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Published on Nov 21, 2025 Updated 0 Hours ago

भारत को “दुनिया की फार्मेसी” कहा जाता है, लेकिन इसकी असली नींव किसी और की सप्लाई चेन पर टिक़ी है. कोविड ने दिखा दिया कि एक झटका आते ही दवाओं से लेकर मेडिकल उपकरण तक सब लड़खड़ा सकता है. सवाल सीधा है- क्या भारत सच में आत्मनिर्भर है या सिर्फ़ आत्मविश्वासी?

भारत–चीन फार्मा रेस: दवाओं की दुनिया किसके हाथ में?

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भारत को "दुनिया की फार्मेसी" कहा जाता है क्योंकि भारत जेनेरिक दवाओं और वैक्सीन्स का दुनिया का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है. आंकड़ों के मुताबिक़, भारत वैश्विक स्तर पर जेनेरिक दवाओं का लगभग 20 प्रतिशत और दुनिया की वैक्सीन ज़रूरत का 60 प्रतिशत से अधिक निर्यात करता है. दवाओं और वैक्सीन के वैश्विक बाज़ार में भारत की इस उपलब्धि का मतलब यह नहीं है कि भारत की फार्मा इंडस्ट्री में सब ठीक-ठाक है जबकि सच्चाई यह है कि इस सफलता के पीछे इस सेक्टर की कई कमियां दिखाई नहीं देती हैं. COVID-19 महामारी के दौरान अचानक जो हालात पैदा हो गए थे उससे फार्मेसी सेक्टर एकदम चरमरा गया था यानी उस दौरान जो परिस्थितियां बनी थीं, वो एक लिहाज़ से चिकित्सा क्षेत्र की क्षमता और लचीलेपन का आकलन करने वाली थी और तब वास्तविकता में पता चला था कि वैश्विक फार्मेसी सेक्टर में कितनी ख़ामियां हैं और इनकी वजह से महामारी जैसी आपदा के दौरान दवाओं की आपूर्ति श्रृंखला कैसे बाधित होती है. ज़ाहिर है कि साल 2020 की शुरुआत में जब महामारी के कारण चीनी फैक्ट्रियां बंद हो गईं थीं, तब भारत की फार्मास्युटिकल सप्लाई चेन को भारी मुश्किलों से जूझना पड़ा था. हालात इतने ज़्यादा बिगड़ गए थे कि मार्च 2020 में भारत को पैरासिटामोल और एंटीबायोटिक्स समेत 26 दवाओं के निर्यात पर रोक तक लगानी पड़ी थी. दरअसल, उस समय चीन से दवाएं बनाने के लिए ज़रूरी रासायनिक यौगिक यानी मुख्य शुरुआती चीज़ों (KSMs) की आपूर्ति बंद हो गई थी, जिससे इन दवाओं के निर्यात करने से देश के भीतर इनकी कमी का ख़तरा पैदा हो गया था. इससे यह स्पष्ट हो गया था कि दशकों से दक्षता आधारित वैश्वीकरण की वजह से दुनिया के तमाम देश फार्मेसी सेक्टर में कुछ सीमित विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर बहुत ज़्यादा निर्भर हो गए थे. जहां तक चीन की बात है, तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत की कई स्वास्थ्य आपूर्ति श्रृंखलाएं चीन से होने वाले आयात पर बहुत अधिक निर्भर है और महामारी के दौरान यह खुलकर सामने भी आ गया था. कुल मिलाकर कोरोना महामारी ने एक तरह से चेतावनी देने का काम किया और यह बताया कि फार्मास्युटिकल्स सेक्टर में भारत के आत्मनिर्भर होने के जो दावे किए जा रहे थे, उनमें कोई सच्चाई नहीं थी. यानी यह पता चला कि भारत इस सेक्टर में आपूर्ति के लिए दूसरे देशों पर बहुत ज़्यादा निर्भर था. इससे यह भी साफ हो गया कि बाहरी ख़तरों से भारत की फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री पर व्यापक असर पड़ सकता है.

