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Published on May 15, 2024 Updated 0 Hours ago

ये पावर प्लांट न केवल पर्यावरण के लिए ख़तरा पैदा करते हैं बल्कि इनसे सुरक्षा से जुड़े जोख़िम भी हैं.

चीन के ख़तरे से ताइवान की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षा में तेज़ी!

चीन के रणनीतिकार सुन ज़ू ने दलील दी थी कि युद्ध हर हाल में छल का सहारा लेकर लड़ा जाना चाहिए. उनके आकलन के मुताबिक युद्ध लड़ने वाले देशों के लिए दुश्मन को उकसाना एवं उत्तेजित करना और दुश्मन को कमज़ोर करने के मक़सद से उनकी एकजुटता में मतभेद पैदा करना ज़रूरी है. चूंकि ताइवान के नए निर्वाचित राष्ट्रपति लाई चिंग-ते के पद संभालने की घड़ी करीब आ गई है, जो कि 20 मई को निर्धारित की गई है, ऐसे में सुन ज़ू के वारिस अतीत के छल-कपट के तरीकों से सीख रहे हैं.  

 चूंकि ताइवान के नए निर्वाचित राष्ट्रपति लाई चिंग-ते के पद संभालने की घड़ी करीब आ गई है, जो कि 20 मई को निर्धारित की गई है, ऐसे में सुन ज़ू के वारिस अतीत के छल-कपट के तरीकों से सीख रहे हैं.  

चीन के मिनिस्ट्री ऑफ स्टेट सिक्युरिटी (विदेश में इंटेलिजेंस, काउंटर इंटेलिजेंस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीतिक सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार) ने एक लेख प्रकाशित किया है जिसमें कहा गया है कि अलगाववाद का मज़बूती से विरोध करना और ताइवान की स्वतंत्रता के लिए ज़ोर लगाने वाली ताकतों को हराना ज़रूरी है. इंटेलिजेंस एजेंसी ने आगे ये तर्क दिया है कि ताइवान के एकीकरण का काम नए जोश के साथ करना चाहिए और इसके लिए उन ताकतों को मज़बूत करना महत्वपूर्ण है जो मेनलैंड के साथ ताइवान को मिलाने के लिए उत्सुक हैं. लेख में एकीकरण के पक्ष में ताइवान, जिसे चीन अपना एक अलग हो चुका प्रांत मानता है, के लोगों की राय एकजुट करने की वकालत की गई है. इसमें ताइवान में एक गुप्त मोर्चा बनाने की धारणा को भी आगे बढ़ाया गया है जो एकीकरण के लक्ष्य को पूरा करेगा. 

“टू सेशंस” का आयोजन

इस साल के “टू सेशंस”- जो चीन में एक राजनीतिक आयोजन है जिस दौरान नेशनल पीपुल्स कांग्रेस (संसद) और चाइनीज़ पीपुल्स पॉलिटिकल कंसल्टेटिव कॉन्फ्रेंस (राजनीतिक सलाहकार संस्था) के सदस्य कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात करते हैं- के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के बड़े अधिकारियों को अंतरिक्ष, इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्रों में क्षमता में सुधार करके समुद्री संघर्ष के लिए तैयारी करने को कहा. 

चीन की इस राय को ताइवान और मेनलैंड की राजनीतिक पार्टियों के बीच के समीकरण और ताइवान के हवाई क्षेत्र में PLA की ग्रे ज़ोन गतिविधियों के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए. 2024 में ताइवान के राष्ट्रपति के चुनाव से पहले अपने एक भाषण में शी जिनपिंग ने कहा, “स्ट्रेट (जलसंधि) के दोनों तरफ रहने वाले लोग एक परिवार के सदस्य हैं” और वो ये उम्मीद करते हैं कि ताइवान के देशवासी चीनी राष्ट्र के लिए मक़सद के साथ मिलकर काम करेंगे. ऐसा लगा कि उनका ये बयान चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) और उसके एकीकरण के लक्ष्य के साथ सहानुभूति रखने वाले लोगों तक पहुंचने की कोशिश है. ताइवान को इस संकेत के बाद ताइवान के पूर्व राष्ट्रपति मा यिंग-ज्यू ने इस साल अप्रैल में राष्ट्रपति शी जिनपिंग और CPC के वरिष्ठ नेताओं से मिलने के लिए बीजिंग का हाई-प्रोफाइल दौरा किया. इस शिखर सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति शी ने ये संदेश दोहराया कि स्ट्रेट के दोनों तरफ रहने वाले लोग चीन के नागरिक हैं और देशवासियों को ताइवान की स्वतंत्रता का विरोध करना चाहिए. ध्यान देने की बात है कि ये बैठक ताइवान रिलेशंस एक्ट (संबंध अधिनियम) तैयार होने की 45वीं सालगिरह के दौरान हुई. ये अधिनियम अमेरिका के साथ ताइवान के संबंधों को मज़बूती देता है और उसकी सुरक्षा को सहारा देता है. 

