दुनियाभर में जिस बहुआयामी बदलाव की शुरुआत हुई है, उसे ध्यान में रखते हुए भारत को अपनी विदेश नीति बनानी होगी. इसके लिए उसे द्विपक्षीय रिश्तों और वैश्विक संस्थानों से कहीं आगे बढ़कर सोचना होगा
हम नए साल और 21वीं सदी के नए दशक में आ चुके हैं और हमारे आसपास सबकुछ बहुत तेजी से बदल रहा है. ये बदलाव इतने बड़े हैं और इनका दायरा इतना व्यापक है, जिसे अक्सर समझना मुश्किल हो जाता है. भारत और वैश्विक राजनीति में आज जो हो रहा है, विद्वानों और जानकारों के लिए उसका विश्लेषण करना मुश्किल हो गया है. असल में, पहले वे इसके लिए जिन आधारों का इस्तेमाल करते थे, वे अब नाकाफ़ी साबित हो रहे हैं. अलग–अलग क्षेत्रों से जो चुनौतियां सामने आ रही हैं, नीति–निर्माताओं को उनसे निपटने के लिए तुरंत (रियल टाइम बेसिस) फैसले करने पड़ रहे हैं.
गुज़रे साल ने हमें याद दिलाया कि इतिहास कई घटनाओं का योग हो सकता है और उनका क्या असर होगा, इस पर किसी का काबू नहीं रहता. कोविड-19 महामारी आई तो दुनिया हैरान रह गई. इस महामारी ने न सिर्फ लाखों जानें लीं और हमारी रोजी–रोटी पर असर डाला बल्कि इसने पिछले कुछ साल से हो रहे बदलावों की रफ्त़ार भी तेज़ कर दी. कुछ बरसों से हम देख रहे थे कि वैश्विक स्तर पर ताकत का जो संतुलन बना हुआ था, वह बदल रहा था. मल्टीलेटरल यानी वैश्विक संस्थाएं कमजोर हो रही थीं. वैश्विक स्तर पर जो आर्थिक व्यवस्था चली आ रही थी, उससे मोहभंग बढ़ रहा था. वहीं, अभी जिन मुद्दों पर दुनिया के देशों के बीच आम सहमति है, उनके लिए भी चुनौतियां खड़ी हो रही थीं.
विदेश मामलों पर सबसे अधिक असर शायद शी जिनपिंग की लीडरशिप में चीन की विदेश नीति का हो. चीन की वैश्विक महत्वाकांक्षा और आक्रामकता बढ़ी है, जो शी का असर है.
इन सबके बीच नया साल एक साफ़गोई लेकर आया है, जो शायद 2020 की उथलपुथल के बगैर मुमकिन नहीं होता. और इस साल जो ग्लोबल ऑर्डर (वैश्विक व्यवस्था) हम बनते देखेंगे, उस पर पिछले साल का साया होगा. यह भी सच है कि विदेश मामलों पर सबसे अधिक असर शायद शी जिनपिंग की लीडरशिप में चीन की विदेश नीति का हो. चीन की वैश्विक महत्वाकांक्षा और आक्रामकता बढ़ी है, जो शी का असर है. इतना ही नहीं, वह इस मामले में अपने पूर्ववर्तियों से बिल्कुल अलग दिख रहे हैं. इसलिए जब कोविड-19 वायरस के फैलाव ने महामारी की शक्ल अख्त़ियार की, तो शी ने इसका फायदा उठाकर दुनिया में चीन का प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की.
दक्षिण और पूर्वी चीन सागर से लेकर हिमालय तक, यूरोप से लेकर पश्चिम एशिया तक, चीन ने हर जगह अपना दख़ल बढ़ाने की कोशिश की. आज चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सोच के हिसाब से शी जब नए वर्ल्ड ऑर्डर का खाका पेश कर रहे हैं तो बाकी की दुनिया एक संतुलन का बेसब्री से इंतजार कर रही है. इसी वजह से कई देश देखना चाहते हैं कि अमेरिका की अगली बाइडेन सरकार की विदेश नीति क्या होगी. जो बाइडेन ऐसे वक्त में राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं, जब अमेरिका इस बात को लेकर बंटा दिख रहा है कि दुनिया में उसकी क्या भूमिका हो. यहां बहस इस बात पर हो रही है कि क्या अमेरिका अपने मूल और ऐतिहासिक मूल्यों पर चलता रहे या उसे नई भूमिका तलाशनी चाहिए? एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप व्हाइट हाउस छोड़ने जा रहे हैं, तो दूसरी ओर ट्रंपवाद ज़िंदा है, यानी अमेरिका से ऐसे वक्त में दुनिया का नेतृत्व करने और वैश्विक जवाबदेही पूरी करने की आस लगाई जा रही है, जब वह अंदरूनी हालात के कारण इसे लेकर एक द्वंद्व में उलझा है.
