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ट्रेड वॉर में खुद को विजेता बताने वाला चीन अब अपनी ही अर्थव्यवस्था की सबसे गहरी दरारों से जूझ रहा है. निर्यात रिकॉर्ड छू रहे हैं मगर घरेलू मांग, निवेश और बाज़ार भरोसा लगातार फिसल रहा है- यही बीजिंग की असली चुनौती है.
पिछले कुछ महीनों से चीन के मुख्य मीडिया और सोशल मीडिया पर नज़र डालने से जीत का एक भाव साफ़-साफ़ दिखता है. कई लोग मानते हैं कि चीन मौजूदा व्यापार युद्ध को जीतने जा रहा है और ‘अमेरिका के लिए अब खेल ख़त्म’ है. ऐसा इसलिए, क्योंकि अमेरिका के ख़िलाफ़ चीन कहीं ज़्यादा असरदार तरीके से व्यापार नियमों को लागू कर रहा है, ज़वाबी कार्रवाई कर रहा है और प्रयोग करने में जुटा है. इसने न सिर्फ़ ट्रंप प्रशासन को अपने कुछ दंडात्मक टैरिफ़ वापस लेने को मजबूर किया है, बल्कि वाशिंगटन के सामने नई चुनौतियां भी पेश की हैं, जैसे कि उसकी आपूर्ति शृंखला की कमज़ोरियों को उजागर किया है, अमेरिकी की भरोसेमंद छवि को नुक़सान पहुंचाया है, उस पर अन्य देशों का अविश्वास बढ़ाया है और उसके वैश्विक प्रभाव को कमज़ोर किया है. ये सभी चीन के लिए रणनीतिक जीत के संकेत हैं और कहा जा रहा है कि बीजिंग को यह सफलता ‘मेड इन चाइना’ की ताक़त के कारण मिल सकी है.
आर्थिक असर के साथ चीन के विदेशी संबंध भी प्रभावित.
चीनी मीडिया–सोशल मीडिया में जीत का भाव उभरता दिख रहा है.
ट्रंप द्वारा पैदा की गई ‘टैरिफ़ बैरियर’, यानी सीमा शुल्क संबंधी रुकावटों के बावजूद, चीन का निर्यात अच्छे तरीके से चल रहा है. साल 2025 के सितंबर तक उसके निर्यात में 7 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी थी. अमेरिकी बाज़ार का अधिकांश हिस्सा गंवाने के बाद भी, चीन वैश्विक व्यापार में आयात से अधिक निर्यात कर रहा है. साल 2025 के शुरुआती आठ महीनों में चीन का ट्रेड सरप्लस 785.34 अरब डॉलर था और इस साल इसके 1.2 ट्रिलियन डॉलर से अधिक होने की उम्मीद है, जो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 1 प्रतिशत है. वैश्विक विनिर्माण, यानी मैन्युफैक्चरिंग में चीन की हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत है, और यह लगातार 15 वर्षों से सबसे ज़्यादा मैन्युफैक्चरिंग करने वाला देश बना हुआ है. इन वर्षों में ‘मेड इन चाइना’ भारत सहित कई विकासशील देशों का आर्थिक आधार बन गया है. इसीलिए, चीन में यह चर्चा आम है कि चीन और अमेरिका के इस खेल ने बीजिंग की ताक़त की सफल परीक्षा ली है और अमेरिका व पूरी दुनिया को चीन की क्षमता का लोहा मानने व चीन को एक उभरती हुई ताक़त के रूप में मान्यता देने के लिए मजबूर किया है. इसीलिए, कोई आश्चर्य नहीं कि चीन फ़िलहाल जश्न मना रहा है.
“हालांकि, यह जश्न कुछ देर का ही है, क्योंकि चीन को कई उभरती चिंताओं का भी सामना करना पड़ रहा है, जो उसकी अपनी अर्थव्यवस्था से जुड़ी हैं.”
हालांकि, यह जश्न कुछ देर का ही है, क्योंकि चीन को कई उभरती चिंताओं का भी सामना करना पड़ रहा है, जो उसकी अपनी अर्थव्यवस्था से जुड़ी हैं. यह सही है कि चीन के उत्पाद दुनिया भर के देशों में पहुंच रहे हैं, लेकिन चीनी पर्यवेक्षकों का मानना है कि उत्पादों के निर्यात से चीन को जो अतिरिक्त कमाई हो रही है, वह उसकी अपनी अर्थव्यवस्था में ज़रूरी जान नहीं डाल पाई है. यह कमाई या तो काग़ज़ों में ही घूमती रहती है या अन्य देशों में की जा रही गतिविधियों में ख़र्च हो जाती है.
