अमेरिका का ध्यान अब पहले जितना इंडो-पैसिफिक पर केंद्रित नहीं दिख रहा है क्योंकि वह कई दूसरे मुद्दों में भी उलझा है. जानिए कैसे चीन इसे अपने लिए मौका मानकर इस क्षेत्र में अपना असर बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.
पिछले दो दशकों में एशिया के प्रति अमेरिका की नीति में धीरे-धीरे बदलाव आया है, कम से कम बयानबाज़ी के स्तर पर, जहां इस क्षेत्र के बढ़ते रणनीतिक महत्व को स्वीकार किया गया है. जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के कार्यकाल के बाद, जो मुख्यतः इराक और व्यापक मध्य पूर्व के संघर्षों से प्रभावित था, 2011 में ओबामा प्रशासन ने ‘पिवट टू एशिया‘ की घोषणा एक रणनीतिक पुनर्संतुलन के रूप में की. इस नीति ने एशिया को आर्थिक विकास और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्रीय क्षेत्र माना, जिसके लिए वाशिंगटन को अपनी कूटनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा भागीदारी को पुनः संतुलित करने की आवश्यकता थी.
इस पिवट का उद्देश्य अमेरिका का ध्यान मध्य पूर्व और यूरोप से हटाकर पूर्वी एशिया की ओर ले जाना था, जिसमें क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूत करने और चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य संबंधों को सुदृढ़ करने पर जोर दिया गया. आसियान जैसे क्षेत्रीय संस्थानों के साथ जुड़ाव, साथ ही जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया के साथ लंबे समय से चले आ रहे गठबंधनों को मजबूत करना, इस रणनीति के प्रमुख स्तंभ थे.
इस योजना का आर्थिक हिस्सा ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप (TPP) पर टिका था. अगर यह लागू हो जाता, तो एक बड़ा व्यापार समूह बन सकता था, इंडो-पैसिफिक में व्यापार के नियम तय हो सकते थे और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में मदद मिल सकती थी.
2011 में ओबामा प्रशासन ने ‘पिवट टू एशिया‘ की घोषणा एक रणनीतिक पुनर्संतुलन के रूप में की. इस नीति ने एशिया को आर्थिक विकास और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्रीय क्षेत्र माना, जिसके लिए वाशिंगटन को अपनी कूटनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा भागीदारी को पुनः संतुलित करने की आवश्यकता थी.
हालांकि, अमेरिका के इससे हटने के बाद टीपीपी सफल नहीं हो सका, और वाशिंगटन की बदलती प्राथमिकताओं-विशेष रूप से ट्रम्प प्रशासन के दौरान-ने यह सवाल उठाया कि क्या अमेरिका एशिया पर अपना रणनीतिक ध्यान बनाए रख सकता है. 2017 की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति ने चीन को एक ‘संशोधनवादी शक्ति‘ बताया, जो इंडो-पैसिफिक में अमेरिका को पीछे छोड़कर क्षेत्रीय व्यवस्था को बदलना चाहती है. ट्रम्प प्रशासन के दौरान आई बाधाओं के बावजूद, इस व्यापक रणनीतिक दृष्टिकोण ने क्वाड (Quadrilateral Security Dialogue) को पुनर्जीवित करने में भी योगदान दिया, जिसमें अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं. बाइडेन प्रशासन ने इस ढांचे को बनाए रखा है, फिलीपींस जैसे साझेदारों के साथ रक्षा सहयोग को बढ़ाया है और ताइवान की संभावित चीनी आक्रमण से रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया है.
ट्रम्प 2.0 के दौर में दोनों पार्टियों के बीच की सहमति में साफ टूट दिखाई देती है. 2025 की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (NSS) ‘मोनरो सिद्धांत’ के एक ‘ट्रम्प कोरोलरी‘ के माध्यम से पश्चिमी गोलार्ध के महत्व को बढ़ाती है, जबकि इंडो-पैसिफिक पर अपेक्षाकृत कम ध्यान देती है. इसमें चीन को एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है, लेकिन उसे ‘प्रणालीगत खतरे’ के बजाय एक समान स्तर के प्रतिस्पर्धी के रूप में प्रस्तुत किया गया है. ध्यान मुख्य रूप से वैचारिक टकराव के बजाय ‘पारस्परिक लाभ’ वाले आर्थिक संबंधों के पुनर्संतुलन पर केंद्रित है.
