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यह लेख इस सवाल से शुरू होता है कि अगर अमेरिका और चीन की टक्कर से दुनिया का शक्ति संतुलन बदल जाए तो भू-राजनीतिक नक्शा कैसा होगा? ऐसे में भारत के लिए सबसे जरूरी है कि वह हिंद महासागर में अपनी नौसैनिक ताकत और रणनीति को मजबूत बनाए.
अमेरिका के महान रणनीतिकार एंड्रयू मार्शल (जिन्होंने लगभग आधी सदी तक अमेरिका के सैन्य बलों के मुख्यालय पेंटागन में रक्षा मंत्री को रणनीतिक सलाह देने वाले ऑफिस ऑफ नेट असेसमेंट का संचालन किया) ज़ोर देकर कहते थे कि रणनीति बनाने के लिए पहले उस परिदृश्य के बारे में बताना ज़रूरी है जिससे निपटा जाना है. आज की चर्चा में जो भू-राजनीतिक परिदृश्य हावी है वो मौजूदा समय में दबदबा रखने वाले अमेरिका और दुनिया की अगुवाई करने की चाहत रखने वाले चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का संभावित परिणाम है. अगर वर्चस्व वाले देश को हटा दिया जाए तो यूरेशिया, अफ्रीका, हिंद महासागर और अटलांटिक महासागर के तट का भू-राजनीतिक परिदृश्य कैसा दिखाई देगा? इसका एक छोटा सा हिस्सा ये है कि आज 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की GDP अमेरिका (29 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर) और चीन (19 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर) को अलग करती है. आर्थिक पूर्वानुमान लगाने वाली ज़्यादातर बड़ी कंपनियों (जिनमें गोल्डमैन सैक्स, मैकिंज़ी एंड कपनी और प्राइस वॉटर हाउस कूपर्स शामिल हैं) का अनुमान है कि 2050 तक चीन की GDP अमेरिका से 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर ज़्यादा हो जाएगी और भारत की GDP अमेरिका से 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर कम होगी.
ये बात सही है कि GDP इस मुकाबले (जिसमें आम तौर पर आर्थिक, तकनीकी एवं शैक्षणिक क्षमताएं, सैन्य एवं अंतरिक्ष शक्ति, भू-राजनीतिक प्रभाव एवं वैश्विक सुशासन की भूमिका के साथ-साथ सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रेरक शामिल हैं) के अनगिनत फैक्टर का केवल एक सामान्य संकेत है. मौजूदा समय में इनमें से हर प्रतिस्पर्धा का परिणाम कांटे के मुकाबले का संकेत देता प्रतीत होता है. उदाहरण के लिए, चिप पर मज़बूत पकड़ के साथ AI, क्वांटम कंप्यूटिंग एवं अंतरिक्ष में अमेरिका आगे है. वहीं चीन इंजीनियरिंग, रिसर्च पेपर एवं उद्धरण (साइटेशन) के साथ-साथ रिसर्च (जिसे हाल ही में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ख़त्म कर दिया है) की फंडिंग में अमेरिका का मुकाबला करता दिखता है. भारत में हमारे लिए सेना, अंतरिक्ष और भू-राजनीतिक क्षेत्र (विशेष रूप से विश्व शासन पर नियंत्रण) सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर हैं.
“अमेरिका–चीन टक्कर के बाद शक्ति संतुलन कैसा बदलेगा—यही सवाल लेख की शुरुआत है.”