लगता है कि दुश्मन के खेमे में मतभेद पैदा करने की सुन ज़ू की सलाह को मानते हुए चीन ताइवान की सत्ता से जुड़े लोगों के साथ संपर्क बना रहा है. इसका पता रक्षा सेवाओं से जुड़े एक जासूसी के नेटवर्क के खुलासे से चला जिसकी वजह से वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को कोर्ट मार्शल किया गया. इसके अलावा जासूसी का ये नेटवर्क गुप्त सूचना चीन तक पहुंचाने के लिए मौजूदा और रिटायर्ड कर्मियों को सक्रिय रूप से अपने साथ जोड़े हुए था. पिछले कुछ वर्षों में ताइवान के साइबर स्पेस को निशाना बनाकर और फिज़िकल साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर के ख़िलाफ हमलों में बढ़ोतरी हुई है. पिछले साल ताइवान के मात्सू द्वीप को इंटरनेट से जोड़ने वाले समुद्री केबल को तोड़ दिया गया जिसकी वजह से द्वीप की इंटरनेट कनेक्टिविटी पर असर पड़ा. कुछ लोगों का मानना है कि ये ताइवान पर चीन के आक्रमण की स्थिति में इंटरनेट तक ताइवान की पहुंच को ख़त्म करने के लिए तैयारी हो सकती है. ये ताइवान के लिए मुख्य कमज़ोरी है क्योंकि अंडरवॉटर इंटरनेट केबल ताइवान को दुनिया के साथ जोड़ते हैं. इंटरनेट हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया है और ताइवान के थिंक-टैंक इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल डिफेंस एंड सिक्युरिटी रिसर्च ने चेतावनी दी है कि PLA द्वीप में अराजकता फैलाने के लिए अंडरवॉटर केबल को तोड़ने की कोशिश कर सकती है. 

पिछले साल ताइवान के मात्सू द्वीप को इंटरनेट से जोड़ने वाले समुद्री केबल को तोड़ दिया गया जिसकी वजह से द्वीप की इंटरनेट कनेक्टिविटी पर असर पड़ा. कुछ लोगों का मानना है कि ये ताइवान पर चीन के आक्रमण की स्थिति में इंटरनेट तक ताइवान की पहुंच को ख़त्म करने के लिए तैयारी हो सकती है.

ताइवान की संचार क्षमता को चोट पहुंचाने से जुड़े चीन के ख़तरों पर ध्यान देते हुए ताइवान के नेतृत्व ने एक स्वदेशी सैटेलाइट सिस्टम बनाने में दिलचस्पी जताई है जो इंटरनेट तक लोगों की पहुंच में मदद कर सकता है. इस प्रकार संचार सामर्थ्य चीन के ख़तरों के ख़िलाफ़ ताइवान की रक्षा तैयारी की एक महत्वपूर्ण विशेषता बन गया है. वैसे तो अंतरिक्ष में ताइवान की महत्वाकांक्षाओं की दिशा में राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिक विचार है लेकिन अपनी तकनीकी बुनियाद, विशेष रूप से सेमीकंडक्टर के उत्पादन की क्षमता, का लाभ उठाने की भी इच्छा है. निवर्तमान साई इंग-वेन प्रशासन ने अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए वित्तीय समर्थन में बढ़ोतरी की है और लगभग 25.1 अरब ताइवानी डॉलर (लगभग 790 मिलियन अमेरिकी डॉलर) के निवेश का वादा किया है. 

