भारत अपने ही कोयले से गैस बनाकर विदेशों पर निर्भरता कम करना चाहता है ताकि स्टील और उद्योगों को सस्ता ईंधन मिल सके लेकिन मुश्किल यह है कि यह तरीका राहत के साथ प्रदूषण की नई चिंता भी बढ़ा सकता है. जानिए भारत के लिए यह तकनीक कितना फायदे का सौदा बन सकती है.
पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव की वजह से दुनिया में ऊर्जा संकट और बढ़ गया है. इससे ज्यादातर देशों की ऊर्जा और कच्चे माल को लेकर चिंता बढ़ी है. भारत में अब कोयले से गैस बनाने की तकनीक को कच्चे माल की सुरक्षा के लिए अहम माना जा रहा है. इसकी वजह देश में मौजूद करीब 400 अरब टन कोयला है. अप्रैल 2026 में कोयला मंत्रालय ने जिन कंपनियों के साथ कोयला खदानों के समझौते किए, उनमें पहली बार इस तकनीक को बढ़ावा देने वाले नियम जोड़े गए.
कोयले से गैस बनाने की इस प्रक्रिया में बहुत ज्यादा गर्मी और दबाव में कोयले को बदला जाता है. बाद में इसी गैस से साफ ईंधन, खाद और यूरिया, मेथनॉल व अमोनिया जैसे केमिकल बनाए जाते हैं. माना जा रहा है कि इससे विदेशों से आने वाले सामान पर निर्भरता कम होगी और हर साल 60 हजार करोड़ से 90 हजार करोड़ रुपये तक बच सकते हैं.कोयले से गैस बनाने की तकनीक को स्टील इंडस्ट्री के लिए अहम माना जा रहा है, लेकिन इसे लेकर पर्यावरण की चिंता भी बनी हुई है. जानकारों का कहना है कि यह तरीका सीधे कोयला जलाने से थोड़ा बेहतर जरूर है, लेकिन स्टील उत्पादन में कार्बन उत्सर्जन अब भी काफी ज्यादा रहता है.
भारत के कोयले में राख बहुत ज्यादा होती है. इसलिए दुनिया में इस्तेमाल होने वाली कई मशीनें और तरीके यहां ठीक से काम नहीं करते और काफी महंगे पड़ते हैं. इन दिक्कतों को देखते हुए सरकार ने 2024 में 8,500 करोड़ रुपये की योजना शुरू की थी.
यह तकनीक अब स्टील इंडस्ट्री में भी इस्तेमाल होने लगी है. इसकी वजह है कि इससे बाहर से आने वाले कोकिंग कोयले और प्राकृतिक गैस की जरूरत कुछ कम हो सकती है. दूसरी तरफ स्टील इंडस्ट्री देश के कुल प्रदूषण का करीब 12 फीसदी हिस्सा पैदा करती है. इसलिए इस सेक्टर में प्रदूषण कम करना जरूरी हो गया है. हालांकि सीधे कोयला जलाने के मुकाबले इसे थोड़ा बेहतर तरीका माना जाता है, लेकिन स्टील बनाने के लिए यह अब भी सबसे ज्यादा कार्बन छोड़ने वाले तरीकों में शामिल है.
भारत ने 2020 में कोयले से गैस बनाने का मिशन शुरू किया था. इसका लक्ष्य 2030 तक 10 करोड़ टन कोयले से गैस बनाना है. इसके तहत सभी कोयला कंपनियों से कहा गया है कि वे अपने कुल उत्पादन का कम से कम 10 फीसदी हिस्सा इस काम में इस्तेमाल करें. इसके लिए इस्तेमाल होने वाले कोयले पर सरकार 50 फीसदी तक छूट भी दे रही है.कोयले से गैस बनाने की परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए सरकार लगातार बड़ी आर्थिक मदद दे रही है. 2024 के बाद अब 2026 में भी हजारों करोड़ रुपये की नई योजना लाई गई है, ताकि सरकारी और निजी कंपनियां इस तकनीक में निवेश बढ़ा सकें.
भारत के कोयले में राख बहुत ज्यादा होती है. इसलिए दुनिया में इस्तेमाल होने वाली कई मशीनें और तरीके यहां ठीक से काम नहीं करते और काफी महंगे पड़ते हैं. इन दिक्कतों को देखते हुए सरकार ने 2024 में 8,500 करोड़ रुपये की योजना शुरू की थी. इसके बाद मई 2026 में 37,500 करोड़ रुपये की एक और योजना लाई गई. इसमें हर परियोजना को 5,000 करोड़ रुपये तक की मदद देने का प्रावधान है.
