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Published on Sep 23, 2025 Updated 2 Days ago

चीन की हालिया सिलसिलेवार “ग्लोबल इनिशिएटिव” की पहल मल्टीलेटरलिज्म को नए सिरे से पेश कर, ग्लोबल साउथ को आकर्षित करना तथा बीजिंग को एक नई विश्व व्यवस्था या वर्ल्ड ऑर्डर के रचयिता के रूप में स्थापित करना अमेरिका के नेतृत्व वाली व्यवस्था को चुनौती देती है.

अपनी वैश्विक पहलों के ज़रिए चीन की एक अलग वर्ल्ड ऑर्डर बनाने की कोशिश

परिचय  

हाल ही में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की मीटिंग में, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक नए “ग्लोबल इनिशिएटिव” की पहल की. इसका मकसद ये था कि सभी देश मिलकर एक ऐसी दुनिया की व्यवस्था बनाएं जो ज़्यादा “जस्ट और इक्विटेबल” यानी न्याय संगत और निष्पक्ष हो. अपनी मुख़्य स्पीच में, शी ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद के समय से इस इस दौर की तुलना की और कहा कि अब “दुनिया के कामकाज को चलाने के लिए एक नए तरीके” की ज़रूरत है. उन्होंने कहा कि शीत युद्ध के समय की सोच, दादागिरी और केवल अपने हितों की रक्षा की सोच यानी संरक्षणवाद (प्रोटेक्शनिज़्म) से दुनिया में देशो के बीच आपस में सहयोग कम हो रहा है. इस समय चीन खुद को शांति और सुरक्षा के रक्षक के किरदार में ढालने की कोशिश में लग रहा है और एक नए वर्ल्ड ऑर्डर की अगुवाई के लिए तत्पर नज़र आ रहा है. चीन अमेरिका के नेतृत्व वाली दुनिया की व्यवस्था की आलोचना कर रहा है, और खुद को एक ज़िम्मेदार किरदार की तरह पेश कर रहा है जो सभी देशों को साथ लेकर काम करना चाहता है और संयुक्त राष्ट्र (UN) के नियमों का पालन करता है. ऐसा करके, बीजिंग उन देशों को अपनी तरफ करना चाहता है जो आज की व्यवस्था से नाराज़ हैं, और उन्हें एक ज़्यादा इन्क्लूसिव व्यवस्था का विकल्प दे रहा है. इन सब के साथ-साथ वह अमेरिका की दादागिरी को चुनौती भी देता नज़र आ रहा है. 

क्या है 'ग्लोबल गवर्नेंस इनिशिएटिव' (GGI) ? 

आज के परिवेश में दुनिया के संस्थानों की 'तीन कमियों' को आधार बनाकर, उन्हें दूर करने के लिए 'ग्लोबल गवर्नेंस इनिशिएटिव' शुरू की गई है. ये कमियां हैं, गरीब और विकासशील देशों को कम मौका मिलना, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे संस्थानों की बात का कम वजन होना, सभी देशों द्वारा मिलकर की गई कोशिशों का ज़्यादा असरदार न होना. इस पहल के दस्तावेज़ में जलवायु परिवर्तन और डिजिटल दुनिया की असमानता जैसी बड़ी समस्याओं पर भी ध्यान देने की बात कही गई है. चीन ने 'ग्लोबल गवर्नेंस इनिशिएटिव' के मूल तत्वों को भी इस दौरान आगे रखा और कहा कि वो संयुक्त राष्ट्र के नियमों का पालन करने और दुनिया के कामकाज को चलाने के तरीके को सुधारने के लक्ष्य को लेकर आगे चलने का इच्छुक है. इस पहल में कुछ खास बातें बताई गई हैं जो संयुक्त राष्ट्र के नियमों से काफ़ी मिलती-जुलती हैं जैसे कि सभी देशों को बराfबर समझना, अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करना, ‘ग्लोबल गवर्नेंस का आधारभूत सिद्धांत’ मल्टीलेटरलिज्म होना और शासन की प्रक्रिया पीपल सेंट्रिक होना यानी लोगो को सर्वोपरि मानना.  