  • चीनी फैक्ट्रियां बंद होते ही भारत की सप्लाई चेन चरमराई।
  • महामारी में साबित—भारत की हेल्थ सप्लाई चेन चीन पर अत्यधिक निर्भर।
  • महामारी ने दिखाया—फार्मा में आत्मनिर्भरता के दावे खोखले थे।

 

चीन पर निर्भरता

मेडिकल सेक्टर में चीन पर भारत की निर्भरता बहुत व्यापक है. बेसिक केमिकल्स से लेकर हाई-टेक हेल्थ डिवाइसों तक हेल्थ इंडस्ट्री से जुड़ा शायद ही ऐसा कोई सेक्टर होगा, जो चीन से होने वाली आपूर्ति पर निर्भर न हो. जहां तक भारत-चीन व्यापार के आंकड़े हैं, तो वे सिर्फ़ एक सीमित सच्चाई ही सामने लाते हैं. वर्ष 2024-25 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़कर 99.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. चीन से जिन चीज़ों का सबसे अधिक आयात किया गया है, उनमें मुख्य रूप से फार्मास्युटिकल्स, एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट यानी सक्रिय फार्मास्युटिकल घटक (APIs), इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरे ज़रूरी उत्पाद शामिल थे. एक विश्लेषण के अनुसार, भारत द्वारा लगभग हर औद्योगिक श्रेणी में आयात की जाने वाली वस्तुओं में अब चीन का दबदबा क़ायम हो चुका है.

“भारत की दवा बनाने वाली कंपनियां उपयोग में आने वाले एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट का क़रीब दो-तिहाई हिस्सा चीन से आयात करती हैं।”

अगर हेल्थ सेक्टर की बात की जाए, तो भारत की दवा बनाने वाली कंपनियां उपयोग में आने वाले एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट का क़रीब दो-तिहाई हिस्सा चीन से आयात करती हैं. साल 2018 में चीन से होने वाले एपीआई के आयात पर नज़र डालें तो भारतीय कंपनियों ने दवा बनाने के लिए ज़रूरी कच्चे माल का लगभग 67.5 प्रतिशत चीन से मंगवाया था. साल-दर-साल इसमें चीन पर निर्भरता बढ़ती जा रही है. साल 2024 तक भारत द्वारा आयात किए जाने वाले कुल एंटीबायोटिक इंग्रीडिएंट्स में चीन की हिस्सेदारी लगभग 87 प्रतिशत पहुंच गई है. देखा जाए तो यह आंकड़ा 2000 के दशक के मध्य में चीन से आयात होने वाले 60 प्रतिशत की तुलना में बहुत अधिक है. इन आंकड़ों से साबित होता है कि महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक्स बनाने के लिए ज़रूरी कच्चे माल को लेकर भारत क़रीब-क़रीब पूरी तरह से चीन पर निर्भर हो गया है और कुछ ऐसी ही तस्वीर दवाओं की दूसरी श्रेणियों में भी दिखाई देती है.

 

फार्मास्युटिकल सेक्टर में भारत की चीन पर निर्भरता इतनी ज़्यादा है कि दोनों देशों के बीच ज़बरदस्त भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता भी इन रिश्तों पर असर नहीं डाल पाई है. यानी दोनों देशों के बीच राजनीतिक तनातनी चरम पर होने के बावज़ूद भारत ने हेल्थ डिवाइसों एवं दवाओं के लिए ज़रूरी रासायनिक घटकों का आयात चीन से लगातार जारी रखा है. कहने का मतलब है कि भारत में दवा बनाने के लिए आवश्यक कच्चे माल से लेकर दवाओं के निर्माण और उनके स्टोर तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया में आज भी चीन की अहम भूमिका है. यहां तक कि कुछ मामलों में तो चीन पर निर्भरता इतनी अधिक है, उसके बगैर काम ही नहीं चल सकता है. एक अध्ययन के मुताबिक़ चीन एरिथ्रोमाइसिन जैसी कुछ विशेष एंटीबायोटिक्स के लिए भारत की 97.7 फीसदी ज़रूरतें पूरी करता है.

