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दक्षिण एशिया में चीन की GSI अब केवल नए समझौते नहीं बल्कि पुराने रक्षा संबंधों को संस्थागत रूप देने में भी सक्रिय है. इस लेख से समझें कि कैसे इससे भारत के नेतृत्व और हिंद महासागर में सुरक्षा संतुलन पर नया दबाव बन रहा है.
नवंबर 2025 में चीन ने एक श्वेत पत्र जारी किया. इसमें वैश्विक सुरक्षा पहल (GSI) के सिद्धांतों पर ज़ोर दिया गया. इसके ज़रिए वैश्विक सुरक्षा संवाद पर नए सिरे से ज़ोर का संकेत मिलता है जिससे हथियार नियंत्रण, निरस्त्रीकरण और अप्रसार से जुड़े मामलों पर चीन का रुख मज़बूत होगा. GSI को एक संगठित ढांचे के रूप में समझा जाता है जो विदेशों में चीन की बिखरी हुई सुरक्षा प्रथाओं को एक पहचानने योग्य प्रारूप में इकट्ठा करती है. GSI के साथ दक्षिण एशिया का जुड़ाव सुरक्षा को लेकर चीन के विचारों से समानता कम और भारतीय वर्चस्व को चुनौती देने के लिए पुराने द्विपक्षीय रक्षा संबंधों को संस्थागत बनाने के बारे में अधिक है. ऐसा करके GSI हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में चीन की सुरक्षा मौजूदगी को लेकर चिंता उत्पन्न करती है. इससे क्षेत्रीय नेतृत्व और सुरक्षा मज़बूत करने के भारत के प्रयासों के सामने चुनौतियां खड़ी होती हैं.
दक्षिण एशिया में चीन की वैश्विक सुरक्षा पहल (GSI) अब केवल नए समझौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पुराने रक्षा संबंधों को संस्थागत रूप देने का माध्यम बन चुकी है, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सुरक्षा भूमिका पर दबाव बढ़ रहा है।
राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने GSI के बारे में सबसे पहले 2022 में बताया और 2023 में एक कॉन्सेप्ट पेपर के ज़रिए इसका वर्णन किया. GSI चीन के नेतृत्व में एक वर्ल्ड ऑर्डर स्थापित करने की उसकी मंशा है. व्यवहार में ये पहल संधि-आधारित ढांचा कम और एक व्यापक व्यवस्था अधिक है जिसके तहत चीन अपना मौजूदा सुरक्षा सहयोग और मज़बूत कर रहा है. इस प्रयास के केंद्र में कानून प्रवर्तन, आंतरिक सुरक्षा और पुलिस साझेदारी का विस्तार है. इसके साथ-साथ उसके नेतृत्व के लिए समर्थन मज़बूत करना भी जो ग्लोबल पब्लिक सिक्युरिटी कोऑपरेशन फोरम (GPSCF) जैसे मंचों के ज़रिए दिखता है. “अविभाज्य सुरक्षा”, गुटों की राजनीति के विरुद्ध और संप्रभुता के सम्मान जैसी धारणाओं के इर्द-गिर्द तैयार ये पहल पश्चिमी देशों के विकल्प के रूप में है जिसे चीन हस्तक्षेपवादी पुराने गठबंधन के रूप में पेश करता है.
