Author : Sauradeep Bag

Expert Speak Raisina Debates
Published on Jan 12, 2026 Updated 0 Hours ago

चीन का डिजिटल युआन (e-CNY) अब एक नए दौर में है. जनवरी 2026 से इस पर ब्याज मिलेगा, जिससे यह सिर्फ डिजिटल नकद नहीं बल्कि “डिजिटल जमा” बन जाएगा. इस लेख से समझें कि सीमापार व्यापार में युआन के बढ़ते इस्तेमाल से डॉलर पर निर्भरता किस तरह धीरे-धीरे कम हो रही है.

चीन का e-CNY मॉडल: डॉलर को चुनौती

चीन अपनी केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) के विकास के एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है. जनवरी 2026 से डिजिटल युआन (e-CNY) पर ब्याज मिलेगा जो मांग जमा दरों से जुड़ा होगा. इससे डिजिटल युआन केवल डिजिटल नकद न रहकर डिजिटल जमा जैसा बन जाएगा. वैश्विक स्तर पर, बड़े पैमाने पर CBDC लागू करने में चीन सबसे आगे है जबकि अन्य देशों की योजनाएं धीरे आगे बढ़ी हैं. उदाहरण के लिए, डिजिटल यूरो अभी तैयारी के चरण में है और 2030 से पहले इसके जारी होने की संभावना कम है. भारत के पायलट कार्यक्रम भी चीन की तेज़ रफ्तार के मुकाबले संतुलित गति से आगे बढ़ रहे हैं.

ब्याज और प्रभाव

डिजिटल युआन पर ब्याज देने का चीन का फैसला घरेलू और रणनीतिक-दोनों उद्देश्यों से जुड़ा हो सकता है, हालांकि इसे किसी बड़े भू-राजनीतिक कदम के रूप में देखना अभी स्पष्ट नहीं है. देश के भीतर, यह कदम लोगों को e-CNY अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है क्योंकि इससे यह नकद और अन्य डिजिटल भुगतान साधनों की तुलना में अधिक आकर्षक बनता है. मांग जमा दरों से जुड़ा रिटर्न डिजिटल युआन को मूल्य संचित करने का माध्यम बना सकता है.

डिजिटल यूरो अभी तैयारी के चरण में है और 2030 से पहले इसके जारी होने की संभावना कम है. भारत के पायलट कार्यक्रम भी चीन की तेज़ रफ्तार के मुकाबले संतुलित गति से आगे बढ़ रहे हैं.

रणनीतिक स्तर पर इसके असर अभी अनिश्चित हैं. कुछ लोग e-CNY को धीरे-धीरे डॉलर पर निर्भरता कम करने के साधन के रूप में देखते हैं लेकिन उपलब्ध संकेत बताते हैं कि चीन सावधानी से, चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ रहा है, न कि डॉलर को सीधे चुनौती देने के लिए. सीमा पार व्यापार में डिजिटल युआन के बढ़ते उपयोग से कुछ क्षेत्रों में डॉलर पर निर्भरता कम हो सकती है. इससे चीन अपने व्यापारिक नेटवर्क के साथ जुड़ी वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था देकर क्षेत्रीय वित्तीय प्रभाव भी बढ़ा सकता है. वैश्विक मुद्रा व्यवस्था में इससे बड़ा बदलाव होगा या नहीं, यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी लेकिन यह जरूर दिखाता है कि डिजिटल मुद्रा के ढांचे में चीन की भूमिका बढ़ सकती है.

संकेत और बदलाव

यह संभव है कि आने वाले समय में अमेरिकी डॉलर का वैश्विक प्रभुत्व धीरे-धीरे कमजोर पड़े, हालांकि इस बारे में अभी कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी होगी. दशकों से डॉलर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और विदेशी मुद्रा भंडार का मुख्य आधार रहा है. इसकी मजबूती का कारण केवल अमेरिका की आर्थिक शक्ति नहीं बल्कि उसकी राजनीतिक संस्थाओं की स्थिरता, गहरे वित्तीय बाज़ार और वैश्विक भरोसा भी रहा है. लेकिन हाल के वर्षों में कुछ ऐसे संकेत उभरे हैं जो इस प्रभुत्व को धीरे-धीरे चुनौती दे सकते हैं.