चीन अमेरिका के नेतृत्व वाली दुनिया की व्यवस्था की आलोचना कर रहा है, और खुद को एक ज़िम्मेदार किरदार की तरह पेश कर रहा है जो सभी देशों को साथ लेकर काम करना चाहता है और संयुक्त राष्ट्र (UN) के नियमों का पालन करता है. ऐसा करके, बीजिंग उन देशों को अपनी तरफ करना चाहता है जो आज की व्यवस्था से नाराज़ हैं, और उन्हें एक ज़्यादा इन्क्लूसिव व्यवस्था का विकल्प दे रहा है. 

ये बातें बहुत हद तक शी के 2021 के बोआओ फोरम में दिए गए भाषण से मिलती जुलती हैं, जिसे उन्होंने “ए वर्ल्ड ऑफ़ चेंज” नाम के प्रसंग के साथ कही था. उस समय उन्होंने 'चार कमियों' की बात की थी जो आज के दौर में मानवता झेल रही है: अच्छे शासन की कमी, आपसी विश्वास की कमी, विकास की कमी और शांति की कमी. इस संदर्भ में उन्होंने यह कहा कि दुनिया को जब एक मजबूत नेतृत्व की ज़रूरत थी तब पश्चिम के नेतृत्व वाली व्यवस्था नाकाम हो गई. चार साल बाद, शी का यह चौथा ग्लोबल इनिशिएटिव चीन की इस महत्वाकांक्षा को उजागर करता है कि वह अब दुनिया को एक नया  विकल्प देना चाहता है. हालांकि, इस दौरान पेश किए गए एक कांसेप्ट नोट ने यह भी साफ़ किया है कि ये पहल भी चीन की पिछली पहलों का ही हिस्सा है, जैसे कि ग्लोबल डेवलपमेंट इनिशिएटिव (GDI), ग्लोबल सिक्योरिटी इनिशिएटिव (GSI) और ग्लोबल सिविलाइज़ेशन इनिशिएटिव (GCI). 

व्यवस्था में नई व्यवस्था लाने की कोशिश 

बीजिंग इन ‘ग्लोबल इनिशिएटिव्स’ को ‘वैश्विक सार्वजनिक वस्तु’ (public goods) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जो धीरे-धीरे अमेरिका के रूल बेस्ड यानि नियमों पर आधारित व्यवस्था को बदल देने की बात करता है. GSI को यूक्रेन युद्ध के दौरान लाया गया था. इसका मकसद शासन को स्थिर रखना और तानाशाह सरकारों को बाहरी जांच से बचाना था. GDI को 2021 में लाया गया, जो GSI का ही एक तरह से जुड़वा भाई था. इसका मकसद दुनिया के विकास के काम को चीन की देखरेख में लाना था. GCI, जो मार्च 2023 में आई, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के विचारों को बढ़ावा देने की कोशिश थी. इसका मकसद लोकतंत्र और मानवाधिकारों जैसे विचारों को हटाकर एक ऐसी दुनिया बनाना था जहां तानाशाह सरकारें भी दोस्त बन सकें और जो मौजूदा अमेरिकी व्यवस्था से ज़्यादा बेहतर लगे, जो हाल के दिनों में बिगड़ती नज़र आ रही है. 

चीन ने 'ग्लोबल गवर्नेंस इनिशिएटिव' के मूल तत्वों को भी इस दौरान आगे रखा और कहा कि वो संयुक्त राष्ट्र के नियमों का पालन करने और दुनिया के कामकाज को चलाने के तरीके को सुधारने के लक्ष्य को लेकर आगे चलने का इच्छुक है.

