Expert Speak Raisina Debates
Published on Jul 07, 2025 Updated 0 Hours ago

होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद करने की ईरान की धमकी बताती है कि दुनिया के इस प्रमुख ऊर्जा मार्ग से कितने बड़े भू-राजनीतिक और भू-आर्थिकी जोखिम जुड़े हुए हैं. 

अगर ईरान होर्मुज़ को बंद करता है तो तेल का क्या होगा?

Image Source: Getty

ईरान के परमाणु ठिकानों पर अमेरिका और इज़रायल के संयुक्त हवाई हमलों के बाद, ईरान की इस्लामी संसद ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकाबंदी करने की सिफ़ारिश करते हुए एक प्रस्ताव पास किया. होर्मुज़ असल में ईरान और ओमान के बीच 32 किलोमीटर चौड़ा एक समुद्री मार्ग है, जो अरब सागर में खुलता है. हालांकि, इस मामले में अंतिम फ़ैसला ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल, यानी सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को लेना है, लेकिन ईरानी संसद का यह स्वीकृत प्रस्ताव गहरी भू-राजनीतिक दुश्मनी के कारण चल रहे सैन्य-संघर्ष के भू-आर्थिक प्रभाव को रेखांकित करता है.

लाल सागर और पनामा नहर जैसे अन्य व्यापार मार्गों के विपरीत, जहाज़ों के लिए अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए होर्मुज़ जलडमरूमध्य को अनदेखा करना संभव नहीं है.

वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए होर्मुज़ जलडमरूमध्य से बेरोकटोक आवाजाही काफ़ी ज़रूरी है. हर दिन विश्व में जितने तेल का उत्पादन होता है, उसका करीब 25 प्रतिशत (2.1 करोड़ बैरल प्रतिदिन या bpd) और वैश्विक समुद्री तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत (11.5 अरब क्यूबिक फीट प्रति दिन) हिस्सा इसी समुद्री चोकप्वाइंट (तंग जलमार्ग) से गुजरता है. इस ऊर्जा आपूर्ति का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा चीन, भारत, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे प्रमुख एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को जाता है.

मानचित्र 1- होर्मुज़ जलडमरूमध्य

Chokepoint Checkers Iran S Strait Of Hormuz Gambit

स्रोत- अल जज़ीरा

वास्तव में, यह पिछले 15 वर्षों में छठा मौका है, जब तेहरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को घेर लेने की धमकी दी है. दरअसल, इन वर्षों में ख़ास तौर से उसके परमाणु कार्यक्रम और तेल निर्यात क्षमता के कारण, बाहरी दबाव व टकराव बढ़ने के साथ ही उसकी धमकियों में दोहराव और गंभीरता बढ़ी है. हालांकि, 2025 का यह संसदीय फ़ैसला इस तरह की रोक का पहला औपचारिक विधायी प्रयास है, जो ईरान की बदलती सामरिक सोच का संकेत है.

ईरान और बाकी दुनिया के लिए होर्मुज़ का महत्व

ईरान के लिहाज़ से होर्मुज़ जलडमरूमध्य का ख़ासा भू-रणनीतिक महत्व है, जो तेहरान को बेहिसाब भू-आर्थिक ताक़त देता है. लाल सागर और पनामा नहर जैसे अन्य व्यापार मार्गों के विपरीत, जहाज़ों के लिए अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए होर्मुज़ जलडमरूमध्य को अनदेखा करना संभव नहीं है. हालांकि, समुद्री मार्गों की नाकेबंदी या खनन से खुद ईरान को ही भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. इससे पैदा होने वाली उथल-पुथल उसके एशियाई सहयोगियों (अरब और दक्षिणी देश) और वैश्विक बीमा व नौवहन उद्योग को अपनी चपेट में ले लेगी.

हालांकि, ईरान अपनी इस भू-रणनीतिक ताक़त का इस्तेमाल अमेरिका के ख़िलाफ़ एक ऐसी रणनीति के रूप में कर सकता है, जिससे असैन्य दबाव बनाने में उसे मदद मिल सकती है, लेकिन इस फ़ैसले की उसे क़ीमत भी चुकानी पड़ेगी. 2023 में ईरान ने जितना निर्यात किया था, उसका 54.4 प्रतिशत हिस्सा ऊर्जा क्षेत्र (तेल और गैस) का था, जो करीब 53 अरब डॉलर का था. ईरान के कुल तेल निर्यात का 77 प्रतिशत हिस्सा (क़ीमतों में भारी छूट के साथ) चीन को भेजा गया, जो प्रतिदिन 10 लाख बैरल था और जिससे तेहरान को लगभग 40 अरब डॉलर की आमदनी हुई थी. अगर ईरान होर्मुज़ को बंद करता है, तो उसे चीन का रास्ता भी बंद करना पड़ेगा, जो उसका सबसे बड़ा व्यापारिक और एकमात्र ऊर्जा कारोबारी भागीदार है. इससे परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पाद, दवाइयां व फार्मास्यूटिकल्स और कृषि उत्पाद जैसे ईरान के महत्वपूर्ण आयात भी प्रभावित होंगे.

