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Published on Mar 17, 2026 Updated 2 Days ago

चीन ने 40 जापानी कंपनियों पर निर्यात प्रतिबंध बढ़ाकर जापान के साथ तकनीक और उद्योग में “नियंत्रित अलगाव” की दिशा में कदम बढ़ाया है. ताइवान और सुरक्षा मुद्दों पर बढ़ते तनाव के बीच यह कदम दिखाता है कि पूर्वी एशिया में चीन-जापान संबंध केवल व्यापार नहीं बल्कि रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बनते जा रहे हैं.

चीन ने 40 जापानी कंपनियों पर क्यों लगाई पाबंदी?

24 फरवरी को चीन ने अपने निर्यात प्रतिबंध का विस्तार करते हुए इसमें 40 जापानी कंपनियों और संस्थानों को शामिल कर लिया. ये कंपनियां जहाज़ निर्माण, एरो-इंजन, डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर मैटेरियल और ऑप्टिकल फिल्म जैसे प्रमुख उद्योगों से जुड़ी हैं. इनमें मित्सुबिशी हेवी इंडस्ट्रीज़, कावासाकी हेवी इंडस्ट्रीज, IHI कॉरपोरेशन, NEC कॉरपोरेशन और फुजित्सु की कई सहायक कंपनियों के साथ-साथ नेशनल डिफेंस एकेडमी ऑफ जापान और जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (JAXA) शामिल हैं. चीनी मीडिया ने संकेत दिया कि इस कदम का मक़सद मटेरियल और प्रिसीज़न मैन्युफैक्चरिंग में चीन और जापान के बीच दीर्घकालिक “नियंत्रित अलगाव” को आगे बढ़ाना है. इसमें सेमीकंडक्टर प्रोसेस मैटेरियल, ऑप्टिकल थिन फिल्म्स और स्पेशलिटी केमिकल में चीन के द्वारा अपना R&D निवेश बढ़ाना शामिल है. वहीं जापान की कंपनियां नीतिगत जोखिम को कम करने के लिए ‘चाइना प्लस वन’ की अपनी रणनीति तेज़ कर रही हैं. इसके लिए वो दक्षिण पूर्व एशिया और भारत में उच्च स्तरीय मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की रणनीति अपना रही हैं. 

चीन का कहना है कि अतीत में चीन को लेकर जापान की नीति “अर्थव्यवस्था पहले, सुरक्षा बाद में” थी. लेकिन अब वो “सुरक्षा सर्वप्रथम, सक्रिय रक्षा” को प्राथमिकता दे रहा है. इसके कारण हाल के महीनों में चीन ने जापान के ख़िलाफ़ कई जवाबी कदम उठाए हैं.

ये घटनाक्रम जापान के ख़िलाफ़ चीन की बढ़ती सख्ती में सबसे नया है. इस सख्ती की शुरुआत पिछले नवंबर में जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के उस बयान के बाद हुई थी जिसमें उन्होंने संकेत दिया था कि ताइवान पर चीन के हमले के जवाब में जापान सैन्य प्रतिक्रिया दे सकता है. चीन का कहना है कि अतीत में चीन को लेकर जापान की नीति “अर्थव्यवस्था पहले, सुरक्षा बाद में” थी. लेकिन अब वो “सुरक्षा सर्वप्रथम, सक्रिय रक्षा” को प्राथमिकता दे रहा है. इसके कारण हाल के महीनों में चीन ने जापान के ख़िलाफ़ कई जवाबी कदम उठाए हैं. इनमें जापानी सीफूड का आयात रोकने से लेकर युद्धपोत भेजना और रेयर अर्थ के निर्यात पर नियंत्रण कड़ा करना, चीन के पर्यटकों को जापान जाने से रोकना, संगीत कार्यक्रमों को रद्द करना एवं पांडा को वापस बुलाना शामिल है. 

