टीबी के मरीज़ों और इससे होने वाली मौतों की संख्या कम करने में काफ़ी प्रगति करने के बावजूद, इसके ख़िलाफ़ भारत की लड़ाई वायु प्रदूषण की चुनौती से निपटे बग़ैर सफल नहीं हो सकती. क्योंकि वायु प्रदूषण टीबी के संक्रमण और इलाज के कमज़ोर परिणामों की प्रमुख मगर अब तक अनदेखी की शिकार वजह है.
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तपेदिक या ट्यूबरक्लोसिस (TB) के ख़िलाफ़ भारत का संघर्ष पुरातन काल से इक्कीसवीं सदी तक चला आ रहा है. प्राचीन ग्रंथों से लेकर शुरुआती आयुर्वेदिक साहित्य तक में इसका ज़िक्र राजरोग या राजयक्ष्मा के रूप में मिलता है. इसकी रोकथाम की जा सकती है और इलाज भी संभव है. फिर भी टीबी का उन्मूलन एक चुनौती बना हुआ है. किसी एक संक्रामक जीव की वजह से होने वाली मौतों में टीबी से मरने वालों की तादाद पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा है. 2015 से 2023 के दौरान भारत में टीबी के मरीज़ों की संख्या में 18 फ़ीसद की गिरावट दर्ज की गई और इसके मरीज़ों की संख्या 237 प्रति लाख के मुक़ाबले घटकर 195 रह गई है, जो वैश्विक औसत से दोगुना है. इसी तरह, इस दौरान टीबी से मरने वालों की दर में भी 21 प्रतिशत की गिरावट आई है और प्रति एक लाख लोगों में टीबी से मरने वालों की संख्या 28 से घटकर अब 22 रह गई है. हालांकि, दुनिया के बाक़ी देशों के मुक़ाबले भारत में टीबी के मरीज़ों की तादाद (26 प्रतिशत) अभी भी सबसे ज़्यादा है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक़ टीबी के मरीज़ों की भारी संख्या के पीछे कई कारण हैं, जिनमें व्यापक सामाजिक आर्थिक कारक और सेहत से जुड़े दूसरे जोखिम भी शामिल हैं. इसकी मुख्य वजहों में जीन म्यूटेशन और दवा प्रतिरोध की वजह से माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस बैक्टीरिया के (MTB) के नए नए स्वरूपों का उभरना, लोगों की आनुवांशिक समस्या, मरीज़ों के संपर्क में आना, कुपोषण, दोहरे संक्रमण और दूसरी बीमारियां शामिल हैं. इसके सामाजिक आर्थिक कारणों में जनसंख्या घनत्व, अप्रवास, टीबी के मरीज़ों को कलंक के तौर पर देखना और स्वास्थ्य के संसाधनों के वितरण की असमानताएं शामिल हैं. वहीं, इसके पर्यावरण संबंधी कारणों में गर्मी, दबाव और बारिश शामिल हैं. हालांकि, उभरते हुए सबूत टीबी के संक्रमण, इसके विस्तार और इलाज के अपेक्षित नतीजे नहीं निकलने की एक और वजह की तरफ़ इशारा करते हैं, जो वायु प्रदूषण है.
2025 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वायु प्रदूषण और तपेदिक के बीच संबंध की बात स्वीकार की थी. दुनिया भर के लोगों की बहुसंख्यक आबादी के स्वीकार्य स्तर से कहीं प्रदूषक तत्वों के संपर्क में आने की घटनाएं बढ़ने से, शरीर में एंटीऑक्सीडेंट की कमी और ज्वर-सूजन होने के साथ साथ कमज़ोर प्रतिरोधी प्रतिक्रिया की वजह से न केवल फेफड़ों के काम करने में तब्दीली आ जाती है, बल्कि प्रदूषण बढ़ाने वाले पार्टिकुलेट मैटर (PM) हवा से फैलने वाले टीबी के बैक्टीरिया के वाहक भी बन जाते हैं और इससे टीबी के प्रति लोगों की स्थिति कमज़ोर हो जाती है.
