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चीन में डिजिटल निगरानी और सोशल क्रेडिट सिस्टम से सरकार लोगों के व्यवहार और बोलने तक पर नज़र रखती है जहाँ नियम मानने पर फायदा और सवाल करने पर नुकसान होता है यानी तकनीक वहाँ सुविधा से ज़्यादा नियंत्रण का ज़रिया बन गई है.
चीन की डिजिटल शासन व्यवस्था दुनिया की सबसे सख़्त निगरानी प्रणालियों में शामिल है. इसके केंद्र में सोशल क्रेडिट सिस्टम है जो डेटा, क़ानून और प्रशासन के ज़रिये नागरिकों और कंपनियों के व्यवहार को नियंत्रित करता है.
अब तक सूचना युद्ध पर चर्चा ज़्यादातर चीन के बाहरी प्रचार तक सीमित रही है, जबकि हक़ीक़त यह है कि देश के भीतर निगरानी तंत्र और सोशल क्रेडिट सिस्टम मिलकर घरेलू जनमत और व्यवहार को दिशा देते हैं.
चीन की राजनीतिक सोच में सूचना को एक तटस्थ साधन नहीं, बल्कि एक रणनीतिक हथियार माना जाता है. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) दोनों ही यह मानते हैं कि आधुनिक संघर्ष केवल हथियारों से नहीं, बल्कि सूचनाओं के ज़रिये लड़े जाते हैं. सार्वजनिक राय को प्रभावित करना, मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना, क़ानूनी ढांचे का इस्तेमाल और नैरेटिव यानी कथानक को नियंत्रित करना-ये सभी चीन की रणनीति के अहम हिस्से हैं.
चीन की राजनीतिक सोच में सूचना को एक तटस्थ साधन नहीं, बल्कि एक रणनीतिक हथियार माना जाता है. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) दोनों ही यह मानते हैं कि आधुनिक संघर्ष केवल हथियारों से नहीं, बल्कि सूचनाओं के ज़रिये लड़े जाते हैं.
देश के भीतर इसका अर्थ है मीडिया, शिक्षा संस्थानों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर कड़ा नियंत्रण. उद्देश्य सिर्फ़ असहमति को दबाना नहीं है, बल्कि पहले से ही लोगों की सोच को एक तय दिशा में ढालना है. पार्टी द्वारा तय किए गए विचारों के इर्द-गिर्द राष्ट्रीय एकता और वैधता बनाए रखना इस रणनीति का मुख्य लक्ष्य है.
वहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यही सोच चीन की विदेश नीति और वैश्विक संचार अभियानों में दिखाई देती है. सरकारी मीडिया, विदेशों में सांस्कृतिक और शैक्षणिक गतिविधियाँ और ऑनलाइन अभियानों के ज़रिये चीन अपनी छवि गढ़ने की कोशिश करता है. इससे यह स्पष्ट होता है कि चीन के लिए सूचना पर नियंत्रण, देश के भीतर और बाहर- दोनों जगह- राष्ट्रीय रणनीति का अभिन्न हिस्सा है.
चीन में सूचना युद्ध का वास्तविक क्रियान्वयन उसकी निगरानी व्यवस्था के ज़रिये होता है. चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक, डिजिटल पहचान पत्र, मोबाइल और इंटरनेट गतिविधियों की निगरानी और एल्गोरिदम आधारित कंटेंट फ़िल्टरिंग-ये सभी रोज़मर्रा के शासन का हिस्सा बन चुके हैं.
इसी ढांचे में सोशल क्रेडिट सिस्टम एक केंद्रीय भूमिका निभाता है. यह सिस्टम नागरिकों और संस्थाओं के व्यवहार को डेटा में बदलकर उनकी विश्वसनीयता का आकलन करता है. व्यवहार, विचार और आज्ञाकारिता-इन सबको मापने योग्य अंकों और श्रेणियों में ढाल दिया जाता है. इस तरह, भरोसे जैसी अमूर्त अवधारणा को एक ठोस नियंत्रण उपकरण में बदल दिया जाता है.
चीन में सूचना युद्ध का वास्तविक क्रियान्वयन उसकी निगरानी व्यवस्था के ज़रिये होता है. चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक, डिजिटल पहचान पत्र, मोबाइल और इंटरनेट गतिविधियों की निगरानी और एल्गोरिदम आधारित कंटेंट फ़िल्टरिंग-ये सभी रोज़मर्रा के शासन का हिस्सा बन चुके हैं.
