वाणिज्यवाद और औद्योगीकरण के दौर में पूंजीवाद ऐसा था कि कुछ देश बहुत आगे निकल गए जबकि बाकी पीछे रह गए. ऐसे समझिए कि किसी खेल में कुछ लोगों को ज़्यादा मौके मिलें तो ये बराबरी नहीं हुई. अब ज़रूरत है जागरूक पूंजीवाद की. इस लेख से समझिए कि इससे सबका भला कैसे संभव है.
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मानव सभ्यता के विकास से यह स्पष्ट होता है कि पूंजीवाद, वैश्विक शांति और सतत विकास के बीच एक विशेष संबंध रहा है. वाणिज्यवाद (Mercantilism) से लेकर वित्तीय पूंजीवाद (Financial Capitalism) तक-जो वैश्वीकरण और उदारीकरण से प्रभावित रहा-पूंजीवाद के रूपों में हुए बदलावों के साथ हिंसा, शांति और स्थिरता के पैटर्न में भी परिवर्तन देखने को मिले हैं.
वाणिज्यवाद का समय गुलामी, उपनिवेशवाद और दमन से भरा हुआ था. उस दौर में पश्चिमी देशों ने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों के संसाधनों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया और वहाँ अपने नियम व संस्कृति भी थोप दी. इससे ग्लोबल नॉर्थ के देशों को विकास, शांति और आधुनिकता का लाभ मिला, लेकिन दुनिया के बाकी हिस्सों को इसका बराबर फायदा नहीं मिला. इसके बाद औद्योगीकरण का दौर आया, जिसमें कोयला, तेल और बाद में गैस की खोज तेज़ हो गई. इन संसाधनों की तलाश और उपयोग ने कई बार ग्लोबल साउथ के देशों की शांति, पर्यावरण और स्थिर विकास को प्रभावित किया और उनके हितों को पीछे धकेल दिया. जैसे-जैसे पूंजीवाद के प्रतिमान बदले, बाजार दक्षता की परिभाषाएँ, वित्त की अस्थिर प्रकृति, और कुछ लोगों के लाभ के लिए अधिकतम मुनाफा और संपत्ति अर्जित करने की प्रवृत्ति बढ़ती गई, जिससे वैश्विक शांति और स्थिरता का संतुलन और अधिक अस्थिर हुआ. कई लोग यह भी कहते हैं कि फ्रांसिस बेकन के प्रारंभिक तर्कवाद ने मानव समाज में लालच को तर्कसंगत ठहराने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया, जिसने अंततः पूंजीवाद और वैश्विक हिंसा के इतिहास को जन्म दिया.
ग्लोबल नॉर्थ के देशों को विकास, शांति और आधुनिकता का लाभ मिला, लेकिन दुनिया के बाकी हिस्सों को इसका बराबर फायदा नहीं मिला. इसके बाद औद्योगीकरण का दौर आया, जिसमें कोयला, तेल और बाद में गैस की खोज तेज़ हो गई. इन संसाधनों की तलाश और उपयोग ने कई बार ग्लोबल साउथ के देशों की शांति, पर्यावरण और स्थिर विकास को प्रभावित किया और उनके हितों को पीछे धकेल दिया.
वॉल स्ट्रीट के नेतृत्व में नए वित्तीय उपकरणों, तकनीक और डिजिटल प्लेटफार्मों के कारण बाज़ार की प्रतिस्पर्धा और अधिक जटिल व तीव्र हो गई है. मार्क्सवादी काल से लेकर द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक, और उसके बाद अमेरिकी प्रभाव वाले नए वैश्विक दौर तक, पूंजीवाद के विकास को ऊर्जा, संस्कृति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के स्वरूप के साथ जोड़ा जा सकता है, जो मानव युद्धों, शांति आंदोलनों और स्थिरता की दिशा तय करते हैं.