भारत का स्टील बाजार दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रहा है. अनुमान है कि 2026 में इसकी मांग 7.4 फीसदी और 2027 में 9.2 फीसदी तक बढ़ सकती है. भारत में स्टील बनाने का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला तरीका वही है, जिसमें पहले लौह अयस्क से ऑक्सीजन हटाई जाती है और फिर उससे स्टील बनाया जाता है. देश के करीब 45 फीसदी स्टील का उत्पादन इसी तरीके से होता है. आने वाले समय में इसका हिस्सा और बढ़ सकता है, क्योंकि ज्यादातर नई परियोजनाएं इसी तरीके से लग रही हैं.
सरकार ने यह भी तय किया है कि आयातित कोकिंग कोयले में 10 से 12 फीसदी घरेलू कोयला मिलाया जाए. 2026 में इसे अहम खनिज की सूची में भी शामिल किया गया, ताकि कारोबार आसान हो और खोज का काम तेज हो सके.
इस तरीके में कोकिंग कोयला बहुत जरूरी होता है. इसे कोक में बदला जाता है, जो भट्ठी में ईंधन का काम करता है. भारत अपनी करीब 90 फीसदी जरूरत ऑस्ट्रेलिया से आयात करके पूरी करता है. इससे भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमतों और सप्लाई रुकने के खतरे से जुड़ी रहती हैं. जनवरी 2026 में ऑस्ट्रेलिया में भारी बारिश और बाढ़ के बाद कोकिंग कोयले की कीमतें 17 महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गईं. मार्च 2026 में पश्चिम एशिया तनाव की वजह से कीमतें फिर बढ़ गईं.
सरकार ने 2022 में मिशन कोकिंग कोल भी शुरू किया. इसका लक्ष्य 2030 तक घरेलू कोकिंग कोयले का उत्पादन 14 करोड़ टन तक पहुंचाना है. सरकार ने यह भी तय किया है कि आयातित कोकिंग कोयले में 10 से 12 फीसदी घरेलू कोयला मिलाया जाए. 2026 में इसे अहम खनिज की सूची में भी शामिल किया गया, ताकि कारोबार आसान हो और खोज का काम तेज हो सके.ऑस्ट्रेलिया में खराब मौसम और पश्चिम एशिया तनाव की वजह से कोकिंग कोयले और गैस की कीमतों में आई तेजी ने भारत की चिंता बढ़ा दी है. इसी वजह से सरकार घरेलू कोयला उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए नई योजनाओं पर जोर दे रही है.
स्टील बनाने में गैस का भी इस्तेमाल होता है, खासकर डीआरआई बनाने में. हालांकि भारत में डीआरआई का करीब 80 फीसदी उत्पादन अब भी कोयले पर आधारित है, लेकिन जेएसडब्ल्यू स्टील और आर्सेलर मित्तल निप्पॉन स्टील इंडिया जैसी बड़ी कंपनियां गैस वाला तरीका इस्तेमाल करती हैं. इससे कच्चे माल की सुरक्षा का खतरा पैदा होता है, क्योंकि भारत दुनिया में तरलीकृत प्राकृतिक गैस का तीसरा सबसे बड़ा आयातक है. देश की कुल गैस सप्लाई का करीब आधा हिस्सा आयात से आता है. युद्ध की वजह से गैस बाजार में आई रुकावटों का असर भारतीय स्टील कंपनियों पर भी पड़ा. कई कंपनियों को उत्पादन घटाना पड़ा.
कोयले से गैस बनाने की तकनीक इन दिक्कतों को कुछ हद तक कम कर सकती है. इससे घरेलू कोयले से गैस बनाई जा सकती है, जो कोकिंग कोयले और प्राकृतिक गैस की जगह कुछ काम कर सकती है. जिंदल स्टील अपने अंगुल प्लांट में घरेलू कोयले से बनी गैस का इस्तेमाल डीआरआई बनाने में कर रही है. कंपनी ने हाल में ब्लास्ट फर्नेस में भी इसका इस्तेमाल शुरू किया है और दूसरे कामों में भी इसे बढ़ा रही है. महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में ऐसी परियोजनाएं तैयार की जा रही हैं.
भारत के स्टील सेक्टर से प्रति टन स्टील पर 2.55 टन कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है. यह दुनिया के औसत से करीब 30 फीसदी ज्यादा है. इससे साफ है कि 2070 तक शून्य उत्सर्जन लक्ष्य पाने के लिए भारत को कम प्रदूषण वाले तरीके अपनाने होंगे.
