Author : Anika Chhillar

Published on Mar 16, 2026 Updated 1 Days ago

जलवायु से लड़ने के लिए देश नए-नए नियम बना रहे हैं, लेकिन यही नियम अब व्यापार में नई रुकावटें भी खड़ी कर रहे हैं. पढ़िए कैसे इन नियमों से बढ़ रहा है वैश्विक तनाव और क्यों WTO में सुधार की मांग तेज़ हो रही है.

जलवायु नीतियां: WTO के सामने नई चुनौती

इस साल वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) की सालाना बैठक में इस बात को लेकर सर्वसम्मति थी कि दुनिया वैश्विक व्यापार में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष होने से बहुत दूर है. दुनिया भर की सरकारें घरेलू लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए व्यापारिक उपायों का उपयोग कर रही हैं. ये ऐसी घटना है जिसे इस साल दावोस में ‘इंटेलिजेंट टकराव’ के रूप में परिभाषित किया गया है. इसका मतलब उन नीतिगत विकल्पों से है जो सरकारें मानकों और रेगुलेशन के माध्यम से चुनती हैं ताकि बाज़ार तक पहुंच को रोकते हुए वैध लक्ष्यों के साथ मुक्त व्यापार को संतुलित किया जा सके. 

जलवायु से जुड़े गैर-टैरिफ उपाय (NTM) इन इंटेलिजेंट टकरावों के एक महत्वपूर्ण प्रेरक रहे हैं. सरकारें जलवायु उद्देश्यों को व्यापार नीति में शामिल कर रही हैं. सबसे उल्लेखनीय बात ये है कि इस साल लागू यूरोपियन यूनियन (EU) का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मेकेनिज़्म (CBAM) किसी शिपमेंट के कार्बन फुटप्रिंट से जुड़ी घोषणाओं और प्रमाणपत्रों के ज़रिए निर्यातकों पर अनुपालन की कड़ी आवश्यकताओं को लागू करता है. इसी तरह की नीतियां विकसित अर्थव्यवस्थाओं में फैल रही हैं जिनका वैश्विक व्यापार पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ रहा है. 

ये ऐसी घटना है जिसे इस साल दावोस में ‘इंटेलिजेंट टकराव’ के रूप में परिभाषित किया गया है. इसका मतलब उन नीतिगत विकल्पों से है जो सरकारें मानकों और रेगुलेशन के माध्यम से चुनती हैं ताकि बाज़ार तक पहुंच को रोकते हुए वैध लक्ष्यों के साथ मुक्त व्यापार को संतुलित किया जा सके. 

वैसे तो ये टकराव सरकारों को नीतिगत स्वतंत्रता प्रदान करते हैं लेकिन ये छोटी अर्थव्यवस्थाओं के लिए लागत बढ़ाते हैं और मौजूदा तनाव को और तेज़ करते हैं. इनसे प्रतिद्वंद्वी रेगुलेटरी गुटों के बनने का भी ख़तरा है जो छोटी अर्थव्यवस्थाओं को एक पक्ष चुनने के लिए मजबूर करते हैं क्योंकि बड़ी ताकतें दूसरे देशों में अपने मानकों को बढ़ावा देना शुरू करती हैं. इस ख़तरे से निपटने के लिए WTO को अपने अगले मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में विश्वसनीय सुधार लाने की आवश्यकता है. 

शून्य उत्सर्जन की तरफ बदलाव में नई व्यापारिक बाधाएं  

2025 में वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा अलग-अलग प्रकार के टैरिफ की शुरुआत था. भले ही कई देश अनुकूल द्विपक्षीय समझौते करने का प्रयास कर रहे हों लेकिन घरेलू लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए व्यापार नीति का उपयोग समाप्त होने वाला नहीं है. NTM में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई है और 2020 से 18,000 नए भेदभावपूर्ण उपायों की शुरुआत की गई है (रेखाचित्र 1). 

रेखाचित्र 1: व्यापार से जुड़े नीतिगत उपायों की संख्या 

Climate Driven Trade Frictions And Future Of The Wto

स्रोत: UNCTAD 

टैरिफ जहां सरल होते हैं और उन पर बातचीत की जा सकती है, वहीं NTM जटिल हैं और तकनीकी मानकों और रेगुलेशन के साथ जुड़े होते हैं. ऊर्जा क्षेत्र में ये दायित्व अक्सर कार्बन उत्सर्जन और सप्लाई चेन पारदर्शिता से जुड़ी रिपोर्टिंग ज़रूरतों का रूप ले लेते हैं. भारत जैसे विकासशील देशों के लिए ये उपाय प्रभावी रूप से उन्हें विकसित बाज़ारों से बाहर कर देते हैं. NTM उन कंपनियों को बाज़ार में प्रवेश से हतोत्साहित करते हैं और बाहर निकलने की संभावना बढ़ाते हैं जो अनुपालन की लागत नहीं उठा पाती हैं. इस तरह की आवश्यकताएं अप्रत्यक्ष रूप से विकसित देशों के रेगुलेटरी सिस्टम में काम करने वाली कंपनियों के पक्ष में होती हैं. ये उपाय अनजाने में ज़्यादा उत्सर्जन वाले विकासशील देशों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं क्योंकि इससे मौजूदा तकनीकी असमानताएं और बढ़ सकती हैं. इसका कारण ये है कि हरित तकनीकों तक कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की सीमित पहुंच है. इसके अलावा विकसित देशों में स्वच्छ तकनीक पेटेंट और सप्लाई चेन का वर्चस्व होने से तकनीक का ट्रांसफर खर्चीला और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन जाता है