संभावित नाकेबंदी से खाड़ी देशों के साथ तेहरान के रिश्तों पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा, क्योंकि इन देशों की होर्मुज़ के साथ बड़ी आर्थिक हिस्सेदारी जुड़ी हुई है. संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर और सऊदी अरब क्रमशः 30 लाख, 15 लाख और 55 लाख बैरल तेल प्रतिदिन निर्यात करते हैं, जो मुख्य रूप से होर्मुज़ जलडमरूमध्य से ही होता है. बेशक, सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन और संयुक्त अरब अमीरात की अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन होर्मुज़ के विकल्प के रूप में काम करती हैं, लेकिन इनकी क्षमताएं कम हैं, जिस कारण होर्मुज़ बंद करने के कारण आपूर्ति में होने वाली रुकावटों की यह पूरी तरह से भरपायी नहीं कर सकतीं. कतर को सबसे गंभीर रुकावट का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि उसके पास इस तरह की पाइपलाइन जैसा विकल्प नहीं है और वह अपने सभी ऊर्जा निर्यात फ़ारस की खाड़ी में रस लफ़ान औद्योगिक शहर के माध्यम से करता है. फिर, कतर में एक अमेरिकी सैन्य अड्डे पर सीमित, और शायद सुनियोजित सैन्य हमला करने के ईरान के हालिया फ़ैसले ने खाड़ी देशों के इस भ्रम को तोड़ दिया है कि इज़रायल-ईरान संघर्ष में उनको शामिल नहीं किया जाएगा. यह तेल के सवाल से कहीं अधिक गंभीर है, क्योंकि अस्थिरता व उथल-पुथल के रूप में चर्चित इस क्षेत्र में सुरक्षित ठिकाने होने के कारण दोहा, अबू धाबी, दुबई और रियाद जैसे शहर खुद को वैश्विक वित्तीय केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहते हैं.

होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बंद होने से तमाम एशियाई देशों के साथ भारत और चीन जैसे ईरान के प्रमुख आर्थिक साझेदारों की ऊर्जा सुरक्षा पर भी असर पड़ेगा. उदाहरण के लिए, भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया होर्मुज़ से हर दिन क्रमशः 28 लाख, 45 लाख, 18 लाख और 17 लाख बैरल तेल का आयात करते हैं. इस कारण होर्मुज़ के बंद होने से एशिया के लिए रोजाना जाने वाले 1 करोड़ बैरल से अधिक कच्चे तेल और खाड़ी में पैदा होने वाली ज्यादातर तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की आवाजाही पर असर पड़ेगा. इससे प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में ऊर्जा प्रवाह गंभीर रूप से प्रभावित होगा और कुछ अनुमानों के अनुसार, तेल की वैश्विक क़ीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ सकती हैं. भारत में भी होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बंद होने से सामाजिक व आर्थिक उथल-पुथल पैदा हो सकती है, ख़ासतौर से यह देखते हुए कि वैश्विक मर्चेंट नेवी कार्यबल में भारतीय समुद्री कर्मियों की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत है.

होर्मुज़ में 2019 के ‘टैंकर युद्ध’ के बाद, जो कम समय तक चला था, युद्ध-जोखिम प्रीमियम 0.1 से 0.5 प्रतिशत तक बढ़ गया था. यह रकम तेल लाने वाले बड़े जहाज़ (VLCC) की एक यात्रा में 5 लाख डॉलर से अधिक के अतिरिक्त ख़र्च का बोझ बढ़ाती है. होर्मुज़ बंद होने से बीमा कंपनियां खाड़ी को ‘उच्च जोखिम’ की श्रेणी में रख सकती हैं