2026 की राष्ट्रीय रक्षा रणनीति (NDS) भी इसी दिशा को दर्शाती है. इसमें मातृभूमि की रक्षा और पश्चिमी गोलार्ध को शीर्ष प्राथमिकता दी गई है, जबकि इंडो-पैसिफिक में चीन को रोकना द्वितीयक उद्देश्य के रूप में रखा गया है. इसमें चीन को ‘दुनिया का दूसरा सबसे शक्तिशाली देश’ बताया गया है, और पहले की रणनीतियों की तरह उसकी दबावपूर्ण या शोषणकारी नीतियों का उल्लेख नहीं किया गया है. विशेष रूप से, इसमें ताइवान या अन्य संवेदनशील क्षेत्रों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है; इसके बजाय ‘फर्स्ट आइलैंड चेन’ के साथ मजबूत प्रतिरोध पर जोर दिया गया है, ताकि चीन क्षेत्रीय प्रभुत्व हासिल न कर सके. हालांकि, ताइवान का उल्लेख न होने से अमेरिकी प्रतिबद्धताओं की स्पष्टता पर सवाल उठे हैं.
बीजिंग के नजरिए से, ये दस्तावेज़ अमेरिका की संसाधन सीमाओं, घरेलू प्राथमिकताओं (जैसे आप्रवासन और आंतरिक सुरक्षा), और अत्यधिक विस्तार से पीछे हटने को दर्शाते हैं, न कि प्रतिस्पर्धा को पूरी तरह छोड़ने को. चीनी विश्लेषक 2025 की NSS को एक संक्रमणकालीन दस्तावेज़ मानते हैं, इसका मतलब है कि अब अमेरिका दुनिया के बजाय अपने देश के हित और आर्थिक सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान दे रहा है. वह बड़े वैश्विक वादों की जगह कम खर्च में अच्छे नतीजे चाहता है. चीन इसे अपनी धीमी और लगातार चलने वाली रणनीति के सही होने के रूप में देखता है, खासकर जब अमेरिका व्यस्त और थोड़ा अस्थिर दिख रहा है.
चीन को ‘दुनिया का दूसरा सबसे शक्तिशाली देश’ बताया गया है, और पहले की रणनीतियों की तरह उसकी दबावपूर्ण या शोषणकारी नीतियों का उल्लेख नहीं किया गया है. विशेष रूप से, इसमें ताइवान या अन्य संवेदनशील क्षेत्रों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है.
हाल की घटनाएं इस धारणा को और मजबूत करती हैं. रिपोर्टों के अनुसार, दक्षिण कोरिया में तैनात अमेरिकी THAAD मिसाइल रक्षा प्रणाली के कुछ हिस्सों को बढ़ते तनाव के बीच मध्य पूर्व में स्थानांतरित किया गया. यह कदम 2026 की शुरुआत में शुरू किए गए ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी‘ के समर्थन में उठाया गया, जिसका उद्देश्य ईरान की मिसाइल क्षमता और सैन्य नेटवर्क को कमजोर करना था. चाहे यह तैनाती कुछ समय के लिए ही क्यों न हो, लेकिन-जिसका सियोल ने विरोध किया-यह दिखाता है कि अमेरिका बिना लंबी रणनीति बनाए सिर्फ हालात संभाल रहा है. इससे लोगों का अमेरिका पर भरोसा कम हो सकता है. अमेरिका कहता है कि उसका पूरा ध्यान इंडो-पैसिफिक पर है, लेकिन पश्चिम एशिया के तनाव और 2026 तक चल रहे रूस–यूक्रेन युद्ध के कारण उसकी क्षमता बंटी हुई लगती है.
बीजिंग मानता है कि ट्रंप का बहुपक्षवाद पर कम भरोसा-जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकलना और सहयोगियों पर दबाव डालना-अमेरिका को और अनिश्चित बनाता है. अब सहयोगी देशों से ज्यादा जिम्मेदारी उठाने को कहा जा रहा है. 2025 की एनएसएस और 2026 की एनडीएस में खासकर इंडो-पैसिफिक और कोरियाई क्षेत्र के देशों से बड़ी भूमिका निभाने की बात कही गई है, ताकि अमेरिका दूसरी जगहों पर ध्यान दे सके. लेकिन यह लेन-देन वाला तरीका रिश्तों में तनाव ला सकता है और यह भी दिखाता है कि अमेरिका अपनी भूमिका थोड़ी कम कर रहा है.
बीजिंग मानता है कि ट्रंप का बहुपक्षीय संस्थाओं पर कम भरोसा-जैसे उनसे बाहर निकलना और सहयोगियों पर दबाव डालना-अमेरिका को अनिश्चित दिखाता है. साथ ही, सहयोगियों से ज्यादा जिम्मेदारी लेने को कहा जा रहा है, जिससे रिश्तों पर दबाव बढ़ सकता है और यह दिखता है कि अमेरिका अपनी भूमिका कुछ कम कर रहा है. चीन के लिए यह स्थिति अवसर पैदा करती है. जब अमेरिका अन्य संघर्षों या घरेलू मुद्दों में उलझा दिखता है, तो क्षेत्रीय देश चीन के साथ अधिक जुड़ाव की ओर झुकते हैं. अमेरिकी प्रतिबद्धता में कमी की धारणा से देश अपने विकल्पों में विविधता लाते हैं, जिससे चीन खुद को एक अधिक स्थिर आर्थिक और कूटनीतिक साझेदार के रूप में प्रस्तुत कर पाता है.