चीन के भीतर इस बात पर सहमति बढ़ती दिख रही है कि उसकी अर्थव्यवस्था अभी ऐसी स्थिति का सामना कर रही है, जो पिछले 40 वर्षों में कभी नहीं देखी गई, और यह भी कि वह कभी महामारी से पूरी तरह उबर नहीं पाएगी. इसका कारण यह है कि उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) लगातार तीन वर्षों से नकारात्मक है और हर महीने घट ही रहा है. तीन वर्षों का नकारात्मक PPI और दो सालों से अधिक समय का क़रीब-क़रीब शून्य उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) चीन के बीते चार दशकों के आर्थिक विकास में सबसे बड़ी गिरावट का संकेत है. चूंकि अर्थव्यवस्था के विभिन्न महत्वपूर्ण क्षेत्रों में गंभीर गिरावट आई है, इस कारण क़ीमतों में भी लगातार कमी हो रही है और कॉरपोरेट मुनाफ़े पर भी दबाव है. इसके साथ ही रियल एस्टेट की क़ीमतों में भी कमी आई है, जो साल 2011 से शुरू हुई है. नतीजतन, खपत भी कम हो रही है. अब चूंकि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में भी गिरावट है, इसलिए औद्योगिक कंपनियों के विदेश जाने का ख़तरा बढ़ रहा है, बाज़ार की लागत बढ़ रही है, आबादी घट रही है और मांग कम हो रही है. इन सबसे रोज़गार के क्षेत्र पर भी दबाव बढ़ रहा है.
अब, चीन के रणनीतिक जगत में जो सवाल मुख्य रूप से घूम रहा है, वह है- सरकार द्वारा बड़े पैमाने किए जा रहे प्रयासों के बावजूद चीन की खपत बढ़ क्यों नहीं रही है? विकासशील देशों के मामले में आमतौर पर जब प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 13,000-14,000 डॉलर तक पहुंच जाता है, तो निर्यात के कारण पड़ने वाले प्रभाव धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ते जाते हैं और खपत मुख्य आधार बन जाता है. फ़िलहाल ज़्यादातर विकसित देश व्यापार घाटे में हैं, क्योंकि उनके पास ख़र्च करने के लिए अधिक पैसे हैं, इसीलिए वे कम निर्यात करते हैं. मगर चीन के मामले में ठीक ऐसा ही नहीं हो रहा है. भले ही, उसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी पहले ही 13,000 से 14,000 डॉलर तक पहुंच गई है, लेकिन बनने वाले अधिकांश राजमार्ग और हवाई अड्डे पहले ही तैयार हो चुके हैं. यानी, इस समय, जब खपत से चीन का विकास आगे बढ़ना चाहिए था और उसके सकल घरेलू उत्पाद का यह 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा होना चाहिए था, उसकी खपत ख़ास तौर से बीते दो सालों में कमज़ोर हुई है.
“तीन वर्षों का नकारात्मक PPI और दो सालों से अधिक समय का क़रीब-क़रीब शून्य उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) चीन के बीते चार दशकों के आर्थिक विकास में सबसे बड़ी गिरावट का संकेत है.”
एक तर्क यह दिया जा रहा है कि सरकार के तकनीकी राष्ट्रवाद का, विशेष तौर पर 2018 के बाद से, असर उल्टा पड़ा है. चीन के रणनीतिक दुनिया में तेज़ी से यह व्याख्या लोकप्रिय हो रही है, क्योंकि इस नीति का मूल मक़सद स्वतंत्र नवाचार को मज़बूत करना रहा है. शंघाई यूनिवर्सिटी ऑफ फाइनेंस ऐंड इकोनॉमिक्स के प्रोफ़ेसर याओ यांग का मानना है कि चीन सरकार ने जाने-अनजाने हार्ड टेक्नोलॉजी और नवाचार को खपत, वित्त और रियल एस्टेट के ख़िलाफ़ खड़ा कर दिया है. कमोबेश यही माना जाता है कि खपत और रियल एस्टेट को बढ़ाने का मतलब है, नवाचार में रुकावट डालना, जिससे चीन अमेरिका से मुकाबले में हार जाएगा. मगर अब यह साफ़ होता जा रहा है कि चीन के पास अभी जो तकनीकी क्षमता है, वह पहले से ही काफ़ी ऊंची है और यह चीनी की अर्थव्यवस्था को मंदी के लंबे दौर में जाने से नहीं रोक सकती.
