-
CENTRES
Progammes & Centres
Location
जैसे जैसे चीन, अफ्रीका में अपनी थिंक टैंक कूटनीति को तेज़ करता जा रहा है, वैसे वैसे इकतरफ़ा परिचर्चा, सॉफ्ट पॉवर के दबदबे और चीन के मूल्यों और आदर्शों के बेधड़क प्रसार को लेकर चिंताएं भी बढ़ती जा रही हैं.
Image Source: Getty
ये हमारी चाइना क्रॉनिकल्स सीरीज़ की 177वीं किस्त है
अब जबकि तेज़ी से बहुध्रुवीय होती दुनिया में चीन, ख़ुद को ग्लोबल साउथ के अगुवा के तौर पर स्थापित करने में जुटा हुआ है, तो उसको इस बात का एहसास भी है कि इसके लिए सिर्फ़ सैन्य शक्ति और आर्थिक कूटनीति से काम नहीं चलने वाला है. प्रभावी तरीक़े से लोगों के दिल दिमाग़ जीतने के लिए कूटनीति और सॉफ्ट पावर के रणनीतिक तालमेल का भी इस्तेमाल करना होगा. अपना दबदबा बढ़ाने और वैश्विक परिचर्चा का रुख़ अपने हित में मोड़ने के लिए चीन ने अपनी थिंक टैंक कूटनीति को तेज़ कर दिया है. इसमें ग्लोबल साउथ के तमाम देशों में ‘चीन की ख़ूबियों वाले नए थिंक टैंक’ की स्थापना और उनको बढ़ावा देना शामिल है. इस मामले में चीन, अफ्रीका पर ख़ास ज़ोर दे रहा है.
थिंक टैंक कूटनीति का मतलब, चीन द्वारा अपने रिसर्च संस्थानों और नीतिगत मंचों का रणनीतिक इस्तेमाल करके विदेशी संबंधों में अपने प्रभाव का प्रचार करना है. 2022 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने साफ़ तौर पर ‘तमाम ख़ास क्षेत्रों से जुड़े, अकादमी और परिचर्चा की व्यवस्थाओं’ के विकास की ज़रूरत पर बल दिया था. इस पहल का मक़सद, चीन की अंतरराष्ट्रीय छवि को चमकाने से कहीं आगे तक जाता है. चीन का व्यापक लक्ष्य ऐसे मंचों का निर्माण करना है, जो चीन की विश्व दृष्टि, उसके प्रशासन के मॉडल और विकास के नमूनों को पश्चिम के मौजूदा चलन वाले उदारवादी मूल्यों के उलट दूसरे विश्वसनीय और आकर्षक विकल्पों के तौर पर है.
चीन ने औपचारिक रूप से अक्टूबर 2011 में चीन- अफ्रीका थिंक टैंक फोरम (CATTF) की शुरुआत की थी, जिसमें 27 अफ्रीकी देशों के प्रतिनिधियों को बुलाया गया था. चीन अफ्रीका थिंक टैंक टैंक्स फोरम, चीन और अफ्रीका के थिंक टैंकों के बीच संवाद और आदान-प्रदान के एक स्थायी मंच का काम करता है. कम से कम सैद्धांतिक तौर पर तो इसके मक़सदों में आपसी समझ को मज़बूत बनाना, नागरिकों की भागीदारी को बढ़ावा देना और मुक्त रूप से संवाद करना और चीन और अफ्रीका के बीच सहयोग के तमाम क्षेत्रों को बेहतर बनाने के लिए नीतिगत सुझाव तैयार करना है. शांति और सुरक्षा, वित्त और निवेश और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे अहम क्षेत्रों पर निशाना साधकर CATTF का मक़सद अकादमिक सहयोग को गहराई देना, टिकाऊ विकास में मदद करना और चीन एवं अफ्रीका के बीच दूरगामी साझेदारी को मज़बूत बनाना है.