इस संदर्भ में, ये सारी पहल चीन के लिए दुनिया में वैश्विक वर्चस्व प्राप्त करने और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की बदलती ज़रूरतों का जवाब देने के लिए बहुत ज़रूरी हथियार हैं. शी की सबसे बड़ी योजना, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI), जो 2013 में शुरू हुई थी, को कुछ देशों में दिक्कतें आईं, लेकिन अब उसे GDI में शामिल कर लिया गया है. पहले की पहलों की तरह, ये भी नित नए नाम से आने वाले होते हैं और “लोगों पर ध्यान”, “नवाचार” और “नतीजे-आधारित” विकास की बात करती हैं. इन सब बातों का बार-बार दोहराया जाना चीन की एक पुरानी चाल है. पुराने विचारों को नए नाम से बेचना और यह दावा करना कि अमेरिका की मौजूदा व्यवस्था “ग़लत और बेईमानी वाली” है, और चीन “स्थिरता का सबसे बड़ा स्रोत” है, यह चीन की चाल का ही हिस्सा है. 

रणनीतिक मायने 

अपने सभी “ग्लोबल इनिशिएटिवों” में चीन ने संयुक्त राष्ट्र और उसके संस्थानों की भूमिका की आलोचना करने से परहेज किया है. उसने कई बार यह दोहराया है कि वो इस संस्था के संस्थापक सदस्यों में से एक है और उसे इस उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से बहुत फ़ायदा हुआ है. हालांकि, बीजिंग इस व्यवस्था में पश्चिमी देशों के दबदबे का विरोध करता है और अक्सर एक बदली हुई दुनिया की व्यवस्था की बात करता है. इन पहलों को चीन की एक बड़ी योजना के तौर पर देखा जाना चाहिए, जहां वो विकासशील देशों का नेता बनना चाहता है. खुद को दुनिया का सबसे बड़ा विकासशील देश बताकर, चीन ग्लोबल साउथ के देशों का साथ जीतना चाहता है और चीनी सोच के साथ एक वैकल्पिक दुनिया की व्यवस्था कायम करने की अपनी मंशा को आगे बढ़ाना चाहता है.  2004 से जब 'बीजिंग कंसेंसस' शब्द इजात हुआ, जिसका मतलब यह था चीनी कम्युनिस्ट पार्टी शासित चीन की सरकार के नेतृत्व में लचीले ढंग से आर्थिक विकास और विदेशी निवेश करता है. यह पश्चिम समर्थित 'वाशिंगटन कंसेंसस' से बेहतर विकल्प के तौर पर पेश करने की कोशिश का हिस्सा है. 2017 में 19वीं पार्टी कांग्रेस में बोलते हुए शी ने कहा था कि चीन 2020 तक एक आधुनिक और समृद्ध राष्ट्र बन जाएगा और सुझाव दिया था कि दूसरे विकासशील देशों को भी चीन जैसा ही मॉडल अपनाना चाहिए. भले ही आज 2025 में चीन की आर्थिक विकास दर कोई खास समृद्धि नहीं दिखा रही हो फिर भी चीन खुद को एक बेहतर मॉडल के अगुवा के तौर पर पेश करने की कोशिश जारी रखे हुए है, चाहे वो शासन में हो या विकासशील देशों या पूरी दुनिया के नेतृत्व के सिलसिले में हो. चीन ने दुनिया का नेतृत्व संभालने की अपनी इच्छा के कई संकेत दिए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ लगाने की जिद के बीच, जिसमें वे दोस्तों और दुश्मनों दोनों के साथ तिरस्कारपूर्ण व्यवहार कर रहे थे. अगर समय रहते अमेरिका नियमों पर आधारित यानी रूल बेस्ड अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के नेतृत्व को संभाले रखने की अपनी प्रतिबद्धता को जारी रखने के संकेत नहीं देती है तो ये उम्मीद की जा सकती है कि चीन की 'ग्लोबल इनिशिएटिव' और भी ज़्यादा जड़ पकड़ेगी और वो तटस्थ देशों और दुश्मनों को भी चीन की तरफ आकर्षित करेगी. 


डॉ. श्रीपर्णा पाठक ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में चाइना स्टडीज़ की प्रोफेसर और नार्थईस्ट एशियाई स्टडीज़ केंद्र की संस्थापक निदेशक हैं. 

उपमन्यु बसु, मानव रचना इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च एंड स्टडीज में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर हैं. 

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