इन फैक्टर की पड़ताल करने के लिए ये जानना समझदारी होगी कि इन क्षेत्रों में जीत हासिल करने के लिए चीन क्या ज़रूरी मानता है. उदाहरण के लिए, चीन की रणनीति व्यापक है जिसे मोटे तौर पर ‘चाइनीज़ ड्रीम’ कहा जाता है. इसके तहत विभिन्न श्वेत पत्रों और पार्टी के पूर्ण अधिवेशनों में आर्थिक विकास, तकनीकी सर्वोच्चता, जीवन स्तर में सुधार, सामाजिक कल्याण और अंत में सैन्य कायाकल्प - जो हमें सबसे ज़्यादा प्रभावित करता है- के लिए अलग-अलग ढांचा बनाया जाता है. वैसे तो चीन अपने रक्षा बजट का अलग-अलग सेनाओं के हिसाब से बंटवारे के बारे में नहीं बताता है लेकिन इस लेखक के द्वारा किए गए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के एक अध्ययन से पता चलता है कि सैन्य साजो-सामान के कुल बजट में से PLA नौसेना को 70 प्रतिशत हिस्सा मिलता है.
“भारत के लिए—सेना, अंतरिक्ष और वैश्विक शासन सबसे अहम कारक.”
चीन की भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं में पूरी दुनिया के लिए उत्पादन करने वाला और प्रमुख व्यापारिक साझेदार बनना शामिल है. इसके तहत हिंद महासागर से होते हुए यूरोप और उसके आगे अफ्रीका, अटलांटिक के पार पनामा समेत दक्षिण एवं मध्य अमेरिका तक व्यापारिक प्रभाव क्षेत्र तैयार करने की योजना बनाई गई है. इस तरह हिंद महासागर में निर्मित जिन चार बंदरगाहों- चटगांव, सित्तवे, हंबनटोटा और ग्वादर- के बारे में हम जानते हैं, वो दुनिया के महासागरों में दबदबा बनाने की चीन की व्यापक योजना की केवल शुरुआत भर है. इसके बारे में नीचे बताया गया है.
चीन के मालिकाना हक वाले 129 बंदरगाह

Source: Council on Foreign Relations
स्पष्ट रूप से भारत को भी उसी तरह की एक व्यापक रणनीति के साथ जवाब देने की आवश्यकता है जो रक्षा मंत्रालय से सामने आ भी सकती है और नहीं भी. हालांकि नौसेना को विकसित करने में कम-से-कम 30 साल लगते हैं जबकि नौसेना की रणनीति तैयार करने वालों को तत्काल जवाब तैयार करना होगा. चीन ने ऐतिहासिक रूप से 100 साल की प्रतिस्पर्धा के हिसाब से सोचा है और भारत-चीन के संदर्भ में इसकी शुरुआत 80 के दशक से होती है जब चीन ने जान-बूझकर पाकिस्तान को परमाणु हथियारों से लैस किया. इस तरह पाकिस्तान पोखरण से 11 साल पहले 1987 में हवाई बम तैनात करने में सक्षम हो गया. भारत के प्रति गहरी दुश्मनी और एशिया में दबदबा रखने वाले चीन के प्रभुत्व का नतीजा भारत के लिए विशेष रूप से गंभीर है. सेना के हिसाब से ये मुकाबला (साफ तौर पर दुश्मनी नहीं) हिमालय के मोर्चे पर नहीं जीता जा सकेगा जहां की भौगोलिक स्थिति पूरी तरह भारत के ख़िलाफ़ है.
“नौसेना—सबसे आत्मनिर्भर और सर्वाधिक तकनीक-निर्भर सेना.”
चीन की बेचैनी- और उसकी एकमात्र असली कमज़ोरी- का फायदा भारत मुख्य रूप से हिंद महासागर में उठा सकता है. इसके लिए वो मलक्का स्ट्रेट की अनुकूल भौगोलिक स्थिति और दूरी का लाभ उठाते हुए पश्चिम की तरफ चीन के विस्तार को रोकने की धमकी दे सकता है. सभी सेनाओं में नौसेना सबसे आत्मनिर्भर है, हालांकि वो तकनीक का सबसे ज़्यादा उपयोग करती है. फिर हम अपने प्रभावशाली नौसैनिक वास्तुशिल्प के कौशल और अपने शिपयार्ड की इंजीनियरिंग क्षमता का उपयोग अगले 25 वर्षों में मज़बूत नौसेना बनाने के लिए कैसे कर सकते हैं? हमारी प्रतिक्रिया में सर्वश्रेष्ठ तकनीक के साथ एक-दूसरे से अच्छी तरह से जुड़ी हुई जीत की रणनीति का मेल होना चाहिए.