ईरान की होर्मुज़ नाकेबंदी के कारण समुद्री परिवहन लागत और युद्ध-जोखिम व राजनीतिक-जोखिम बीमा प्रीमियम (यह व्यवसायों और निवेशकों को विदेशों में राजनीतिक अस्थिरता या संघर्ष की स्थिति से होने वाले आर्थिक नुकसान से बचाता है) में भी वृद्धि हो सकती है, जिससे वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र में कारोबारी कामकाज के लिए अधिक ख़र्च करना पड़ सकता है. होर्मुज़ में 2019 के टैंकर युद्ध के बाद, जो कम समय तक चला था, युद्ध-जोखिम प्रीमियम 0.1 से 0.5 प्रतिशत तक बढ़ गया था. यह रकम तेल लाने वाले बड़े जहाज़ (VLCC) की एक यात्रा में 5 लाख डॉलर से अधिक के अतिरिक्त ख़र्च का बोझ बढ़ाती है. होर्मुज़ बंद होने से बीमा कंपनियां खाड़ी को उच्च जोखिम की श्रेणी में रख सकती हैं, जिससे अंडरराइटिंग लागत (जोखिम के मूल्यांकन और जांच-पड़ताल की प्रक्रिया से जुड़े ख़र्च) 300 से 500 प्रतिशत बढ़ सकती है. 2019 में VLCC चार्टर की दरें प्रति दिन 30,000 डॉलर से बढ़कर 1.5 लाख डॉलर हो गई थी. इस बार भी नाकेबंदी की सूरत में क़ीमतें इसी तरह या इससे भी अधिक बढ़ने की आशंका है.

ऐसे वक्त में, जब यूरोप, मध्य पूर्व और हिंद-प्रशांत क्षेत्रों में साझा हितों को लगातार आगे बढ़ाने पर ज़ोर दिया जा रहा है, व्यापार की सुरक्षा और ख़ासकर ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अलग-अलग सोच नहीं टिक सकती.

निष्कर्ष

अभी के समय में, यानी साल 2025 में इज़रायल और ईरान के बीच 12 दिनों के इस युद्ध के पैमाने व गंभीरता के बावजूद होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद करना इतना आसान नहीं है. ऊर्जा सुरक्षा को बाधित करने या समुद्री नाकेबंदी करने जैसे उपायों से तेहरान के लिए उन देशों के साथ कूटनीतिक स्थिरता बनाए रखना मुश्किल होगा, जिनके साथ उसके कामकाजी संबंध हैं, ख़ास तौर से ग्लोबल साउथ, यानी वैश्विक दक्षिण और एशिया के देशों में. इससे दुनिया भर में तेल की क़ीमतें बढ़ने का भी ख़तरा है. इस लिहाज़ से देखें, तो अभी के 12 दिवसीय युद्ध का गैर-पारंपरिक प्रभाव पड़ा है, क्योंकि तेल की क़ीमतें युद्ध (जब ईरान और इज़रायल ने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला) से पहले लगाई जा रही आशंकाओं के बिल्कुल विपरीत गिर गईं. बहरहाल, कई एशियाई आयातकों ने पूर्व में तेहरान को लेकर मुश्किलें झेली हैं. जैसे, नई दिल्ली और सियोल, दोनों के जहाज़ों को 2021 में फ़ारस की खाड़ी से गुजरते समय पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने जैसे फ़िजूल के आरोप लगाकर ईरान ने ज़ब्त कर लिए थे. तेहरान के उस कदम को इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) जैसी संस्थाओं द्वारा दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा गया था, क्योंकि प्रतिबंधों के कारण एशियाई देशों में उसके अरबों के भुगतान रुक गए थे.

साफ है, वैश्विक चोकप्वाइंट पर कोई देश अकेले फैसला नहीं ले सकता. यदि आज होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद किया जाता है, तो इसका असर वैश्विक व्यापार में भी दिखेगा, क्योंकि इसी तरह की भू-राजनीतिक व भू-आर्थिक मुश्किलों वाले मलक्का जलडमरूमध्य, स्वेज नहर और अन्य जलमार्गों पर भी इसका असर पड़ेगा. ऐसे वक्त में, जब यूरोप, मध्य पूर्व (भारत के लिहाज़ से पश्चिम एशिया) और हिंद-प्रशांत क्षेत्रों में साझा हितों को लगातार आगे बढ़ाने पर ज़ोर दिया जा रहा है, व्यापार की सुरक्षा और ख़ासकर ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अलग-अलग सोच नहीं टिक सकती. ऊर्जा आज भी भू-राजनीति और भू-आर्थिकी, दोनों का बुनियादी स्तंभ है, जो हर किसी को प्रभावित करता है, फिर चाहे वे बड़ी ताक़तें हों या छोटे देश.


(कबीर तनेजा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में स्ट्रैटेजिक स्टडीज प्रोग्राम के उप-निदेशक और फेलो हैं)

(पृथ्वी गुप्ता ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में स्ट्रैटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में जूनियर फेलो हैं)

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.