भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है लेकिन शिक्षा सुधारों में उनकी भूमिका अब भी सीमित है. लेख से समझें कि क्यों भारत में शिक्षा व्यवस्था तभी प्रभावी बन सकती है, जब युवा केवल सीखने वाले नहीं बल्कि नीति से कक्षा तक उसके सह-निर्माता हों.
भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है. 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 37.1 करोड़ युवा देश की कुल जनसंख्या का करीब 27 प्रतिशत है. ऐसे में कहा जा सकता है कि किसी भी निर्णय में युवाओं को शामिल करना उसकी कामयाबी की संभावना बढ़ा सकता है. दरअसल, युवाओं की भागीदारी केवल प्रतीकात्मक नहीं है बल्कि यह एक ऐसा प्रशासनिक निर्णय है जो बेहतर जानकारी, प्रभावी क्रियान्वयन, प्रासंगिकता और संस्थानों पर विश्वास को बढ़ाता है- खासतौर पर भारत जैसे बड़े और जटिल शिक्षा तंत्र में.
भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 अपने उद्देश्य और दायरे में व्यापक और परिवर्तनकारी है. यह स्कूल और उच्च शिक्षा दोनों में बड़े सुधारों की बात करती है और शिक्षार्थी-केंद्रित शिक्षा पर ज़ोर देती है. इसका फोकस समग्र, खोज-आधारित और अनुभवात्मक सीख पर है. हालांकि, यह नीति युवाओं को शिक्षा नीति और प्रशासन के निर्माता के रूप में नहीं देखती. यानी, युवा सुधारों के सह-निर्माता नहीं माने गए हैं.
समग्र शिक्षा अभियान के तहत स्कूलों की शासन व्यवस्था में छात्र प्रतिनिधित्व का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है. इसी तरह, शिक्षा का अधिकार अधिनियम (2009) में स्कूल प्रबंधन समितियों (SMC) में माता-पिता और समुदाय के सदस्यों को शामिल किया गया है लेकिन छात्रों को निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनाया गया है.
व्यवहार में, छात्रों की भागीदारी अक्सर अनौपचारिक रहती है-जैसे छात्र क्लब चलाना, प्रार्थना सभा का प्रबंधन या सुझाव पेटी के माध्यम से प्रतिक्रिया देना-लेकिन कोई स्थायी और संस्थागत व्यवस्था नहीं है.
युवाओं की भागीदारी केवल प्रतीकात्मक नहीं है बल्कि यह एक ऐसा प्रशासनिक निर्णय है जो बेहतर जानकारी, प्रभावी क्रियान्वयन, प्रासंगिकता और संस्थानों पर विश्वास को बढ़ाता है- खासतौर पर भारत जैसे बड़े और जटिल शिक्षा तंत्र में.
इसके विपरीत, ड्राफ्ट राष्ट्रीय युवा नीति (जुलाई 2023) युवाओं की आवाज़ को नीति निर्माण में संस्थागत रूप से शामिल करने की बात करती है. इसमें सार्वजनिक मंचों, संरचित संवाद और युवा संसद जैसे उपाय शामिल हैं. यहाँ युवाओं को विकास के लाभार्थी नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदार माना गया है.
हालांकि, यह भागीदारी ज़्यादातर नागरिक नेतृत्व तक सीमित है और शिक्षा क्षेत्र में ठोस सह-निर्माण पर कम ध्यान देती है. विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रसंघ होते तो हैं, लेकिन उनका प्रभाव ज़्यादातर कैंपस सुविधाओं और छात्र कल्याण तक सीमित रहता है, न कि पाठ्यक्रम या ढांचागत फैसलों पर. इस प्रकार, भारत में शिक्षा सुधारों में युवाओं की भागीदारी अक्सर अस्थायी या परामर्श तक सीमित रहती है, न कि वास्तविक सह-निर्माण तक.