 

भारत का मेडिकल डिवाइस मार्केट बहुत तेज़ी से वृद्धि कर रहा है और यह 11 बिलियन अमेरिकी डॉलर से ज़्यादा का हो गया है. भारतीय मेडिकल डिवाइस बाज़ार भी अपनी 70 प्रतिशत से अधिक ज़रूरतों के लिए विदेशी आयात पर निर्भर है और इसमें भी चीन की हिस्सेदारी सबसे ज़्यादा है. मेडिकल डिवाइस के कुल आयात में चीन की हिस्सेदारी क़रीब 20 प्रतिशत पहुंच गई है. चिकित्सा क्षेत्र में इस्तेमाल किए जाने वाले कई मॉनिटर, इमेजिंग मशीन के घटक, डिस्पोज़ेबल और कम क़ीमत वाले डायग्नोस्टिक्स चीन में बनते हैं या फिर चीन में निर्मित घटकों से बनाए जाते हैं. इस कारण से अस्पताल में काम आने वाली बुनियादी मशीनों और उपकरणों पर भी चीनी उत्पादों का दबदबा बना हुआ है. मेडिकल डिवाइस उद्योग के लोगों के मुताबिक़ वेंटिलेटर जैसी आवश्यक मशीन के लिए ज़रूरी अत्याधुनिक घटकों को अभी भी आयात करना पड़ता है, क्योंकि भारत में इन हाई-टेक उपकरणों के निर्माण की इंडस्ट्री अभी विकसित नहीं हो पाई है.

“भारत द्वारा आयात किए जाने वाले कुल एंटीबायोटिक इंग्रीडिएंट्स में चीन की हिस्सेदारी लगभग 87 प्रतिशत पहुंच गई है।”

इसके अलावा, मेडिकल सेक्टर से जुड़े अत्याधुनिक तकनीक़ी इकोसिस्टम, जैसे कि मेडिकल इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए सेमीकंडक्टर, मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (MRI) मशीनों के लिए रेयर-अर्थ मैग्नेट और इंटेंसिव केयर यूनिट (ICU) उपकरणों के लिए विशेष सेंसर जैसी चीज़ों की आपूर्ति के लिए भारत चीनी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर है. इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरी तकनीक़ी सामग्री के निर्माण और आपूर्ति में चीन का प्रभुत्व है. उदाहरण के लिए, भारत में कई डिवाइसों में इस्तेमाल होने वाले सिलिकॉन वेफर के कुल आयात में क़रीब 97 प्रतिशत हिस्सेदारी चीन की है. इससे पता चलता है कि अस्पताल में मरीज़ के बेड के आस-पास जो भी मशीनें और डिवाइस होती हैं, उनके लिए भी चीन पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है. इस प्रकार से देखा जाए तो भारत का हेल्थकेयर सेक्टर कहीं न कहीं काफ़ी हद तक चीनी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर हो चुका है. ज़ाहिर है कि चीन पर बढ़ती यह निर्भरता सोचने का विषय और इस पर गंभीरता से विचार किए जाने की ज़रूरत है.

