COP30 में बच्चों का ज़िक्र हुआ लेकिन जलवायु संकट की जड़ों पर वार करने के लिए आवश्यक बाध्यकारी फैसले क्यों नदारद रहे. इस लेख के जरिए नतीजे की एक तस्वीर पेश की गई है कि सबसे कमज़ोर और संवेदनशील बच्चे आज भी किस तरह एक असुरक्षित भविष्य के सामने खड़े हैं.
30वां संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP30) जीवाश्म ईंधन के उपयोग और वनों की कटाई के मुद्दे का समाधान करने में नाकाम रहा. इसकी वजह से आर्थिक रूप से कमज़ोर और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील बच्चे असुरक्षित रह गए. वैसे तो COP30 के फैसलों में बच्चों का ध्यान रखा गया लेकिन जलवायु को प्रभावित करने वाले तत्वों पर बाध्यकारी उपायों की अनुपस्थिति सांकेतिक समावेशन और सार्थक संरक्षण के बीच अंतर को उजागर करती है. दुनिया भर की सरकारों ने जलवायु से जुड़े फैसलों में बच्चों को प्राथमिकता देने का एक महत्वपूर्ण मौका गंवा दिया.
लगभग एक अरब बच्चे (जो दुनिया भर के बच्चों का लगभग आधा है) ऐसे देशों में रहते हैं जिन्हें जलवायु परिवर्तन की वजह से ‘बेहद अधिक जोखिम’ वाली श्रेणी में रखा गया है. इसके कारण संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन (UNCRC) के तहत दायित्वों को पूरा करने की सरकारों की चुनौती बढ़ गई है. साथ ही 2030 के लिए सतत विकास लक्ष्यों (SDG) को हासिल करना भी मुश्किल हो गया है. ब्राज़ील, कोलंबिया और पेरू में 4,20,000 से अधिक बच्चे अमेज़न के सूखे से प्रभावित हुए हैं जिससे उनके अस्तित्व और विकास को ख़तरा है. पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में 5.10 करोड़ से ज़्यादा बच्चे जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य से जुड़े संकटों से लेकर विस्थापन और आर्थिक अस्थिरता का सामना कर रहे हैं.
COP30 के फैसलों में बच्चों का ध्यान रखा गया लेकिन जलवायु को प्रभावित करने वाले तत्वों पर बाध्यकारी उपायों की अनुपस्थिति सांकेतिक समावेशन और सार्थक संरक्षण के बीच अंतर को उजागर करती है. दुनिया भर की सरकारों ने जलवायु से जुड़े फैसलों में बच्चों को प्राथमिकता देने का एक महत्वपूर्ण मौका गंवा दिया.
2024 में जलवायु परिवर्तन से दक्षिण एशिया में 12.80 करोड़ बच्चों की स्कूली शिक्षा बाधित हुई. इनमें 5.48 करोड़ बच्चे केवल भारत के हैं जो यूनिसेफ के बाल जलवायु जोखिम सूचकांक में 163 देशों में 26वें पायदान पर है. इससे जलवायु से प्रेरित शिक्षा असमानता को तुरंत दूर करने की ज़रूरत का पता चलता है. कुल मिलाकर 24.20 करोड़ से ज़्यादा बच्चों की स्कूली शिक्षा लू, बाढ़ और तूफान जैसी जलवायु आपदाओं के कारण बाधित हुई. इससे उनके सीखने, बढ़ने और फलने-फूलने के अधिकारों पर स्थायी प्रभाव पड़ा जिसे रेखाचित्र 1 में दिखाया गया है. इसके साथ-साथ बच्चों पर केंद्रित क्षेत्रों जैसे कि पोषण के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहायता में भारी कटौती से करोड़ों बच्चे महत्वपूर्ण सहायता से वंचित रह गए. जलवायु परिवर्तन का सबसे ज़्यादा प्रभाव छोटे बच्चों और भावी पीढ़ियों पर पड़ता है. इसके दीर्घकालिक प्रभावों को कम करने के लिए तुरंत कदम उठाना आवश्यक है.