थिंक टैंक कूटनीति का मतलब, चीन द्वारा अपने रिसर्च संस्थानों और नीतिगत मंचों का रणनीतिक इस्तेमाल करके विदेशी संबंधों में अपने प्रभाव का प्रचार करना है.
2013 में सत्ता में आने के बाद से राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इन पहलों के व्यापक प्रसार पर बल दिया है. चीन ने CATTF के अलावा भी दूसरे कई थिंक टैंकों के नेटवर्क को स्थापित किया है. इनमें बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और ग्लोबल कम्युनिटी ऑफ शेयर्ड फ्यूचर शामिल हैं. इन नेटवर्कों को मुख्य रूप से चीन की सरकारी संस्थाएं, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सामरिक शाखाएं जैसे कि चाइनीज़ एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज (CASS), पीपुल्स डेली, CGTN और शिन्हुआ न्यूज़ एजेंसी, अपने अंतरराष्ट्रीय साझीदारों के साथ मिलकर चलाती हैं.
इन तयशुदा मक़सदों के साथ चीन ने 20 मई 2025 को कुनमिंग में चीन अफ्रीका थिंक टैंक फोरम के 14वें सम्मेलन का आयोजन किया था. इसमें चीन और अफ्रीका के लगभग 100 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था. इस मंच का आयोजन ‘चाइना अफ्रीका गवर्नेंस एक्सपीरियंस एंड चाइनीज़ मॉडर्नाइज़ेशन’ के झंडे तले किया गया था.
इस मंच में शामिल होने वालों ने ‘कुनमिंग की आम सहमति’ का समर्थन करते हुए प्रशासन और विकास में सहयोग को गहराई देने और चीन के आधुनिकीकरण और अफ्रीका के विकास की स्वतंत्र रणनीतियों के बीच तालमेल बिठाने पर सहमति जताई थी. इस मंच के बाद, प्रतिनिधियों ने चीन के युन्नान सूबे का तीन दिनों का दौरा किया था, ताकि आधुनिकीकरण के चीन के प्रयासों के तमाम पहलुओं को देख समझ सकें. इनमें ग्रामीण क्षेत्र का नवीनीकरण, पर्यावरण को टिकाऊ बनाना, आविष्कार पर आधारित प्रगति और सामुदायिक प्रशासन शामिल था.
14वें CATFF की ख़ास अहमियत है क्योंकि ये 2024 के फोरम ऑन चाइना अफ्रीका को-ऑपरेशन (FOCAC) के सीधे फॉलो-अप के तौर पर किया गया था. FOCAC अफ्रीका के साथ संबंधों को आगे बढ़ाने का सबसे अहम बहुस्तरीय मंच है. 2024 में बीजिंग में हुए FOCAC के सम्मेलन के दौरान, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने आधुनिकीकरण को लेकर चीन और अफ्रीका की साझेदारी के छह बुनियादी स्तंभों को रेखांकित किया था और साझा भविष्य वाले चीन और अफ्रीका के सदाबहार समुदाय के निर्माण की एक व्यापक कार्य योजना सामने रखी थी.
इसके बदले में चीन, अफ्रीकी देशों से ये अपेक्षा करता है कि वो संयुक्त राष्ट्र (UN) और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मंचों में चीन को कूटनीतिक समर्थन दें. महत्वपूर्ण बात ये है कि इस एक्शन प्लान में शी जिनपिंग की तीन वैश्विक पहलों- ग्लोबल डेवलपमेंट इनिशिएटिव (GDI), ग्लोबल सिक्योरिटी इनिशिएटिव (GSI) और ग्लोबल सिविलाइज़ेशन इनिशिएटिव (GCI) को लागू करने को प्राथमिकता दी गई है. परिकल्पना के ये तीन कोण, सामूहिक रूप से वैकल्पिक वैश्विक नियमों और प्रशासनिक मॉडलों को लेकर चीन के दृष्टिकोण का आधार हैं.