 

चीनी आपूर्ति में सुरक्षा से जुड़े ख़तरे

निसंदेह तौर पर भारत हेल्थ सेक्टर में चीन पर अत्यधिक निर्भर है और अगर किसी सूरत में चीन से होने वाली आपूर्ति बाधित होती है, तो इससे स्वास्थ्य सुरक्षा के क्षेत्र में भारत को ज़बरदस्त झटका लग सकता है. वैश्विक स्तर पर महाशक्तियों के बीच होड़ के इस दौर में दवाओं और मेडिकल उपकरणों में आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता उतनी ही घातक साबित हो सकती है, जितनी ऊर्जा या खाद्य आपूर्ति से जुड़ी अनिश्चितता. ज़ाहिर है कि इन ज़रूरी सेक्टरों में आपूर्ति प्रभावित होने के परिणाम बेहद भयानक हो सकते हैं. इसके अलावा, स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए ज़रूरी चीज़ों की आपूर्ति में अनिश्चितता के कारण लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ सकता है. उदाहरण के तौर पर अगर प्रमुख और कारगर एंटीमाइक्रोबियल दवाओं की कमी होने पर उनकी जगह पर सब्स्टीट्यूट एंटीबायोटिक मेडिसिन का इस्तेमाल बढ़ सकता है. ज़ाहिर है कि ऐसी दवाएं ज़्यादा असरदार नहीं होती हैं और इनके नतीज़े अच्छे नहीं होते हैं. इन दवाओं के अधिक इस्तेमाल से मरीज़ में एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (AMR)  बढ़ जाता है. यानी इससे बैक्टीरिया तेज़ी से रेजिस्टेंस बनाने लगते हैं. कहने का मतलब है कि जब डॉक्टरों को 'रिजर्व' दवाओं का इस्तेमाल करने के लिए मज़बूर किया जाता है, तो इसका नुक़सान मरीज़ों को ही होता है और ये दवाएं बीमारी को ठीक नहीं कर पाती हैं. इस प्रकार से देखें तो महत्वपूर्ण दवाओं की आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट होने पर आने वाले दिनों में ड्रग-रेजिस्टेंट का संकट भी पैदा हो सकता है.

 

इसके अलावा, आपूर्ति श्रृंखलाओं का इस्तेमाल रणनीतिक हथियार के रूप में किया जा सकता है. ज़ाहिर है कि भारत के साथ किसी राजनीतिक गतिरोध की स्थिति में चीन अपने प्रभुत्व का इस्तेमाल करके मेडिकल आपूर्ति को दबाव बनाने का ज़रिया बना सकता है. कल्पना कीजिए, अगर चीन के साथ भारत के रिश्ते बिगड़ते हैं, तो भारत के सामने हेल्थ सेक्टर के लिए ज़रूरी चीज़ों की आपूर्ति की कमी का ख़तरा पैदा हो सकता है. कोविड-19 के दौरान भारत इस तरह के विपरीत हालातों का सामना कर चुका है, इसलिए इन दिशा में गंभीरता से सोचना चाहिए और महत्वपूर्ण दवाओं व मेडिकल डिवाइसों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य माना जाना चाहिए.

 

रणनीतिक लिहाज़ से मेडिकल आपूर्ति कितनी अहम? 

भारत ने स्वास्थ्य और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी महत्वपूर्ण चीज़ों के आयात को अब ऐसी रणनीतिक परिसंपत्ति यानी महत्वपूर्ण संसाधन के रूप में देखना शुरू कर दिया है, जिसे नीतिगत समर्थन की आवश्यकता है. पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत सरकार ने फार्मास्युटिकल और मेड-टेक सेक्टरों में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए कई उपाय किए हैं. इस दिशा में सरकार द्वारा शुरू की गई पहलों में सबसे अहम प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम है. पीएलआई का उद्देश्य देश में ही बल्क ड्रग्स यानी दवाइयों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले मुख्य कंपोनेंट्स (APIs), महत्वपूर्ण शुरुआती सामग्री (KSMs) और मेडिकल डिवाइस की मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहित करना है. सरकार की ओर से साल 2020 में PLI योजना को 6,940 करोड़ की बजटीय आवंटन के साथ शुरू किया गया था. इस योजना के तहत उन कंपनियों को वित्तीय मदद दी जाती है, जो देश में मेडिकल सेक्टर के लिए ज़रूरी महत्वपूर्ण सामग्री का निर्माण करती हैं. इस योजना के शुरुआती परिणाम ख़ासे उत्साहजनक रहे हैं. PLI स्कीम ने वर्ष 2024 तक API/KSM के उत्पादन से जुड़ी 32 परियोजनाएं पूरी करने में मदद की है, जिससे वार्षिक उत्पादन क्षमता में अतिरिक्त 56,679 मीट्रिक टन की वृद्धि हुई है. यह देश के भीतर मेडिकल क्षेत्र में ज़रूरी सामग्री की आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा है. इसके अलावा, ऐसी 16 और परियोजनाओं के विकास का काम जारी है. इस परियोजनाओं को विकसित करने में बड़ी कंपनियां और छोटे उत्पादक दोनों शामिल हैं.

