा खर्च कर रही हैं और कर्ज भी बढ़ रहा है. यह ग्लोबल साउथ के देशों के लिए एक चेतावनी है. उन्हें केवल एआई पर निर्भर होने के बजाय मानव विकास, रोजगार और लोगों की जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए संतुलित विकास मॉडल अपनाना चाहिए.

मैकडॉनल्ड्स, डीपीडी, एयर कनाडा, कर्लना और सेल्सफोर्स जैसी कई कंपनियों में एआई अपनाने के असफल उदाहरण सामने आए. इनमें कुछ कंपनियों ने कर्मचारियों को हटाकर एआई एजेंट लगाए, लेकिन बाद में उन्हें फिर से कर्मचारियों को वापस नियुक्त करना पड़ा. फिनटेक, स्वास्थ्य, शिक्षा, विनिर्माण और सरकारी क्षेत्रों में भी एआई अपनाने को लेकर गंभीर चिंताएँ मौजूद हैं. उदाहरण के लिए, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के कई अध्ययनों ने स्वास्थ्य सेवाओं में एआई चैटबॉट्स के उपयोग के खतरों को उजागर किया है. वहीं, आपातकालीन देखभाल अनुसंधान संस्थान (ECRI) की हालिया रिपोर्ट ने 2026 में एआई चैटबॉट्स के गलत उपयोग को स्वास्थ्य तकनीक से जुड़ा सबसे बड़ा खतरा बताया.

स्थिति को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि ‘एआई’ शब्द का जानबूझकर गलत इस्तेमाल भी किया जा रहा है, ताकि जांच-पड़ताल से बचा जा सके. कई बार ऐसे कार्यों को भी एआई आधारित बताया जाता है, जिनमें वास्तव में एआई की जरूरत ही नहीं होती. उदाहरण के तौर पर, नॉर्वे की टेक कंपनी 1X ने 2025 में नियो नामक दुनिया का पहला उपभोक्ता-तैयार ह्यूमनॉइड रोबोट पेश किया. शुरुआत में दावा किया गया कि यह एआई से संचालित है, लेकिन बाद में पता चला कि कुछ कार्य वास्तव में दूर बैठे कर्मचारी कर रहे थे, जिससे उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता भी प्रभावित हो सकती थी.

इस प्रकार, भले ही एआई स्वचालन आज डेवलपर्स और तकनीकी उत्साहियों के बीच लोकप्रिय बना हुआ है, लेकिन कई मामलों में यह केवल खर्च घटाने और कर्मचारियों की संख्या कम करने का साधन बनता दिखाई देता है. सफल एआई उपयोग के दावों के बावजूद, इस विषय पर ठोस और शोध-आधारित प्रमाण बहुत सीमित हैं. अधिकांश मामलों में LLMs मनुष्यों का प्रभावी विकल्प साबित नहीं हुए हैं, बल्कि कई बार उन्होंने कार्यक्षमता को और बाधित किया है.

हाइपरस्केलिंग बनाम वास्तविक स्थिरता  

एआई अपनाने की पहले बताई गई विफलताओं के अलावा, डेटा सेंटरों की अत्यधिक ऊर्जा आवश्यकताएँ एआई विकास के मौजूदा ‘हाइपरस्केलिंग’ मॉडल को धीरे-धीरे अस्थिर बना रही हैं. इसके कारण दुनिया भर में कई स्थानों पर बड़े पैमाने पर बिजली कटौती, पानी की कमी और वायु प्रदूषण जैसी समस्याएँ सामने आई हैं, जिनके खिलाफ स्थानीय समुदायों द्वारा विरोध प्रदर्शन भी किए जा रहे हैं.

स्थिति को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि ‘एआई’ शब्द का जानबूझकर गलत इस्तेमाल भी किया जा रहा है, ताकि जांच-पड़ताल से बचा जा सके. कई बार ऐसे कार्यों को भी एआई आधारित बताया जाता है, जिनमें वास्तव में एआई की जरूरत ही नहीं होती.

