Author : Ramanath Jha

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Published on May 01, 2024 Updated 0 Hours ago

एक तरफ जहां भारत में अपराध पर एनसीआरबी के डेटा, काफी विस्तृत एवं व्यापक सेट है, वहीं उनमे व्याप्त चंद डेटा विसंगतियों को संबोधित किये जाने की आवश्यकता है.

भारत के सबसे बड़े शहरों में ‘अपराध’ की घटनाओं का आकलन!

6 दिसंबर 2023 को राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) ने वर्ष 2022 में भारत में अपराध संबंधी एक वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित की. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत उपाय के तौर पर, अपराध दर, किसी एक कैलेंडर वर्ष में प्रति एक लाख व्यक्ति की आबादी पर होने वाले अपराध की कुल मात्रा है. अपराध दर, कानून उल्लंघन का आकलन करने का एक मान्य तरीका है, चूंकि घनी जनसंख्या वाले बड़े भोगौलीक क्षेत्रों की बड़ी आबादी वाले इलाकों में छोटी आबादी वाले इलाकों की तुलना में, बड़ी मात्रा में अपराध होने की संभावना है. प्रति लाख जनसंख्या का जो हिसाब किताब सामने आता है, वो आकार एवं जनसंख्या को गैर ज़रूरी बना देता है क्योंकि वो एक (सिमिट्रिकल) यानी कि एक समान क्षेत्र मुहैय्या करता है जहां किसी देश के राज्यों, ज़िले एवं शहरों के बीच एक निष्पक्ष तुलना की जा सके.  

महानगरों में अपराध 

देश की कुल 19 महानगरीय शहरें जिनके लिए एनसीआरबी ने अलग आँकड़े मुहैया कराए थे, उनमें वर्ष 2022 के दौरान राष्ट्रीय जनसंख्या का कुल 8.12 प्रतिशत हिस्सा रहता है. हालांकि, अपराधों में उनकी साझेदारी 14.65 प्रतिशत रही है. उसी तरह से, इन शहरों में स्थानीय एवं विशिष्ट कानून के तहत कुल 233,114 मुकदमे दायर किए गए, जो कि सारे एसएलएल (SLL) मुकदमों का कुल 10.29 प्रतिशत है. ये अपराध विशेषज्ञों की उस बात का समर्थन करना है कि जिसके अनुसार बड़े शहरों में अपराध का दर छोटे शहरों शहरों, कस्बों और गांवों की तुलना में कहीं ज्य़ादा पाया जाता है. इसके पीछे की वजह में शामिल है वो अवसर जो शहरों में सहज तरीके से धन मिलना, पहचान ज़ाहिर होने, गिरफ़्तारी जेल की सज़ा होने की कम आशंका है. इसी कारण से बड़े शहर पास एवं दूर के अपराधियों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं. हालांकि, भारत के बड़े शहरी समूहों के लिए ये आंकड़े शत-प्रतिशत सही लगते हैं, लेकिन इनमें शामिल कुछ आंकड़े, हमेशा इसकी पुष्टि नहीं करते हैं. इस  लेख में इनमें से कुछ की चर्चा की गई है.   

 भारत के बड़े शहरी समूहों के लिए ये आंकड़े शत-प्रतिशत सही लगते हैं, लेकिन इनमें शामिल कुछ आंकड़े, हमेशा इसकी पुष्टि नहीं करते हैं. इस  लेख में इनमें से कुछ की चर्चा की गई है.   

अपराध दर के मामले में दिल्ली 1,832.6 के दर के साथ दिल्ली अन्य सभी शहरों, जिनमें जयपुर (916.7), इंदौर (767.7), कोच्चि (626.7) और पटना (611.7) आदि शहरों के औसत 544 से 3.36 गुणा ज्य़ादा है. 78.2 के अपराध दर के साथ कोलकाता सबसे शांतिप्रिय शहर के तौर पर उभर कर सामने आया है. चेन्नई (211.2), कोयम्बटूर (211.2), सूरत (215.3), पुणे (219.3), हैदराबाद (266.7), बेंगलुरू (337.3), अहमदाबाद (360.1), मुंबई (367.3), कोझिकोड (397.5), कानपुर (401.4), गाज़ियाबाद (418.0),नागपुर (516) और लखनऊ (521) जैसे सभी शहरों का अपराध दर शहरी औसत (544) से कम ही है.  

