ताइवान के चुनाव में लाइ चिंग-तुआ की जीत चीन को नहीं पसंद आई है और इसी वजह से ताइवान के इर्द-गिर्द सैन्य अभ्यास करके चीन, उस पर दबाव बढ़ा रहा है.
चीन की सरकार, ताइवान को लेकर काफ़ी सख़्त रुख़ दिखा रही है. और, अगर हम पूरी निष्पक्षता से कहें तो ताइवान भी इसका उतनी ही मज़बूती से जवाब दे रहा है. हालांकि, ये कहना ज़रा मुश्किल है कि आख़िर एक दूसरे पर आंखें तरेरने का ये खेल किस मोड़ पर जाकर ख़त्म होगा, जहां से आगे ऐसे नतीजे निकलेंगे, जो पहले कभी देखे सुने नहीं गए.
पिछले गुरुवार और शुक्रवार को चीन की ईस्टर्न थिएटर कमान ने ताइवान के इर्द गिर्द साझा सैन्य अभ्यास किया था. इस युद्धाभ्यास को ताइवान के लिए ‘दंड’ क़रार दिया गया था, क्योंकि पिछले सोमवार को ही ताइवान के नए राष्ट्रपति लाइ चिंग-तुआ के कार्यकाल की शुरुआत हुई थी.
लेकिन इस बार के युद्ध अभ्यास तो उन इलाक़ों में भी फैल गए, जिनकी वजह से ताइवान के मुख्य द्वीप और चीन की सीमा के क़रीब स्थित छोटे छोटे द्वीपों को लगभग चारों तरफ़ से घेर लिया गया था.
पिछले चार वर्षों के दौरान, चीन (PRC) ताइवान के आस-पास के इलाक़ों में नियमित रूप से युद्ध अभ्यास करता रहा है, ताकि वो ताइवान की सरकार पर दबाव बना सके. क्योंकि चीन की नज़र में, ताइवान की सरकार कुछ ज़्यादा ही स्वतंत्रता की समर्थक थी. लेकिन इस बार के युद्ध अभ्यास तो उन इलाक़ों में भी फैल गए, जिनकी वजह से ताइवान के मुख्य द्वीप और चीन की सीमा के क़रीब स्थित छोटे छोटे द्वीपों को लगभग चारों तरफ़ से घेर लिया गया था.

Source: FocusTaiwan
ये बात शुरू से ही स्पष्ट है कि चीन, लाइ चिंग-तुआ पर वश्वास नहीं करेगा, क्योंकि वो लंबे समय से ताइवान को एक स्वतंत्र राष्ट्र मानते रहे हैं और ये बात चीन को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं है, क्योंकि चीन इस बात पर ज़ोर देता रहा है कि ताइवान को जल्दी से जल्दी उसका हिस्सा बन जाना चाहिए.
लाई चिंग-तुआ ने अपने कार्यकाल के शुरुआती भाषण में चीन से कहा कि वो ‘ताइवान को राजनीतिक और फ़ौजी तरीक़े से डराना धमकाना’ बंद कर दे. चिंग-तुआ ने कहा कि चीन को ‘चीन गणराज्य के अस्तित्व की सच्चाई’ को स्वीकार करना होगा. चिंग-तुआ ने तो ये तक कह दिया कि ताइवान, अपने संविधान में दर्ज संप्रभुता का मालिक है और चीन और रिपब्लिक ऑफ चाइना (ताइवान) एक दूसरे के मातहत नहीं हैं.
ऐसे में तब कोई हैरानी नहीं हुई, जब चीन ने लाई चिंग-तुआ की ये कहते हुए आलोचना की कि वो ताइवान के आज़ादी हासिल करने को लेकर ‘ख़तरनाक संकेत’ दे रहे हैं. चीन की स्टेट काउंसिल के ताइवान मामलों के कार्यालय के प्रवक्ता चेन बिनहुआ ने कहा कि, लाई के भाषण ने ‘बड़ी हठधर्मिता से ताइवान के स्वतंत्रता के रुख़ को दोहराया है. उन्होंने बड़ी बेशर्मी से अलगाववाद की वकालत की है और ताइवान जलसन्धि के आर-पार टकराव को उकसाया है…’
लाई के भाषण को लेकर पर्यवेक्षकों ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि उन्होंने 19992 की उस आम सहमति का कोई ज़िक्र नहीं किया था, जिसे चीन और ताइवान के संबंधों के मौजूदा दौर का दिशा-निर्देश माना जाता है.
