Author : Sohini Bose

Published on May 23, 2022 Updated 21 Hours ago

चटगांव बंदरगाह: भारत के साथ ‘संतुलन’ की कूटनीति स्थापित करने में बांग्लादेश का तुरुप का पत्ता!

चटगांव बंदरगाह: भारत के साथ ‘संतुलन’ की कूटनीति स्थापित करने में बांग्लादेश का तुरुप का पत्ता!

ढाका में अप्रैल के आख़िर में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना और भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बीच हुई बैठक के दौरान बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने भारत को चटगांव बंदरगाह के इस्तेमाल की पेशकश की. जयशंकर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रतिनिधि के तौर पर प्रधानमंत्री हसीना को नई दिल्ली के दौरे का न्योता देने के लिए ढाका गए थे. दो पड़ोसी देशों के बीच पारस्परिक लाभ के लिए ज़्यादा कनेक्टिविटी की आवश्यकता पर चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री हसीना ने इस बात की तरफ़ ध्यान दिलाया कि संपर्क में बढ़ोतरी होने से भारत के समुद्र विहीन पूर्वोत्तर के राज्यों असम और त्रिपुरा को चटगांव बंदरगाह तक पहुंचने में मदद मिलेगी. ये बयान उस पेशकश की याद दिलाता है जब बांग्लादेश ने 2019 में चीन के दक्षिण-पश्चिम प्रांतों को चटगांव और मोंगला बंदरगाहों का इस्तेमाल करने के लिए दिया था. वास्तव में पड़ोसियों के साथ बांग्लादेश की सामरिक साझेदारी में, ख़ासतौर पर भारत और चीन जैसे बड़े देशों के साथ, चटगांव बंदरगाह का ज़िक्र अक्सर होता है. जैसे-जैसे बांग्लादेश बंगाल की खाड़ी की भू-राजनीति, जो कि रफ़्तार पकड़ रही है, में अपना रास्ता बना रहा है वैसे-वैसे इस बंदरगाह का फ़ायदा उठाना महत्वपूर्ण है. 

ढाका में अप्रैल के आख़िर में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना और भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बीच हुई बैठक के दौरान बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने भारत को चटगांव बंदरगाह के इस्तेमाल की पेशकश की.

चटगांव बंदरगाह का क्षेत्र 

स्रोत: फिगशेयर

बंदरगाह का महत्व 

कर्णफुली नदी पर निर्मित, समुद्र की तरफ़ 16 किलोमीटर की दूरी पर, चटगांव बंदरगाह बांग्लादेश का प्रमुख समुद्री बंदरगाह है. ये बंगाल की खाड़ी के समुद्री किनारे पर सबसे व्यस्त बंदरगाह है और 2021 में दुनिया के 100 सबसे व्यस्त कंटेनर बंदरगाहों की लॉयड की सूची में इसकी रैंकिंग 67वीं है. बांग्लादेश के रेडीमेड कपड़ों के व्यापार पर महामारी के असर और इसके परिणामस्वरूप कंटेनर की आवाजाही में कमी की वजह से चटगांव बंदरगाह 2020 की 58वीं रैंकिंग से 2021 में नौ पायदान नीचे गिर गया लेकिन इस बंदरगाह की उपयोगिता पर कोई सवाल नहीं है. इसका महत्व  है कि ये समुद्र तट से कुछ किलोमीटर के आगे गहरे पानी में जहाज़ों के रुकने की सुविधा देता है. चटगांव बंदरगाह के ज़रिए बांग्लादेश का 92 प्रतिशत एग्ज़िम (निर्यात-आयात) समुद्री व्यापार, मुख्य तौर पर निर्मित उत्पादों का, होता है. चटगांव बंदरगाह से थोक कार्गो का भी परिवहन होता है लेकिन यात्री जहाज़ सीमित हैं. चटगांव बंदरगाह का इस्तेमाल भारत, नेपाल और भूटान के द्वारा जहाजों के हस्तांतरण (ट्रांसशिपमेंट) के लिए भी किया जाता है और बंदरगाह के परिसर में एक कंटेनर टर्मिनल का निर्माण भी किया जा रहा है जिसके 2024 में पूरा होने की संभावना है. इस बंदरगाह की सामरिक स्थिति के अलावा इसके इंफ्रास्ट्रक्चर की उपयोगिता भारत और चीन- दोनों देशों के लिए इसे विकास की महत्वपूर्ण संभावना से संपन्न करती है. 