सोशल क्रेडिट सिस्टम केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं है. यह मनोवैज्ञानिक प्रबंधन, सामाजिक अनुशासन और विचारधारात्मक नियंत्रण को एक ही डिजिटल ढांचे में समेट देता है. इससे राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक शासन के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है.
चीन की निगरानी व्यवस्था कोई एकल प्रणाली नहीं, बल्कि तकनीक, क़ानून और संस्थानों का आपस में जुड़ा हुआ नेटवर्क है. शहरों और गाँवों में लगे सीसीटीवी कैमरे, मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट के लिए अनिवार्य पंजीकरण, ऑनलाइन भुगतान प्रणाली, बायोमेट्रिक डेटा-इन सबको जोड़कर नागरिकों की एक समग्र डिजिटल प्रोफ़ाइल बनाई जाती है.
“स्काईनेट” और “शार्प आइज़” जैसी परियोजनाओं के तहत हाई-डेफ़िनिशन कैमरों का जाल बिछाया गया है, जिन्हें चेहरे की पहचान और व्यवहार विश्लेषण से जोड़ा जा रहा है. इसका नतीजा यह है कि निगरानी केवल अपराध रोकने का साधन नहीं रहती, बल्कि सूचना पर प्रभुत्व स्थापित करने का माध्यम बन जाती है.
सोशल क्रेडिट सिस्टम की शुरुआत 2006 के आसपास एक ऐसे ढांचे के रूप में हुई थी, जिसका उद्देश्य व्यापारिक ईमानदारी और नागरिक ज़िम्मेदारी को बढ़ावा देना बताया गया लेकिन समय के साथ यह एक व्यापक नियंत्रण तंत्र में बदल गया.
यह प्रणाली किसी एक अंक पर आधारित नहीं है बल्कि ब्लैकलिस्ट और रेडलिस्ट के ज़रिये काम करती है. नियमों का उल्लंघन करने वालों, अदालत के आदेश न मानने वालों या सरकारी मानकों पर खरे न उतरने वालों को ब्लैकलिस्ट किया जाता है. इसका परिणाम यात्रा प्रतिबंध, नौकरी में बाधा, कर्ज़ न मिलना और सरकारी सेवाओं से वंचित होना हो सकता है.
इसके विपरीत, अच्छे नागरिकों को सुविधाएँ और प्राथमिकताएँ दी जाती हैं. 2022 तक, सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 72 लाख से अधिक लोगों को अविश्वसनीय की श्रेणी में रखा गया था, जो इस प्रणाली के व्यापक प्रभाव को दिखाता है.
सोशल क्रेडिट सिस्टम केवल नियम पालन सुनिश्चित नहीं करता बल्कि यह विचारों को भी नियंत्रित करता है. जो लोग सरकारी नीतियों का समर्थन करते हैं या आधिकारिक कथानकों को आगे बढ़ाते हैं, उन्हें लाभ मिलता है. वहीं, सवाल उठाने वालों या असहमति जताने वालों को सामाजिक और आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है.
इस तरह राजनीतिक आज्ञाकारिता को सामाजिक उन्नति से जोड़ दिया गया है. विचारधारात्मक निष्ठा को सामाजिक पूंजी में बदल दिया जाता है जबकि असहमति को जोखिम के रूप में दर्ज किया जाता है.
चीन में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को पहले से ही सामग्री की जाँच करने, सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ावा देने और नियम तोड़ने वालों की रिपोर्ट करने का निर्देश दिया गया है. एल्गोरिदम इस तरह बनाए गए हैं कि वे स्वीकृत विचारों को आगे बढ़ाएँ और आलोचनात्मक आवाज़ों को दबा दें.
सोशल क्रेडिट सिस्टम इस डिजिटल नियंत्रण को और मज़बूत करता है. ऑनलाइन गतिविधियों- जैसे सरकारी नीतियों की आलोचना या वैकल्पिक सूचनाएँ साझा करना- का सीधा असर व्यक्ति के सामाजिक दर्जे पर पड़ सकता है. इस तरह सूचना युद्ध रोज़मर्रा के शासन का हिस्सा बन जाता है.
चीन की सूचना रणनीति आज केवल उसकी घरेलू सीमाओं तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि वह धीरे-धीरे वैश्विक स्तर पर अपना प्रभाव बढ़ा रही है. सरकारी मीडिया के विस्तार, अंतरराष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय मौजूदगी और संगठित ऑनलाइन अभियानों के ज़रिये चीन अपनी नीतियों और शासन मॉडल को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करता है. अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए तैयार किए गए समाचार, डॉक्यूमेंट्री और सोशल मीडिया सामग्री का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं बल्कि वैश्विक जनमत को प्रभावित करना भी है.