वॉल स्ट्रीट के नेतृत्व में उभरी बाज़ार की आक्रामक प्रतिस्पर्धा, नए वित्तीय उपकरणों और तकनीकी ढाँचों से समर्थित और डिजिटल प्लेटफार्मों द्वारा तेज़ हुई, ने बाजार व्यवस्था को और जटिल बना दिया है. नई आर्थिक संरचनाओं में, वॉल स्ट्रीट के नाज़ुक पतन के कारण कई परिवार कुछ ही क्षणों में बेघर हो गए. जहाँ अनेक परिवार गंभीर असुरक्षा में धकेल दिए गए, वहीं बड़ी कंपनियों को उस देश की सरकार ने बचा लिया जिसे पूंजीवाद का केंद्र माना जाता है. इस प्रकार आज दुनिया अपनी ही बहु-संकट (polycrisis) की स्थिति में, एक नाज़ुक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, घटते बहुपक्षवाद और बढ़ते क्षेत्रीय सहयोग की आवश्यकता के बीच, एक नई विकास व्यवस्था स्थापित करने की तलाश में है.
ऐसी नई विकास व्यवस्था का केंद्रबिंदु सजग पूंजीवाद होना चाहिए, जहां धन अर्जित करना कोई अपराध या वर्जित कार्य न माना जाए, लेकिन यह अंत्योदय के न्यायपूर्ण और नैतिक सिद्धांतों पर आधारित हो, ताकि समाज के हर व्यक्ति को इसका लाभ मिल सके. भारत, जो अपनी राजनीतिक और सभ्यतागत परंपरा में सर्वोदय के मूल सिद्धांतों को मानता है, ऐसे सजग पूंजीवाद का अग्रदूत बन सकता है, जहाँ धन का सृजन, अधिकतमकरण और वितरण समग्र, अहिंसक विकास और सामाजिक समानता के सिद्धांतों पर आधारित हो.
यदि AI को लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए, जमीनी स्तर पर ऊर्जा बदलाव और जलवायु कार्रवाई में लगाया जाए, तो इसका बड़ा लाभ मिल सकता है. अगर इन बदलावों को सही दिशा में आगे बढ़ाया जाए, तो दुनिया में शांति और स्थिरता बढ़ सकती है.
भारत जिस सजग पूंजीवाद की बात करता है, वह सबके भले, सत्य, अहिंसा, त्याग और आर्थिक समानता पर आधारित है, ताकि समाज अधिक न्यायपूर्ण बन सके. आज भारत की पहलें-जैसे आत्मनिर्भर भारत, विकसित भारत, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और नेट ज़ीरो 2070-इसी सोच को आगे बढ़ाती हैं. इनका लक्ष्य विकास के साथ शांति और स्थिरता लाना है. आज दुनिया ऐसे मोड़ पर है जहाँ विकास करते समय अंत्योदय और सर्वोदय की सोच के साथ सभी लोगों के हित और समानता को ध्यान में रखना जरूरी है.
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नवीकरणीय ऊर्जा परिवर्तन और जलवायु संकट के इस नए युग में, जहाँ जोखिम, चुनौतियाँ और अवसर अलग-अलग स्तरों पर मौजूद हैं, सजग पूंजीवाद अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाएगा. मानव सभ्यता एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहाँ हमें इन सभी परिवर्तनों को स्वीकार करना होगा, लेकिन अंत्योदय और सर्वोदय के नैतिक दृष्टिकोण के साथ.
भारत दुनिया को यह दिखा सकता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग ऊर्जा और जलवायु संकट को कम करने में कैसे किया जा सकता है. यदि AI को लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए, जमीनी स्तर पर ऊर्जा बदलाव और जलवायु कार्रवाई में लगाया जाए, तो इसका बड़ा लाभ मिल सकता है. अगर इन बदलावों को सही दिशा में आगे बढ़ाया जाए, तो दुनिया में शांति और स्थिरता बढ़ सकती है. हालांकि, कुछ लोगों को यह भी चिंता है कि भविष्य में AI मानव संबंधों और वैश्विक व्यवस्था को बदल सकता है.
आनंदजीत गोस्वामी, वरिष्ठ शोध अध्येता, शोध प्रमुख, अशोका सेंटर फॉर पीपल सेंट्रिक एनर्जी ट्रांजिशन; निदेशक, मानव रचना सेंटर फॉर पीस एंड सस्टेनेबिलिटी.
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Anandajit Goswami, Senior Research Fellow, Research Lead, Ashoka Centre For People Centric Energy Transition; Director, Manav Rachna Centre For Peace and Sustainability ...
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