 

महानगरों में हत्या के संदर्भ में, आंकड़ों की सूची में प्रति लाख जनसंख्या की आबादी में होने वाले हत्या के मामलों में औसत 5.2 के साथ पटना शहर सबसे ऊपर है. इसके पीछे लखनऊ (4.5), जयपुर (4.3), इंदौर (3.3), और गाज़ियाबाद (3.1) है. कोलकाता (0.2), कोझिकोड (0.3), मुंबई (0.7), और कोच्चि (0.8) में प्रति एक लाख की जनसंख्या पर 1 से भी कम हत्याएं दर्ज हुई है. प्रतिशत के तौर पर, सभी 19 शहरी समूह राष्ट्रव्यापी हत्याओं का कुल 7.12 प्रतिशत हिस्सा बनते हैं, जो कि कुल औसत जनसंख्या प्रतिशत (8.12) से भी कम बनती है. दिल्ली में अपहरण एवं अपहरण का दर (34.2) के साथ सबसे शीर्ष पर है, उसके बाद (32.4) पटना, और (31.1) इंदौर, चेन्नई (0.4), कोयम्बटूर (0.4) एवं कोच्चि (0.9) सबसे न्यूनतम दर दर्ज करती है. प्रतिशत के तौर पर, शहरों ने जनसंख्या के आधार पर देश के अन्य स्थानों की तुलना में, जनसंख्या के अनुपात में अपहरण एवं अपहर्ताओं  में अधिक अंक (12.99) प्राप्त किए है. पटना, लखनऊ, गाज़ियाबाद और कानपुर उम्रदराज़ आबादी के प्रति  काफी दयालु थे. उनके यहां वरिष्ठ नागरिकों के साथ अपराध की कोई भी शिकायत दर्ज नहीं हुई थी.  

महिलाओं संग होने वाले अपराध के मामले में, लखनऊ (161.4), दिल्ली (186.9) और जयपुर सबसे ज्य़ादा (239.3) के औसत के साथ सबसे शीर्ष पर है. 2021 की तुलना में 2022 में लैंगिक अपराध में 12.3 प्रतिशत की उछाल देखी गई. कोयंबटूर (12.9), चेन्नई (17.1) और कोलकाता (27.8) के साथ सबसे ज्य़ादा महिलाओं के अनुकूल शहर के तौर पर उभर कर सामने आया है. बाल अपराध के मामले में दिल्ली ने (7400), उनके पीछे मुंबई (3178) और बेंगलुरु ने (1,578) के साथ सबसे ज्य़ादा शिकायतें दर्ज की है. कोयम्बटूर (83), पटना (127) और कोच्चि (206) के साथ सबसे नीचे के पायदान पर है. 19 शहरों में वरिष्ठ नागरिकों संग कुल 3, 996 दर्ज किए गए मामलों के साथ, 2021 की संख्या की तुलना में 6.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है. (1,313) दिल्ली, (572) मुंबई, और (458) बेंगलुरु  में सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए.    

आर्थिक अपराधों के संदर्भ में, 19 महानगरीय शहरों में कुल 40,760 मामले दर्ज किए गए हैं. 2021 की तुलना में, इसमें सीधे-सीधे 15.8 प्रतिशत की उछाल थी. इनमें से 88.4 प्रतिशत मामले जालसाज़ी, धोखाधड़ी और फ्रॉड के मामले थे. अगर प्रतिशत के तौर पर आंके तो पायेंगे कि देश के शहर अपराध के सभी मामलों के कुल 21.07 प्रतिशत की भागीदारी के लिए ज़िम्मेदार थे. साइबर अपराध के रिकॉर्ड को शहरों में दर्ज कुल 37.06 प्रतिशत मामलों के साथ सबसे ऊपर थे. इन शहरों में हो रहे साइबर अपराधों की संख्या में भारी वृद्धि देखी गई है. कुल 24,420 घटनाएं दर्ज की गईं थीं, जो कि 2021 के उपरांत आयी बढ़त का 42.7 प्रतिशत थी. भारत के अपराध निरोधक प्रणाली का संपूर्ण प्रदर्शन, उत्साहवर्धक नहीं था. जघन्य अपराधों के लिए दिए जाने वाली सज़ा का दर काफी कम था. हत्या के आरोपियों में ये 42.5 प्रतिशत, बलात्कार संबंधी अपराधियों को 17.9 प्रतिशत और अपहरण से जुड़े अपराध के लिए  ये  38.6 प्रतिशत थी.  

आर्थिक अपराधों के संदर्भ में, 19 महानगरीय शहरों में कुल 40,760 मामले दर्ज किए गए हैं. 2021 की तुलना में, इसमें सीधे-सीधे 15.8 प्रतिशत की उछाल थी.

