चीन की कृषि जैव विविधता का इतिहास सदियों पुराना है. वर्तमान में जिस प्रकार से खेती के तौर-तरीक़ों में तेज़ी से बदलाव हो रहे हैं, उनमें जलवायु लचीलेपन, खाद्य प्रणालियों और पारिस्थितिक स्थिरता के लिहाज़ से चीन की कृषि जैव विविधिता बेहद अहम साबित हो रही है.
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यह चाइना क्रॉनिकल्स सीरीज़ का 172वां लेख है.
चीन में व्यापक स्तर पर कई कृषि पारिस्थितिक क्षेत्र हैं, जहां सदियों पुराने तौर-तरीक़ों से खेती की जाती है. इन्हीं क्षेत्रों की वजह से एग्रीकल्चर बायो-डायवर्सिटी यानी कृषि जैव विविधता के दुनिया के 12 वैश्विक केंद्रों में चीन का भी नाम शामिल है. ज़ाहिर है कि चीन की इस उपलब्धि और विशेषता के पीछे देश में खेती के अलग-अलग तरीक़े और कृषि से जुड़ी सांस्कृतिक विविधिता है. इन्हीं खूबियों ने 1.4 बिलियन से अधिक आबादी के भरण-पोषण और उनकी खाद्य व पोषण सुरक्षा में चीन की पारंपरागत तौर पर मदद की है. हालांकि, चीन में खेती-बाड़ी के अब पहले जैसे हालात नहीं हैं और तेज़ी से हो रहे आधुनिकीकरण, औद्योगिक कृषि की और बढ़ते क़दमों एवं जलवायु परिवर्तन ने चीन की कृषि जैव विविधता को प्रभावित किया है. इन विपरीत हालातों की वजह से चीन के लिए टिकाऊ कृषि और पोषण सुरक्षा हासिल करना एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है.
चीन की कृषि जैव विविधता का सबसे बेहतरीन उदाहरण युन्नान प्रांत के होंगेहे हानी राइस टेरेस हैं. ये चीन की चावल की खेती की 1300 साल पुरानी विरासत है, जिसमें सीढ़ीनुमा खेतों पर चावल की पैदावार की जाती है और होंगेहे हानी राइस टेरेस क़रीब 16,603 हैक्टेयर क्षेत्र में फैले हुए हैं. चावल की खेती का यह तरीक़ा देखा जाए तो पारिस्थितिकी इंजीनियरिंग का सटीक उदाहरण पेश करता है. हानी के लोगों ने खेती के इस परंपरागत तरीक़े को समय के साथ-साथ उन्नत किया है और इसे पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए नए-नए प्रयोग किए हैं. नीचे दिखाया गया है कि वहां चावल की खेती के दौरान चावल-मछली-बत्तख प्रणाली कैसे काम करती है, जो कि चीन की एक पारंपरिक कृषि पद्धति है. यह एक बहु-फसल मॉडल है, जिसमें एक ही भूमि पर चावल की फसल उगाई जाती है और मछली व बत्तख भी पाली जाती हैं. इस प्रणाली में, बत्तखें चावल के खेतों में घूमती हैं, खरपतवारों और कीटों को खाती हैं, और मिट्टी को उर्वरक प्रदान करती हैं. मछलियां पानी में रहती हैं, कीड़ों को खाती हैं और पानी को साफ रखती हैं. यह प्रणाली कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करती है, जिससे पर्यावरण को लाभ होता है, साथ ही जैव विविधिता को भी खेती के इस मॉडल से बढ़ावा मिलता है. इसके अलावा इससे भोजन और आय के भी अलग-अलग स्रोत मिलते हैं, जिससे किसानों की इनकम में वृद्धि होती है. खेती के ऐसे तरीक़ों से किसानों की आय तो बढ़ती ही है, साथ ही ऐसी कृषि पद्धतियां खेती की स्थानीय संस्कृति को भी संरक्षित करती हैं, साथ ही किसानों की मेहनत का महत्व बताती हैं और पारिस्थितिकी से जुड़ी पारंपरिक जानकारी को भी सहेज कर रखती हैं.