रेखाचित्र 1: 2024 में जलवायु परिवर्तन के कारण स्कूल में व्यवधानों की वजह से प्रभावित छात्रों का माहवार विवरण

स्रोत: UNICEF
बच्चे केवल पीड़ित नहीं हैं; जलवायु संकट का समाधान करने में भी वो सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं. सदस्य देशों को ये सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों की आवाज़ सुनी जाए, संसाधनों का आवंटन किया जाए और उनके भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक ढांचा स्थापित किया जाए. राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) और अन्य राष्ट्रीय एवं राज्यस्तरीय जलवायु योजनाओं के विकास में बच्चों को सुनना चाहिए, उनसे सलाह ली जानी चाहिए.
जलवायु परिवर्तन का सबसे ज़्यादा प्रभाव छोटे बच्चों और भावी पीढ़ियों पर पड़ता है. इसके दीर्घकालिक प्रभावों को कम करने के लिए तुरंत कदम उठाना आवश्यक है.
बच्चों और युवाओं के प्रति संवेदनशील होने के लिए हर देश में NDC को चार में से कम-से-कम तीन मानदंडों को पूरा करना होगा: (1) इसमें बच्चों और युवाओं का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए; (2) ये अधिकारों पर आधारित होना चाहिए जिसमें बच्चों और युवाओं को अधिकार धारक के रूप में मान्यता दी जाए; (3) ये समावेशी होना चाहिए जिसमें बच्चों और युवाओं को जलवायु उपाय के लिए एक महत्वपूर्ण हितधारक के रूप में मान्यता मिले; और (4) ये समग्र और बहुक्षेत्रीय होना चाहिए जिसमें बच्चों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रतिबद्धताओं के माध्यम से बच्चों और युवाओं के विशेष जोखिमों और असुरक्षाओं का समाधान किया जाना चाहिए.
यूनिसेफ के द्वारा NDC 2.0 की समीक्षा में पाया गया कि 38 प्रतिशत ने बाल स्वास्थ्य, 43 प्रतिशत ने शिक्षा, 30 प्रतिशत ने सामाजिक सुरक्षा, 39 प्रतिशत ने पानी और 15 प्रतिशत ने स्वच्छता का ज़िक्र किया. संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (UNFCCC) 2025 की NDC सिंथेसिस रिपोर्ट से पता चलता है कि 52 प्रतिशत सदस्य देश अब बच्चों और युवाओं पर जलवायु परिवर्तन के अत्यधिक प्रभाव को मान्यता देते हैं. वहीं 30 प्रतिशत देशों ने सामर्थ्य को मज़बूत बनाने के लिए विशेष उपायों का ज़िक्र किया है. ध्यान देने की बात है कि 88 प्रतिशत देशों ने संकेत दिया कि NDC के विकास में बच्चों और युवाओं पर विचार किया जा रहा है या विचार किया जाएगा. हालांकि इन प्रतिबद्धताओं पर गहराई से नज़र डालने की आवश्यकता है.
COP30 के अंत में 119 देशों ने नए NDC सौंपे लेकिन ये संकल्प 2035 तक ज़रूरी उत्सर्जन कटौती से काफी कम हैं. ग्लोबल वार्मिंग में 2.3-2.8°C वृद्धि का अनुमान है जो 1.5°C के पेरिस सम्मेलन के लक्ष्य से अधिक है. COP30 में 59 अनुकूलन संकेतकों पर सहमति बनी लेकिन बातचीत के अंतिम दिनों में इनमें से कई में बदलाव किए गए. अब दो साल की बेलेम-अदीस दृष्टिकोण प्रक्रिया के तहत इनमें और बदलाव होगा जो उनके अमल में आने पर सवाल खड़े करता है. COP30 ने अनुकूलन के लिए फंड तीन गुना करने की मांग की लेकिन उसके पास कोई ठोस योजना नहीं है. साथ ही फंड के वितरण में 2030 से 2035 तक की देरी हो रही है. विकासशील देशों के लिए हर साल 310-365 अरब अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता है जो मौजूदा फंडिंग के स्तर से 12-14 गुना है.
