यूएनएससी ने ईरान के खाड़ी देशों पर हमलों की निंदा करते हुए संघर्ष रोकने का प्रस्ताव पारित किया, जिसे व्यापक समर्थन मिला. समझिए अमेरिका, रूस और चीन के अलग-अलग रुख के बावजूद बनी यह सहमति एक कूटनीतिक संकेत है, न कि अंतिम समाधान. असल तस्वीर यह है कि पश्चिम एशिया में स्थिरता अभी भी आगे की बातचीत और शक्ति-संतुलन पर निर्भर है.
11 मार्च को, अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर हमले शुरू करने के लगभग दो सप्ताह बाद, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें खाड़ी देशों और जॉर्डन पर ईरान के हमलों की निंदा की गई और तुरंत संघर्ष रोकने की अपील की गई. इस प्रस्ताव में ईरान के अपने पड़ोसी देशों पर किए गए ‘गंभीर हमले‘ का स्पष्ट उल्लेख किया गया और मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को बंद करने की उसकी धमकी का विरोध किया गया. लगभग 135 सह-प्रायोजकों के साथ यूएनएससी प्रस्ताव 2817 - जिसमें अमेरिका या इज़राइल का कोई उल्लेख नहीं है, पारित किया गया, जिससे उन गतिरोधों को तोड़ने में सफलता मिली जो आमतौर पर अन्य संघर्षों में यूएनएससी में देखे जाते हैं. यह प्रस्ताव एक दुर्लभ उदाहरण है जब कई देशों ने मिलकर एक ही बात पर सहमति दिखाई. इस सहमति को बनाने में खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों की कूटनीति की बड़ी भूमिका रही. इन देशों ने अलग-अलग देशों से बात करके समर्थन जुटाया और प्रस्ताव को आगे बढ़ाने में मदद की. इसलिए यह सिर्फ किसी एक देश की जीत नहीं, बल्कि मिलकर किए गए प्रयासों का परिणाम माना जा रहा है. हालांकि इतिहास को देखें तो अक्सर ऐसा हुआ है कि जब बड़े सैन्य हस्तक्षेप हुए, तब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद कई मामलों में अमेरिका के रुख के करीब दिखाई दी. यानी परिषद के फैसलों पर अमेरिका का प्रभाव पहले से ही काफी मजबूत रहा है. इसलिए इस बार की व्यापक सहमति को थोड़ा अलग और खास माना जा रहा है.
यूएनएससी प्रस्ताव 2817 में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 का उल्लेख किया गया, जिसमें सशस्त्र हमलों के जवाब में व्यक्तिगत या सामूहिक आत्मरक्षा के अधिकार की पुष्टि की गई. प्रस्ताव में ईरान के इन कार्यों को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन और अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा के लिए खतरा बताया गया. प्रक्रिया के अनुसार, हमलों के बाद यूएनएससी में दो मसौदा प्रस्ताव पेश किए गए-एक बहरीन द्वारा GCC सदस्य देशों (कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात), जॉर्डन और कई सह-प्रायोजकों की ओर से तैयार किया गया; और दूसरा प्रस्ताव रूस द्वारा पेश किया गया.
यह प्रस्ताव एक दुर्लभ उदाहरण है जब कई देशों ने मिलकर एक ही बात पर सहमति दिखाई. इस सहमति को बनाने में खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों की कूटनीति की बड़ी भूमिका रही. इन देशों ने अलग-अलग देशों से बात करके समर्थन जुटाया और प्रस्ताव को आगे बढ़ाने में मदद की. इसलिए यह सिर्फ किसी एक देश की जीत नहीं, बल्कि मिलकर किए गए प्रयासों का परिणाम माना जा रहा है.
पारित किए गए प्रस्ताव में अमेरिका और इज़राइल की भूमिका का जिक्र नहीं किया गया, न ही संयुक्त सैन्य कार्रवाई के दौरान अयातुल्ला अली खामनेई की मौत का उल्लेख किया गया. फिर भी इस प्रस्ताव को बहुत बड़े स्तर पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला. लगभग 135 देशों ने इसका साथ दिया, जो संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में सबसे बड़े समर्थन में से एक माना जा रहा है. इतनी ज्यादा सहमति होने के कारण रूस और चीन के लिए वीटो का इस्तेमाल करना राजनीतिक रूप से मुश्किल हो गया. अगर वे वीटो करते, तो दुनिया में यह संदेश जाता कि वे व्यापक अंतरराष्ट्रीय राय के खिलाफ खड़े हैं. इसलिए दोनों देशों ने प्रस्ताव को रोकने के बजाय मतदान से दूरी बनाए रखी, जिससे प्रस्ताव आसानी से पारित हो गया और यूएनएससी में असामान्य सहमति देखने को मिली.
