Author : Emil Avdaliani

Expert Speak Raisina Debates
Published on Sep 18, 2025 Updated 4 Days ago

दक्षिण काकेशस अब केवल चीन का एक ट्रांजिट-हब नहीं, बल्कि यूरेशिया के सबसे विवादित क्षेत्रों (काला सागर क्षेत्र) में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का रणनीतिक अवसर भी है.

दक्षिण काकेशस में चीन की रणनीतिक बढ़त

दक्षिण काकेशस (पूर्वी यूरोपीय और पश्चिमी एशियाई क्षेत्र) के साथ चीन का रिश्ता एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है. इसे यहां के तीन देशों- आर्मेनिया, अज़रबैजान और जॉर्जिया के साथ उसकी बढ़ती आर्थिक भागीदारी, बढ़ते व्यापार और लगातार फल-फूल रही राजनीतिक साझेदारी से समझा जा सकता है. यह क्षेत्र कभी बीजिंग की यूरेशियाई रणनीति या उसके बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के केंद्र में नहीं था, बल्कि हाशिए पर था, मगर आज स्थिति यह है कि पूरे महाद्वीप में बदलती कनेक्टिविटी और महाशक्तियों के बीच बढ़ते टकराव के कारण यह कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है.

इस बदलाव का केंद्र-बिंदु है, तथाकथित मध्य गलियारे का बढ़ता महत्व. यह गलियारा वास्तव में, काला सागर से मध्य एशिया तक फैला एक ट्रांस-यूरेशियाई व्यापार मार्ग है. यूक्रेन और मध्य-पूर्व में चल रहे युद्धों व सामान्य अस्थिरता के कारण इस मार्ग का महत्व आज बहुत अधिक बढ़ गया है. जब बीजिंग ने एक दशक से भी अधिक समय पहले BRI की शुरुआत की थी, तब दक्षिण काकेशस उसकी योजनाओं में शायद ही शामिल था. उस समय, सोवियत काल के बुनियादी ढांचे और राजनीतिक विश्वसनीयता वाले रूसी मार्ग से ही चीन यूरोपीय संघ (EU) के देशों से सीधे जुड़ा करता था.

मध्य गलियारे की किस्मत तब पूरी तरह बदल गई, जब फरवरी 2022 में यूक्रेन में युद्ध शुरू हुआ और अस्थिर सुरक्षा माहौल के साथ-साथ पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण रूसी मार्ग से अंतरराष्ट्रीय जहाज़ों का होने वाला परिचालन बाधित हो गया. इसने बीजिंग को यह सोचने पर मजबूर किया कि वह उत्तरी परिवहन गलियारे पर अपनी निर्भरता का पुनर्मूल्यांकन करे, बल्कि दक्षिण काकेशस के साथ भी अपनी साझेदारी को एक नई ऊंचाई दे. 

मगर मध्य गलियारे की किस्मत तब पूरी तरह बदल गई, जब फरवरी 2022 में यूक्रेन में युद्ध शुरू हुआ और अस्थिर सुरक्षा माहौल के साथ-साथ पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण रूसी मार्ग से अंतरराष्ट्रीय जहाज़ों का होने वाला परिचालन बाधित हो गया. इसने बीजिंग को यह सोचने पर मजबूर किया कि वह उत्तरी परिवहन गलियारे पर अपनी निर्भरता का पुनर्मूल्यांकन करे, बल्कि दक्षिण काकेशस के साथ भी अपनी साझेदारी को एक नई ऊंचाई दे. दक्षिण काकेशस भौगोलिक रूप से चीन और यूरोपीय संघ को जोड़ने वाला सबसे छोटा ज़मीनी हिस्सा है. मध्य गलियारे पर चीन का ध्यान किस तरह बढ़ा है, इसका पता इससे भी चलता है कि अगस्त 2025 में जॉर्जिया, अज़रबैजान और कज़ाकिस्तान के रेलवे प्रमुखों के बीच एक बैठक में चीन रेलवे कंटेनर ट्रांसपोर्ट कॉर्प लिमिटेड (CRCT) को भी मध्य गलियारा विकसित कर रही उस साझा कंपनी में शामिल किया गया, जिसकी स्थापना 2023 में हुई है.