तमाम अध्ययन के संकेत देते हैं कि वायु प्रदूषण से कम अवधि के लिए हो या लंबी अवधि का एक्सपोज़र दोनों ही टीबी के संक्रमण और इसके सक्रिय बीमारी में तब्दील होने की आशंकाएं बढ़ा देता है. रिसर्च लंबे समय से घर के भीतर के वायु प्रदूषण (IAP) और टीबी के मामलों के बीच संपर्क की बात साबित कर चुका है. अब नए सबूत लगातार ये संकेत दे रहे हैं कि बाहरी वायु प्रदूषण (OAP) भी टीबी का संक्रमण बढ़ाने की बड़ी वजह है.
1.टीबी का संक्रमण
रिसर्च ये इशारा करते हैं कि घर के भीतर का हो या फिर बाहर का वायु प्रदूषण, दोनों ही टीबी और ख़ास तौर से फेफड़ों की टीबी (PTB) के सक्रिय मरीज़ों की संख्या में इज़ाफ़ा करने में योगदान दे सकते हैं. 2024 में दुनिया भर में टीबी के सभी मामलों में से मोटे तौर पर 81 प्रतिशत मरीज़ फेफड़ों की टीबी के थे. 2021 में तमाम अध्ययनों के एक विश्लेषण में पाया गया था कि वायु प्रदूषण के तत्वों के साथ लंबे वक़्त तक संपर्क में रहने से टीबी के मामलों में बढ़ोत्तरी हो जाती है. ख़ास तौर से हवा में PM10 से कम आकार के पार्टिकुलेट मैटर में प्रति 10 μg/m³ की बढ़ोत्तरी से टीबी के संक्रमण का ख़तरा 5.8 फ़ीसद बढ़ जाता है. इसी तरह हवा में सल्फर डाई ऑक्साइड (SO2) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) की 1 ppb बढ़ोत्तरी से टीबी के संक्रमण में क्रमश: 1.6 और 1.0 प्रतिशत का इज़ाफ़ा होता पाया गया है.
रिसर्च लंबे समय से घर के भीतर के वायु प्रदूषण (IAP) और टीबी के मामलों के बीच संपर्क की बात साबित कर चुका है. अब नए सबूत लगातार ये संकेत दे रहे हैं कि बाहरी वायु प्रदूषण (OAP) भी टीबी का संक्रमण बढ़ाने की बड़ी वजह है.
PM 2.5, PM10 और सल्फर डाई ऑक्साइड जैसे वायु प्रदूषक तत्व जब इंसानों की सांस के साथ अंदर जाते हैं, तो वो सांस की नली की क़ुदरती रक्षात्मक परतों को नुक़सान पहुंचाते हैं. घर के भीतर के प्रदूषण का संबंध भी टीबी होने के जोखिम से पाया गया है. जब उपलों और लकड़ी को जलाकर या मिट्टी के तेल से खाना पकाया जाता है, या गर्माहट के लिए इन्हें जलाया जाता है, तो टीबी का संक्रमण होने की आशंका बढ़ जाती है.
चीन में हुए एक अध्ययन में पाया गया है कि वायु प्रदूषण से कुछ समय बाद फेफड़ों की टीबी होने की आशंका बढ़ जाती है. PM 2.5, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) में इज़ाफ़े से तीन महीने के बाद फेफड़ों की टीबी के मामले बढ़ने लगते हैं. वहीं ओज़ोन (O3) के संपर्क में आने से उसी महीने टीबी होने की आशंका होती है. 2020 में दक्षिण कोरिया में किए गए एक अध्ययन से पता चला था कि लंबे वक़्त तक PM10 के संपर्क में आने और टीबी के मामलों के बीच सीधा संपर्क होता है.
2. इलाज के परिणाम, बीमारी की प्रगति और दवा प्रतिरोधक तपेदिक
वायु प्रदूषण के तत्वों और इलाज के अपेक्षित नतीजे नहीं मिलने के बीच भी संबंध पाया गया है. इसमें बार बार बीमारी का होना, विकलांगता और मौत भी हो सकती है, जिससे टीबी के इलाज का असर सीमित हो जाता है. संक्रमित व्यक्ति के फेफड़ों की प्रतिरोधक क्षमता को कमज़ोर करने वाले प्रदूषक तत्वों की मौजूदगी से टीबी के बैक्टीरिया (MTB) के फिर से सक्रिय होने के लिए अच्छा माहौल मिल जाता है.
