जलवायु परिवर्तन अब भारत में केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि एक गहरा स्वास्थ्य संकट बन चुका है जो जान, आजीविका और विकास तीनों को प्रभावित कर रहा है. बढ़ती आपदाओं और बीमारियों के बीच यह लेख जांचता है कि इन जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए भारत की स्वास्थ्य प्रणाली कितनी सक्षम और तैयार है.
जलवायु परिवर्तन अब पूरी दुनिया में मानव स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है. लगभग 3.6 अरब लोग ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जो जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं जहाँ उन्हें स्वास्थ्य पर सीधे और परोक्ष दोनों तरह के प्रभाव झेलने पड़ते हैं. हीटवेव, तूफान और बाढ़ जैसी चरम मौसम घटनाएँ, साथ ही बढ़ता प्रदूषण, सीधे तौर पर बीमारियों और मौतों का कारण बन रहे हैं. इसके अलावा, खाद्य प्रणालियों में बाधा से पोषण प्रभावित होता है, जानवरों से फैलने वाली बीमारियां (ज़ूनोसिस) बढ़ती हैं और भोजन, पानी तथा मच्छरों से फैलने वाले रोगों का खतरा भी बढ़ता है. अच्छे स्वास्थ्य से जुड़े कई सामाजिक कारक भी कमजोर पड़ते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 2030 से 2050 के बीच जलवायु परिवर्तन के कारण हर साल लगभग 2.5 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं, और स्वास्थ्य को होने वाला सीधा नुकसान 2 से 4 अरब अमेरिकी डॉलर के बीच आंका गया है.
हालांकि इसके प्रभाव सभी पर पड़ेंगे लेकिन महिलाएं और बच्चे, अल्पसंख्यक, प्रवासी और विस्थापित लोग, बुज़ुर्ग, गरीब समुदाय और पहले से बीमार लोग इन जलवायु-संवेदनशील बीमारियों का सबसे अधिक बोझ उठाएँगे. इससे विकास, वैश्विक स्वास्थ्य, गरीबी घटाने, स्वास्थ्य असमानताओं को कम करने और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) हासिल करने में हुई दशकों की प्रगति खतरे में पड़ सकती है. WHO का कहना है कि जिन क्षेत्रों में स्वास्थ्य ढाँचा कमजोर है, वे जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले बढ़ते स्वास्थ्य संकटों से निपटने में सबसे कम सक्षम होंगे.
भारत में यह संकट पहले ही सामने आने लगा है. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के एक आकलन के अनुसार, 2025 के पहले नौ महीनों में चरम मौसम घटनाओं से होने वाली मौतों में पिछले चार वर्षों की तुलना में 48 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. 273 में से 270 दिनों में किसी न किसी तरह की चरम मौसम घटना दर्ज की गई-जैसे गर्मी और ठंड की लहरें, बिजली गिरना, तूफान, भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन-जिनमें 4,064 से अधिक लोगों की जान गई. राज्यों के बीच असर में भी बड़ा अंतर दिखा. हिमाचल प्रदेश सबसे अधिक प्रभावित रहा, जहाँ 217 दिन चरम मौसम रहा और 380 मौतें हुईं. इसके बाद केरल में 147 दिन चरम मौसम और 114 मौतें, जबकि मध्य प्रदेश में 144 दिनों में 532 मौतें दर्ज की गयी. एक अन्य अध्ययन के अनुसार, भारत में कुल मौतों में से लगभग 7.29 प्रतिशत तापमान से जुड़ी हैं-जिसमें ठंड से 6.8 प्रतिशत और गर्मी से 0.5 प्रतिशत मौतें हुईं. पिछले दो दशकों में आपदाओं की संख्या भी तेजी से बढ़ी है.
WHO का कहना है कि जिन क्षेत्रों में स्वास्थ्य ढाँचा कमजोर है, वे जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले बढ़ते स्वास्थ्य संकटों से निपटने में सबसे कम सक्षम होंगे.
