Expert Speak Raisina Debates
Published on Jan 07, 2026 Updated 3 Days ago

COP30 में जलवायु वार्ता का एजेंडा बदला- अनुकूलन और समानता आगे आईं, ब्रिक्स का प्रभाव बढ़ा लेकिन 1.5 डिग्री लक्ष्य और जीवाश्म ईंधन पर सहमति आज भी दूर है.

COP30 के बाद COP33: भारत की तैयारी

बेलेम में पार्टियों का 30वां सम्मेलन (COP30) ऐसे समय में हुआ, जब वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव दिख रहे हैं. पश्चिमी देशों का जलवायु नेतृत्व बिखरा हुआ नज़र आया, यूरोप अपनी महत्वाकांक्षाओं पर फिर से विचार करता दिखा और अमेरिका पूरी तरह सक्रिय भूमिका में नहीं था. ऐसे में वैश्विक जलवायु वार्ताओं का केंद्र धीरे-धीरे उभरती अर्थव्यवस्थाओं की ओर खिसकता दिखा. COP30 ने इसी बदलाव को दर्शाया-सम्मेलन में अनुकूलन (एडेप्टेशन) और सामाजिक समानता पर कुछ प्रगति हुई लेकिन उत्सर्जन घटाने (मिटिगेशन) के मोर्चे पर नतीजे कमजोर रहे. साथ ही यह भी साफ़ हुआ कि जलवायु शासन से जुड़ी संस्थाओं में गहरे संरचनात्मक सुधारों की ज़रूरत है. इस सम्मेलन की सबसे अहम विशेषता यह रही कि ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ के देशों ने एजेंडा और विमर्श को कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ प्रभावित किया.

COP30: सीमित उपलब्धियाँ और अधूरी चुनौतियाँ

COP30 के नतीजों में राजनीतिक इच्छाशक्ति भी दिखी और सीमाएं भी. ग्लोबल म्यूटिराओ समझौते के तहत विकसित देशों ने 2035 तक अनुकूलन वित्त को तीन गुना बढ़ाकर सालाना 40 अरब डॉलर से 120 अरब डॉलर करने का वादा किया. यह राशि जलवायु कार्रवाई के लिए सालाना 1.3 ट्रिलियन डॉलर जुटाने के बड़े लक्ष्य का हिस्सा है. हालांकि यह एक अहम कदम है लेकिन लंबी समयसीमा बताती है कि तात्कालिक ज़रूरतों को पूरा करने में अभी भी कमी है. अनुकूलन के वैश्विक लक्ष्य (GGA) के लिए 59 संकेतकों को अपनाया गया, जिससे खाद्य और जल सुरक्षा, बुनियादी ढांचे की मजबूती और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्राथमिकता मिली.

ग्लोबल म्यूटिराओ समझौते के तहत विकसित देशों ने 2035 तक अनुकूलन वित्त को तीन गुना बढ़ाकर सालाना 40 अरब डॉलर से 120 अरब डॉलर करने का वादा किया. यह राशि जलवायु कार्रवाई के लिए सालाना 1.3 ट्रिलियन डॉलर जुटाने के बड़े लक्ष्य का हिस्सा है.

हालांकि अनुकूलन फंडिंग में प्रगति हुई लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि पैसा अनुदान के रूप में आएगा या कर्ज़ के रूप में और इसे ज़मीन तक कैसे पहुँचाया जाएगा.

सम्मेलन में जस्ट ट्रांज़िशन मैकेनिज्म को भी मज़बूती दी गई. इसमें श्रमिक अधिकारों, आदिवासी समुदायों, महिलाओं, युवाओं और असंगठित क्षेत्र के कामगारों को शामिल करने पर ज़ोर दिया गया लेकिन इसके क्रियान्वयन, फंडिंग और समयसीमा से जुड़े कई सवाल अभी खुले हैं. उत्सर्जन घटाने के मामले में मौजूदा राष्ट्रीय लक्ष्य 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य से काफ़ी पीछे हैं. इसे सुधारने के लिए बेलेम मिशन टू 1.5 और ग्लोबल इम्प्लीमेंटेशन एक्सेलेरेटर की घोषणा हुई लेकिन इनका असर अमल पर निर्भर करेगा.

वन और प्रकृति संरक्षण पर भी ध्यान गया. 125 अरब डॉलर के ट्रॉपिकल फॉरेस्ट्स फॉरएवर फ़ैसिलिटी की शुरुआत हुई जो आदिवासी संरक्षण को प्राथमिकता देती है. हालांकि वनों की कटाई रोकने के लिए कोई बाध्यकारी रोडमैप तय नहीं हो पाया.