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि दक्षिण काकेशस से होकर गुज़रने वाला यह गलियारा रूस की मूल भूमि और हमेशा अस्थिर रहने वाले मध्य पूर्व, दोनों को दरकिनार करता है. इस बदलाव को संभव बनाने में क्षेत्रीय बुनियादी ढाँचे की बड़ी भूमिका रही, क्योंकि इस क्षेत्र में पहले से ही बुनियादी ढांचा मौजूद है. बाकू-त्बिलिसि-कार्स रेलवे ने आधुनिक राजमार्गों और कैस्पियन व काला सागर पर उपलब्ध बंदरगाह सुविधाओं के साथ मिलकर, वैकल्पिक व्यापार मार्गों की आधारशिला तैयार कर दी है. रूस और यूक्रेन युद्ध से जॉर्जिया और अज़रबैजान को यह मौका मिला है कि वे अपने संबंध ज़रूरी साझेदार के रूप में आगे बढ़ाएं. इतना ही नहीं, मध्य एशिया के साथ संबंधों को मज़बूत बनाने और चीन के साथ व्यापक सहयोग के दरवाज़े खोलने को भी वे आगे बढ़े हैं.

साफ़ है, इस क्षेत्र में चीन की रुचि और बढ़ने की ही संभावना है, क्योंकि 8 अगस्त, 2025 को वाशिंगटन डीसी में आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच ‘शांति और समृद्धि के लिए ट्रंप रोड’ (TRIPP) पर हस्ताक्षर किया गया है. TRIPP एक परिवहन गलियारा है, जो आर्मेनिया के सबसे दक्षिण क्षेत्र स्यूनिक होकर गुज़रेगा और अज़रबैजान को उसके बाहरी क्षेत्र नखचिवन से जोड़ेगा. इससे दक्षिण काकेशस, और उसके बाहर भी, सुरक्षा और संपर्क व्यवस्था बदल सकती है. बीजिंग ने अभी तक इस ‘रोड’ का खुलकर समर्थन नहीं किया है, लेकिन उभरता हुआ यह नया गलियारा चीन को दक्षिण काकेशस और तुर्किये के साथ अपने संबंधों में विविधता लाने में ज़रूर मदद करेगा.

इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि TRIPP चीन को आर्मेनिया तक पहुँचने का अवसर प्रदान करेगा. नागोर्नो-काराबाख़ क्षेत्र पर अधिकार जमाने के लिए होने वाले युद्धों के कारण आर्मेनिया 1990 के दशक से ही प्रमुख परिवहन ढांचों से कटा हुआ है. येरेवन और अंकारा, साथ ही येरेवन और बाकू के बीच संबंधों में होते सुधार को देखते हुए लगता यही है कि यह स्थिति अब बदलने वाली है. इतना ही नहीं, हाल-फिलहाल ऐसे संकेत भी मिले हैं कि आर्मेनिया, चीन के साथ अधिक व्यापक संबंध बढ़ाने को इच्छुक है. उदाहरण के लिए, येरेवन ने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का सदस्य बनने के लिए आधिकारिक रूप से आवेदन दिया है. इसको लेकर बयान विदेश मंत्री अरारत मिर्ज़ोयान की जून 2025 में हुई चीन की पहली आधिकारिक यात्रा के बाद सार्वजनिक तौर पर सामने आया है.

अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते टकराव, चीन को ऐसे व्यापारिक मार्ग तलाशने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, जहां अमेरिका का प्रभाव कम हो, क्योंकि मलक्का जलडमरूमध्य की पहेली को सुलझाना अब भी चीन के नीति-निर्माताओं के लिए चुनौती बनी हुई है.