 

भारत-ताइवान ‘हित’

साई इंग-वेन प्रशासन की अग्रणी पहल में से एक थी क्षेत्रीय एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए ताइवान की तकनीकी जानकारी का फायदा उठाना. इसकी वजह से ‘न्यू साउथबाउंड पॉलिसी’ तैयार हुई. भारत ने भी ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के साथ पूर्व एशिया को लेकर अपने दृष्टिकोण में बदलाव किया. अंतरिक्ष कार्यक्रम में हालिया सफ़लताओं ने अपनी अंतरिक्ष-तकनीकी क्षमताओं में भारत के भरोसे को बढ़ाया है. 2017 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपने PSLV रॉकेट का इस्तेमाल कर 104 सैटेलाइट को लॉन्च किया जिनमें से 101 विदेशी थे. इस शानदार रिकॉर्ड के साथ भारत ने 1999 से अपने लॉन्च व्हीकल का उपयोग करके 432 विदेशी सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजा है. 2023 में G20 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लोबल साउथ के लिए एक सैटेलाइट विकसित करने के उद्देश्य से संसाधनों को इकट्ठा करने पर ज़ोर दिया. इस संबंध में भारत और ताइवान के हित मिलते हैं और उनके बीच तालमेल की संभावनाएं हैं. ताइवान सैटेलाइट को लॉन्च करने वाला रॉकेट सिस्टम विकसित करने के लिए उत्सुक है और इसको लेकर उसने अतीत में अमेरिका और यूरोपियन यूनियन के साथ साझेदारी की है. ताइवान ने अपने तकनीकी साझेदारों में विविधता लाने में दिलचस्पी जताई है और भारत को एक किफायती विकल्प के रूप में देखा जाता है जो कि राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी ठीक है. 

20 मई को ताइवान में नए प्रशासन के काम-काज संभालने के साथ भारत को ताइवान के साथ अंतरिक्ष सहयोग को अगले स्तर पर ले जाने की आकांक्षा रखनी चाहिए. 

हाल के वर्षों में दोनों पक्षों की सरकारी और प्राइवेट कंपनियों के बीच तालमेल के साथ इस क्षेत्र में सहयोग में बढ़ोतरी हुई है. 2018 में ताइवान के राष्ट्रीय अंतरिक्ष संगठन (NSO) ने टायफून जैसी चरम मौसमी घटनाओं (एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स) पर नज़र रखने में ISRO से सहयोग मांगा. अक्टूबर 2022 में ताइवान स्पेस इंडस्ट्री डेवलपमेंट एसोसिएशन (TSIDA) और भारत के सैटकॉम इंडस्ट्री एसोसिएशन (SIA-इंडिया) ने जानकारी के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने और अंतरिक्ष क्षेत्र में वाणिज्यिक अवसरों का पता लगाने के लिए इंडिया स्पेस कांग्रेस में एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए. इस लक्ष्य की दिशा में मार्च 2023 में साझा तौर पर एक अंतर्राष्ट्रीय स्पेस-टेक स्टार्टअप सपोर्ट प्रोग्राम (ISSSP) का आयोजन किया गया जहां भारत के अंतरिक्ष स्टार्टअप्स ने अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया और तालमेल के लिए वाणिज्यिक अवसरों की खोज की. सितंबर 2023 में दूसरे ISSSP में रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए चुने गए कुल 16 स्पेस-टेक स्टार्टअप्स में से आठ भारत से थे. 

स्पेस-टेक जानकारी के आदान-प्रदान में सहयोग के अलावा ताइवान और भारत अपने अंतरिक्ष तालमेल को और बढ़ा सकते हैं जहां भारत कम लागत में ताइवान को सैटेलाइट लॉन्च करने की सुविधा की पेशकश कर सकता है और ताइवान महत्वपूर्ण पुर्जे एवं प्रिसिज़न मशीनरी विकसित करने में भारत की मदद कर सकता है. इस तरह 20 मई को ताइवान में नए प्रशासन के काम-काज संभालने के साथ भारत को ताइवान के साथ अंतरिक्ष सहयोग को अगले स्तर पर ले जाने की आकांक्षा रखनी चाहिए. 


कल्पित ए मंकिकर ORF के स्ट्रैटजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में फेलो हैं. 

सत्यम सिंह ORF के स्ट्रैटजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में रिसर्च इंटर्न हैं. 

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Authors

Kalpit A Mankikar

Kalpit A Mankikar

Kalpit A Mankikar is a Fellow with Strategic Studies programme and is based out of ORFs Delhi centre. His research focusses on China specifically looking ...

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Satyam Singh

Satyam Singh

Satyam Singh is a Research Intern under the Strategic Studies Programme at ORF, New Delhi. He studies China’s foreign policy, particularly in relation to India. In ...

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