इसके बावजूद अमेरिका सहित पूरी दुनिया में इस पर आम सहमति बन रही है कि चीन ग्लोबल ऑर्डर और अमेरिकी हितों के लिए चुनौतियां खड़ी कर रहा है. दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति बनने के लिए चीन ने अमेरिका के साथ जो मुक़ाबला शुरू किया है, वह आने वाले वर्षों में बहुत बड़ी होड़ में बदल सकता है. अगर बाइडेन जनवरी के आख़िर में राष्ट्रपति पद संभालने के बाद चीन के साथ बातचीत का रास्ता चुनते हैं, तो भी दोनों मुल्कों के बीच आगे चलकर यह रेस तेज़ होगी. व्यापार और तकनीक के क्षेत्र में तनाव बढ़ेगा और यही वे दो चीजें हैं, जो पिछले कई दशकों से ग्लोबल इकॉनमिक ऑर्डर (वैश्विक आर्थिक व्यवस्था) तय करती आई हैं. दुनिया के ताक़तवर देशों की तरफ से व्यापार और तकनीक को अलग करने की जो कोशिशें हो रही हैं, उससे संघर्ष की ज़मीन तैयार हो रही है. और यह 1990 के दशक से चले आ रहे वैश्वीकरण की बुनियाद को भी चुनौती दे रहा है. वहीं, वैश्वीकरण के खिलाफ़ जो माहौल बन रहा है, वह भी आगे चलकर और तेज़ हो सकता है. इसकी वजह यह है कि दुनिया को इसके ज़रिये क़रीब लाने या जोड़ने की लागत दिन–ब–दिन बढ़ती जा रही है. पश्चिमी देशों में वैश्वीकरण के खिलाफ़ पहले ही मुहिम शुरू हो चुकी है. इसी वजह से इन देशों की बड़ी राजनीतिक पार्टियां तक व्यापार और प्रवास जैसे मामलों में लंबे अरसे से चली आ रही अपनी सोच बदल रही हैं. यह बात मान लीजिए कि वैश्वीकरण का यह विरोध पश्चिमी मुल्कों तक ही रुका नहीं रहेगा. आज सप्लाई चेन से लेकर कनेक्टिविटी इनीशिएटिव जैसे मामलों को लेकर दुनिया बंट रही है. ऐसे में वैश्वीकरण के लिए समर्थन जुटाना और भी मुश्किल हो गया है.
अमेरिका सहित पूरी दुनिया में इस पर आम सहमति बन रही है कि चीन ग्लोबल ऑर्डर और अमेरिकी हितों के लिए चुनौतियां खड़ी कर रहा है. दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति बनने के लिए चीन ने अमेरिका के साथ जो मुक़ाबला शुरू किया है, वह आने वाले वर्षों में बहुत बड़ी होड़ में बदल सकता है.
दुनिया के अलग–अलग धड़ों में बंटने का असर संयुक्त राष्ट्र जैसी बहुदेशीय संस्थाओं के भविष्य पर भी पड़ेगा. यूं तो ज्य़ादातर देश अभी भी ऐसे संस्थानों पर आगे भी आस्था बनाए रखने की बात कर रहे हैं, लेकिन इनके अंदरूनी विरोधाभासों को देखते हुए लग रहा है कि इस आस्था का टिके रहना मुश्किल है. मिसाल के लिए, इस महामारी को ही लीजिए. आदर्श स्थिति में इसका हल समूची दुनिया को मिलकर निकालना चाहिए था क्योंकि इससे सभी प्रभावित हैं. लेकिन हुआ क्या? इसी महामारी ने इस कथित एका की पोल खोल दी. चीन इन संस्थाओं से इसलिए नाराज़ है क्योंकि उसे लगता है कि यह व्यवस्था उसके बिना बनी है. इसलिए वह इसे चुनौती दे रहा है. दूसरी तरफ, अमेरिका जो इन संस्थाओं का सबसे अहम् संस्थापक रहा है, वह भी इनके कामकाज के मौजूदा तरीके से खुश नहीं है.
पिछले सात दशकों से दुनिया भर में शांति बनाए रखने और उसकी समृद्धि के केंद्र में कथित तौर पर जो उदारवादी व्यवस्था रही है, वह भी आज की आम चुनौतियों का असरदार जवाब नहीं ढूंढ पा रही है. ऐसा जवाब, जो सबको मंज़ूर हो. यह दशकों से चले आ रहे वैश्विक सहयोग के कमज़ोर होने का संकेत दे रहा है. आज न सिर्फ़ ग्लोबल गवर्नेंस के पारंपरिक क्षेत्र में देश बंटे हुए नजर आ रहे हैं बल्कि यह अलगाव उन क्षेत्रों को लेकर भी है, जिनके लिए नए नियम तय किए जाने हैं, मिसाल के लिए अंतरिक्ष, साइबर और उभरती हुई तकनीक, जिनका रणनीतिक इस्तेमाल हो सकता है.