 “कुल मिलाकर कोरोना महामारी ने एक तरह से चेतावनी देने का काम किया और यह बताया कि फार्मास्युटिकल्स सेक्टर में भारत के आत्मनिर्भर होने के जो दावे किए जा रहे थे, उनमें कोई सच्चाई नहीं थी।”

इतना ही नहीं, सरकार की ओर से मेडिकल टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी इसी तरह की पहलें की जा रही हैं. सरकार ने 2023 में एक नेशनल मेडिकल डिवाइस पॉलिसी को स्वीकृति प्रदान की है. इस नीति का उद्देश्य मेडिकल टेक्नोलॉजी सेक्टर की वृद्धि को तेज़ करना और मेडिकल डिवाइसों व तकनीक़ी उपकरणों के आयात में कमी लाना है. मेडिकल डिवाइस PLI योजना और नेशनल मेडिकल डिवाइस पॉलिसी भारत में इमेजिंग इक्विपमेंट, इम्प्लांट, डायग्नोस्टिक किट्स और मेडिकल वियरेबल्स जैसी चीज़ों के विनिर्माण को प्रोत्साहित करती है. इसके अलावा, 'चाइना+1' रणनीति यानी अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं और विनिर्माण को चीन पर निर्भर रखने के बजाय दूसरे विकल्पों को भी तैयार करने की रणनीति पर भी चर्चा होनी चाहिए. इस चर्चा में भारत के दृष्टिकोण को केंद्र में रखना चाहिए, यानी इस पर विचार करना चाहिए कि मेडिकल सेक्टर की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक ही देश पर अत्यधिक निर्भर रहने की जगह दूसरे देशों या फिर देश में ही दूसरे स्रोतों से वैकल्पिक इंतज़ाम किए जाएं. सरकार की नीतियों से इस दिशा में कुछ क़ामयाबी हासिल हुई है. कुछ बल्क ड्रग्स जैसे कि पेनिसिलिन जैसी फर्मेंटेटिव एंटीबायोटिक्स को हाल-फिलहाल तक 95 फीसदी तक आयात किया जाता था, लेकिन अब इसे पायलट स्केल पर भारत में भी बनाया जा रहा है. हालांकि, दवाओं के निर्माण की व्यापक क्षमता हासिल करने क लिए बहुत अधिक पूंजी की ज़रूरत होती है, साथ ही यह पर्यावरण के लिहाज़ से भी बेहद संवेदनशील हो सकता है. इसके अलावा, दवाइयों के उत्पादन की इकाइयों और उससे जुड़ी आपूर्ति श्रृंखलाओं को बनाने में चीन को दशकों का वक़्त लगा है, ज़ाहिर है कि भारत में इन्हें इतनी ज़ल्दी स्थापित करना आसान नहीं है. इसके अलावा, उत्पादों का किफायती दामों में मिलना भी एक बड़ा मुद्दा है. अक्सर देश में बनाए जाने वाले उत्पाद आयात किए गए उत्पादों से बहुत महंगे होते हैं. घरेलू उत्पादों के साथ शुरुआती दौर में ऐसा ही देखने को मिलता है. इसी के मद्देनज़र नीतियों को कारगर तरीक़े से बनाने और अमल में लाना बहुत अहम हो जाता है, क्योंकि नीतियों के ज़रिए ही इस समस्या का हल निकाला जा सकता है.