चीन की कृषि जैव विविधता का सबसे बेहतरीन उदाहरण युन्नान प्रांत के होंगेहे हानी राइस टेरेस हैं. ये चीन की चावल की खेती की 1300 साल पुरानी विरासत है, जिसमें सीढ़ीनुमा खेतों पर चावल की पैदावार की जाती है और होंगेहे हानी राइस टेरेस क़रीब 16,603 हैक्टेयर क्षेत्र में फैले हुए हैं.

स्रोत: राइस-फिश-डक सिम्बायोसिस
चीन में अलग-अलग तरह की फसलों को उगाने के साथ ही पशुपालन और सूक्ष्मजीवों को भी उतना ही महत्व दिया जाता है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि चीन अपनी कृषि जैव विविधिता में पोषण के मुद्दे को भी प्रमुखता देता है. चीन की हरित क्रांति में नई तकनीक़ों का जमकर उपयोग किया जाता है, इससे कहीं न कहीं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को आगे बढ़ाने में भी मदद मिलती है. जौ, अनाज, बाजरा, जई और ज्वार जैसी पारंपरिक फसलें, जो कि पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं, लेकिन इन्हें अक्सर बहुत कम महत्व दिया जाता है और कम उगाया जाता है. सबसे बड़ी बात यह है कि इन्हीं फसलों ने चीन की खाद्य और पोषण सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
खेती में उन्नत किस्म के बीजों की अहम भूमिका होती है और कृषि जैव विविधता बीजों के विकास और उत्पादन में बहुत अहम है. ज़ाहिर है कि कृषि की पूरी बुनियाद ही बीजों के गुणवत्ता पर टिकी होती है. चीन में बीजों के विकास पर बहुत ध्यान दिया जाता है और दुनिया में चीन के पास विकसित बीजों और जर्मप्लाज्म का सबसे बड़ा संग्रह है. इससे चीन को नई-नई फसलों को विकसित करने और खाद्य सुरक्षा हासिल करने में मदद मिलती है. इसके अलावा, चीन में सामुदायिक बीज बैंकों को काफ़ी प्रोत्साहन दिया जाता है और फसलों की स्थानीय प्रजातियों को बनाए रखने, साथ ही उन्हें बढ़ावा देने के लिए हर संभव सहायता दी जाती है. ज़ाहिर है कि स्थानीय स्तर पर उगाई जाने वाली पारंपरिक फसलें वहां की स्थानीय ज़रूरतों और जलवायु परिस्थितियों के मुताबिक़ होती हैं. इन सामुदायिक बीज बैंकों के ज़रिए चीन में ग्रामीण समुदायों और किसानों को उन्नत किस्म के बीजों की कोई कमी नहीं होने दी जाती है और इस प्रकार से उन्हें खाद्य सुरक्षा भी प्रदान की जाती है.
चीन में कृषि जैव विविधिता को बनाए रखने की दिशा में तमाम कोशिशें की जा रही हैं, बावज़ूद इसके चीन में पारंपरिक फसलों में होने वाले अनुवांशिक क्षरण यानी उनकी गुणवत्ता में होने वाली गिरावट और अंधाधुंध कृषि की वजह से वहां एग्रो बायोडयवर्सिटी पर गंभीर संकट छाया हुआ है. इतना ही नहीं चीन में लगातार बढ़ते शहरीकरण और ज़मीन के उपयोग में हो रहे बदलाव की वजह से जैव विविधिता वाली खेती की ज़मीन कम होती जा रही है. कुल मिलाकर चीन में कृषि की जो पारंपरिक जानकारी और ज्ञान है, उसमें पीढ़ी दर पीढ़ी लगातार कमी आ रही है, साथ ही ग्रामीण इलाक़ों से लोगों का पलायन शहरों की ओर हो रहा है. इन सबके चलते चीन में कृषि और पारिस्थितिकी से जुड़ी जो विरासत है और जो सदियों पुरानी जानकारी है, उसके लुप्त होने का गंभीर संकट पैदा हो गया है.
चीन में कृषि जैव विविधिता को बनाए रखने की दिशा में तमाम कोशिशें की जा रही हैं, बावज़ूद इसके चीन में पारंपरिक फसलों में होने वाले अनुवांशिक क्षरण यानी उनकी गुणवत्ता में होने वाली गिरावट और अंधाधुंध कृषि की वजह से वहां एग्रो बायोडयवर्सिटी पर गंभीर संकट छाया हुआ है.