चीन और ताइवान के रिश्तों के पर्यवेक्षकों का कहना है कि लाई चिंग-तुआ अपनी पूर्ववर्ती राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन द्वारा अपनाई गई नीति की लक्ष्मण रेखा से आगे बढ़ गए. त्साई इंग-वेन की नीति थी कि ‘न तो चीन से दबो, न उसे उकसाओ’ और यथास्थिति बनाए रखो. लेकिन लाई चिंग-तुआ ने दोनों पक्षों के संबंधों और हालात को लेकर चीन को लेकर जिस तरह की भाषा और जुमलों का इस्तेमाल की, उससे चीन का ग़ुस्सा भड़क उठा. फाइनेंशियल टाइम्स ने लाई के भाषण का विश्लेषण करते हुए हेडलाइन लगाई थी कि, ‘ताइवान के नए नेता को लेकर चीन की बात में कुछ दम तो है.’
लाई के भाषण को लेकर पर्यवेक्षकों ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि उन्होंने 19992 की उस आम सहमति का कोई ज़िक्र नहीं किया था, जिसे चीन और ताइवान के संबंधों के मौजूदा दौर का दिशा-निर्देश माना जाता है. लाई की पूर्ववर्ती त्साई इंग-वेन ने 2016 में अपने कार्यकाल के शुरुआती भाषण में इसे स्वीकार किया था. हालांकि, उन्होंने भी अप्रत्यक्ष रूप से ही 1992 की आम सहमति की ओर इशारा किया था. इस वजह से चीन की चिंता बढ़ गई थी और उसने इसी वजह से ताइवान के साथ आधिकारिक संवाद बंद कर दिया था. 1992 की आम सहमति चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और ताइवान में उस वक़्त के सत्ताधारी दल KMT बना एक व्यापक समझौता था. इसमें कहा गया था कि ‘चीन’ केवल एक है. भले ही इसकी दोनों पक्ष अपने अपने तरीक़े से चाहे जो व्याख्या करें.
रिपब्लिक ऑफ चाइना (ROC) के एक अलग संप्रभु राष्ट्र होने लेकर मौजूदा राष्ट्रपति लाई चिंग-तुआ और देश के मुख्य विपक्षी दल यानी कुओमिंतांग पार्टी (KMT) के नज़रिए में काफ़ी अंतर है. KMT का मानना है कि ROC का मतलब पूरा चीन है, जो ठीक उसी तरह है जैसे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ताइवान को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का हिस्सा मानती है.
अगर ताइवान की नाकेबंदी कर दी गई, तो उसकी अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी और फिर वो मुर्दा द्वीप में तब्दील हो जाएगा.’
इस बीच, ताइवान के भीतर भी इसे लेकर अंदरूनी विवाद है. ताइवान की संसद में लाई चिंग-तुआ की डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी के पास बहुमत नहीं है. वहां, सारे विपक्षी दल मिलकर ये कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें सरकार के ऊपर निगरानी के और अधिकार मिल जाएं. ताइवान के मुख्य विपक्षी दल KMT को अब चीन समर्थक के तौर पर देखा जा रहा है. जबकि, KMT का कहना है कि वो तो बस चीन से नज़दीकी संबंध चाहती है. संसद में सरकार और विपक्षी दलों के संबंधों में ज़बरदस्त तनाव हैं और पिछले हफ़्ते संसद में दोनों पक्षों के बीच हाथापाई भी हुई थी.
इस बीच, ताइवान के इर्द गिर्द चीन का युद्धाभ्यास शुक्रवार को समाप्त हो गया. CCTV न्यूज़ के मुताबिक़ इस युद्धाभ्यास के तीन नए पहलू थे. पहला तो ये था कि इसने एक नई परिस्थिति स्थापित की और ताइवान की स्थिति को लेकर अमेरिका-ताइवान की संयुक्त सलामी स्लाइसिंग की रणनीति को जवाब दिया. दूसरा नया पहलू ये था कि इस युद्धाभ्यास में चीन के तट के पास स्थित ताइवान के दो बाहरी द्वीपों को भी शामिल किया गया था.
चीन के युद्धाभ्यास की तीसरी प्रमुख बात इसका मिज़ाज था, जिससे ये संकेत मिलता है कि चीन, ताइवान पर सीधा हमला करने के बजाय उसकी नाकाबंदी करने की रणनीति अपना सकता है. जैसा कि CCTV न्यूज़ की रिपोर्ट में कहा गया है कि, ‘ताइवान की अर्थव्यवस्था निर्यात पर आधारित है और इसकी ऊर्जा की ज़्यादातर खपत निर्यात पर निर्भर है. अगर ताइवान की नाकेबंदी कर दी गई, तो उसकी अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी और फिर वो मुर्दा द्वीप में तब्दील हो जाएगा.’
ये एक अहम संकेत है और इस बात को लेकर काफ़ी चर्चाएं हो रही हैं कि अगर चीन ने ताइवान की नाकेबंदी की, तो वो कितनी असरदार होगी. एक बात तो है कि चीन के लिए ताइवान पर सीधा हमला करने के बजाय ये विकल्प अपनाना बेहतर होगा. क्योंकि तब अमेरिका और ताइवान के लिए इसका जवाब दे पाना मुश्किल होगा. नाकेबंदी के दौरान ताइवान से रवाना होने वाले जहाज़ों को रोककर उनकी तलाशी लेने से लेकर आवाजाही को पूरी तरह रोकना शामिल हो सकता है. इससे नाकेबंदी की जवाबी कार्रवाई भी हो सकती है, जिससे चीन को नुक़सान हो सकता है. क्योंकि चीन भी अपने खाने, ऊर्जा और निर्यात के लिए समुद्री यातायात पर ही निर्भर है.