कोयले से गैस बनाने की तकनीक को अक्सर ऊर्जा बदलाव का हिस्सा बताया जाता है. लेकिन कई रिपोर्टों का कहना है कि घरेलू कोयले से बनी गैस आयातित कोकिंग कोयले से सस्ती जरूर हो सकती है, लेकिन इससे निकलने वाला कार्बन प्राकृतिक गैस और सीधे कोयला जलाने से ज्यादा होता है. भारत के स्टील प्रदूषण कम करने के रोडमैप के मुताबिक इस तरीके में प्रति टन स्टील 2.50 से 2.90 टन कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है. यह पुराने तरीके से भी ज्यादा है.
भारत हरित हाइड्रोजन और कबाड़ स्टील के इस्तेमाल को भी बढ़ावा दे रहा है. हरित हाइड्रोजन बनाने की लागत 2023 के करीब 5 डॉलर प्रति किलो से घटकर लगभग 3 डॉलर प्रति किलो हो गई है. राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन की योजनाओं के तहत जिंदल हाइजेन को 17,490 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं.
भारत के कुछ स्टील प्लांट कार्बन पकड़ने और जमा करने वाली तकनीक इस्तेमाल कर रहे हैं. जब इस तकनीक में ऑक्सीजन का इस्तेमाल होता है, तो कार्बन डाइऑक्साइड को पकड़ना आसान और थोड़ा सस्ता हो जाता है. सरकार अब ऐसी तकनीकों को बढ़ावा दे रही है. 2026-27 के बजट में भारी उद्योगों, खासकर स्टील सेक्टर में, कार्बन पकड़ने वाली तकनीकों के लिए 20 हजार करोड़ रुपये दिए गए हैं. हालांकि इन तकनीकों को लेकर सवाल भी हैं. जानकारों का कहना है कि इनमें तकनीकी दिक्कतें, ज्यादा खर्च और पर्यावरण से जुड़े खतरे हैं. जिंदल स्टील एंड पावर के अंगुल प्लांट में कार्बन पकड़ने की तकनीक लगी होने के बावजूद बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड अब भी हवा में जा रही है.
भारत का स्टील सेक्टर दुनिया के मुकाबले काफी ज्यादा कार्बन छोड़ता है. ऐसे में 2070 तक शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने के लिए देश को कम प्रदूषण वाले तरीके अपनाने होंगे. लेकिन कोयले से गैस बनाने की तकनीक को लेकर बहस जारी है, क्योंकि कई रिपोर्टों के मुताबिक इससे भी भारी मात्रा में कार्बन निकलता है. भारत हरित हाइड्रोजन और कबाड़ स्टील के इस्तेमाल को भी बढ़ावा दे रहा है. हरित हाइड्रोजन बनाने की लागत 2023 के करीब 5 डॉलर प्रति किलो से घटकर लगभग 3 डॉलर प्रति किलो हो गई है. राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन की योजनाओं के तहत जिंदल हाइजेन को 17,490 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. दूसरी तरफ भारत में कबाड़ स्टील को दोबारा इस्तेमाल करने का ढांचा अब भी बिखरा हुआ है. करीब 70 फीसदी काम छोटे और असंगठित कारोबारियों के हाथ में है, जहां पुरानी तकनीक इस्तेमाल होती है. इसे सुधारने के लिए सरकार 2019 की नीति में बदलाव कर रही है.
वहीं कोयले से गैस बनाने की प्रक्रिया से दूसरी समस्याएं भी पैदा होती हैं. इससे निकलने वाला कचरा भारी धातुओं से भरा होता है और इसे सुरक्षित तरीके से फेंकना मुश्किल है. इस प्रक्रिया में पानी की बहुत जरूरत होती है और पानी गंदा होने का खतरा भी बढ़ता है. इसलिए कार्बन पकड़ने वाली तकनीक जोड़ने के बावजूद इसे पूरी तरह साफ तरीका नहीं माना जा सकता.
भारत का स्टील सेक्टर किसी एक तकनीक के सहारे नहीं बदलने वाला. कोयले से गैस बनाने की तकनीक प्रदूषण कम करने का पूरा समाधान नहीं है, लेकिन यह आयातित कोयले और प्राकृतिक गैस पर निर्भरता कम करके कच्चे माल की सुरक्षा मजबूत कर सकती है. इसलिए इसे अकेले समाधान नहीं, बल्कि उन कई उपायों में से एक माना जाना चाहिए, जिनसे भारत स्टील सेक्टर को मजबूत रखते हुए प्रदूषण कम करने की कोशिश कर रहा है.
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