उदाहरण के लिए, 2023 तक अमेरिका की कुल वार्षिक बिजली खपत में डेटा सेंटरों की हिस्सेदारी 4.4 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है, जो 2018 की तुलना में लगभग दोगुनी है. इसके अलावा, एआई से जुड़ी बिजली आपूर्ति की बाधाओं के कारण कई डेटा सेंटर परियोजनाओं में भारी देरी हो रही है. अनुमान है कि 2026 के लिए प्रस्तावित वैश्विक क्षमता का लगभग 11 गीगावाट हिस्सा अभी भी केवल घोषणा के चरण में है और उसके निर्माण के कोई स्पष्ट संकेत दिखाई नहीं दे रहे हैं.

Figure 1: संचालन तिथि के अनुसार वैश्विक डेटा सेंटर क्षमता वृद्धि (गीगावाट में)

Current Ai Model Inadequacies Implications For The Global South

Source: एक्सियोस

वित्तीय दृष्टि से भी अधिकांश एआई कंपनियाँ और हाइपरस्केलर निवेश पर सीमित लाभ मिलने के कारण भारी कर्ज में डूब चुके हैं. इसके चलते ‘सर्कुलर निवेश‘ और तथाकथित ‘एआई बबल‘ के जल्द फूटने की आशंकाएँ बढ़ रही हैं. उदाहरण के लिए, 1.4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक के वित्तीय निवेश के बावजूद, ओपनएआई ने 2025 में केवल लगभग 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर का वार्षिक राजस्व दर्ज किया. इसी तरह की स्थिति कोरवीव जैसे हाइपरस्केलरों की भी है, जो 2025 में केवल 5 बिलियन अमेरिकी डॉलर से थोड़ा अधिक राजस्व होने के बावजूद 2026 में 30–35 बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च करने की योजना बना रहे हैं.

हालांकि ‘डॉट कॉम बबल‘ जैसे पिछले तकनीकी उछालों में पूंजी का गलत आवंटन एक सामान्य प्रवृत्ति रही है, लेकिन उस समय एक बड़ा अंतर यह था कि बबल फूटने के बाद भी अधिकांश निर्मित अवसंरचना किसी न किसी रूप में उपयोगी बनी रही. इसके विपरीत, वर्तमान ‘एआई बबल’ में बनाए जा रहे विशाल डेटा सेंटरों की उपयोगिता बहुत सीमित हो सकती है, खासकर तब जब LLMs की प्रगति एक स्तर पर आकर रुक जाएगी. लेकिन अब बड़ी टेक कंपनियाँ लंबे समय तक चलने वाले और अत्यधिक खर्चीले ‘हाइपरस्केलिंग’ मॉडल में इतनी गहराई से फंस चुकी हैं कि उनके पास अपनी दिशा बदलने या रणनीति सुधारने का विकल्प लगभग नहीं बचा है.

LLMs की सीमाएँ  

वर्तमान समय में बड़े प्री-ट्रेंड मॉडलों और ‘हाइपरस्केलिंग’ एआई मॉडल में भारी निवेश और रुचि का एक प्रमुख कारण एलएलएम की तथाकथित ‘उभरती क्षमताएँ‘ हैं. हालाँकि, कई प्रमाण यह संकेत देते हैं कि एलएलएम की ये ‘उभरती क्षमताएँ’ वास्तव में कमजोर मापदंडों और बेंचमार्क का परिणाम हो सकती हैं. इसके अलावा, जैसे-जैसे एलएलएम का आकार बढ़ता है, उनके प्रदर्शन में दिखने वाला सुधार संभवतः वास्तविक तर्क क्षमता या भाषाई समझ के बजाय केवल पैटर्न याद रखने की बेहतर क्षमता का परिणाम है. भविष्य में, खासकर अधिक उन्नत बेंचमार्क के सामने, यह प्रगति एक स्तर पर आकर रुक सकती है.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की उन्नति के लिए एसोसिएशन (AAAI) द्वारा 475 विशेषज्ञों पर किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, 76 प्रतिशत विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान मशीन लर्निंग मॉडल AGI हासिल करने में सक्षम नहीं होंगे. आज के एलएलएम और जेनएआई सिस्टम अक्सर गलत, अधूरी या मनगढ़ंत जानकारी दे देते हैं. इनमें पक्षपात की समस्या भी होती है, इसलिए लोग एआई पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर पाते.