 

लचीलापन और स्वास्थ्य सुरक्षा रणनीति कितनी ज़रूरी?

निश्चित रूप से भारत में स्वास्थ्य आपूर्ति श्रृंखलाओं को सशक्त करने के लिए व्यापक कोशिशें की गई हैं, बावज़ूद इसके देश को संकट से बचाने के लिहाज़ से इन प्रयासों में अभी भी कई कमियां हैं. जैसे कि भारत में ऑयल या खाद्यान्न की उपलब्धता से जुड़े ताज़ा आंकड़ों को बताने के लिए पूरा तंत्र है, लेकिन महत्वपूर्ण दवाओं की ज़रूरत और उपलब्धता बताने के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. इसके अलावा, एक मुद्दा यह भी है कि दवाओं की ख़रीद के जो भी तौर-तरीक़े हैं वे हमेशा रणनीतिक लक्ष्य के मुताबिक़ नहीं होते हैं. दवाओं की ख़रीद के लिए सरकारी या निजी अस्पतालों द्वारा जो टेंडर प्रक्रिया अपनाई जाती है, उसमें आमतौर पर सबसे कम क़ीमत पर दवाएं उपलब्ध कराने वालों को प्राथमिकता दी जाती है. यानी इससे आयातित दवाओं के आपूर्तिकर्ताओं को टेंडर मिलता है. ज़ाहिर है कि ये दवाएं चीन से ही आयात की जाती है, क्योंकि कम क़ीमत पर दवाएं वहीं से मिल सकती हैं, यानी कहीं न कहीं इस प्रक्रिया से चीन को भी लाभ पहुंचता है. भारत ग्लोबल साउथ का एक प्रभावशाली राष्ट्र है और भारत के पास हेल्थ सेक्टर के लिए ज़रूरी दवाओं और दूसरे सामानों की आपूर्ति सुनिश्चित व सुरक्षित करने के लिए अन्य विकासशील देशों के साथ मिलकर इस दिशा में क़दम बढ़ाने का बेहतरीन अवसर है. कहने का मतलब है कि भारत अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया में साझेदार देशों के साथ मिलकर दवाओं की ख़रीद और उत्पादन में पहल कर सकता है.

 

इसके अलावा स्वास्थ्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए भारत को एक नेशनल हेल्थ सिक्योरिटी सूची तैयार करनी चाहिए. यानी एक ऐसी सूची बनाना चाहिए, जिसमें न सिर्फ़ देश की स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए ज़रूरी सभी महत्वपूर्ण दवाइयों (और उनके APIs/KSMs), वैक्सीनों, मेडिकल डिवाइसों के नाम दर्ज़ हों, बल्कि स्वास्थ्य से संबंधित डिजिटल प्रणालियों और कंपोनेंट्स के नाम भी लिखे हों. इस सूची से यह पता चल सकेगा कि कौन सी दवाएं और चिकित्सा उपकरण इतने आवश्यक है कि अगर उनकी कमी हो जाए तो देश के सामने संकट पैदा हो सकता है और ख़तरे वाले हालात बन सकते हैं. दूसरा क़दम यह उठाना चाहिए कि स्वास्थ्य आपूर्ति के जुड़ी जो भी नीतियां बनाई जाएं, उनमें इस सूची में शामिल चीज़ों की आपूर्ति को हर हाल में प्राथमिकता दी जाए. इतना ही नहीं, अगर कोई आइटम ऐसा है, जो हेल्थ सेक्टर के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, तो भारत को यह ज़रूर सुनिश्चित करना चाहिए कि उसकी आपूर्ति के लिए कम से कम दो या तीन भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता उपलब्ध हों. फिर चाहे वे घरेलू आपूर्तिकर्ता हों या फिर अन्य देशों के.