चीन में इस दिशा में जो भी नीतिगत क़दम उठाए गए हैं, उनसे कृषि जैव विविधिता के संरक्षण और उपयोग के लिए अवसर भी बनते हैं, साथ ही कई चुनौतियां भी खड़ी होती हैं. चीन की जो राष्ट्रीय विकास रणनीति है, उसमें ‘इकोलॉजिकल सिविलाइजेशन’ यानी प्रकृति के साथ तालमेल स्थापित करके आगे बढ़ने को खासी तवज्जो दी गई है. इस रणनीति में पर्यावरणीय स्थिरता को प्रोत्साहित करने के दौरान जैव विविधता के महत्व को बखूबी समझा गया है. चीन के ‘ग्रेन फॉर ग्रीन’ यानी कृषि भूमि को जंगल या घास के मैदान में बदलने जैसे कार्यक्रमों का मकसद वनों की कटाई, पारिस्थितिक क्षरण और मिट्टी के कटाव जैसी समस्याओं का समाधान करना है. ऐसे कार्यक्रम बताते हैं कि चीन जैव विविधता के प्रति कितना सजग और संवेदनशील है. हालांकि, चीन में इस तरह की कोशिशें ज़मीनी स्तर पर उतनी कारगर नज़र नहीं आती हैं. इतना ही नहीं, कई बार तो लगता है कि चीन का ज़ोर औद्योगिक कृषि यानी बड़े पैमाने पर खेती में मशीनों, रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल के ज़रिए अधिक से अधिक पैदावार हासिल करने पर है.
ऐसे में साफ है कि अगर राष्ट्रीय खाद्य और पोषण सुरक्षा नीतियों में कृषि जैव विविधता को प्रमुखता दी जाती है, तो इससे अच्छे नतीज़े हासिल हो सकते हैं. उदाहरण के तौर पर ऐसे नीतिगत क़दम उठाए जाने चाहिए, जिनमें सरकारी ख़रीद योजनाओं, स्कूलों में बच्चों को भोजन खिलाने जैसे कार्यक्रमों और बाज़ारों में उन फसलों को तवज्जो दी जाए, जिन्हें पारंपरिक तरीक़े से उगाया जाता है और जिनका आमतौर पर कम उपयोग किया जाता है. इससे इन फसलों की खेती को भी बढ़ावा मिलेगा और इनकी खपत में भी बढ़ोतरी होगी. इसके अलावा, खान-पान से जुड़े दिशा-निर्देशों और सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित क़वायदों में भी पारंपरिक फसलों को प्रोत्साहन देने से भी जैव विविधिता के प्रयासों को बल मिल सकता है. ऐसा करने से न सिर्फ़ पोषण में सुधार होगा यानी लोगों को पोषण युक्त भोजन उपलब्ध होगा बल्कि जैव विविधता के अनुकूल खेती के लिए बाज़ार विकसित होगा, जिससे इन फसलों की पैदावार को बढ़ावा मिलेगा.
कृषि जैव विविधता के संरक्षण में किसानों की भागीदारी सुनिश्चित किया जाना भी बेहद अहम है. किसान केवल नई-नई तकनीक़ों और नीतियों का लाभ उठाने के लिए ही अहम नहीं हैं, बल्कि देखा जाए तो वे ही वास्तविकता में कृषि जैव विविधता का सही मायने में संरक्षण कर सकते हैं. पूर्वी चीन में ‘सीड टू टेबल’ पहल का उद्देश्य टिकाऊ एग्रीफूड प्रणालियों को बढ़ावा देना और किसानों व बाज़ारों के बीच संबंध को मज़बूत करना है. सहभागी प्लांट ब्रीडिंग, सामुदायिक बीज मेले और फार्मर फील्ड स्कूल जैसी पहलें खेती-बाड़ी से जुड़ी जानकारियों को सहेजने के नज़रिए से बेहद अहम हैं. इसके अलावा बीजों के नेटवर्क को मज़बूत करने और फसल विविधता के अनुकूल प्रबंधन के लिहाज़ भी ये पहलें बहुत महत्वपूर्ण हैं. इस तरह की पहलें चीन के जातीय अल्पसंख्यक क्षेत्रों में ख़ास तौर पर बहुत अहम हैं, क्योंकि इन क्षेत्रों में जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत काफ़ी नज़दीकी से जुड़ी हुई है.