इसके अलावा, 2024 में जनसंख्या के हिसाब से औसत PM2.5 प्रदूषण के मामले में भारत दुनिया में पाँचवें स्थान पर रहा. मध्य और दक्षिण एशिया के 15 सबसे प्रदूषित शहरों में से 10 भारत में हैं. राजधानी दिल्ली में ही 2023 में कुल मौतों में से 15 प्रतिशत (17,188 मौतें) वायु प्रदूषण के कारण हुईं जो 2018 की तुलना में 8.9 प्रतिशत अधिक है. येल विश्वविद्यालय के 2024 पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक के अनुसार, 180 देशों में स्वच्छता और पीने के पानी के मामले में भारत 143वें स्थान पर है. नीति आयोग की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, सुरक्षित पानी की कमी के कारण हर साल लगभग 2 लाख मौतें होती हैं और अनुमान है कि 2030 तक करीब 60 करोड़ लोग-यानी भारत की अनुमानित आबादी का लगभग 40 प्रतिशत-जल संकट का सामना कर सकते हैं.
अप्रत्यक्ष प्रभावों की बात करें तो, द लैंसेट के अनुसार भारत में एडीज़ एल्बोपिक्टस मच्छर से डेंगू फैलने की क्षमता लगभग दोगुनी हो गई है. यह 1951–1960 में 0.86 थी जो 2015–2024 में बढ़कर 1.60 हो गई. इससे पता चलता है कि पर्यावरणीय हालात अब लंबे समय तक बीमारी फैलने के लिए अनुकूल हो गए हैं. 2024 तक भारत के तटीय क्षेत्रों में भी ऐसे हालात 46 प्रतिशत बढ़ गए जो विब्रियो जैसे जलजनित संक्रमणों (हैजा जैसी बीमारियाँ) के लिए अनुकूल हैं. यह गर्म होते समुद्रों के कारण तटीय इलाकों में बीमारियों के बढ़ते खतरे का संकेत है.
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने जलवायु परिवर्तन के मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं. वर्ष 2019 में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन एवं मानव स्वास्थ्य कार्यक्रम (NPCCHH) की शुरुआत की. इसका उद्देश्य स्वास्थ्य प्रणाली की क्षमता बढ़ाना और जलवायु बदलाव से पैदा होने वाले स्वास्थ्य प्रभावों से निपटने के लिए तैयारी और प्रतिक्रिया को मजबूत करना है. इसके तहत 2023 में राष्ट्रीय दिशानिर्देशों के आधार पर राज्य जलवायु परिवर्तन एवं मानव स्वास्थ्य कार्ययोजनाएँ (SAPCCHH) तैयार की गयी. इन योजनाओं में संवेदनशील जिलों की पहचान की गई और गर्मी, वायु प्रदूषण, मच्छर जनित रोगों तथा चरम मौसम घटनाओं के लिए स्वास्थ्य अनुकूलन योजनाएँ बनाने की जिम्मेदारी राज्यों को दी गई. राज्यों से यह भी अपेक्षा की गई कि वे प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करें, स्वास्थ्य प्रणाली की तैयारी बढ़ाएँ और हरित व जलवायु-सहनीय स्वास्थ्य ढांचा विकसित करें. इसके अलावा, वेब-आधारित इंटीग्रेटेड हेल्थ इंफॉर्मेशन प्लेटफॉर्म (IHIP) के जरिए निगरानी की जाती है जहां राज्य और केंद्र शासित प्रदेश मच्छर जनित रोगों और गर्मी से होने वाली मौतों की रिपोर्ट करते हैं.
भारत में यह संकट पहले ही सामने आने लगा है. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के एक आकलन के अनुसार, 2025 के पहले नौ महीनों में चरम मौसम घटनाओं से होने वाली मौतों में पिछले चार वर्षों की तुलना में 48 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई.
NPCCHH की स्थापना सही दिशा में एक कदम है लेकिन यह अभी शुरुआती चरण में है. जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने के लिए स्वास्थ्य प्रणाली की क्षमता तेजी से बढ़ाने की जरूरत है.