भारत के अलावा दूसरे दक्षिण एशियाई देशों (पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और मालदीव) ने इसमें शामिल होने में तेज़ी दिखाई है (तालिका 1 देखें). इसके पीछे मुख्य रूप से तीन कारण हैं:
तालिका 1: GSI पर दक्षिण एशियाई देशों का रुख
Source: China Internal Security Diplomacy Dataset, Harvard Dataverse
पहला कारण ये है कि दक्षिण एशियाई देशों को रक्षा एवं सुरक्षा सुधारों तथा सहयोग की सख्त ज़रूरत है क्योंकि हिंद महासागर मौजूदा भू-राजनीतिक उथल-पुथल का केंद्र बनता जा रहा है. दक्षिण एशियाई देशों का मानना है कि चीन का उदय अपरिहार्य है. औद्योगिक रक्षा उत्पादन, हथियार निर्यात में चीन की क्षमता और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), साइबरस्पेस एवं बाहरी अंतरिक्ष जैसे “उभरते क्षेत्रों” में चीन की प्रगति उसे उन देशों के लिए आकर्षक साझेदार बनाती है जो पश्चिमी देशों की राजनीतिक शर्तों को माने बिना तेज़ी से अपनी क्षमता बढ़ाना चाहते हैं. बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव के लिए चीन बड़े पैमाने पर उत्पादन और गति का दुर्लभ मेलजोल प्रस्तुत करता है. वहीं पाकिस्तान के लिए चीन का हथियार और रक्षा सहयोग भारत के ख़िलाफ़ उसकी मुख्य गारंटी के रूप में देखा जाता है.
दक्षिण एशिया में GSI का बढ़ता प्रभाव प्रमुख समुद्री कॉरिडोर में चीन की सुरक्षा मौजूदगी को संस्थागत रूप देने में भी तेज़ी लाता है. BRI के बुनियादी ढांचे के साथ जोड़ा जाए तो GSI सुरक्षा-वाणिज्यिक साठगांठ को मज़बूत करती है.
दूसरा, GSI के साथ दक्षिण एशिया की भागीदारी रणनीतिक विविधता में सक्षम बनाती है और भारत की ज़बरदस्त मौजूदगी से बचाने का काम करती है. ऐतिहासिक रूप से भारत इस क्षेत्र में बड़ी ताकत और सुरक्षा प्रदान करने वाला रहा है. इसने दक्षिण एशियाई देशों को विविधता के लिए मजबूर किया है. इस क्षेत्र के देश स्वीकार करते हैं कि भारत के साथ सहयोग के ज़रिए क्षेत्रीय सुरक्षा बढ़ाना आवश्यक है लेकिन उनका ये मानना है कि GSI के तहत चीन के साथ सुरक्षा भागीदारी भारत पर उनकी निर्भरता कम करेगी और उनके लिए सौदेबाज़ी की अतिरिक्त गुंजाइश होगी.
तीसरा, घरेलू आवश्यकताएं और राजनीति भी इन बाहरी गठबंधनों को आकार देती हैं. भारत के साथ रक्षा और सुरक्षा सहयोग से राजनीतिक चुनौतियां बढ़ी हैं. ये आरोप भी लगे हैं कि भारत दक्षिण एशियाई देशों की संप्रभुता का उल्लंघन करता है. मालदीव का ‘इंडिया आउट’ अभियान और श्रीलंका के रक्षा समझौते की हालिया आलोचना इस बात का उदाहरण है कि सुरक्षा सहयोग का कैसे राजनीतिकरण किया जाता है. इसके कारण राष्ट्रीय सुरक्षा की नीति काफी हद तक मौजूदा शासन तय करती है. मालदीव और बांग्लादेश GSI में अपनी सरकारों में बदलाव के बाद शामिल हुए. वहीं श्रीलंका की बात करें तो आर्थिक मुश्किलों ने चीन को लेकर उसकी सौदेबाज़ी की शक्ति बहुत कम कर दी.
चीन के लिए GSI अपनी बढ़ती सुरक्षा और रक्षा साझेदारी को संस्थागत रूप देने का स्वाभाविक रास्ता है. ये उसे अपने नेतृत्व को स्थापित करने और उसकी वैधता हासिल करने में भी मदद करती है. साथ ही भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना का विकल्प प्रदान करने और भारत को चुनौती देने में भी मददगार है. वैसे चीन ने दावा किया है कि भूटान और नेपाल ने GSI का समर्थन किया है जबकि दोनों में से किसी देश ने इस संबंध में आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है.