चीन की भौगोलिक सीमा से बाहर, आर्मेनिया भी इस क्षेत्र में एक बड़ी ताक़त के रूप में उभर सकता है, जिसके साथ चीन एक रणनीतिक साझेदारी समझौता कर सकता है. यह दक्षिण काकेशस देशों के साथ संबंधों को बेहतर बनाने के बीजिंग के प्रयासों की ही अगली कड़ी होगी. 2023 में बीजिंग ने जॉर्जिया के साथ रणनीतिक साझेदारी से जुड़े एक समझौते पर हस्ताक्षर किया था. उसके बाद 2024 में अज़रबैजान के साथ भी इसी तरह का एक समझौता किया गया था. अप्रैल 2025 में बाकू के साथ भी संबंधों को समग्र साझेदारी समझौते के रूप में आगे बढ़ाया गया है. ये सभी समझौते काफ़ी अधिक व्यावहारिक हैं. चीन किसी विशेष वैचारिक सोच के साथ काम करने से बचता है, इसके बजाय वह अपना ध्यान संप्रभुता का पारस्परिक सम्मान करने और ठोस आर्थिक लाभों पर लगाता है. इन दस्तावेज़ों की विषय-वस्तु से यही पता चलता है कि मध्य गलियारा लगातार सहयोग के केंद्र-बिंदु के रूप में उभरा है.

व्यापक रणनीतिक परिदृश्य

बीजिंग के लिए दक्षिण काकेशस के साथ अधिक जुड़ाव की रणनीतिक वज़ह भी है. दरअसल, इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाकर चीन काला सागर पर एक महत्वपूर्ण बढ़त पाना चाहता है. काला सागर रूस व पश्चिम के बीच मुकाबले का केंद्र है और वैश्विक खाद्य व ऊर्जा आपूर्ति में एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है. दक्षिण काकेशस मध्य एशिया में स्वाभाविक विस्तार करने की चीन की सोच के अनुरूप है, जहां बीजिंग रेलवे, बंदरगाहों और अन्य बुनियादी ढांचों में निवेश करके अपनी सक्रियता लगातार बढ़ा रहा है. उदाहरण के लिए, चीन-किर्गिज़स्तान-उज़्बेकिस्तान रेलवे के निर्माण का काम चल रहा है, तो पश्चिमी कैस्पियन और काला सागर तटों पर परियोजनाएं जारी हैं, जॉर्जिया के अनाकलिया समुद्री बंदरगाह में भी चीन की गहरी रुचि है, जिस कारण यह एक वाणिज्यिक और बुनियादी ढांचा गलियारा बन जाता है.

दक्षिण काकेशस में प्रभाव बढ़ाने का चीन का प्रयास एक मायने में बीजिंग का अपने पश्चिम की ओर बढ़ने का भी संकेत है. वह समुद्री व्यापार पर अपनी निर्भरता को सीमित करना चाहता है, जो लगातार अस्थिर होता जा रहा है. वास्तव में, यमन में हूतियों से पैदा होने वाले सुरक्षा ख़तरे और यूक्रेन में युद्ध के कारण बनी अनिश्चितताएं दक्षिण काकेशस के प्रति आकर्षण बढ़ाती हैं. इसके अलावा, अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते टकराव, चीन को ऐसे व्यापारिक मार्ग तलाशने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, जहां अमेरिका का प्रभाव कम हो, क्योंकि मलक्का जलडमरूमध्य की पहेली को सुलझाना अब भी चीन के नीति-निर्माताओं के लिए चुनौती बनी हुई है.

दरअसल, इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाकर चीन काला सागर पर एक महत्वपूर्ण बढ़त पाना चाहता है. काला सागर रूस व पश्चिम के बीच मुकाबले का केंद्र है और वैश्विक खाद्य व ऊर्जा आपूर्ति में एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है. 