हालाँकि इसके प्रभाव और क्रियान्वयन पर सीमित अध्ययन उपलब्ध हैं, लेकिन 2025 में हिमाचल प्रदेश, असम, गुजरात और केरल में SAPCCHH पर किए गए एक विश्लेषण से पता चला कि प्राथमिकताएँ तय करने में अपनाया गया ऊपर-से-नीचे (टॉप-डाउन) तरीका स्थानीय परिस्थितियों को पूरी तरह नहीं समझ पाया. उदाहरण के लिए, केरल में समुद्र स्तर बढ़ने के स्वास्थ्य प्रभावों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया जबकि हिमाचल प्रदेश में जलविद्युत क्षमता पर चर्चा तो हुई लेकिन इसके स्वास्थ्य और पर्यावरणीय असर की जांच नहीं की गई. इसके अलावा, भले ही राज्य स्तर की संस्थाओं में विभागों का प्रतिनिधित्व हो लेकिन ज़िला और ब्लॉक स्तर के अधिकारियों-जो असल में योजनाओं को लागू करते हैं-के साथ समन्वय और संवाद कमजोर है. वहीं, 2020 से 2025 के बीच NPCCHH के लिए केवल 249.5 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया, जो काफी कम है.
स्वास्थ्य अनुकूलन में अभी निवेश करने से न केवल जानें बचेंगी बल्कि लंबे समय में आर्थिक उत्पादकता भी सुरक्षित रहेगी. स्वास्थ्य अनुकूलन को भारत की जलवायु रणनीति का एक मुख्य हिस्सा बनाना जरूरी है. मौजूदा रोग निगरानी प्रणालियों को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा परिभाषित सभी चरम मौसम घटनाओं को इसमें शामिल किया जा सके जो अभी पूरी तरह नहीं हो पा रहा है. संवेदनशील आबादी, समुदायों और क्षेत्रों की पहचान कर उन्हें प्राथमिकता देनी होगी ताकि जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले सबसे गंभीर प्रभावों को कम किया जा सके. प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ विकसित करनी होंगी और स्वास्थ्य कर्मियों को मौसम के अनुसार बढ़ने वाले रोग मामलों से निपटने के लिए प्रशिक्षित करना होगा. सभी स्तरों पर स्वास्थ्य केंद्रों को बढ़ते स्वास्थ्य बोझ से निपटने के लिए पर्याप्त संसाधनों से लैस करना आवश्यक है. साथ ही, दवाओं और आवश्यक चिकित्सा सामग्री की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए आपूर्ति श्रृंखला को भी जलवायु-सहनीय बनाना होगा.
प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ विकसित करनी होंगी और स्वास्थ्य कर्मियों को मौसम के अनुसार बढ़ने वाले रोग मामलों से निपटने के लिए प्रशिक्षित करना होगा. सभी स्तरों पर स्वास्थ्य केंद्रों को बढ़ते स्वास्थ्य बोझ से निपटने के लिए पर्याप्त संसाधनों से लैस करना आवश्यक है.
इसके अलावा, स्वास्थ्य अनुकूलन योजनाओं को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बनाना होगा ताकि क्षेत्र-विशिष्ट जलवायु और स्वास्थ्य जोखिमों को सही ढंग से संबोधित किया जा सके. इसके लिए ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर के अधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय और संवाद आवश्यक है. संस्थागत फीडबैक व्यवस्था जरूरी है ताकि ज़मीनी स्तर पर मिले अनुभव और राज्यों की विशेष कमजोरियाँ राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को तय करने में मदद कर सकें. इससे व्यापक ढाँचे लचीले रहेंगे और भारत के विभिन्न राज्यों में जलवायु जोखिम, बीमारियों की प्रकृति, स्वास्थ्य क्षमता और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के अंतर को समायोजित किया जा सकेगा. फिलहाल NPCCHH के लिए सार्वजनिक वित्तपोषण बहुत कम है इसलिए जलवायु-सहनीय स्वास्थ्य प्रणाली विकसित करने के लिए इसे उच्च प्राथमिकता देना आवश्यक है.
जैसे-जैसे जलवायु जोखिम बढ़ते जाएंगे, भारत की स्वास्थ्य प्रणाली की मजबूती ही देश की कुल अनुकूलन क्षमता को तय करेगी इसलिए जलवायु नियोजन में स्वास्थ्य को केंद्र में रखना केवल एक स्वास्थ्य नीति का सवाल नहीं बल्कि जीवन, अर्थव्यवस्था और मानव विकास को सुरक्षित रखने की बुनियादी जरूरत है.
निमिषा चड्ढा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में रिसर्च असिस्टेंट हैं.
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Nimisha Chadha is a Research Assistant with ORF’s Centre for New Economic Diplomacy. She was previously an Associate at PATH (2023) and has a MSc ...
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