इसके अलावा, एक स्टडी में ये भी पाया गया है कि PM2.5, PM10 और कार्बन मोनोऑक्साइड के संपर्क में बहुत अधिक रहने से भी दवा प्रतिरोधी बैक्टीरिया (MDR) के संक्रमण के मामले बढ़ जाते हैं. वायु प्रदूषक तत्वों के संपर्क में कम अवधि के लिए भी आने पर दवा प्रतिरोधी टीबी (DR-TB) के लक्षण दिखने लगते हैं; ख़ास तौर से नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के प्रति एक्सपोज़र से पहली बार के टीबी के मरीज़ के DR-TB के भयंकर रूप से शिकार होने की आशंका 15.9 प्रतिशत अधिक हो जाती है.
PM10 की वजह से टीबी की वजह से मौत का जोखिम बेहन कम घनत्व वाली हवा (15 μg/m³) में भी होता है और तमाम दवाओं के प्रतिरोधी टीबी के मरीज़ों के लिए लंबे समय तक ऐसे माहौल में रहने से ख़तरा और भी बढ़ जाता है, जिसमें तापमान और नमी में काफ़ी उतार-चढ़ाव आता हो. इसके अलावा एक अध्ययन में ये भी पता चला है कि हाल ही में टीबी से उबरे लोगों के रहने के ठिकाने में वायु प्रदूषकों की अधिक मात्रा से उनकी मौत होने का जोखिम भी बढ़ जाता है.
3. अधिक जोखिम वाले लोग और ख़तरे का वर्गीकरण
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार ठोस ईंधन जलाने से घर के भीतर होने वाला प्रदूषण तुलनामत्क रूप से कमज़ोर सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि वालों को अधिक प्रभावित करता है. ठोस ईंधन पर निर्भर परिवारों की महिलाओं और बच्चों को इसकी वजह से टीबी होने की आशंका अधिक होती है. जलवायु परिवर्तन से इसमें और इज़ाफ़ा होने की आशंका भी जताई जा रही है. क्योंकि इससे न केवल प्रदूषक तत्वों के संपर्क में बढ़ोत्तरी होगी, बल्कि भयंकर रूप से ख़राब मौसम और घर के बाहर के प्रदूषण में वृद्धि की वजह से जब लोग घरों के भीतर रहेंगे, जहां हवा की आवाजाही कम होगी, तो उनके टीबी के शिकार होने की आशंका बढ़ जाएगी.
दक्षिण कोरिया में किए गए एक अध्ययन से पता चला था कि लंबे वक़्त तक PM10 के संपर्क में आने और टीबी के मामलों के बीच सीधा संपर्क होता है.
वर्गीकृत आंकड़ों के विश्लेषण से ये भी पता चला है कि 65 साल से ज़्यादा उम्र के बुजुर्ग जिनका टीबी का इतिहास रहा हो, वो वायु प्रदूषण के अधिक शिकार होते हैं. ख़ास तौर से सल्फर डाई ऑक्साइड के संपर्क में आने की वजह से बुज़ुर्गों में टीबी के लक्षणों में बहुत इज़ाफ़ा होता देखा गया है. अन्य कमज़ोर तबक़ों में शहरी ग़रीबों जैसे वो समुदाय हो सकते हैं, जिनके ऊपर टीबी के संक्रमण की अधिकता के साथ साथ वायु प्रदूषण के संपर्क में अधिक आने की दोहरी मार पड़ती है. महानगरों में स्लम में रहने वाले लोगों पर ये बात विशेष रूप से लागू होती है, जो भारत में टीबी का पांच गुना अधिक जोखिम झेलते हैं और लगातार वायु प्रदूषक तत्वों के संपर्क में आते रहते हैं.
वैसे तो भारत की कुल आबादी में आदिवासियों की संख्या केवल 8.4 प्रतिशत है. लेकिन, देश के 170 आदिवासी ज़िलों में से 63 फ़ीसद में टीबी का संक्रमण राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है और घरेलू प्रदूषण कम करने के लिए प्रधानमंत्री उज्जवला योजना (PMUY) के बावजूद हाशिए पर पड़े हुए हैं. उज्जवला योजना के सबसे कम लाभार्थी अनुसूचित जनजातियों के हैं, जिससे उनके बीच अंदरूनी वायु प्रदूषण घटाने में एक सीमित सफलता ही मिल सकी है.