चीन-जापान संबंधों में एक संरचनात्मक बदलाव

ये ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि चीन के विद्वान संबंधों में मौजूदा गिरावट को समय-समय पर आने वाले महज़ एक और उतार-चढ़ाव के रूप में नहीं देखते हैं बल्कि एक महत्वपूर्ण सांकेतिक घटना मानते हैं जिसके दीर्घकालिक परिणाम हैं, विशेष रूप से अमेरिका-चीन के बीच शक्ति परिवर्तन के व्यापक दृष्टिकोण से. चीन के लिए मौजूदा गतिरोध तीन मुद्दों को एक साथ जोड़ता है: ताइवान के मुद्दे पर अंतिम समाधान; पूर्वी एशियाई क्षेत्रीय व्यवस्था का पुनर्निर्माण जिसके केंद्र में चीन-जापान संबंध हैं और चीन के पक्ष में शक्ति संतुलन में बदलाव के बाद अमेरिका के साथ एक नए स्थिर संबंध का निर्माण. 

शक्ति के उभरते संतुलन में अपने बढ़ते प्रभाव को दिखाकर और उसका लाभ उठाकर चीन तेज़ी से ऊपर बताए गए विषयों के इर्द-गिर्द नैरेटिव और एजेंडा तय करना चाह रहा है. इसी के अनुसार चीन ने सितंबर 2025 में एक भव्य मिलिट्री परेड का आयोजन किया जिसमें “जापानी आक्रमण के ख़िलाफ़ चीन के प्रतिरोध और फासीवाद के विरुद्ध दुनिया की जीत” की 80वीं सालगिरह मनाई गई. इस समारोह में 26 देशों के राष्ट्राध्यक्ष और सरकार के प्रमुख शामिल हुए. इस समारोह में शी जिनपिंग ने अपने भाषण के दौरान “द्वितीय विश्व युद्ध के सही ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य” को कायम रखने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया. अपने भाषण में उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में मिली जीत के नतीजतन और युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के एक प्रमुख घटक- दोनों के रूप में चीन में ताइवान की वापसी पर ज़ोर दिया. उनका संबोधन चीन की सोच में बदलाव को दिखाता है. उन्होंने ताइवान मुद्दे को घरेलू मामलों एवं संप्रभुता के पारंपरिक नैरेटिव से आगे रखा. 

दूसरा, चीन ने इस विचार को आगे बढ़ाया है कि चीन और अमेरिका को मिलकर युद्ध के बाद की अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को कायम रखना चाहिए. इस तरह उन्होंने जापान के ख़िलाफ़ दोनों देशों के युद्धकालीन सहयोग के इतिहास की याद दिलाई. इस संदर्भ में ये जापान के दक्षिणपंथ को लेकर चिंताओं को उजागर करता है जो सामूहिक आत्म-रक्षा का हवाला देकर ताइवान को लेकर अमेरिका को चीन के साथ संघर्ष में घसीट सकता है. 

इस समारोह में शी जिनपिंग ने अपने भाषण के दौरान “द्वितीय विश्व युद्ध के सही ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य” को कायम रखने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया. अपने भाषण में उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में मिली जीत के नतीजतन और युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के एक प्रमुख घटक- दोनों के रूप में चीन में ताइवान की वापसी पर ज़ोर दिया.

चाइनीज़ यूनिवर्सिटी ऑफ हॉन्ग कॉन्ग के प्रोफेसर झेंग योंगनियान जैसे चीनी विद्वानों की दलील है कि जापान को इस बात की इजाज़त नहीं दी जा सकती कि वो “इज़रायल की तरह अमेरिका को अपने लक्ष्य प्राप्त करने के लिए निर्देशित करे”. इसलिए कहा गया है कि अगर चीन के साथ अमेरिका तनाव कम करना चाहता है तो उसे जापान के दक्षिणपंथी झुकाव को रोकना होगा. इसी संदर्भ में पिछले नवंबर में ऐसी ख़बरें आईं कि डोनाल्ड ट्रंप ने शी जिनपिंग के कहने पर जापानी प्रधानमंत्री से अनुरोध किया कि वो ताइवान को लेकर अपनी बयानबाज़ी नरम करें ताकि चीन के साथ चल रही बातचीत में रुकावट नहीं आए. 