नाकेबंदी, सीधे हमले की तुलना में फ़ौरी नहीं होगी. फिर भी इसका दुनिया की अर्थव्यवस्था पर तबाही लाने वाला असर पड़ेगा. इससे चीन को लेकर दुनिया की राय भी नकारात्मक होगी क्योंकि, नाकेबंदी के दौरान अलग अलग देशों के जहाज़ों को रोककर उनकी तलाशी ली जा सकती है.
ताइवान को लेकर अमेरिका और ख़ुद ताइवान का नज़रिया, फ़रवरी 2023 में सीआईए के निदेशक विलियम बर्न्स के पर्दाफ़ाश पर आधारित है. बर्न्स ने अमेरिकी संसद की हाउस इंटेलिजेंस कमेटी को बताया था कि ताइवान को लेकर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए. और, उन्होंने ये भी कहा था कि अमेरिका के पास ‘ये गोपनीय जानकारी’ है कि शी जिनपिंग ने चीन की सेना को आदेश दिया है कि वो 2027 तक ताइवान पर हमले की तैयारी करे.
इसमें कोई शक नहीं है कि अमेरिका और ताइवान, चीन के संभावित सैन्य विकल्पों के बारे में सोच रहे हैं, जिसमें नाकेबंदी भी शामिल है. लेकिन, हाल के दिनों में अमेरिका, ताइवान में आपात स्थिति से निपटने के लिए एक सैन्य रणनीति भी तैयार कर रहा है.
ताइवान की जलसंधि के इर्द गिर्द हो रही सैन्य गतिविधियां भविष्य के लिए कोई अच्छा संकेत नहीं हैं. इस बात की संभावना हमेशा बनी रहती है कि स्थानीय स्तर की घटनाएं बेक़ाबू हो जाएं.
अभी पिछले ही महीने अमेरिका और फिलीपींस की सैनिक टुकड़ियों ने लाओआग शहर में चीन के समुद्री आक्रमण को पीछे धकेलने का अभ्यास किया था. लाओआग, फिलीपींस का वो सूबा है, जो चीन के सबसे पास स्थित है और ताइवान के दक्षिण में है. अमेरिका और फिलीपींस की सेनाएं हाल के वर्षों में सबसे बड़े बालिकतन या कंधे से कंधा मिलाकर युद्धाभ्यास में हिस्सा ले रहे थे. अमेरिका ने टाइफोन सिस्टम के लिए मध्यम दूरी के एक नए मिसाइल लॉन्चर को भी तैनात किया है, जो टोमाहॉक और एसएम-6 मिसाइलें दाग़ता है. टोमाहॉक मिसाइलें ताइवान और चीन के सैनिक अड्डों के साथ साथ दक्षिणी चीन सागर और ख़ुद चीन के भीतर तक मूलभूत ढांचों को निशाना बना सकती हैं. वहीं, SM-6 मिसाइल चीन की हाइपरसोनिक मिसाइलों के हमले को रोक सकती है.
फिलीपींस और अमेरिका के इस युद्ध अभ्यास का एक हिस्सा इथबायत और मावुलिस द्वीपों पर भी किया गया था, जो ताइवान से केवल 80 से 100 मील की दूरी पर हैं. अमेरिकी मरीन, जो इस युद्धाभ्यास में शामिल थे, वो छोटी और फुर्तीली सैन्य टुकड़ियों के इस्तेमाल की रणनीति का विकास कर रहे हैं और इसके साथ साथ छोटे ड्रोन और सेंसर का उपयोग भी कर रहे हैं, ताकि अमेरिका के सैनिकों के बड़े दस्ते जुटाने तक इस इलाक़े में संभावित चीनी सैन्य अभियान की रफ़्तार को कम कर सकें.
ताइवान की जलसंधि के इर्द गिर्द हो रही सैन्य गतिविधियां भविष्य के लिए कोई अच्छा संकेत नहीं हैं. इस बात की संभावना हमेशा बनी रहती है कि स्थानीय स्तर की घटनाएं बेक़ाबू हो जाएं. इसमें दांव पर जो कुछ लगा है, वो न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक है. ऐसे में हालात पर नज़र रखना और जाने अनजाने में तनाव बढ़ने पर उसे रोकने के लिए तेज़ी से क़दम उठाना ज़रूरी है.
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Manoj Joshi is a Distinguished Fellow at the ORF. He has been a journalist specialising on national and international politics and is a commentator and ...
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