पूरा भारत PM2.5 के बीमार कर देने वाले स्तर की चपेट में है. अकेले 2019 में ही भारत में 16.7 लाख लोगों की मौत (कुल मौतों का 17.8 प्रतिशत) की वजह वायु प्रदूषण को बताया गया था. इसके अलावा एक मोटे अनुमान के मुताबिक़ भारत की 40 प्रतिशत आबादी MTB की शिकार है. दशकों तक बेलगाम संक्रमण ने बहुत से भारतीयों को छुपी हुई टीबी के संक्रमण (LTBI) का शिकार बना दिया. इसके अलावा, विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ 2023 में भारत में दुनिया 27 प्रतिशत बहुल दवा प्रतिरोधी (MDR) मामले थे. कुल मिलाकर ये सारी बातें टीबी उन्मूलन के लिए बड़ी चुनौती पेश करती हैं और हवा की ख़राब गुणवत्ता की वजह से छुपी हुई टीबी के दोबारा सक्रिय होने की आशंका बढ़ाने वाले हैं.
वैसे तो टीबी के पीछे कई सामाजिक कारण और दूसरी बीमारियां और सेहत की समस्याएं होती हैं, जिनमें HIV वायरस और डायबिटीज़ भी शामिल है. लेकिन, भारत में टीबी के मरीज़ों की भारी संख्या एक नीतिगत कमी को भी दर्शाती है. HIV की वजह से टीबी के सक्रिय होने की आशंका आठ गुना तक बढ़ जाती है. लेकिन HIV के साथ (PLHIV) जी रहे लोग टीबी के नए मामलों में केवल पांच प्रतिशत (लगभग एक लाख मामले) हैं. जबकि आबादी के इस वर्ग के बीच मौत की दर में 25 प्रतिशत का योगदान टीबी का होता है. दुनिया भर में टीबी के दस प्रतिशत मामलों का संबंध डायबिटीज़ से पाया गया है.
पूरा भारत PM2.5 के बीमार कर देने वाले स्तर की चपेट में है. अकेले 2019 में ही भारत में 16.7 लाख लोगों की मौत (कुल मौतों का 17.8 प्रतिशत) की वजह वायु प्रदूषण को बताया गया था. इसके अलावा एक मोटे अनुमान के मुताबिक़ भारत की 40 प्रतिशत आबादी MTB की शिकार है.
इसकी तुलना में टीबी के लगभग 26 प्रतिशत मामलों के पीछे घर के भीतर का वायु प्रदूषण (IAP) को बताया गया है. इस बीच, बाहरी वायु प्रदूषण (OAP) के असर पर अभी अध्ययन चल ही रहा है. वैसे तो अन्य कारकों के साथ साथ HIV और डायबिटीज़ की वजह से होने वाली टीबी से निपटने में भारत की कोशिशें शानदार रही हैं. लेकिन, टीबी पर वायु प्रदूषण के असर को इसके निवारण की नीतियों में ज़्यादा सक्रियता से शामिल करने की ज़रूरत है.
टीबी से लड़ने में भारत की शानदार उपलब्धि के पीछे इसके उन्मूलन को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता का बड़ा योगदान रहा है. 1962 में भारत ने राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम शुरू किया था. जिसके बाद 1997 में संशोधित राष्ट्रीय टीबी नियंत्रण कार्यक्रम (RNTCP) लागू किया गया. 2018 में जब सरकार ने 2025 तक ‘टीबी मुक्त भारत’ बनाने की घोषणा की तो 2020 में इसका नाम बदलकर नेशनल ट्यूबरक्लोसिस एलिमिनेशन प्रोग्राम (NTEP) कर दिया गया. भारत ने टीबी की महामारी के 2030 तक उन्मूलन के संयुक्त राष्ट्र के स्थायी विकास के लक्ष्यों (UN-SDGs) से (जिस पर भारत ने भी दस्तख़त किए हैं) पांच बरस पहले ही इसके उन्मूलन का लक्ष्य रखा है.