कृषि जैव विविधता चीन की सदियों पुरानी कृषि विरासत का प्रतिबिंब नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए भी एक बेहतरीन रणनीति है. चीन जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों, पर्यावरणीय हलचल और पोषण परिवर्तन यानी खानपान की तरीक़ों में बदलाव का सामना कर रहा है. ऐसे में अगर चीन अपनी समृद्ध कृषि जैव विविधता से सबक लेते हुए क़दम उठाता है, तो निश्चित तौर पर उसे अधिक टिकाऊ, समावेशी और लचीली खाद्य प्रणाली बनाने में मदद मिल सकती है.
इसके अलावा, कृषि जैव विविधिता को बढ़ावा देने में तकनीक़ी नवाचार भी काफ़ी अहम भूमिका निभाता हैं. जैसे कि मोबाइल आधारित प्लेटफॉर्म सीड एक्सचेंज यानी बीजों की अदला-बदली, जल प्रबंधन, मौसम के पूर्वानुमान और जैव विविधता निगरानी में मददगार हो सकते हैं. इतना ही नहीं अगर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके कृषि से जुड़ी पारंपरिक जानकारी को डिजिटल तरीक़े से संजोया जाता है और ओपन-सोर्स बीज डेटाबेस स्थापित किया जाता है, तो इससे न केवल कृषि से संबंधित प्राचीन ज्ञान को आगे की पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सकता है, बल्कि लोगों को खेती से जुड़ी हर प्रकार की जानकारी से भी लैस किया जा सकता है. एक बात बहुत अहम है कि इस प्रकार के उपायों को अमल में लाने के दौरान छोटे और सीमांत किसानों की ज़रूरतों को प्राथमिकता देनी चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इन विकसित माध्यमों तक उनकी आसान पहुंच हो.
आख़िर में, कृषि जैव विविधता चीन की सदियों पुरानी कृषि विरासत का प्रतिबिंब नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए भी एक बेहतरीन रणनीति है. चीन जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों, पर्यावरणीय हलचल और पोषण परिवर्तन यानी खानपान की तरीक़ों में बदलाव का सामना कर रहा है. ऐसे में अगर चीन अपनी समृद्ध कृषि जैव विविधता से सबक लेते हुए क़दम उठाता है, तो निश्चित तौर पर उसे अधिक टिकाऊ, समावेशी और लचीली खाद्य प्रणाली बनाने में मदद मिल सकती है. चीन की कृषि जैव विविधता में खेती के तरीक़ों, ज़मीन के उपयोग और बीज से जुड़ी पारंपरिक जानकारियों का अकूत भंडार है. चीन के युन्नान प्रांत के सीढ़ीदार चावल के खेतों से लेकर हार्बिन के ठंड-सहने में सक्षम बीजों के बैंकों तक, कृषि से जुड़े ऐसे कई उपाय देखने को मिलते हैं, जो लगते तो स्थानीय और स्वदेशी हैं, लेकिन इनका प्रभाव और प्रासंगिकता वैश्विक है. कुल मिलाकर कृषि जैव विविधिता के महत्व के मद्देनज़र इन उपायों को टिकाऊ खाद्य प्रणालियों यानी खेती की पर्यावरण अनुकूल पद्धतियों में शामिल किया जाना चाहिए और इसके लिए नीतिगत क़दम भी उठाना चाहिए, साथ ही व्यापक स्तर पर इसमें सामुदायिक भागीदारी भी सुनिश्चित करनी चाहिए. ऐसा करके ही न केवल भविष्य के खाद्य संकटों से निपटने के लिए अभी से कमर कसी जा सकती है, बल्कि वर्तमान में फसलों की पैदावार बढ़ाई जा सकती है और खाद्य सुरक्षा की समस्या का समाधान करने के साथ-साथ किसानों की इनकम में भी बढ़ोतरी की जा सकती है. .
शोभा सूरी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के हेल्थ इनीशिएटिव में सीनियर फेलो हैं.
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Dr. Shoba Suri is a Senior Fellow with ORFs Health Initiative. Shoba is a nutritionist with experience in community and clinical research. She has worked on nutrition, ...
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