GCC द्वारा प्रायोजित प्रस्ताव अंततः 13 मतों के समर्थन से पारित हुआ - जिनमें बहरीन, कोलंबिया, डेनमार्क, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, ग्रीस, लातविया, लाइबेरिया, पाकिस्तान, पनामा, सोमालिया, अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस शामिल थे - जबकि चीन और रूस ने मतदान से परहेज (abstain) किया. वहीं रूस के मसौदा प्रस्ताव को चार समर्थन मत (चीन, पाकिस्तान, रूस और सोमालिया), दो विरोध मत (लातविया और अमेरिका) और नौ अनुपस्थित मतों के साथ अस्वीकार कर दिया गया.
ध्यान देने वाली बात यह है कि पारित प्रस्ताव में अमेरिका और इज़राइल की भूमिका या अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या का कोई जिक्र नहीं किया गया. फिर भी, इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय समर्थन के कारण रूस और चीन के लिए वीटो का इस्तेमाल करना राजनीतिक रूप से महंगा साबित हो सकता था. इसलिए दोनों स्थायी सदस्यों ने मतदान से दूरी बनाए रखी, जिससे प्रस्ताव पारित हो गया. हालांकि, दोनों देशों ने अपनी आपत्तियाँ दर्ज कराते हुए कहा कि अमेरिका और इज़राइल ने यूएनएससी की अनुमति के बिना सैन्य हमले किए और उन्हें तुरंत रोकना चाहिए, खाड़ी अरब देशों की संप्रभुता का पूरा सम्मान होना चाहिए, और यह प्रस्ताव संघर्ष के मूल कारणों और पूरे परिदृश्य को संतुलित रूप से नहीं दर्शाता.
संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 24 के तहत सुरक्षा परिषद को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन अनुच्छेद 2(7) में गैर-हस्तक्षेप का सिद्धांत अधिकांश देशों के लिए एक महत्वपूर्ण मानक रहा है. इसके बावजूद, कई बार ऐसा हुआ है जब यूएनएससी ने अपने प्रस्तावों के माध्यम से अमेरिका के नेतृत्व वाले सैन्य हस्तक्षेपों को राजनीतिक समर्थन दिया - भले ही हमेशा कानूनी अनुमति स्पष्ट रूप से न दी गई हो.
लगभग 135 देशों ने इसका साथ दिया, जो संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में सबसे बड़े समर्थन में से एक माना जा रहा है. इतनी ज्यादा सहमति होने के कारण रूस और चीन के लिए वीटो का इस्तेमाल करना राजनीतिक रूप से मुश्किल हो गया. अगर वे वीटो करते, तो दुनिया में यह संदेश जाता कि वे व्यापक अंतरराष्ट्रीय राय के खिलाफ खड़े हैं.
उदाहरण के लिए, शीत युद्ध के अंत के समय अमेरिका के गहन कूटनीतिक प्रयासों के कारण यूएनएससी प्रस्ताव 678 पारित किया गया, जिसने सदस्य देशों को कुवैत से इराकी सेना को बाहर निकालने के लिए ‘सभी आवश्यक उपाय’ अपनाने की अनुमति दी. इससे बाद में हुए खाड़ी युद्ध को प्रभावी रूप से मंजूरी मिल गई.
इसी तरह, 1999 में अमेरिका और नाटो ने कोसोवो में हस्तक्षेप किया, जिसमें बल प्रयोग के लिए पहले से यूएनएससी की अनुमति नहीं ली गई. 9/11 के बाद अमेरिका और यूएनएससी के संबंधों में एक नया मोड़ आया, जब आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और आत्मरक्षा के सिद्धांत को अधिक महत्व मिलने लगा. ‘ग्लोबल वॉर ऑन टेररिज्म’ के दौरान अमेरिका के नेतृत्व वाले प्रमुख सैन्य अभियानों में यूएनएससी ने युद्ध को सीधे अधिकृत तो नहीं किया, लेकिन आतंकवादी हमलों को अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए खतरा माना और आत्मरक्षा के अधिकार की पुष्टि की. इसी आधार पर अफगानिस्तान और इराक में सैन्य हस्तक्षेप को सही ठहराया गया और शुरुआती वर्षों में इसे ज्यादा विरोध का सामना नहीं करना पड़ा.