चीन की सूचना रणनीति आज केवल उसकी घरेलू सीमाओं तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि वह धीरे-धीरे वैश्विक स्तर पर अपना प्रभाव बढ़ा रही है. सरकारी मीडिया के विस्तार, अंतरराष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय मौजूदगी और संगठित ऑनलाइन अभियानों के ज़रिये चीन अपनी नीतियों और शासन मॉडल को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करता है.
इसके साथ ही, चीन का तकनीकी निर्यात भी उसकी सूचना रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है. निगरानी तकनीक, डिजिटल पहचान प्रणालियाँ और डेटा प्रबंधन से जुड़ी प्रणालियाँ कई देशों में निर्यात की जा रही हैं. इससे न केवल चीन की तकनीकी पहुँच बढ़ती है बल्कि उसके शासन मॉडल की सोच भी दूसरे समाजों तक पहुँचती है. इसी तरह, शैक्षणिक सहयोग, शोध संस्थानों के बीच समझौते और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से चीन अपनी नीतियों और दृष्टिकोण को बौद्धिक वैधता देने का प्रयास करता है.
प्रवासी चीनी समुदाय इस रणनीति का एक विशेष लक्ष्य बनते हैं. कई मामलों में यह देखा गया है कि विदेशों में रहने वाले चीनी नागरिकों पर पारिवारिक संबंधों, आर्थिक हितों या सामाजिक दबावों के ज़रिये प्रभाव डालने की कोशिश की जाती है. इससे उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक भागीदारी प्रभावित हो सकती है.
इन सभी घटनाक्रमों से स्पष्ट होता है कि सोशल क्रेडिट जैसी अवधारणाएँ अब केवल चीन के भीतर सामाजिक नियंत्रण तक सीमित नहीं हैं. शुरुआत में इन्हें प्रशासनिक दक्षता और सामाजिक अनुशासन के उपकरण के रूप में पेश किया गया था लेकिन समय के साथ ये व्यापक सूचना रणनीति का हिस्सा बनती चली गईं. आज सोशल क्रेडिट प्रणाली न केवल नागरिकों के व्यवहार को दिशा देने का माध्यम है, बल्कि यह भी तय करती है कि कौन भरोसेमंद है और कौन नहीं.
दुनिया के लिए यह एक चेतावनी है. सवाल यह नहीं है कि निगरानी संभव है या नहीं—बल्कि यह है कि उस पर सीमा कैसे लगाई जाए. सुरक्षा और गरिमा, नियंत्रण और स्वतंत्रता के बीच संतुलन ही 21वीं सदी की डिजिटल राजनीति की दिशा तय करेगा.
इस सोच का प्रभाव चीन की सीमाओं से बाहर भी दिखाई देने लगा है. तकनीकी निर्यात, मीडिया प्रचार और कूटनीतिक संवाद के ज़रिये इस मॉडल को एक वैकल्पिक शासन व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. इससे वैश्विक स्तर पर यह बहस तेज़ हुई है कि विकास, स्थिरता और सामाजिक नियंत्रण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए. परिणामस्वरूप, सोशल क्रेडिट जैसी प्रणालियाँ अंतरराष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित कर रही हैं और डिजिटल शासन के भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर रही हैं.
चीन की निगरानी व्यवस्था, सोशल क्रेडिट सिस्टम और सूचना युद्ध का मेल आधुनिक डिजिटल तानाशाही का सबसे व्यापक उदाहरण बन चुका है. तकनीक, क़ानून और विचारधारा को एक साथ जोड़कर समाज को नियंत्रित करने का यह प्रयोग अनुशासन और स्थिरता तो ला सकता है, लेकिन इसकी कीमत व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और वास्तविक विश्वास के रूप में चुकानी पड़ती है.
दुनिया के लिए यह एक चेतावनी है. सवाल यह नहीं है कि निगरानी संभव है या नहीं—बल्कि यह है कि उस पर सीमा कैसे लगाई जाए. सुरक्षा और गरिमा, नियंत्रण और स्वतंत्रता के बीच संतुलन ही 21वीं सदी की डिजिटल राजनीति की दिशा तय करेगा.
सौम्या अवस्थी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर सिक्योरिटी, स्ट्रेटेजी एंड टेक्नोलॉजी में फेलो हैं.
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Dr Soumya Awasthi is Fellow, Centre for Security, Strategy and Technology at the Observer Research Foundation. Her work focuses on the intersection of technology and national ...
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