चीन अपने सैन्य ढांचों में लार्ज लैंग्वेज मॉडल को शामिल करके युद्ध में एक परिवर्तनकारी बदलाव की ओर बढ़ चुका है. वह अब अपने तेज़ नवाचार, बिना मुश्किल उसे सिस्टम में शामिल करके और युद्ध क्षेत्र में अत्याधुनिक ड्रोनों व मिसाइलों की सटीक तैनाती सुनिश्चित करके अमेरिका के प्रभुत्व को चुनौती देने लगा है.
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चीन की 2017 की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) योजना का ज़िक्र करते हुए गूगल के पूर्व सीईओ एरिक श्मिट ने कहा था, ‘2020 तक, वे हमारी बराबरी कर लेंगे. 2025 तक, वे हमसे बेहतर हो जाएंगे. और 2030 तक, एआई की दुनिया पर वे दबदबा बना लेंगे.’ चीन द्वारा हाल ही में DeepSeek लॉन्च किए जाने से एरिक की चेतावनी सच साबित होती दिखती है. कुछ लोग इसे चीन का ‘स्पुतनिक संकट’ (1960 के दशक में सोवियत संघ द्वारा स्पुतनिक लॉन्च के समय बड़े देशों में चिंता फैल गई थी) बता रहे हैं.
हालांकि, लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLMs) में चीन की बढ़त भले ही सिर्फ़ आर्थिक छलांग लग सकती है, लेकिन एआई-सक्षम सैन्य हथियारों की यह नई पीढ़ी भविष्य के युद्धों के लिहाज़ से किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है. यह चीन के सिस्टम को बेहतर बनाती है, ‘किल चेन’ (साइबर हमलों) को सुव्यवस्थित करती है, और अमेरिकी सैन्य सोच से आगे निकलने की क्षमता रखती है. इसके अलावा, उन्नत मानवरहित हवाई वाहन (UAV) या ड्रोन बनाने की चीन की क्षमता एआई-एकीकरण में खूब सहायक है, जो उसे स्वचालित हथियारों को एक साथ समूह में भेजने में सक्षम बनाती है और युद्धक्षेत्र में सस्ते व सटीक ड्रोन-मिसाइलों के इस्तेमाल की राह तैयार करती है.
अबू धाबी में हाल ही में हुए रक्षा एक्सपो में शींगजी-पी 60 में डीपसीक का इस्तेमाल देखा गया. शींगजी-पी 60 ऐसा स्वचालित सैन्य वाहन है, जिसमें दोहरे उपयोग के लिए स्वचालित सॉफ़्टवेयर लगाया गया है. ये घटनाक्रम बताते हैं कि सैन्य उपयोग के लिए LLMs के प्रयोगों और तैनाती में तेज़ी पर चीन ख़ासा ध्यान दे रहा है.
अमेरिका जहां ‘रेप्लिकेटर इनिशिएटिव’ के ज़रिये मानवरहित व स्वचालित प्रणालियों में दौड़ लगा रहा है, वहीं विशेषज्ञों की नज़र में, विभिन्न विभागीय सॉफ़्टवेयर के बीच सही से तालमेल न होना उसकी प्रगति को धीमा कर रहा है. जैसे-जैसे चीन अपने सैन्य ढांचे में उन्नत LLMs शामिल करने लगा है, अमेरिका को उच्च तकनीक वाले, एआई-संचालित युद्धक्षेत्र में अपनी बढ़त बनाए रखने के लिए चरण-दर-चरण फ़ैसले लेने होंगे और सिस्टम के एकीकरण में तेज़ी लानी होगी.
चैटजीपीटी 4 और लामा 3 सहित पश्चिम में विकसित LLMs की तुलना में डीपसीक बहुत कम लागत में तैयार किया गया है और कंप्यूटिंग शक्ति के केवल दसवें हिस्से के साथ विकसित हुआ है. UAV से लेकर कमांड और कंट्रोल सिस्टम (C2) तक इसके सैन्य इस्तेमाल की पूरी क्षमता है. हाल की रिपोर्टों से पता चलता है कि चीन ने अस्पतालों और सैनिकों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में डीपसीक मॉडल का इस्तेमाल शुरू कर दिया है, जो उच्च-दांव वाले युद्धों में इसके उपयोग से पहले एक नियंत्रित माहौल में प्रयोग के रूप में इसके उपयोग की कोशिश है. अबू धाबी में हाल ही में हुए रक्षा एक्सपो में शींगजी-पी 60 में डीपसीक का इस्तेमाल देखा गया. शींगजी-पी 60 ऐसा स्वचालित सैन्य वाहन है, जिसमें दोहरे उपयोग के लिए स्वचालित सॉफ़्टवेयर लगाया गया है. ये घटनाक्रम बताते हैं कि सैन्य उपयोग के लिए LLMs के प्रयोगों और तैनाती में तेज़ी पर चीन ख़ासा ध्यान दे रहा है.