  

चटगांव बंदरगाह का इस्तेमाल भारत, नेपाल और भूटान के द्वारा जहाजों के हस्तांतरण (ट्रांसशिपमेंट) के लिए भी किया जाता है और बंदरगाह के परिसर में एक कंटेनर टर्मिनल का निर्माण भी किया जा रहा है जिसके 2024 में पूरा होने की संभावना है. 

सामरिक महत्व 

बांग्लादेश त्रिकोणीय बंगाल की खाड़ी के शिखर पर स्थित है. इसकी वजह से बांग्लादेश की पहुंच इस समुद्री इलाक़े के लिए महत्वपूर्ण जहाज़ों के रास्ते तक है. इसके अलावा इस इलाक़े में बताये जा रहे हाइड्रोकार्बन के भंडार तक भी बांग्लादेश की पहुंच है. इस तरह भू-राजनीतिक रूप से बांग्लादेश एक महत्वपूर्ण पड़ोसी है और अपनी जगह की वजह से चटगांव बंदरगाह बांग्लादेश का एक सामरिक हिस्सा है. भारत और चीन के लिए चटगांव बंदरगाह का महत्व निम्नलिखित है: 

भारत के समुद्र विहीन पूर्वोत्तर के लिए समुद्र का एक रास्ता 

भारतीय उपमहाद्वीप में 1947 में खींची गई बंटवारे की रेखा, जिससे पूर्वी पाकिस्तान बना, ने भारत के पूर्वोत्तर को समुद्र विहीन कर दिया, पूर्वोत्तर भारत को समुद्र तक आसानी से पहुंचने से वंचित कर दिया गया. लेकिन इसके बावजूद 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर दूसरा युद्ध छिड़ने से पहले तक पूर्वोत्तर भारत को पूर्वी पाकिस्तान के बंदरगाहों का इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई थी. तब से भारत चटगांव बंदरगाह तक फिर से पहुंच हासिल करने की कोशिश कर रहा है जो कि पूर्वोत्तर के क्षेत्र के लिए भारत के अपने कोलकाता बंदरगाह से भी काफ़ी नज़दीक है. इसके अलावा, चटगांव बंदरगाह तक अलग-अलग संपर्कों के ज़रिए भी पहुंचना आसान है जबकि कोलकाता बंदरगाह तक पहुंचने के लिए ज़मीन के रास्ते संकीर्ण सिलिगुड़ी गलियारे, जिसे ‘चिकन्स नेक’ के नाम से भी जाना जाता है, से पहुंचना होगा. इस तरह भारत के पूर्वोत्तर को न सिर्फ़ विकसित करने और भारत के बाक़ी हिस्सों से इसका संपर्क मज़बूत करने के लिए बल्कि सीमा साझा करने वाले पड़ोसी देशों जैसे कि बांग्लादेश के साथ इसका संपर्क बढ़ाने के लिए भी चटगांव बंदरगाह के साथ पूर्वोत्तर को जोड़ना एक सस्ता विकल्प है. इससे भारत के एक्ट ईस्ट और पड़ोसी पहले की नीति का प्रचार करने में मदद मिलेगी. 

कुछ ख़बरों में बताया गया है कि इस क़दम के ज़रिए बांग्लादेश अमेरिका के साथ भारत के अच्छे संबंधों का इस्तेमाल करके अमेरिका के साथ अपने रिश्तों को दुरुस्त करना चाहता है क्योंकि अपने रैपिड एक्शन बटालियन की वजह से बांग्लादेश अमेरिका के आर्थिक प्रतिबंधों का सामना कर रहा है.