दूसरे देशों के मीडिया, थिंक टैंक, अकादमी क्षेत्र और कारोबारी सेक्टर के साथ संवाद, चीन की विदेश नीति का एक ज़रूरी तत्व है. ट्रैक II और लोगों के बीच आदान- प्रदान के ज़रिए चीन अपनी अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति का विस्तार करना चाहता है, ताकि वो दुनिया के आम लोगों के बीच अपनी हैसियत बढ़ा सके और बहुपक्षवाद एवं मुक्त व्यापार के मज़बूत समर्थक के तौर पर अपनी छवि को चमका सके.
अफ्रीका का टिकाऊ विकास किसी बाहरी मॉडल को जस का तस अपना लेने से नहीं होगा, फिर चाहे वो पश्चिमी मॉडल हो या चीनी. इसके बजाय अफ्रीका की अगुवाई वाले ऐसे समाधान तलाशने होंगे, जो इस महाद्वीप के विविधता भरे ऐतिहासिक तजुर्बों, सांस्कृतिक संदर्भों और सामूहिक आकांक्षाओं के साथ मज़बूती से जुड़े हों.
वैसे तो चीन की थिंक टैंक कूटनीति, अफ्रीकी देशों को विकास के वैकल्पिक मॉडल और रिसर्च एवं सहयोग में ठोस निवेश उपलब्ध कराती है. लेकिन, इससे कुछ चिंताएं भी पैदा होती हैं. किसी भी देश के विकास का मार्ग उसके अनूठे ऐतिहासिक संदर्भों और सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों से निर्धारित होना चाहिए. फिर भी चीन का अफ्रीका के विकास की मार्गदर्शक रूपरेखा के तौर पर ‘चीनी समाधान’ पर बल देना, विविधताओं से भरे अफ्रीका के अलग अलग देशों में इन मॉडलों को लागू करने की व्यावहारिकता और इससे जुड़े चीन के हितों को लेकर सवाल खड़े करता है.
आपसी समझ बढ़ाने की परिचर्चा के बावजूद, चीन के इनमें से ज़्यादातर फोरम का संचालन चीन के सरकारी संस्थान बड़ी चतुराई से करते हैं, जिससे खुली परिचर्चा की गुंजाइश या फिर चीन के विकास के मॉडल की आलोचनात्मक समीक्षा की संभावना काफ़ी कम हो जाती है. विचारों के ऐसे असमान आदान प्रदान से सच्चे बौद्धिक संवाद की संभावना सीमित हो जाती है और नीतिगत आविष्कार की गुंजाइश भी कम हो जाती है.
इसीलिए, तमाम कोशिशों और निवेश के बावजूद चीन के ये मंच अक्सर खुलकर संवाद को मज़बूती देने या फिर तमाम क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से आदान-प्रदान के मामले में कमज़ोर पड़ जाते हैं. इसके बजाय ये मंच चीन की संस्कृति के प्रति एक आदर्शवादी दृष्टिकोण को पेश करने की कोशिश करते हैं और एक पार्टी वाले प्रशासनिक मॉडल को विकास के एक व्यावहारिक विकल्प के तौर पर सामने रखते हैं, जो इसकी घोषणा से ही ज़ाहिर हो जाता है.
ऐसे में अफ्रीका के लिए मुख्य चुनौती ये है कि वो चीन के साथ संवाद को ख़ारिज न करे, बल्कि इस उभरते मंज़र से सोच-विचार और रणनीतिक दूरदृष्टि के साथ निपटे. अफ्रीका का टिकाऊ विकास किसी बाहरी मॉडल को जस का तस अपना लेने से नहीं होगा, फिर चाहे वो पश्चिमी मॉडल हो या चीनी. इसके बजाय अफ्रीका की अगुवाई वाले ऐसे समाधान तलाशने होंगे, जो इस महाद्वीप के विविधता भरे ऐतिहासिक तजुर्बों, सांस्कृतिक संदर्भों और सामूहिक आकांक्षाओं के साथ मज़बूती से जुड़े हों.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Samir Bhattacharya is an Associate Fellow at Observer Research Foundation (ORF), where he works on geopolitics with particular reference to Africa in the changing global ...
Read More +