चीन का दक्षिण काकेशस में बढ़ता सक्रिय जुड़ाव ऐसे समय हो रहा है जब इस क्षेत्र पर लंबे समय तक पश्चिमी या रूसी प्रभाव को लेकर कई तरह के संदेह बने हुए हैं. न तो मॉस्को, न यूरोपीय संघ और न ही अमेरिका इस क्षेत्र पर पूरी तरह से हावी हो सकते हैं. रूस तो यूक्रेन में उलझा हुआ है, जबकि अमेरिका की अधिक रुचि मध्य पूर्व में है और वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी विदेश नीति को नए रूप में परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है. यूरोपीय संघ भी अब तक इस क्षेत्र में अपनी भागीदारी को लेकर कोई ठोस योजना बना पाने में सफल नहीं हो सका है. इसके साथ-साथ, दक्षिण काकेशस के देश भी सक्रिय रूप से अपनी विदेश नीति में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं. बहु-वेक्टरवाद, या किसी एक बड़ी ताक़त पर निर्भरता कम करने की सोच, आर्मेनिया, अज़रबैजान और जॉर्जिया के विदेशी संबंधों में साफ़-साफ़ देखी जा सकती है. चीन के साथ उनकी बढ़ती साझेदारी को भी इसी नज़रिये से देखा जाना चाहिए.

इस क्षेत्र में चीन की रुचि स्थानीय देशों तक पहुंचने और बहु-वेक्टरवाद तक ही सीमित नहीं है. हरित ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) का बीजिंग तेज़ी से विस्तार कर रहा है. अज़रबैजान चीनी हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक गाड़ियों का एक प्रमुख आयातक बनकर उभरा है, जिसने अकेले 2024 में करीब 15,500 गाड़ियां आयात कीं. यह साल 2023 की तुलना में एक बड़ी उछाल का संकेत थी. जॉर्जिया में भी चीनी कारें बाजार पर क़ब्ज़ा करती जा रही हैं. 2025 की पहली छमाही में, 3,616 इलेक्ट्रिक गाड़ियां इस देश में आयात की गईं, जो 2024 में दर्ज़ 1,922 गाड़ियों की तुलना में करीब 88 प्रतिशत अधिक हैं. चीन अब अमेरिका के बाद जॉर्जिया का दूसरा सबसे बड़ा इलेक्ट्रिक वाहन आपूर्तिकर्ता बन गया है. इसके अलावा, यूरोपीय संघ को चीनी गाड़ियों के पुनर्निर्यात में भी जार्जिया का विशेष महत्व है, क्योंकि काला सागर में इस देश की रणनीतिक मौजूदगी का ख़ास महत्व है. पश्चिमी जॉर्जिया के शहर कुटैसी में चीन कार उत्पादन की संभावना तलाशने को लेकर बातचीत भी कर रहा है, हालांकि अभी तक इस पर कोई ठोस सहमति नहीं बन सकी है.

निष्कर्ष

इस प्रकार दक्षिण काकेशस को लेकर बीजिंग का नज़रिया चीन के सुदूर पश्चिमी प्रांत शिनजियांग से मध्य एशिया होते हुए काला सागर तक निर्बाध गलियारा विकसित करने की सोच पर आधारित है. दक्षिण काकेशस अब केवल चीन का एक ट्रांजिट-हब नहीं, बल्कि यूरेशिया के सबसे विवादित क्षेत्रों (काला सागर क्षेत्र) में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का रणनीतिक अवसर भी है. इस क्षेत्र में चीन की स्थिति काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि यूक्रेन के युद्ध का क्या नतीजा निकलता है? अगर रूस की जीत होती है, तो उत्तरी यूरेशियाई गलियारा की तरफ शायद उसका फिर से आकर्षण बढ़ जाएगा और मध्य गलियारा पीछे छूट जाएगा. इससे दक्षिण काकेशस में चीन की रुचि घट सकती है. फिर भी, त्बिलिसी, बाकू और येरेवन के साथ बीजिंग की सक्रिय भागीदारी का लंबे समय तक यहां असर पड़ता रहेगा. स्पष्ट है, एक बहुध्रुवीय दक्षिण काकेशस में, चीन एक नए खिलाड़ी के रूप में उभरा है, जिसके साथ अन्य पारंपरिक देशों (रूस, अमेरिका और ईरान) को यहां टकराना पड़ सकता है.


(एमिल अवदालियानी जॉर्जिया के त्बिलिसी स्थित यूरोपीय विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर और सिल्क रोड्स के जानकार हैं)

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