सम्मेलन की सबसे बड़ी कमी जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने पर ठोस सहमति का अभाव रहा. 80 से अधिक देशों के समर्थन के बावजूद बड़े तेल और गैस उत्पादक देशों के विरोध के कारण अंतिम दस्तावेज़ से यह भाषा हटा दी गई. इससे वैज्ञानिक समयसीमा और राजनीतिक सहमति के बीच का अंतर साफ़ दिखा.

ग्लोबल साउथ का बढ़ता जलवायु प्रभाव

COP30 की सबसे अहम उपलब्धि भू-राजनीतिक स्तर पर दिखी. जब पारंपरिक जलवायु शक्तियां बंटी हुई थीं, तब ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ के देशों ने एकजुट होकर मज़बूत भूमिका निभाई. ब्राज़ील ने अपनी अध्यक्षता को समानता, वन संरक्षण और जलवायु न्याय से जोड़ा. COP30 में ब्रिक्स देशों ने अलग–अलग लेकिन पूरक प्राथमिकताओं के साथ मज़बूत भूमिका निभाई. चीन ने तकनीक हस्तांतरण, नवीकरणीय ऊर्जा सहयोग और दक्षिण–दक्षिण साझेदारी पर ज़ोर दिया. दक्षिण अफ्रीका ने अफ्रीकी देशों की अनुकूलन ज़रूरतों और न्यायसंगत संक्रमण को प्रमुख मुद्दा बनाया. वहीं रूस ने विकासशील देशों के लिए रियायती वित्त बढ़ाने हेतु बहुपक्षीय विकास बैंकों में सुधार का समर्थन किया. इस बीच ब्रिक्स ने पहली बार संयुक्त जलवायु-वित्त सिफारिश पेश की, जिसे न्यू डेवलपमेंट बैंक ने ग्रीन बॉन्ड और स्थानीय मुद्रा ऋण के माध्यम से आगे बढ़ाया.

उभरती जलवायु व्यवस्था में भारत की भूमिका

COP30 में भारत की भूमिका सम्मेलन के प्रमुख मुद्दों के साथ काफ़ी हद तक मेल खाती दिखाई दी. भारत ने अनुकूलन को प्राथमिकता देने, न्यायसंगत ऊर्जा संक्रमण (जस्ट ट्रांज़िशन), तकनीकी सहयोग और जलवायु वित्त में सुधार जैसे विषयों पर लगातार ज़ोर दिया. ये वही क्षेत्र हैं जहाँ विकासशील देशों की ज़रूरतें सबसे अधिक हैं और जहाँ वैश्विक व्यवस्था में असमानताएँ सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं. ब्रिक्स देशों के समर्थन के साथ भारत की COP33 की मेज़बानी की दावेदारी भी इसी व्यापक रणनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाती है जिसमें भारत खुद को ग्लोबल साउथ की एक मज़बूत और भरोसेमंद आवाज़ के रूप में स्थापित करना चाहता है.

भारत यह दिखाने का प्रयास कर रहा है कि विकास और जलवायु कार्रवाई एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं.

भारत की स्थिति इसलिए भी अलग है क्योंकि वह दुनिया की लगभग 17 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता है जबकि ऐतिहासिक रूप से उसके हिस्से में वैश्विक उत्सर्जन का 4 प्रतिशत से भी कम आता है. इसके बावजूद भारत तेज़ आर्थिक विकास और बड़े पैमाने पर स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण, दोनों को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. सौर और नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार, ऊर्जा तक सार्वभौमिक पहुँच और जलवायु-सहिष्णु बुनियादी ढांचे पर निवेश इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं. इस संतुलन के ज़रिये भारत यह दिखाने का प्रयास कर रहा है कि विकास और जलवायु कार्रवाई एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं.

प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना, सौर ऊर्जा का विस्तार और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन में नेतृत्व जैसे प्रयास भारत की स्थिति को मज़बूत करते हैं. इस संदर्भ में COP33 की मेज़बानी की भारत की दावेदारी केवल राष्ट्रीय आकांक्षा नहीं बल्कि एक ऐसे बहुध्रुवीय और समावेशी जलवायु क्रम का संकेत है, जिसमें ग्लोबल साउथ की आवाज़ को केंद्रीय स्थान मिल रहा है.


सैंड्रा थाचिरिकल प्रथाप ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में रिसर्च असिस्टेंट हैं.

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.