आज दुनिया में जिस भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक जोरआजमाइश के संकेत दिख रहे हैं, उसका हिंद–प्रशांत क्षेत्र पर सबसे अधिक असर होगा. यह क्षेत्र पहले से ही वैश्विक अवसरों और चुनौतियों के केंद्र में है, जिसके आने वाले वक्त में और रफ्त़ार पकड़ने के आसार हैं. चीन हिंद–प्रशांत पहल को कमतर दिखाने की जितनी भी कोशिश कर ले, पश्चिम यूरोप से लेकर प्रशांत महासागर के सुदूर तटीय देशों में इसे जिस तरह से हाथोंहाथ लिया जा रहा है, उससे पता चलता है कि इस अलायंस की घड़ी आ गई है. इस क्षेत्र में जो बदलाव हो रहे हैं, उससे समान सोच रखने वाले देशों का गठबंधन मज़बूत होगा. वैसे, इस सहयोग के लिए अभी तक कोई औपचारिक सांस्थानिक ढांचा नहीं बना है. लेकिन इस क्षेत्र में भारत और कुछ अन्य देशों के बीच सहयोग बढ़ने की वजह यह होगी कि यहां ताकत को लेकर ज़ोर-आजमाइश बढ़ने के आसार हैं.
दुनिया के अलग-अलग धड़ों में बंटने का असर संयुक्त राष्ट्र जैसी बहुदेशीय संस्थाओं के भविष्य पर भी पड़ेगा. यूं तो ज्य़ादातर देश अभी भी ऐसे संस्थानों पर आगे भी आस्था बनाए रखने की बात कर रहे हैं, लेकिन इनके अंदरूनी विरोधाभासों को देखते हुए लग रहा है कि इस आस्था का टिके रहना मुश्किल है
यूरेशिया (यूरोप और एशिया) एक और क्षेत्र है, जो वैश्विक शतरंज की बिसात बन सकता है. इस क्षेत्र में चीन और रूस के साथ आने से नई स्थितियां बन रही हैं, जिसका वैश्विक शक्ति संतुलन पर काफी असर पड़ सकता है. चीन और रूस के बीच कोई औपचारिक गठबंधन तो नहीं हुआ है, लेकिन दोनों देशों के रिश्ते से इस बारे में शुरुआती संदेह खत्म हो गए हैं. यह रिश्ता भविष्य में क्या सूरत अख्त़ियार करता है, इसका न सिर्फ़ यूरेशिया की भू-राजनीति पर असर होगा बल्कि दूसरे देशों पर कुछ ऐसा करने का दबाव बढ़ेगा, जिससे कई पारंपरिक समीकरण बदल सकते हैं. फिर पश्चिम एशिया भी है, जो अक्सर दुनिया की सुर्ख़ियां बन जाता है. अब्राहम समझौते से क्षेत्रीय राजनीति को लेकर कई बनी–बनाई धारणाएं बदली हैं और इससे क्षेत्र में सहयोग और फिर से संघर्ष शुरू होने, दोनों की संभावनाएं बनी हैं.
इन बदलावों को देखते हुए भारत को अपनी विदेश नीति तैयार करनी होगी. उसे द्विपक्षीय और बहुदेशीय संगठनों से आगे निकलकर सोचना होगा. भारत की चीन नीति के सिलसिले में गुज़रा साल बहुत अहम साबित हुआ. इससे यह साफ़ हो गया कि आने वाले वर्षों और दशकों में भारत के पास कौन से रास्ते हैं. आज जब चीन के साथ उसका टकराव बना हुआ है, इस बीच दुनिया की भारत से वैश्विक स्तर पर बड़ी भूमिका निभाने की उम्मीद भी बढ़ रही है.
इन बदलावों को देखते हुए भारत को अपनी विदेश नीति तैयार करनी होगी. उसे द्विपक्षीय और बहुदेशीय संगठनों से आगे निकलकर सोचना होगा. भारत की चीन नीति के सिलसिले में गुज़रा साल बहुत अहम साबित हुआ.
भारत की वैश्विक आकांक्षा भी बढ़ी है, इसलिए 21वीं सदी के तीसरे दशक में उसे हाशिये पर बैठना गवारा नहीं होगा. वह वैश्विक स्तर पर बड़ी भूमिका निभाने के तैयार है. वहीं, दुनिया के दूसरे मुल्कों की तरह 2021 में उसे भी स्वास्थ्य मोर्चे पर चुनौतियों और आर्थिक संकट से जूझना पड़ेगा. इसके बावजूद उसके पास वैश्विक बहस और नतीजों को प्रभावित करने के मौके होंगे. यह मौका ‘दुनिया का दवाखाना’ होने के नाते या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य के रूप में उसके पास होगा. भारत के नीति–निर्माता इन मौक़ों का किस तरह से फायदा उठाते हैं और इसे लेकर वे कितने गंभीर हैं, इससे यह तो तय होगा ही कि दुनिया में भारत की धमक कितनी बढ़ती है, साथ ही इससे आने वाले दशकों में वैश्विक राजनीति की दिशा भी तय होगी.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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