 “मेडिकल डिवाइस बाज़ार भी अपनी 70 प्रतिशत से अधिक ज़रूरतों के लिए विदेशी आयात पर निर्भर है और इसमें भी चीन की हिस्सेदारी सबसे ज़्यादा है।”

तीसरा क़दम यह उठाना चाहिए कि जिस प्रकार तेल के लिए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार होता है, उसी तर्ज़ पर भारत सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक दवाओं व हेल्थ उपकरणों के लिए रणनीतिक बफर रिजर्व बना सकता है. इसके अलावा, एंटी-इन्फेक्टिव API या पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट का एक सीमित स्टॉक रखा जा सकता है और इसमें रोटेशन के ज़रिए चीज़ों की आपूर्ति को ताज़ा बनाए रखा जा सकता है, यानी दवाओं को एक्सपायर होने से बचाया जा सकता है. आख़िर में, भारत कोऑपरेटिव बल्क बाइंग मैकेनिज़्म यानी अन्य देशों के साथ मिलकर बड़ी तादाद में दवाओं की ख़रीद की पैरोकारी करके, ज़रूरी दवाओं और मेडिकल उपकरणों की कमी के बारे में जानकारी साझा करके और हेल्थ सेक्टर से संबंधित आवश्यक वस्तुओं को निर्यात प्रतिबंध से मुक्त करने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय समझौते की पहल कर सकता है. ऐसा करके भारत न केवल वैश्विक स्तर पर एक मिसाल स्थापित कर सकता है, बल्कि सामूहिक उपायों को अपनाने पर बल दे सकता है.

 “निसंदेह तौर पर भारत हेल्थ सेक्टर में चीन पर अत्यधिक निर्भर है और अगर किसी सूरत में चीन से होने वाली आपूर्ति बाधित होती है, तो इससे स्वास्थ्य सुरक्षा के क्षेत्र में भारत को ज़बरदस्त झटका लग सकता है।”

ज़ाहिर है कि भारत के हेल्थ सेक्टर में चीनी दवाओं और दूसरे सामानों का दबदबा है और ऐसे में भारत की मेडिकल सप्लाई चेन में चीन का जो प्रभुत्व है, वह अचानक समाप्त नहीं होगा और भारत को इसके लिए चीन से कोई विवाद मोल लेने की भी ज़रूरत नहीं है. हालांकि, भारत को यह ज़रूर सुनिश्चित करना होगा कि चीन के साथ हेल्थ सेक्टर में जो निर्भरता है वो भविष्य में भी बगैर किसी अड़चन के इसी प्रकार चलती रहेगी, या फिर इसमें कोई ख़तरा पैदा हो सकता है. स्वास्थ्य और चिकित्सा आपूर्ति को राष्ट्रीय सुरक्षा का एक ज़रूरी हिस्सा मानते हुए भारत को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना चाहिए. ज़ाहिर है कि आने वाले साल यह तय करेंगे कि भारत अपनी स्वास्थ्य आपूर्ति श्रृंखलाओं को कितने प्रभावशाली तरीक़े से सशक्त करने में सक्षम हो पाता है. इसी से यह भी सुनिश्चित होगा कि भविष्य में किसी स्वास्थ्य संकट का सामना करने के लिए भारत कितनी बेहतर तरीक़े से तैयार होगा.


के. एस. उपलब्ध गोपाल ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के हेल्थ इनीशिएटिव में एसोसिएट फेलो हैं.

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Author

K. S. Uplabdh Gopal

K. S. Uplabdh Gopal

Dr. K. S. Uplabdh Gopal is an Associate Fellow within the Health Initiative at ORF. His focus lies in researching and advocating for policies that ...

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