अमेरिका के भीतर बढ़ता राजनीतिक ध्रुवीकरण, बार-बार होने वाले नीतिगत टकराव और सरकार के कामकाज में अनिश्चितता, लंबे समय में डॉलर की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश जारी कर अमेरिका में केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) के निर्माण पर रोक लगा दी है. उन्होंने इसके पीछे वित्तीय स्थिरता, व्यक्तिगत गोपनीयता और राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़े जोखिमों का हवाला दिया है. इसके साथ ही व्यापार और टैरिफ नीतियों को लेकर अस्थिरता भी वैश्विक निवेशकों और व्यापारिक साझेदारों के मन में सवाल खड़े करती है. यदि ऐसी अनिश्चितताएँ लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो वे डॉलर की सुरक्षित मुद्रा की छवि को धीरे-धीरे कमजोर कर सकती हैं.

दूसरी ओर, अमेरिका के बाहर भी ऐसे घटनाक्रम हो रहे हैं जो वैकल्पिक मुद्राओं को धीरे-धीरे आकर्षक बना सकते हैं. वैश्विक दक्षिण के कई देश व्यापार में अपनी स्थानीय मुद्राओं के उपयोग की संभावनाएँ तलाश रहे हैं. खबरों के अनुसार, एक भारतीय कंपनी ने रूस से कोयला आयात के भुगतान के लिए युआन का इस्तेमाल किया जबकि बांग्लादेश ने अपने परमाणु बिजली संयंत्र के निर्माण के लिए युआन में भुगतान करना चुना. प्रतिबंधों, भू-राजनीतिक तनावों और भुगतान प्रणालियों से जुड़ी चिंताओं ने भी कुछ देशों को डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए प्रेरित किया है.

अमेरिका के भीतर बढ़ता राजनीतिक ध्रुवीकरण, बार-बार होने वाले नीतिगत टकराव और सरकार के कामकाज में अनिश्चितता, लंबे समय में डॉलर की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है.

यदि चीन जैसे बड़े देश आर्थिक सुधारों को लगातार आगे बढ़ाते हैं और दीर्घकालिक स्थिरता बनाए रखते हैं तो उनकी मुद्राएँ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक भरोसेमंद बन सकती हैं. हालांकि, इसके लिए आवश्यक है कि वे मुद्राएँ स्थिर हों, उन पर भरोसा किया जा सके और उनमें पर्याप्त तरलता हो ताकि बड़े पैमाने पर व्यापार और निवेश को सहारा मिल सके. कुल मिलाकर, डॉलर के प्रभुत्व में कमी यदि होती भी है, तो वह अचानक नहीं बल्कि एक धीमी और क्रमिक प्रक्रिया के रूप में सामने आएगी.

CBDC की बढ़ती गति

खुदरा केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) को लागू करने के मामले में चीन दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे आगे है. जहाँ कई देश अभी इसके डिज़ाइन और कानूनी ढांचे पर चर्चा कर रहे हैं, वहीं चीन पहले ही आवश्यक संस्थागत ढांचा तैयार कर चुका है और सीमापार उपयोग के प्रयोग भी कर रहा है. हालांकि, इस क्षेत्र में चीन की अंतरराष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को कुछ झटके भी लगे हैं. बहुपक्षीय सीमापार भुगतान मंच mBridge को लेकर की गई कोशिशों को पिछले वर्ष कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जब बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS) इस परियोजना से हट गया. यह घटना दिखाती है कि भू-राजनीतिक सीमाएँ अब भी चीन की डिजिटल मुद्रा योजनाओं के वैश्विक विस्तार को प्रभावित और सीमित कर रही हैं.