वैश्विक शोध और विभिन्न देशों के अनुभव यह स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि जब शिक्षा व्यवस्था में युवाओं की भागीदारी संरचित, निरंतर और वास्तविक होती है, तो इसका सकारात्मक प्रभाव केवल नीतियों पर ही नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा प्रणाली के प्रदर्शन पर पड़ता है. ऐसे वातावरण में युवा स्वयं को केवल शिक्षा के उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसके सक्रिय सहभागी के रूप में देखते हैं, जिससे उनका समग्र विकास भी होता है.
अध्ययनों से यह भी सामने आया है कि जब स्कूल और शैक्षणिक संस्थान छात्रों को अपनी बात रखने के लिए सार्थक और सुरक्षित मंच प्रदान करते हैं, तो उनमें आत्मविश्वास, अपनापन और जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है. छात्र यह महसूस करते हैं कि वे जिस प्रणाली का हिस्सा हैं, उस पर उनका भी प्रभाव है. इससे उनकी सीखने में रुचि बढ़ती है और वे पढ़ाई को केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक साझा प्रयास के रूप में देखने लगते हैं.
छात्रों की भागीदारी से शिक्षण संस्थानों में लिए जाने वाले रोज़मर्रा के फैसलों की गुणवत्ता भी बेहतर होती है. छात्र अपनी ज़मीनी समस्याओं, कक्षा के अनुभवों और सीखने की चुनौतियों पर सीधा फीडबैक दे सकते हैं, जिससे नीतियाँ और प्रक्रियाएँ अधिक व्यावहारिक और प्रभावी बनती हैं. परिणामस्वरूप, सीखने के नतीजे सुधरते हैं, स्कूलों में सहभागिता बढ़ती है और शिक्षा व्यवस्था अधिक उत्तरदायी, भरोसेमंद और सशक्त बनती है.
यह भागीदारी ज़्यादातर नागरिक नेतृत्व तक सीमित है और शिक्षा क्षेत्र में ठोस सह-निर्माण पर कम ध्यान देती है. विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रसंघ होते तो हैं, लेकिन उनका प्रभाव ज़्यादातर कैंपस सुविधाओं और छात्र कल्याण तक सीमित रहता है, न कि पाठ्यक्रम या ढांचागत फैसलों पर.
यूनेस्को ने स्कूलों में युवाओं की सार्थक भागीदारी पर दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनमें छात्र प्रतिनिधि परिषदों के उदाहरण दिए गए हैं. इन परिषदों में छात्र और शिक्षक मिलकर स्कूल की नीतियों और प्रक्रियाओं की समीक्षा करते हैं. इससे शिक्षा सुधार ज़्यादा प्रासंगिक और भरोसेमंद बनते हैं. स्कॉटलैंड इसका एक ठोस उदाहरण है, जहां बच्चों और युवाओं की भागीदारी के लिए एक मजबूत व्यवस्था विकसित की गई है. वहाँ की सरकारी रिपोर्ट बताती है कि जब भागीदारी को संसाधन, ढाँचा और निर्णय प्रक्रिया से जोड़ा जाता है, तो नीतियों और सेवाओं की गुणवत्ता बेहतर होती है.
हालांकि, यूनिसेफ इनोसेंटी की एक रिपोर्ट यह भी बताती है कि कई जगह युवाओं की भागीदारी केवल दिखावटी होती है. शिक्षा के क्षेत्र में भी अक्सर युवाओं को प्रतीकात्मक रूप से शामिल किया जाता है, लेकिन वे उन प्रणालियों को आकार देने से वंचित रहते हैं जिनसे वे रोज़ाना जुड़े होते हैं. सबूत साफ़ हैं: जब युवाओं की आवाज़ को संस्थागत, समावेशी और प्रभावी बनाया जाता है, तो शिक्षा सुधार ज़्यादा सफल, भरोसेमंद और लागू करने योग्य बनते हैं. यह केवल अधिकारों का मुद्दा नहीं, बल्कि प्रभावशीलता का सवाल है.