चिंता की एक और बड़ी वज़ह है- ‘नेटवर्क-केंद्रित’ युद्ध में तालमेल बनाकर फ़ैसले लेने के लिए विभिन्न सेवाओं में LLMs को तेज़ी से तैनात करने की चीन की बढ़ती क्षमता. सभी सेवाओं में AI के शामिल होने के बाद, ये LLMs आंकड़ों, निर्णय और कार्रवाइयों के बीच के अंतर को सेकंड से भी कम समय में ख़त्म कर सकते हैं, ताकि ‘सेंसर-टु-शूटर लूप’ (किसी लक्ष्य को तुरंत पहचानना, प्राप्त सूचना का विश्लेषण करना और लक्ष्य को निशाना बनाने के लिए शूटर, यानी हथियार को निर्देश देना) तेज़ हो सकें. हमले की कार्रवाइयों को निर्देशित करने के लिए वास्तविक समय की खुफ़िया जानकारी का उपयोग करते हुए, ये LLMs टोही उपकरणों को सटीक-हमला करने में सक्षम बनाते हैं, ताकि किल चेन को तुरंत ख़त्म किया जा सके, जिसे सैन्य संगठन के विशेषज्ञ टोही हमला रणनीति (RSC) भी कहते हैं. जब तक अमेरिका RSC क्षमताओं में दक्षता हासिल करेगा, तब तक चीन इस क्षेत्र में अपनी बढ़त के ज़रिए युद्धक्षेत्र में प्रभुत्व की नई परिभाषा गढ़ चुका होगा.
चीन एआई के एकीकरण के जिस मुकाम की कल्पना कर रहा है, उस पर ज़ोर देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि चीनी सेना 2030 तक विभिन्न स्तरों पर स्वचालित ‘एल्गोरिदमिक’ और ‘नेटवर्क-केंद्रित’ युद्ध क्षमताओं की एक शृंखला बना सकती है.
चीन की रिपोर्टों से पता चलता है कि डीपसीक ड्रोन, उपग्रहों और रडार को आपस में जोड़ सकता है, जिससे सैन्य फ़ैसले लेने में मदद मिल सकती है और प्रमुख लक्ष्यों को तेज़ी से पहचाना जा सकता है. पेंटागन की हालिया रिपोर्ट भी इन दावों पर मुहर लगाती है और बताती है कि अमेरिका के विश्लेषक जिसे ‘मल्टी-डोमेन किल-वेब’ कहते हैं, उसे विकसित करने की दिशा में चीन आगे बढ़ रहा है. इसे विमान, सेंसर और मिसाइलों के बीच तालमेल बनाने के लिए तैयार किया गया है. चीन एआई के एकीकरण के जिस मुकाम की कल्पना कर रहा है, उस पर ज़ोर देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि चीनी सेना 2030 तक विभिन्न स्तरों पर स्वचालित ‘एल्गोरिदमिक’ और ‘नेटवर्क-केंद्रित’ युद्ध क्षमताओं की एक शृंखला बना सकती है. इसके अलावा, एकसमान डाटा साझाकरण को लागू करने के लिए केंद्रीकृत कमांड व्यवस्था, साथ ही वाणिज्यिक तकनीकों को सैन्य ढांचों में शामिल करने वाले असैन्य-सैन्य जुड़ाव जैसी व्यवस्थाओं को भी चीनी सेना में शामिल करने पर बल दिया जा रहा है.
फिलहाल, अमेरिकी सेना में अभी सभी अंगों में एआई को शामिल नहीं किया जा सका है, जिससे इसकी तैनाती प्रभावित हो रही है. हालांकि, ज्वाइंट ऑल-डोमेन कमांड ऐंड कंट्रोल (JADC2) जैसे प्रयास कुछ उम्मीद जगाते हैं, फिर भी चुनौतियां बनी हुई हैं, जैसे- विभिन्न अंगों के बीच डाटा साझा करना, संयुक्त अभियानों के लिए संगठनात्मक ढांचों में तालमेल बनाना और सेना के भीतर सांस्कृतिक गतिरोध. विभिन्न प्रोग्रामों के अनुकूल सॉफ़्टवेयर के बिना, स्वचालित प्लेटफ़ॉर्म दूसरे प्लेटफ़ॉर्म व तंत्रों के साथ वास्तविक समय में संचार या डाटा साझा नहीं कर सकते, जिससे फ़ैसले लेने की प्रक्रिया प्रभावित होती है.
ड्रोन बाजार में चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षा
इसके अलावा, चीन का विशाल ड्रोन बाज़ार बड़े पैमाने पर मानवरहित अत्याधुनिक हथियारों को तैयार करके, युद्धक्षेत्र में सस्ते व एआई-सक्षम प्लेटफ़ॉर्म (ये अभियानों के लिए एक-दूसरे के साथ तालमेल बनाते हैं) की संख्या बढ़ाकर, इन चुनौतियों को बढ़ा रहा है. सस्ते मानवरहित अत्याधुनिक हथियारों से जुड़ी एक एकीकृत प्रणाली बनाने की सोच उच्च-तकनीक युद्ध के आगामी युग में अमेरिकी प्रभुत्व के लिए ख़तरा है. हालांकि, चीन कई मामलों में अमेरिका जैसी तकनीकी बढ़त नहीं पा सका है या उससे आगे नहीं निकल पाया है, लेकिन वाशिंगटन यदि तुरंत अपनी सक्रियता नहीं दिखाता है, तो ‘सिस्टम-ऑफ-सिस्टम एप्रोच’ (कई तंत्रों को एक करने संबंधी नज़रिया) के माध्यम से वह उन्नत LLMs के इस्तेमाल के मामले में संतुलन को अपने पक्ष में झुका सकता है.