अगर स्वास्थ्य सेवा या खेती से जुड़ा एआई गलत सलाह दे दे, तो लोगों की जिंदगी और आजीविका पर गंभीर असर पड़ सकता है. इसलिए ग्लोबल साउथ के देशों को बिना सोचे-समझे एआई अपनाने के बजाय मानव विकास, रोजगार और श्रमिक अधिकारों को प्राथमिकता देनी चाहिए.

हालांकि परिणाम सुधारने के लिए सुदृढीकरण सीखना, पुनर्प्राप्ति-संवर्धित पीढ़ी (RAG) और चेन-ऑफ-थॉट रीजनिंग जैसी तकनीकों पर काम हो रहा है, लेकिन भविष्य में एआई की वास्तविक प्रगति जहाँ तक नए या मिश्रित न्यूरल नेटवर्क ढांचों पर निर्भर करेगी. इनमें न्यूरो-प्रतीकात्मक तर्क प्रणाली और सूचना जाली सीखना जैसे गैर-न्यूरल मॉडल शामिल हो सकते हैं. लेकिन ये वैकल्पिक तकनीकें अभी शुरुआती विकास चरण में हैं. यह दिखाता है कि मौजूदा एआई मॉडल अभी पूरी तरह भरोसेमंद नहीं हैं, इसलिए लोगों के जीवन से जुड़े क्षेत्रों में इन्हें बहुत सावधानी से इस्तेमाल करना चाहिए.

ग्लोबल साउथ के लिए AI का सही रास्ता  

ग्लोबल साउथ में एआई सहयोग और अपनाने का मुद्दा, विशेष रूप से मानव और सामाजिक विकास के संदर्भ में, इंडिया आई इम्पैक्ट समिट 2026 का प्रमुख विषय रहा. जो लोग एआई को समाज के अधिकतम लाभ का साधन बताते हैं, उनके दावों के विपरीत वर्तमान LLMs से जुड़े खतरे उनके संभावित लाभों से कहीं अधिक बड़े दिखाई देते हैं.

इसका अर्थ यह नहीं है कि एआई का कोई सामाजिक लाभ नहीं है. कई क्षेत्रों में एआई ने सकारात्मक परिणाम भी दिए हैं. उदाहरण के लिए, भारत में भाषिणी जैसे प्लेटफॉर्म के माध्यम से भाषा अनुवाद चैटबॉट सफल साबित हुए हैं. इसी प्रकार, अल्फाफोल्ड जैसे शोध उपकरणों ने वैज्ञानिक अनुसंधान को तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके लिए गूगल डीपमाइंड की टीम को 2024 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला.

एआई इंसानों की मदद करने वाला एक उपयोगी साधन हो सकता है, लेकिन यह पूरी तरह इंसानों की जगह नहीं ले सकता. इसे सही तरीके से काम करने के लिए अब भी इंसानी निगरानी और समझ की जरूरत होती है. कई जगह एआई सफल रहा है, क्योंकि वहाँ गलत जवाब देने से बड़ा नुकसान नहीं होता. जैसे भाषा अनुवाद में गलती होने पर ज्यादा असर नहीं पड़ता. लेकिन अगर स्वास्थ्य सेवा या खेती से जुड़ा एआई गलत सलाह दे दे, तो लोगों की जिंदगी और आजीविका पर गंभीर असर पड़ सकता है. इसलिए ग्लोबल साउथ के देशों को बिना सोचे-समझे एआई अपनाने के बजाय मानव विकास, रोजगार और श्रमिक अधिकारों को प्राथमिकता देनी चाहिए. एआई का उपयोग केवल उन क्षेत्रों में होना चाहिए, जहां जोखिम कम हो और लोगों को वास्तविक फायदा मिले.


प्रतीक त्रिपाठी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर सिक्योरिटी, स्ट्रेटेजी एंड टेक्नोलॉजी (सीएसएसटी) में एसोसिएट फेलो हैं.
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