बांग्लादेश का इरादा भी अपने दूसरे सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार भारत के साथ कनेक्टिविटी को मज़बूत करने का है. इसलिए 2015 में दोनों देशों ने एक तटीय जहाज़रानी (शिपिंग) समझौते और एक मानक संचालन प्रक्रिया (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रॉसिजर) पर हस्ताक्षर किए जिसके तहत भारत के पूर्वी तट और बांग्लादेश के बंदरगाहों, ख़ास तौर पर चटगांव, के बीच सीधी नियमित जहाज़ सेवा को अनुमति दी गई. इससे सामानों के पहुंचने का समय 25 दिन के बदले सात दिन हो गया और हर कंटेनर पर 300 अमेरिकी डॉलर की अनुमानित बचत हुई. चटगांव बंदरगाह प्राधिकरण ने भारत के सामने त्रिपुरा के नज़दीक आशुगंज नदी बंदरगाह के ज़रिए पूर्वोत्तर राज्यों को सामान पहुंचाने के लिए भी चटगांव बंदरगाह के इस्तेमाल का प्रस्ताव भारत के सामने रखा था. 2020 में त्रिपुरा को आख़िरकार चटगांव बंदरगाह तक पहुंच मिल ही गई. एक ट्रायल रन में त्रिपुरा को अखौरा इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट पर चटगांव बंदरगाह से 100 टन कार्गो प्राप्त हुआ. लेकिन उस वक़्त से इस मामले में  बात ज़्यादा आगे नहीं बढ़ी है, सिर्फ़ मार्च 2021 में मैत्री सेतु/फेनी पुल का उद्घाटन हुआ जो त्रिपुरा को चटगांव से जोड़ता है. इसके बाद प्रधानमंत्री हसीना की हाल की पेशकश के साथ बांग्लादेश और भारत के बीच सीमा पार के रास्तों पर काम शुरू करने के बारे में उनकी सहमति को लेकर कुछ ख़बरों में बताया गया है कि इस क़दम के ज़रिए बांग्लादेश अमेरिका के साथ भारत के अच्छे संबंधों का इस्तेमाल करके अमेरिका के साथ अपने रिश्तों को दुरुस्त करना चाहता है क्योंकि अपने रैपिड एक्शन बटालियन की वजह से बांग्लादेश अमेरिका के आर्थिक प्रतिबंधों का सामना कर रहा है. कुछ ख़बरों में ये भी कहा गया है कि प्रधानमंत्री हसीना की ये पेशकश म्यांमार के साथ भारत के बढ़ते व्यापार और कनेक्टिविटी को लेकर चिंता का नतीजा है. तीसरा मतलब ये निकाला जा रहा है कि श्रीलंका के हालात से सबक़ लेते हुए बांग्लादेश की ये पेशकश अपनी अर्थव्यवस्था को और मज़बूत करने की एक कोशिश है. वजह चाहे कुछ भी हो लेकिन भारतीय दृष्टिकोण से ये पेशकश एक स्वागत योग्य क़दम है. 