NEP 2020 को ज़मीनी स्तर पर लागू करते समय युवाओं को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि साझेदार माना जाना चाहिए. इसके लिए तीन व्यावहारिक कदम उठाए जा सकते हैं:
पहला, शिक्षा सुधारों के क्रियान्वयन ढांचे में युवाओं की भूमिका शुरू से शामिल की जाए. NEP के तहत बने स्कूल कॉम्प्लेक्स प्रबंधन समितियों (SCMC) में हाल के स्नातकों या छात्र प्रतिनिधियों के लिए कुछ सीटें आरक्षित की जा सकती हैं, ताकि वे शिक्षण गुणवत्ता और योजनाओं पर प्रतिक्रिया दे सकें.
यूनिसेफ इनोसेंटी की एक रिपोर्ट यह भी बताती है कि कई जगह युवाओं की भागीदारी केवल दिखावटी होती है. शिक्षा के क्षेत्र में भी अक्सर युवाओं को प्रतीकात्मक रूप से शामिल किया जाता है, लेकिन वे उन प्रणालियों को आकार देने से वंचित रहते हैं जिनसे वे रोज़ाना जुड़े होते हैं.
दूसरा, नए पाठ्यक्रम या मूल्यांकन सुधारों में युवाओं को सह-डिज़ाइन प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाए. कार्यशालाओं और डिज़ाइन चैलेंज के ज़रिये छात्र स्थानीय ज़रूरतों के अनुरूप समाधान सुझा सकते हैं. डिज़ाइन फॉर चेंज जैसे प्रयास इस दिशा में सीख देने वाले उदाहरण हैं.
तीसरा, भारत के डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कर बड़े स्तर पर और तुरंत युवा प्रतिक्रिया ली जा सकती है. जैसे, एक मोबाइल ऐप या युवा पोर्टल जहाँ छात्र मिड-डे मील, शिक्षक उपस्थिति या पढ़ाई की गुणवत्ता पर प्रतिक्रिया दे सकें. इससे नीति निर्माताओं को समय रहते समस्याओं का पता चल सकेगा.
अक्सर यह आशंका व्यक्त की जाती है कि शिक्षा व्यवस्था में युवाओं की भागीदारी से निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है या जवाबदेही अस्पष्ट हो सकती है. यह चिंता स्वाभाविक है, लेकिन उचित डिज़ाइन और संरचना के साथ इसे प्रभावी ढंग से संबोधित किया जा सकता है. युवाओं की भागीदारी तभी उपयोगी होगी जब उसे नए और अलग नौकरशाही ढाँचे बनाने के बजाय मौजूदा व्यवस्थाओं में ही जोड़ा जाए. इससे निर्णय प्रक्रिया पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा और प्रशासनिक गति बनी रहेगी.
भागीदारी को संतुलित और समावेशी बनाने के लिए प्रतिनिधि और घूर्णन (रोटेशन) प्रणाली अपनाना आवश्यक है, ताकि सीमित संख्या में छात्र एक निश्चित अवधि के लिए अपनी भूमिका निभा सकें और समय के साथ अधिक युवाओं को अवसर मिल सके. इसके साथ ही, युवाओं की भूमिका समयबद्ध और स्पष्ट होनी चाहिए, जिससे चर्चाएँ लंबी न खींचें और निर्णय लेने में देरी न हो.
यदि भारत शिक्षा के क्षेत्र में ‘शिक्षार्थी-केंद्रित’ दृष्टिकोण से आगे बढ़कर ‘सह-निर्मित’ मॉडल अपनाता है, तो इसका अर्थ होगा कि नीति निर्माण, क्रियान्वयन और मूल्यांकन-तीनों स्तरों पर युवाओं की भूमिका सुनिश्चित की जाए.