भले ही अमेरिका इस खतरे को भली-भांति समझता है, लेकिन यदि वह सॉफ़्टवेयर एकीकरण में व्याप्त अस्पष्टता, नौकरशाही अवरोधों और संगठनात्मक बाधाओं जैसी समस्याओं का शीघ्र समाधान नहीं करता, तो ‘सॉफ़्टवेयर-संचालित किंतु हार्डवेयर-सक्षम’ युद्ध के इस नए युग में अपनी बढ़त बनाए रखना उसके लिए कठिन हो जाएगा.
फिलहाल, यूक्रेन युद्ध में AI से लैस छोटे-छोटे ड्रोन बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहे हैं. विशेष रूप से, अमेरिकी कंपनियां यूक्रेन को स्काईनोड-एस बोर्ड जैसी तकनीकें उपलब्ध करा रही हैं, जो ऐसे कंप्यूटर हैं, जो लगभग क्रेडिट कार्ड के आकार के हैं और LLMs के प्रयोगों के अनुकूल हैं. ये प्रणालियां UAV को अपने लक्ष्य को लॉक करने और कई अन्य काम करते हुए खुद ही संचालित होने में सक्षम बनाती हैं. हालांकि, इन तकनीकों के सामने कई चुनौतियां भी हैं, जिनमें छोटे UAV में ज़रूरी कंप्यूटिंग शक्ति पैदा करने और LLMs प्रणालियों को विश्वसनीय व कुशलतापूर्वक संचालित करने के लिए प्रशिक्षण देना शामिल है. यह उसी तरह की तकनीक है, जिसे चीन डीपसीक जैसे उन्नत LLMs के साथ विकसित कर सकता है. इस तरह का विकास डाटा के विश्लेषण को बेहतर बनाता है, फ़ैसले लेने में तेज़ी लाता है और UAV व अन्य स्वचालित प्लेटफ़ॉर्म के बीच सहज प्राकृतिक भाषा में तालमेल संभव बनाता है.
हालांकि, रक्षा विभाग (DoD) ने हाल ही में कई प्रयास किए हैं- जैसे JADC2, नई सॉफ़्टवेयर संकलन नीति, अदर ट्रांजेक्शन अथॉरिटी (OTA) को प्रोत्साहित करना और मॉड्यूलर ओपन सिस्टम, जो काफ़ी उपयोगी तो हैं, लेकिन नौकरशाही संबंधी रुकावटों और संगठनात्मक चुनौतियों के कारण इन प्रयासों की गति धीमी बनी हुई है. रक्षा विभाग को ‘मानकीकृत संदर्भ वास्तुकला’ को ज़रूर प्राथमिकता देनी चाहिए और सभी इकाइयों, सेवाओं व विभागों में सॉफ़्टवेयर को एकरूप बनाना चाहिए. इसके साथ ही, पूरे विभाग में कामकाज को एकीकृत करने के लिए ‘डेवसेकऑप्स’ (डेवलपमेंट, सिक्योरिटी और ऑपरेशन को मिलाकर बना शब्द) में तेज़ी लानी चाहिए और वास्तविक समय में तुरंत फ़ैसले लेने वाले अंतर-विभागीय LLMs लागू करना चाहिए.
चीनी सेना द्वारा LLM-संचालित युद्ध क्षमताओं का तीव्र विकास अमेरिकी सैन्य प्रभुत्व के लिए एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है. भले ही अमेरिका इस खतरे को भली-भांति समझता है, लेकिन यदि वह सॉफ़्टवेयर एकीकरण में व्याप्त अस्पष्टता, नौकरशाही अवरोधों और संगठनात्मक बाधाओं जैसी समस्याओं का शीघ्र समाधान नहीं करता, तो ‘सॉफ़्टवेयर-संचालित किंतु हार्डवेयर-सक्षम’ युद्ध के इस नए युग में अपनी बढ़त बनाए रखना उसके लिए कठिन हो जाएगा.
(रोहित नारायण स्तंबमकडी अमेरिका की स्टारबर्स्ट एक्सेलरेटर से जुड़े हैं, जो नवाचार को लेकर सलाह देने वाली कंपनी है और रक्षा व एयरोस्पेस जैसे क्षेत्रों में अत्याधुनिक उपक्रमों के विकास और क्रियान्वयन को आगे बढ़ाती है)
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Rohith Narayan Stambamkadi is an Associate at Starburst Accelerator, USA—an innovation consulting firm that fast-tracks the development and deployment of cutting-edge ventures in the defence ...
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