जयपुर, इंदौर, कोच्चि, पटना, मुंबई, सूरत, अहमदाबाद, बेंगलुरू, कानपुर, गाज़ियाबाद, नागपुर और लखनऊ ने अपने-अपने राज्यों के औसत अपराध दर को भी पार कर लिया है. कोलकाता, चेन्नई, कोयंबटूर, पुणे, हैदराबाद और कोझिकोड आदि कुछ अपवाद हैं, जहां अपराध का दर राज्य के औसत से भी कम है. जो थ्योरी आमतौर पर मान ली गई है कि अपराध की घटनाएं घनी आबादी वाली जगहों पर ज़्यादा होती हैं, वो बात 12 विभिन्न शहरों में अपराध के मामलों से साफ होता है. लेकिन जैसा कि उपर कहा गया है, छह शहर ऐसे भी हैं जो ऊपर कही गई बात को गलत साबित करते हैं. ना ही ऐसा कोई सिद्धांत है कि बड़े शहरों में छोटे शहरों की तुलना में बड़े अपराध ज़्यादा होते है. कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद और पुणे देश के आठ बड़े शहरों में शामिल हैं. लेकिन उसके बावजूद इन शहरों में अपराध का दर, पटना, जयपुर, और इंदौर जैसे छोटे शहरों की तुलना में कम दर्ज हुए हैं.  

जहां एनसीआरबी के आँकड़े, सबसे व्यापक और भरोसेमंद संग्रह है, इसके बावजूद उसमें कुछ डेटा संबंधी कमियां हैं. सबसे पहले तो, नागरिक सभी अपराधों की सूचना नहीं देते हैं. उसके बाद, कुछ मामलों में दोष पुलिस अधिकारियों पर जाता है जिसेअपराध का भंडाफोड़ भी कहा जाता है, ये एक ऐसी शब्दावली है जिसके तहत पुलिस वाले इस बात के लिये बदनाम हैं कि, वे एफआईआर (FIR) दर्ज करने के बजाय, स्थानीय पुलिस बल द्वारा अपराध वाली जगह में अपराध की स्थिति के विषय में, जो घटना घटी है उसके विपरीत एक बेहतर तस्वीर पेश करने की छूट दे दी जाती है. तीसरी, एनसीआरबी  प्रमुख अपराध नियम का अभ्यास करती है. इसका मतलब ये है कि अगर किसी एक एफआईआर में एक से अधिक अपराध जैसे बलात्कार एवं हत्या का ज़िक्र है, तो उस अपराध को जघन्यतम अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा यानी बलात्कार को गौण कर सिर्फ़ हत्या की बात की जायेगी. ये तीन ऐसे कारण हैं जिसकी वजह से अपराध की रिपोर्टिंग में कमी आयी है.  

 

आगे की राह 

 

जो दूसरी महत्वपूर्ण कमी है वो है देश के भीतर के सभी शहरी क्षेत्रों से मिलने वाले सटीक आंकड़ों का न होना. हालांकि, शुरुआत यहां से किया जा सकता है कि देश में जो 69 पुलिस कमिश्नरेट हैं, जिनकी पिछले कुछ साल में शहरी इलाकों में स्थापना की गई है, वहां से आंकड़े इकट्ठा कर एक डेटा तैयार करना आसान होगा. इसी तरह से, डेटा संग्रह को चरणबद्ध तरीके सेक्लास शहरों एवं अन्य छोटे-छोटे शहरों तक बढ़ाया जा सकता है. देश में बढ़ते शहरीकरण, निश्चित तौर पर इसकी मांग करेंगे.

 नए प्रकार के अपराध उभर कर सामने आ रहे हैं, और नित नए कानून बनाए जा रहे हैं, जिसके तहत अपराध नियंत्रण से संबंधित नये विभागों का निर्माण किया जा सके, ताकि डेटा को सही तरह से संग्रहित किया जा सके.

इसके अलावा, देश में अपराध की प्रकृति काफी जटिल होती जा रही है. नए प्रकार के अपराध उभर कर सामने रहे हैं, और नित नए कानून बनाए जा रहे हैं, जिसके तहत अपराध नियंत्रण से संबंधित नये विभागों का निर्माण किया जा सके, ताकि डेटा को सही तरह से संग्रहित किया जा सके. भारत को अपराध के कारणों का पता लगा पाने में अब भी काफी कमी का सामना करना पड़ रहा है. जैसे-जैसे देश  में शहरीकरण बढ़ेगा, वैसे-वैसे अपराध का स्वभाव एवं उसकी प्रकृति भी जटिल होती जाएगी. इसीलिए, डेटा संग्रह को समय-समय पर आगे बढ़ाना पड़ेगा एवं इसकी लगातार जांच की जानी चाहिए कि डेटा का संग्रह एवं उसका संयोजन किस गति से बढ़ रहा है. इस प्रकार की पहल से पुलिस प्रशासन एवं देश, शहरी भारत में अपराध के मोर्चे पर व्याप्त चुनौतियों का सामना कर पाने में सक्षम होंगे.  



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