चीन की रणनीति कई स्तरों पर आगे बढ़ सकती है-
चीन बीआरआई, आरसीईपी और दूसरे व्यापार समझौतों के जरिए देशों से अपने आर्थिक रिश्ते मजबूत कर रहा है और खुद को सहयोग करने वाला देश दिखाता है, जबकि अमेरिका ज्यादा अपने फायदे पर ध्यान देता हुआ नजर आता है. साथ ही, चीन दक्षिण चीन सागर और ताइवान जैसे इलाकों में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है और कमजोर या तटस्थ देशों से संबंध मजबूत कर रहा है. वहीं, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत जैसे देश अपनी ताकत बढ़ा रहे हैं और क्वाड जैसे समूहों में साथ काम कर रहे हैं, लेकिन दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ देश आर्थिक और कूटनीतिक रूप से चीन के करीब जा सकते हैं.
संतुलन बनाए रखने के लिए अमेरिका को अपनी विश्वसनीयता मजबूत करनी होगी-जैसे लगातार सुरक्षा देना, छोटे-छोटे समूहों में सहयोग बढ़ाना और अपनी रणनीति साफ रखना. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो अमेरिका का यह रणनीतिक भटकाव धीरे-धीरे खुद ही मजबूत होता जाएगा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के पक्ष में संतुलन बदल सकता है.
हालांकि, चीनी रणनीतिकार सतर्क बने हुए हैं. वे इस बदलाव को अमेरिकी प्रभुत्व के अंत के बजाय उसे अधिक टिकाऊ बनाने का प्रयास मानते हैं. प्रतिस्पर्धा जारी है, लेकिन चीन ऐसी कार्रवाई से बचता है जो टकराव को बढ़ा सकती है. इंडो-पैसिफिक, जो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग आधा हिस्सा समेटे हुए है, 21वीं सदी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बना हुआ है. बीजिंग का मानना है कि अमेरिका का ध्यान एशिया से हटकर पश्चिमी गोलार्ध और मध्य पूर्व की ओर जाना, चीन के प्रभाव को बढ़ाने के अवसर पैदा कर रहा है.
बीजिंग के नजरिए से, ट्रम्प 2.0 के तहत अमेरिका का जो रणनीतिक संकुचन दिख रहा है-जैसे 2025 की एनएसएस में पश्चिमी गोलार्ध पर ज्यादा ध्यान, 2026 की एनडीएस में चीन को तटस्थ तरीके से देखना और ताइवान का उल्लेख न होना, ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के दौरान THAAD की तैनाती में बदलाव, और सहयोगियों के साथ अधिक लेन-देन वाला रवैया-ये सब प्रतिस्पर्धा कम होने के बजाय नए अवसर का संकेत देते हैं. चीन इस स्थिति का फायदा उठाकर खुद को एक भरोसेमंद और सहयोगी देश के रूप में दिखा रहा है, जबकि अमेरिका थोड़ा अस्थिर नजर आ रहा है. चीन अपनी रणनीति को तेज करते हुए BRI और RCEP के जरिए आर्थिक संबंध बढ़ा रहा है, साथ ही सीमित सैन्य गतिविधियां और दूसरे देशों से रिश्ते मजबूत कर रहा है.
हालांकि, फर्स्ट आइलैंड चेन में अमेरिका की मजबूत मौजूदगी और दोनों देशों के बीच आर्थिक प्रतिस्पर्धा के कारण चीन का पूरा दबदबा बनाना आसान नहीं है. फिर भी, अगर लोगों को लगे कि अमेरिका का ध्यान भटक रहा है, तो इससे चीन का असर बढ़ सकता है. इसलिए, संतुलन बनाए रखने के लिए अमेरिका को अपनी विश्वसनीयता मजबूत करनी होगी-जैसे लगातार सुरक्षा देना, छोटे-छोटे समूहों में सहयोग बढ़ाना और अपनी रणनीति साफ रखना. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो अमेरिका का यह रणनीतिक भटकाव धीरे-धीरे खुद ही मजबूत होता जाएगा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के पक्ष में संतुलन बदल सकता है.
डॉ. श्रीपर्णा पाठक ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में चीन अध्ययन की प्रोफेसर और पूर्वोत्तर एशियाई अध्ययन केंद्र की संस्थापक निदेशक हैं.
उपमन्यु बसु मानव रचना अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान एवं अध्ययन संस्थान में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर हैं.
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Upamanyu Basu is an Assistant Professor of Politics and International Relations at the Manav Rachna International Institute of Research and Studies. He is currently pursuing ...
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