अमेरिका-जापान की ‘दक्षिणपंथी’ एकजुटता को लेकर चीन की चिंता

पिछले चुनाव में सनाए ताकाइची की ज़बरदस्त जीत ने चीन में चिंता बढ़ा दी है. चीन के आकलन के मुताबिक हाउस ऑफ रिप्रेज़ेंटेटिव में दो-तिहाई से ज़्यादा का बहुमत जापान को सैन्य खर्च बढ़ाने, संवैधानिक संशोधन करने, “तीन परमाणु विरोधी सिद्धांतों” को त्यागने और चीन की तरफ सख्त रुख को बिना किसी रुकावट के अपनाने को आसान बनाएगा. इसलिए चीन को लगता है कि ये कोई सामान्य चुनावी नतीजे नहीं हैं बल्कि एक रणनीतिक बदलाव है जिसका पूर्वी एशिया के सुरक्षा परिदृश्य पर असर पड़ेगा. 

भारत को पूर्वी एशिया के घटनाक्रम पर बारीकी से नज़र रखनी चाहिए और चीन-जापान संबंधों में मौजूदा गिरावट का आकलन रणनीतिक पहलू से करना चाहिए. ये उम्मीद करते हुए कि आर्थिक और राजनीतिक संबंध जल्द ही सामान्य हो जाएंगे, इसे एक सामान्य उतार-चढ़ाव मानकर खारिज नहीं करना चाहिए.

चीन को सबसे ज़्यादा चिंता जापान के राजनीतिक बदलाव को लेकर अमेरिका के रुख पर है. चीन के विश्लेषकों का कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव की पूर्वसंध्या पर सार्वजनिक रूप से सनाए ताकाइची के लिए प्रचार किया और नतीजों की घोषणा के बाद तुरंत उन्हें बधाई दी. इस तरह उन्होंने स्पष्ट रूप से ताकाइची के रुढ़िवादी रवैये और “ताकत के ज़रिए शांति” की कूटनीति का समर्थन किया. 

चीन की नज़र अब जापान की प्रधानमंत्री के संभावित अमेरिका दौरे पर है जो 19 मार्च से शुरू हो रहा है. मुख्य सवाल है कि ये दौरा केवल सैन्य खर्च, हथियार निर्यात, जवाबी हमले की क्षमता जैसे मुद्दों तक सीमित रहता है या इससे अमेरिका-जापान सुरक्षा गठबंधन में “गुणात्मक परिवर्तन” आएगा जिसमें जापानी संविधान के अनुच्छेद 9 में संशोधन, “तीन परमाणु विरोधी सिद्धांतों” में फेरबदल या ताइवान स्ट्रेट में दोनों पक्षों के द्वारा सीधे हस्तक्षेप जैसे कदम शामिल हो सकते हैं.  भारत को पूर्वी एशिया के घटनाक्रम पर बारीकी से नज़र रखनी चाहिए और चीन-जापान संबंधों में मौजूदा गिरावट का आकलन रणनीतिक पहलू से करना चाहिए. ये उम्मीद करते हुए कि आर्थिक और राजनीतिक संबंध जल्द ही सामान्य हो जाएंगे, इसे एक सामान्य उतार-चढ़ाव मानकर खारिज नहीं करना चाहिए.


अंतरा घोषाल सिंह ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में फेलो हैं.

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Antara Ghosal Singh

Antara Ghosal Singh

Antara Ghosal Singh is a Fellow at the Strategic Studies Programme at Observer Research Foundation, New Delhi. Her area of research includes China-India relations, China-India-US ...

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