भविष्य के युद्ध पर तकनीक और नज़दीक के हवाई क्षेत्रों में वर्चस्व का सबसे निर्णायक नतीजा ये है कि सभी देश 10 सेंटीमीटर के निपटारे के प्रति उजागर और पारदर्शी हो गए हैं. इसलिए पाकिस्तान जैसा मध्यम आकार का देश मोटे तौर पर 5,000 लक्ष्य उत्पन्न करता है जिनकी तबाही उसे फिर से पाषाण युग में ले जाएगी. चीन संभावित रूप से 20,000 लक्ष्य उत्पन्न करता है. इसके साथ समुद्र आधारित जमीन पर हमला करने वाली क्रूज़ मिसाइल की निर्णायक क्षमता भी है जो नौसेनाओं को दुश्मन के बेड़ों पर हमला करने के अलावा उनकी ज़मीन पर भी हमला करने की ताकत प्रदान करती है.
“हिंद महासागर में प्रभुत्व हेतु भारत को 80,000 टन के 3 एयरक्राफ्ट करियर चाहिए.”
पिछले 30 वर्षों के दौरान दुनिया के इतिहास की दिशा अमेरिकी नौसेना के द्वारा 2,300 टॉमाहॉक मिसाइल दागे जाने से काफी प्रभावित हुई है. नौसेना की ताकत युद्धपोतों की संख्या से नहीं बल्कि उनके द्वारा जुटाए जा सकने वाले वर्टिकल लॉन्च साइलो (VLS) की संख्या से मापी जाती है जो अमेरिका के पास फिलहाल 9,900 और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) के पास 4,200 है. अगर हम टाइप 18 के 30 डेस्ट्रॉयर (जिन्हें मौजूदा समय में मझगांव में बनाया जा रहा है) बना लें और 24 SSN (अटैक पनडुब्बी) प्रोग्राम शुरू कर दें (जिनमें से प्रत्येक में 24 VLS हों) तो 2050 तक कम-से-कम 4,000 VLS (3,000+1,000) की संख्या तक पहुंचने की उम्मीद रख सकते हैं. टाइप 18 डेस्ट्रॉयर (एक मज़बूत प्लैटफॉर्म) में 144 VLS सेल हैं जिनमें से 100 को ज़मीन पर हमला करने वाली क्रूज़ मिसाइल के लिए रखा जा सकता है. चीन ने दक्षिण चीन सागर में सेकेंड आइलैंड चेन तक एक मज़बूत एंटी-एक्सेस/एरिया डिनायल (A2/AD) क्षमता भी विकसित कर ली है लेकिन SSN बेड़ा इसे भेद सकता है. हमारी SSN तैनाती से दक्षिण-पूर्व चीन के सघन आबादी वाले और बेहद औद्योगिक इलाकों को ख़तरा पैदा हो जाएगा.
अंत में, हिंद महासागर- जिसके ज़रिए चीन की लगभग 60 प्रतिशत ऊर्जा और 80 प्रतिशत विदेश व्यापार का आवागमन होता है- में दबदबे के लिए भारत को कम-से-कम 80,000 टन के तीन बड़े एयरक्राफ्ट करियर तैनात करने होंगे. इससे क्षोभमंडल तक पूरे महासागरीय युद्धक्षेत्र पर वर्चस्व स्थापित होगा. हमारी क्षमताओं को पारंपरिक निवारक के रूप में काम करना चाहिए और भारत को रणनीतिक स्वायत्तता की नीति का पालन करने में सक्षम बनाना चाहिए.
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