चर्चा को खुले और अनिश्चित मुद्दों के बजाय प्राथमिक और स्पष्ट सवालों तक सीमित रखना भी महत्वपूर्ण है, जैसे पाठ्यक्रम की प्रासंगिकता या स्कूल सेवाओं की गुणवत्ता. इससे युवाओं की राय सीधे नीति और क्रियान्वयन से जुड़ सकेगी.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि युवा निकायों की भूमिका सलाहकार और मूल्यांकनात्मक होनी चाहिए, न कि कार्यकारी. शिक्षा कार्यक्रमों को लागू करने की अंतिम जिम्मेदारी अधिकारियों, शिक्षकों और संस्थानों की ही रहेगी. इस तरह, युवाओं की भागीदारी जवाबदेही को कमजोर नहीं, बल्कि उसे और मज़बूत कर सकती है.
अंतरराष्ट्रीय शिक्षा दिवस 2026 भारत के लिए यह सोचने का एक महत्वपूर्ण अवसर है कि शिक्षा सुधारों में युवाओं की भूमिका क्या होनी चाहिए. अब तक युवाओं को शिक्षा व्यवस्था का केवल लाभार्थी माना गया है, लेकिन बदलते समय की मांग है कि उन्हें सक्रिय साझेदार के रूप में देखा जाए. भारत जैसे युवा देश में, जहां बड़ी आबादी शिक्षा प्रणाली से सीधे जुड़ी हुई है, सुधारों की सफलता युवाओं की वास्तविक भागीदारी पर काफी हद तक निर्भर करती है.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 एक व्यापक और दूरदर्शी सुधार एजेंडा है, जिसका उद्देश्य शिक्षा को अधिक समावेशी, कौशल-आधारित और भविष्य के अनुरूप बनाना है. हालाँकि, इतने बड़े स्तर पर बदलाव तभी सफल हो सकते हैं जब उनके क्रियान्वयन के दौरान मज़बूत और निरंतर फीडबैक तंत्र मौजूद हो. युवाओं की भागीदारी इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे शिक्षा व्यवस्था के प्रत्यक्ष उपयोगकर्ता हैं और जमीनी स्तर की वास्तविकताओं से भली-भांति परिचित होते हैं. उनकी प्रतिक्रिया नीतियों की कमियों को समय रहते उजागर कर सकती है और सुधारों को अधिक प्रभावी बना सकती है.
युवाओं को साझेदार बनाने से शिक्षा व्यवस्था में विश्वास भी मजबूत होता है. जब छात्र महसूस करते हैं कि उनकी बात सुनी जा रही है और उनके सुझावों का असर नीतियों और संस्थानों पर पड़ रहा है, तो वे सुधारों को अपनाने में अधिक सहयोगी बनते हैं. इससे न केवल क्रियान्वयन बेहतर होता है, बल्कि संस्थानों और छात्रों के बीच विश्वास का रिश्ता भी गहराता है.
यदि भारत शिक्षा के क्षेत्र में ‘शिक्षार्थी-केंद्रित’ दृष्टिकोण से आगे बढ़कर ‘सह-निर्मित’ मॉडल अपनाता है, तो इसका अर्थ होगा कि नीति निर्माण, क्रियान्वयन और मूल्यांकन-तीनों स्तरों पर युवाओं की भूमिका सुनिश्चित की जाए. ऐसा मॉडल शिक्षा को अधिक प्रासंगिक, लचीला और टिकाऊ बना सकता है. लंबे समय में, यह न केवल बेहतर शैक्षणिक परिणाम देगा, बल्कि एक जिम्मेदार, जागरूक और सहभागी युवा वर्ग को भी तैयार करेगा, जो देश के विकास में सक्रिय भूमिका निभा सकेगा.
अर्पण तुलस्यान ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में सीनियर फेलो हैं.
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Arpan Tulsyan is a Senior Fellow at ORF’s Centre for New Economic Diplomacy (CNED). With 16 years of experience in development research and policy advocacy, Arpan ...
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