जलवायु और पर्यावरण संकट पहले से ही बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा के अधिकारों को कमज़ोर करते हैं, विशेष रूप से कम और मध्यम आय वाले देशों में. जैवविविधता ध्वस्त होने और प्रदूषण को जोड़ दें तो ये संकट विस्थापन, कुपोषण, बाल श्रम, बाल विवाह और बिगड़ते मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देते हैं. इसके बावजूद 2006 और 2023 के बीच प्रमुख बहुपक्षीय जलवायु फंड से प्राप्त राशि का केवल 2.4 प्रतिशत ही बच्चों से जुड़ी पहल पर खर्च किया गया. ये बहुत कम है.
COP30 पर अपने बयान में बाल अधिकार समिति ने इस बात पर ज़ोर दिया कि बच्चों के अधिकारों, कल्याण और गरिमा के लिए तुरंत, समन्वित, बाल अधिकार आधारित जलवायु उपायों की आवश्यकता है.
संयुक्त राष्ट्र की आम टिप्पणी संख्या 26 में जलवायु संकट समेत पर्यावरणीय गिरावट को “बच्चों के ख़िलाफ़ संरचनात्मक हिंसा का एक रूप” माना गया है और कहा गया है कि “इससे समुदायों एवं परिवारों का सामाजिक पतन हो सकता है.” UNFCCC के 198 सदस्य देश हैं जबकि UNCRC के 196 (ज़्यादातर देशों ने दोनों पर हस्ताक्षर किए हैं), ऐसे में अनिवार्य है कि ये देश इन परस्पर जुड़े दायित्वों का समाधान करें. बाल अधिकार और पर्यावरण पर कमेटी के नए समूह जलवायु दायित्व को बाल अधिकारों में एकीकृत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है.
अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की सलाह में इस बात की पुष्टि की गई है कि जलवायु परिवर्तन पर कदम उठाने में सदस्य देशों की नाकामी को मानवाधिकार दायित्वों का उल्लंघन माना जाना चाहिए. ये जलवायु और बाल अधिकार के ढांचे को जोड़ने की आवश्यकता को उजागर करता है. COP30 ने इस तालमेल को प्रदर्शित करने का एक अवसर प्रदान किया लेकिन इसके बावजूद कमियां बनी हुई हैं.
विकास सहायता में कमी के बीच बच्चों का भविष्य अधर में लटका हुआ है. 2024 में OECD के आंकड़ों के अनुसार आधिकारिक विकास सहायता 7.1 प्रतिशत घटकर 212.1 अरब अमेरिकी डॉलर रह गई. सबसे बड़े दानकर्ता अमेरिका ने 63.3 अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान किया जो 2023 की तुलना में 4.4 प्रतिशत कम है. अमेरिका ने स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा से जुड़ी पहल समेत बच्चों पर केंद्रित योजनाओं में 4 अरब अमेरिकी डॉलर की कटौती की.
COP30 पर अपने बयान में बाल अधिकार समिति ने इस बात पर ज़ोर दिया कि बच्चों के अधिकारों, कल्याण और गरिमा के लिए तुरंत, समन्वित, बाल अधिकार आधारित जलवायु उपायों की आवश्यकता है. बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना न केवल एक नैतिक अनिवार्यता है बल्कि हर किसी के लिए एक न्यायसंगत और रहने योग्य भविष्य में एक निवेश भी है.
मनीष ठाकरे जलवायु परिवर्तन से निपटने, लचीलेपन और समावेशी शहरी विकास में विशेषज्ञता रखने वाले सलाहकार हैं.
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Manish Thakre is a consultant specialising in Climate Action, Resilience, and Inclusive Urban Development. Executive MSc in Cities, London School of Economics and Political Science ...
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