वास्तव में दक्षिण एशिया में GSI नई परियोजनाओं के बदले मौजूदा रक्षा प्रणालियों के माध्यम से लागू होती है. साझा ट्रेनिंग अभ्यासों के साथ दक्षिण एशिया को चीन का हथियार निर्यात (जैसा कि तालिका 2 में है) उसके बदलते रक्षा संबंधों का संकेत देता है. पाकिस्तान, चीन का सबसे बड़ा साझेदार बना हुआ है जिसके साथ सह-उत्पादन की व्यवस्था, साझा मंच और गहरी अनुकूलता है. पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश ने भी बुनियादी ढांचे से जुड़े रक्षा सहयोग की ओर रुख किया है. चीन ने 2023 में बांग्लादेश के पहले पनडुब्बी बेस का निर्माण पूरा किया. ख़बरों के मुताबिक अंतरिम सरकार चीन की मदद से ब्रिटिश युग के लालमोनिरहाट एयर बेस को फिर से इस्तेमाल में लाने की दिशा में काम कर रही है.
GSI भारत के नेतृत्व वाले कोलंबो सिक्युरिटी कॉन्क्लेव जैसी मौजूदा क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना को भी चुनौती देती है. कुल मिलाकर GSI इस क्षेत्र में भारत की अगुवाई वाली संरचना के लिए अधिक चुनौतियां पेश करती है.
मोइज़्ज़ू के नेतृत्व में मालदीव ने भी चीन के साथ अपने पहले सैन्य सहायता समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसके तहत मालदीव के सुरक्षा बलों को गैर-घातक हथियार और मुफ्त ट्रेनिंग मिलेगी. मालदीव ने चीन के रिसर्च जहाज़ों को अपने समुद्र में आने की अनुमति भी दी है. चीन और भारत के साथ संबंधों को संतुलित करने के प्रयासों और चीन के जासूसी करने वाले जहाज़ों को अपने यहां आने से प्रतिबंधित करने के बावजूद श्रीलंका ने 2024 में PLA नेवी के कई जहाज़ों की मेज़बानी की.
तालिका 2: चीन की रक्षा भागीदारी
Source: Lowy Institute Asia Power Index
दक्षिण एशिया में GSI का बढ़ता प्रभाव प्रमुख समुद्री कॉरिडोर में चीन की सुरक्षा मौजूदगी को संस्थागत रूप देने में भी तेज़ी लाता है. BRI के बुनियादी ढांचे के साथ जोड़ा जाए तो GSI सुरक्षा-वाणिज्यिक साठगांठ को मज़बूत करती है.
चीन का हथियार निर्यात भी दक्षिण एशियाई देशों को दीर्घकालीन संबंधों के लिए बाध्य करता है. पारंपरिक सैन्य सहयोग से आगे चीन ने पुलिस बलों और आंतरिक सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी ट्रेनिंग कार्यक्रमों का विस्तार किया है. लगातार भागीदारी से चीन की सुरक्षा पद्धतियों और ख़तरे की धारणा से परिचित होने में मदद मिलती है.
GSI भारत के नेतृत्व वाले कोलंबो सिक्युरिटी कॉन्क्लेव जैसी मौजूदा क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना को भी चुनौती देती है. अलग-अलग देश अपने सुरक्षा दृष्टिकोण और शासन व्यवस्था में चीन के हथियारों और नीतियों का उपयोग बढ़ाएंगे जिससे समान विचार वाले क्षेत्रीय सहयोग के लिए नई चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं.
कुल मिलाकर GSI इस क्षेत्र में भारत की अगुवाई वाली संरचना के लिए अधिक चुनौतियां पेश करती है.
आदित्य गौडारा शिवमूर्ति ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं।
उदिति लुनावत ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च इंटर्न हैं।
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Aditya Gowdara Shivamurthy is an Associate Fellow with the Strategic Studies Programme’s Neighbourhood Studies Initiative. He focuses on strategic and security-related developments in the South Asian ...
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Uditi Lunawat is a Research Intern at the Observer Research Foundation. ...
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