टीबी उन्मूलन के प्रयास तेज़ करने और गुमशुदा मामलों की समस्या से निपटने के लिए भारत ने 100 दिनों के टीबी उन्मूलन का अभियान दिसंबर 2024 में शुरू किया था, जिसका मक़सद जल्दी इलाज शुरू करना और मौत होने से रोकना था. इसका नतीजा हुआ कि बीमारी का शिकार होने की अधिक आशंका वाले 12.97 करोड़ लोगों की जांच की गई और टीबी के 7.19 लाख नए मामलों का पता लगाया गया. वैसे तो टीबी उन्मूलन के समेकित प्रयास तारीफ़ के योग्य हैं. लेकिन ठोस आंकड़ों के मामले में अभी भी भारत में टीबी के मरीज़ों की तादाद बहुत अधिक है और ये प्रति एक लाख लोगों के ऊपर सिर्फ़ 44 मरीज़ तक बीमारी सीमित करने के लक्ष्य से बहुत पीछे है.
इस समय नेशनल स्ट्रैटेजिक प्लान फॉर ट्यूबरक्लोसिस: 2017-25 (NSP 2017-25) में घर के भीतर के वायु प्रदूषण को टीबी का एक कारण माना गया है और इसमें प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत इस प्रदूषण को कम करने के प्रयासों की भी चर्चा की गई है. इस योजना के तहत ठोस ईंधन पर निर्भर ग़रीब परिवारों को LPG सिलेंडर दिए जाते हैं, ताकि उनके घर के भीतर की हवा की गुणवत्ता में सुधार हो और टीबी के मामलों में कमी आए. हालांकि, उज्जवला योजना के तहत गैस कनेक्शन की संख्या बढ़ रही है. लेकिन, सिलेंडर फिर से भरवाने की दर लाभार्थियों के बीच अभी भी बेहद कम है. यही नहीं वायु प्रदूषण के संदर्भ में टीबी को नियंत्रित करने की कोई स्पष्ट रूप-रेखा भी नहीं है.
भारत में टीबी के मरीज़ कम करने के लिए टीबी और वायु प्रदूषण से जुड़ी नीतियों को स्पष्ट रूप से और लगातार एकीकृत करना ज़रूरी है. हवा की गुणवत्ता की चिंताओं को टीबी उन्मूलन की रणनीतियों का हिस्सा बनाना, घर के भीतर और बाहर के वायु प्रदूषण के संपर्क में आने की निगरानी का विस्तार करना और ज़्यादा जोखिम वाली आबादी को प्राथमिकता देना आवश्यक है.
आज जब भारत टीबी उन्मूलन के लिए अंतिम कड़ी तक पहुंचने की रणनीति विकसित कर रहा है, तो उसको चाहिए कि वो टीबी की समस्या को फेफड़ों की सेहत से जुड़े व्यापक दायरे में ले आए, जहां वायु प्रदूषक तत्व बीमारी के संक्रमण, इसके विकास और मौत की दर बढ़ाने में अहम भूमिका अदा करते हैं.
भारत में टीबी के मरीज़ कम करने के लिए टीबी और वायु प्रदूषण से जुड़ी नीतियों को स्पष्ट रूप से और लगातार एकीकृत करना ज़रूरी है. हवा की गुणवत्ता की चिंताओं को टीबी उन्मूलन की रणनीतियों का हिस्सा बनाना, घर के भीतर और बाहर के वायु प्रदूषण के संपर्क में आने की निगरानी का विस्तार करना और ज़्यादा जोखिम वाली आबादी को प्राथमिकता देना आवश्यक है. चूंकि टीबी की बीमारी पर सेहत और पर्यावरण से जुड़े कई कारण मिल-जुलकर असर डालते हैं. ऐसे में पर्यावरण की सेहत, विशेष रूप से वायु प्रदूषण को लेकर ‘वन हेल्थ’ को टीबी उन्मूलन की रूप-रेखाओं में शामिल करने से इस बीमारी से निपटने में व्यापक रूप से सहायता मिलेगी. आने वाले समय में इस विषय पर एक समर्पित ब्रीफ में हम अलग अलग सेक्टर की नीतियों और नवाचारी मॉडलों की पड़ताल करेंगे, जो इस एकीकरण को वास्तविकता में तब्दील कर सकते हैं और भारत के टीबी उन्मूलन के प्रयासों को गति दे सकते हैं.
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Nimisha Chadha was a Research Assistant with ORF’s Centre for New Economic Diplomacy. She was previously an Associate at PATH (2023) and has a MSc ...
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