ये घटनाक्रम संकेत देते हैं कि चीन की CBDC परियोजना अब अधिक परिपक्व चरण में प्रवेश कर रही है. डिजिटल युआन पर ब्याज देने का फैसला देश के भीतर इसकी लोकप्रियता बढ़ा सकता है और इसके उपयोग को तेज़ कर सकता है, हालांकि इसके दीर्घकालिक प्रभाव समय के साथ ही स्पष्ट होंगे. डिजिटल युआन को सीधे तौर पर डॉलर से दूरी बनाने के औज़ार के रूप में देखना आकर्षक लग सकता है, लेकिन अब तक के प्रमाण एक धीमी और असमान प्रक्रिया की ओर इशारा करते हैं. डॉलर का प्रभुत्व कुछ खास परिस्थितियों और व्यापारिक रास्तों में ही कमजोर हो रहा है, वह भी ज़्यादातर प्रतिबंधों, व्यापारिक तनावों या लेन-देन की सुविधा के कारण, न कि किसी सुनियोजित वैश्विक बदलाव से.

ये घटनाएँ दिखाती हैं कि वैश्विक व्यापार में मुद्राओं का उपयोग धीरे और असमान रूप से विविध हो रहा है-यह किसी बड़े बदलाव से अधिक, बदलती भू-राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों के व्यावहारिक जवाब जैसा है.

यह अधिक स्पष्ट है कि चीन, भारत और कई अन्य देशों में CBDC को लेकर गति तेज़ हो रही है, जबकि अमेरिका डिजिटल मुद्रा के लिए निजी क्षेत्र के नेतृत्व वाला अलग रास्ता अपना रहा है. जैसे-जैसे सीमापार व्यापार और भुगतान में युआन का उपयोग बढ़ेगा, खासकर नई डिजिटल संरचनाओं के साथ, यह देखना अहम होगा कि भुगतान के तरीके, व्यापारिक रिश्ते और मुद्रा पसंद किस दिशा में बदलते हैं. यह बदलाव वैश्विक मौद्रिक व्यवस्था में किसी बड़े संरचनात्मक परिवर्तन की शुरुआत है या मौजूदा भू-राजनीतिक हालात के अनुसार एक अस्थायी समायोजन-यह सवाल अभी खुला हुआ है.

इसके कुछ शुरुआती संकेत पहले से दिख रहे हैं, खासकर प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक बदलावों के संदर्भ में. चीन–रूस व्यापार का एक बड़ा हिस्सा अब युआन और रूबल में हो रहा है, जिससे डॉलर का उपयोग घटा है. रूस के अलावा, चीन ने यूएई, सऊदी अरब और क़तर जैसे मध्य-पूर्वी देशों के साथ व्यापार निपटान समझौते किए हैं, जिन्हें उसकी क्रॉस-बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम (CIPS) का समर्थन मिल रहा है.

ऊर्जा के अलावा भी सीमापार व्यापार में युआन का उपयोग धीरे-धीरे बढ़ता दिख रहा है. खबरों के अनुसार, एक भारतीय कंपनी ने रूस से कोयला आयात के लिए युआन में भुगतान किया, जबकि बांग्लादेश ने अपने परमाणु बिजली संयंत्र के निर्माण के लिए युआन में भुगतान चुना. कुल मिलाकर, ये घटनाएँ दिखाती हैं कि वैश्विक व्यापार में मुद्राओं का उपयोग धीरे और असमान रूप से विविध हो रहा है-यह किसी बड़े बदलाव से अधिक, बदलती भू-राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों के व्यावहारिक जवाब जैसा है.


सौरदीप बाग ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर सिक्योरिटी, स्ट्रेटेजी एंड टेक्नोलॉजी में एसोसिएट फेलो हैं.

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