हिंद महासागर में चीन की पकड़ 

चीन के व्यापारिक जहाज़ों के द्वारा बार-बार चटगांव बंदरगाह के दौरे की वजह से मा हुआन नाम के एक इतिहासकार, जिन्होंने चीन के एक अभियान पर 1405 में चटगांव का दौरा किया था, ने इसका नाम ‘चिट-ले-गान’ रख दिया था. आज ये बंदरगाह हिंद महासागर के एक रास्ते के रूप में चीन के लिए महत्वपूर्ण है. कुछ अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टों में बताया गया है कि बंदरगाह में चीन का निवेश “हिंद महासागर के क्षेत्र में समुद्री ऊर्जा के रास्तों पर नियंत्रण करने और दक्षिण एशिया के देशों में बंदरगाहों को विकसित करके अपनी ताक़त का विस्तार करने” की उसकी योजना का एक हिस्सा है. दूसरी रिपोर्टों में भी चटगांव बंदरगाह का इस्तेमाल चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति में करने की संभावना का विश्लेषण किया गया है. ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ अमेरिका के द्वारा तैयार एक परिकल्पना है जिसमें बताया गया है कि हिंद महासागर में चीन सैन्य और वाणिज्यिक अड्डों का निर्माण कर रहा है. लेकिन चीन के जानकारों ने इस दावे का खंडन किया है. उनके मुताबिक़ चटगांव बंदरगाह का विकास चीन और बांग्लादेश के बीच बराबर की शर्तों पर आधारित है क्योंकि दोनों देशों ने संयुक्त आर्थिक विकास के लिए एक पारस्परिक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. उनका कहना है कि, “चीन के द्वारा इस परियोजना को पैसा मुहैया कराने के पीछे कोई सैन्य उद्देश्य नहीं है”.

वर्तमान में चीन की पहुंच चटगांव बंदरगाह तक है और वो ढाका से चटगांव के बीच हाई-स्पीड रेल परियोजना का निर्माण करने एवं उसे चलाने, और 220 किलोमीटर की पाइनलाइन बनाने में दिलचस्पी रखता है. 

अपनी तरफ़ से बांग्लादेश भी इस बंदरगाह में चीन के निवेश को बढ़ाने के लिए उत्सुक है. 2010 की रिपोर्ट में बताया गया है कि बांग्लादेश को उम्मीद थी कि बंगाल की खाड़ी में एक गहरे पानी का बंदरगाह बनाकर वो इसे एक क्षेत्रीय व्यावसायिक केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए 8.7 अरब अमेरिकी डॉलर की चीन की सहायता हासिल कर लेगा. बांग्लादेश चाहता था कि 2055 तक बंदरगाह की कार्गो संभालने की क्षमता तीन गुना बढ़ाई जाए. उस वक़्त से बांग्लादेश के साथ चीन के संबंधों में बहुत ज़्यादा मज़बूती आई है और चीन 2015 में भारत को पछाड़कर बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया. वर्तमान में चीन की पहुंच चटगांव बंदरगाह तक है और वो ढाका से चटगांव के बीच हाई-स्पीड रेल परियोजना का निर्माण करने एवं उसे चलाने, और 220 किलोमीटर की पाइनलाइन बनाने में दिलचस्पी रखता है. इसके अलावा चीन एक घाट (सिंगल मूरिंग प्वाइंट) भी बनाना चाहता है जहां से आयातित तेल को सीधे चटगांव रिफाइनरी तक पहुंचाया जा सकता है. 

निष्कर्ष

चटगांव बंदरगाह में एशिया के दो बड़े देशों की दिलचस्पी साफ़ तौर पर दिखती है. इसलिए ये बांग्लादेश का तुरुप का पत्ता है जिसके सहारे वो अपने आर्थिक विकास को तेज़ कर सकता है और दोनों देशों के साथ अनुकूल संबंधों को विकसित कर सकता है. इसलिए अपनी तटस्थता को बरकरार रखते हुए बंदरगाह को सामूहिक रूप से विकसित करने की पहल के ज़रिए अपना आर्थिक विकास करना बांग्लादेश की संतुलन की कूटनीति की जीत है. 

बांग्लादेश की तरफ़ से भारत को चटगांव बंदरगाह के इस्तेमाल की अनुमति देना ऐसी ही एक कूटनीतिक पहल है. ये दोनों देशों के बीच उनकी साझेदारी में बढ़ती मिलनसारिता को दिखाता है जिसकी व्याख्या दोनों देशों ने मार्च 2021 में “पूरे क्षेत्र के लिए द्विपक्षीय संबंधों के एक आदर्श” के तौर पर की थी. 

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Sohini Bose

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Sohini Bose is an Associate Fellow at Observer Research Foundation (ORF), Kolkata with the Strategic Studies Programme. Her area of research is India’s eastern maritime ...

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