भारत जैसे विकासशील देशों के लिए ये उपाय प्रभावी रूप से उन्हें विकसित बाज़ारों से बाहर कर देते हैं. NTM उन कंपनियों को बाज़ार में प्रवेश से हतोत्साहित करते हैं और बाहर निकलने की संभावना बढ़ाते हैं जो अनुपालन की लागत नहीं उठा पाती हैं. इस तरह की आवश्यकताएं अप्रत्यक्ष रूप से विकसित देशों के रेगुलेटरी सिस्टम में काम करने वाली कंपनियों के पक्ष में होती हैं.

जलवायु प्रेरित NTM से उत्पन्न एक अन्य चुनौती रेगुलेटरी कन्वर्जेंस की कमी है. EU जहां CBAM को लागू करता है, वहीं कार्बन उत्सर्जन पर अलग-अलग निर्भरता के साथ विभिन्न मॉडल उभर रहे हैं. अमेरिका में इन्फ्लेशन रिडक्शन एक्ट स्थानीय सामग्री संबंधी आवश्यकताओं और उत्सर्जन की दर से जुड़ा प्रदर्शन आधारित स्वच्छ ऊर्जा टैक्स क्रेडिट लागू करता है. चीन की उत्सर्जन व्यापार प्रणाली में बिजली क्षेत्र शामिल है लेकिन इसमें CBAM के समान कोई व्यवस्था नहीं है. वहीं यूनाइटेड किंगडम (UK) का CBAM प्रस्ताव EU से अलग है जिसकी वजह से ये काम-काज में अधिक जटिल बन जाता है. 

जलवायु संबंधी व्यापारिक तनावों के मुताबिक WTO में बदलाव

WTO का भविष्य वैश्विक व्यापार प्रणाली में तनावों का सामना करने की उसकी क्षमता पर निर्भर करेगा. चूंकि अगला मंत्रिस्तरीय सम्मेलन नज़दीक आ रहा है, ऐसे में WTO को स्पष्ट प्राथमिकताओं के इर्द-गिर्द अपने एजेंडे को व्यवस्थित करने से लाभ होगा. 

सबसे पहले उसे स्थिरता के स्रोत और वैश्विक आर्थिक बंटवारे के ख़िलाफ़ रक्षा कवच के रूप में काम जारी रखना चाहिए. रेगुलेटरी बंटवारे की आर्थिक लागत बहुत ज़्यादा है, विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए जिनके पास अलग-अलग मानकों और नीतियों का पालन करने की क्षमता नहीं होती है. WEF के अनुमानों के अनुसार इससे वैश्विक GDP को पांच प्रतिशत तक का नुकसान हो सकता है. 

मार्च के अंत में होने वाला मंत्रिस्तरीय सम्मेलन सुधार के एजेंडा को फिर से पटरी पर लाने और NTM एवं रेगुलेटरी बंटवारे का बेहतर ढंग से जवाब देने के लिए बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को ढालने का एक अच्छा अवसर है.

दूसरा, चूंकि दुनिया शून्य उत्सर्जन की तरफ बढ़ रही है, ऐसे में कार्बन मूल्य निर्धारण, सब्सिडी या औद्योगिक नीति जैसे सरकार के हस्तक्षेप महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. WTO को सुनिश्चित करना चाहिए कि ये हस्तक्षेप बहुपक्षीय प्रणाली के अनुरूप हों और उससे प्रतिस्पर्धा न करें. आधुनिक सब्सिडी नियमों की अनुपस्थिति में सब्सिडी की अनियंत्रित होड़ और व्यापार रक्षा साधनों में बढ़ोतरी का ख़तरा है. 

अंत में, NTM के प्रसार ने तनाव को और बढ़ा दिया है. मौजूदा WTO का ढांचा सरकारों को घरेलू चिंताओं का समाधान करने की अनुमति तो देता है लेकिन बहुपक्षीय मंच में संवाद और सहयोग को बहाल करने की तत्काल आवश्यकता है.  मार्च के अंत में होने वाला मंत्रिस्तरीय सम्मेलन सुधार के एजेंडा को फिर से पटरी पर लाने और NTM एवं रेगुलेटरी बंटवारे का बेहतर ढंग से जवाब देने के लिए बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को ढालने का एक अच्छा अवसर है.


अनिका छिल्लर ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर इकोनॉमी एंड ग्रोथ में रिसर्च असिस्टेंट हैं.

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