हालांकि, धीरे-धीरे आत्मरक्षा का तर्क हस्तक्षेप की नीति में बदलने लगा, खासकर लीबिया और सीरिया के मामलों में रक्षा करने की जिम्मेदारी (R2P) सिद्धांत के इस्तेमाल के साथ. एनएससी के भीतर स्थायी पाँच देशों (P5) के बीच बढ़ते मतभेद और वैश्विक दक्षिण के देशों की आपत्तियों ने इस हस्तक्षेपवादी R2P सिद्धांत के खिलाफ प्रतिक्रिया को जन्म दिया. उदाहरण के तौर पर, ब्राज़ील और भारत ने लीबिया में बल प्रयोग की अनुमति देने वाले यूएनएससी प्रस्ताव 1973 जैसे महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर मतदान से दूरी बनाई, यह कहते हुए कि जमीनी स्थिति की विश्वसनीय जानकारी की कमी है और नागरिकों की सुरक्षा के नाम पर बल प्रयोग एक विरोधाभास पैदा करता है. 9/11 के बाद संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के सर्वसम्मति से पारित होने का जो रुझान था, वह सीरिया के मामले में रुक गया. 2012 के बाद से रूस ने सीरिया संघर्ष से जुड़े कई प्रस्तावों को वीटो कर दिया.
सैन्य ठिकानों और ऊर्जा से जुड़ी महत्वपूर्ण जगहों पर लगातार हवाई हमले और जवाबी हमले हो रहे हैं. हाल ही में अमेरिका ने ईरान के खार्ग द्वीप पर सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, जबकि तेल से जुड़े स्थानों को नुकसान नहीं पहुँचाया गया. साथ ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के लगभग बंद होने की स्थिति भी बनी हुई है. इन हालातों में संघर्ष और बढ़ता दिख रहा है. कूटनीति के स्तर पर, भले ही अमेरिका संयुक्त राष्ट्र के मंचों से कुछ दूरी बना रहा हो और यूएनएससी में मतभेद हों, फिर भी इस प्रस्ताव को मिला बड़ा समर्थन कुछ नए संकेत देता है.
सैन्य टकराव काफी बढ़ चुका है और ईरान इसे अपने अस्तित्व का मुद्दा मान रहा है, इसलिए हालात शांत होना आखिरकार इस पर निर्भर करेगा कि सभी पक्ष बातचीत और समाधान का रास्ता अपनाने के लिए कितने तैयार होते हैं.
पहला, इस प्रस्ताव पर कई देशों का समर्थन यह बताता है कि खाड़ी देशों का समूह अब काफी मजबूत हो गया है. उनकी आर्थिक और कूटनीतिक ताकत पहले से ज्यादा बढ़ी है। यह सिर्फ अमेरिका की जीत नहीं, बल्कि इन देशों की आपसी एकता और प्रभाव को दिखाता है. पिछले कुछ सालों में GCC देशों ने कई झगड़ों और विवादों को सुलझाने में मदद की है. उदाहरण के तौर पर, कतर ने तालिबान से बातचीत कराने में भूमिका निभाई और सऊदी अरब ने सूडान की शांति वार्ता में हिस्सा लिया. इसी वजह से जब उन पर हमले हुए, तो कई देशों ने उनका समर्थन किया और यूएनएससी में उन्हें समर्थन मिला.
दूसरा, यह प्रस्ताव भले ही ज्यादा प्रतीकात्मक हो, लेकिन इससे यह साफ नहीं होता कि आगे रूस और चीन जैसे स्थायी सदस्य यूएनएससी में कैसी रणनीति अपनाएँगे. वोटिंग में शामिल न होने के बावजूद दोनों देशों ने परिषद में अमेरिका से मतभेद दिखाए. उन्होंने ईरान के कथित परमाणु हथियार कार्यक्रम को लेकर बनाई जा रही ज्यादा चिंता या ‘अतिशयोक्ति’ पर भी सवाल उठाए.
हालांकि यह प्रस्ताव मिलकर कार्रवाई करने और बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव को दिखाता है, फिर भी संघर्ष हल करने में यूएनएससी की क्षमता सीमित है. क्योंकि सैन्य टकराव काफी बढ़ चुका है और ईरान इसे अपने अस्तित्व का मुद्दा मान रहा है, इसलिए हालात शांत होना आखिरकार इस पर निर्भर करेगा कि सभी पक्ष बातचीत और समाधान का रास्ता अपनाने के लिए कितने तैयार होते हैं.
हीना मखीजा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं.
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Dr. Makhija is an Associate Fellow at ORF and specializes in the study of Multilateralism, International Organizations, Global Norms, India at UN, Multilateral Negotiations, and ...
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