कहा यह भी जा रहा है कि चीन केवल तकनीकी रुकावटों को दूर करके और एक स्वतंत्र घरेलू औद्योगिक श्रृंखला बनाकर नकदी की कमी संबंधी अपने मौजूदा गंभीर संकट से बच नहीं सकता. यह आर्थिक समस्या इसलिए पैदा हुई है, क्योंकि उसका पूंजी बाज़ार सिकुड़ गया है, जिसके केंद्र में रियल एस्टेट है. चीन के अर्थशास्त्री चेतावनी दे रहे हैं कि पर्याप्त घरेलू मांग के बिना चीन का मैन्युफैक्चरिंग, सैन्य और तकनीकी क्षेत्र जितना मज़बूत होता जाएगा, उसका घरेलू आर्थिक संकट उतना ही गंभीर हो जाएगा. वे सावधान करते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध से पहले वैश्विक विनिर्माण में अमेरिका की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत थी, जो चीन के मौजूदा 30 प्रतिशत से अधिक है, फिर भी उसे मानव इतिहास की सबसे बड़ी मंदी का सामना करना पड़ा. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि चीन के लिए भी यही आज सच होता जान पड़ रहा है.
“बेहतर उत्पादकता अब चीन की सबसे बड़ी कमज़ोरी बन रही है.”
चीन की मौजूदा आर्थिक चुनौतियों की कुछ चीनी अर्थशास्त्री अलग तरह से भी व्याख्या करते हैं. उनके मुताबिक, खपत बढ़ाने के लिए सरकारी नीतियां अब तक सब्सिडी, करों में कमी, नकद सहायता, रोजगार में स्थिरता, आय बंटवारे में निवासियों की हिस्सेदारी बढ़ाने, बैंक खाते में भुगतान ज़्यादा करने और सामाजिक सुरक्षा व जनहित के कामों में ख़र्च अधिक करने जैसे उपायों पर ज़ोर देती रही हैं, जबकि रियल एस्टेट जैसे ढांचागत मुद्दों पर ध्यान देने से परहेज़ किया गया है. जबकि, कहा जाता है कि यदि रियल एस्टेट की क़ीमतों में लंबे समय तक गिरावट बनी रहती है, तो समग्र मांग स्थिर ही रहेगी, उसमें वृद्धि नहीं होगी. राजस्व की कमी के कारण स्थानीय सरकारें निवेश करने से दूर रहेंगी, जिससे घरेलू मांग का बढ़ना कठिन हो जाएगा.
इस लिहाज़ से देखें, तो बीते कुछ वर्षों में रियल एस्टेट के बुलबुले को ठीक करने और उसके जोखिम को दूर करने के प्रयास ‘गंभीर गलतियां’ थी, जैसा कि शियामेन यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और चाइना अर्बन प्लानिंग सोसाइटी के उपाध्यक्ष झाओ यानजिंग कहते हैं. उनकी मानें, तो रियल एस्टेट पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई ने चीन के मध्यम वर्ग को प्रभावित किया, जिसके कारण घरेलू मांग नहीं बढ़ पा रही. इसीलिए, चीन का रणनीतिक वर्ग चाहता है कि सरकार कर्ज़ बढ़ाने के बारे में अपने पुराने रुख़ पर फिर से विचार करे. वह विशेष रूप से रियल एस्टेट को बुरा मानने या वास्तविक अर्थव्यवस्था (यानी, मज़बूत तकनीक, उत्पादन और सैन्य) पर बहुत ज़्यादा ध्यान देने या जापान के तीन दशकों तक नुक़सान उठाने के अनुभव का हवाला देते हुए कर्ज़ बढ़ाने से बचने की कोशिश न करे.
मुख्य रूप से अभी यही सलाह दी गई है कि सरकार को घटती मांग के इस दौर में आपूर्ति पक्ष मज़बूत बनाने के उपाय बंद कर देने चाहिए, क्योंकि इससे ज़रूरत से ज़्यादा आपूर्ति हो रही है और घरेलू अर्थव्यवस्था नीचे गिर रही है. इस बीच, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन की जबर्दस्त उत्पादकता ने न केवल अमेरिका को, बल्कि यूरोपीय संघ, भारत और अन्य देशों को भी उसके ख़िलाफ़ समीकरण बनाने को मजबूर किया है. बड़े बाज़ार वाले देश चीन को अपना सबसे बड़ा ख़तरा मान रहे हैं और तेज़ी से उसके ख़िलाफ़ संरक्षणवादी उपाय अपना रहे हैं. इस तरह, चीन की बेहतर उत्पादकता, जो चीन की वैश्विक हैसियत की कुंजी है, मौजूदा परिस्थितियों में उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी साबित हो रही है.
“भारत को चीन की स्थिति न ज्यादा आंकनी चाहिए, न कमतर समझनी चाहिए.”
चीनी पर्यवेक्षकों का तर्क है कि चीन को अब विनिर्माण पर नहीं, बल्कि पूंजी पर ध्यान लगाना चाहिए. इतना ही नहीं, शेयर बाज़ार को बढ़ावा देने, घर की क़ीमतों को संभालने (लगातार गिरावट को रोकने) और स्थानीय सरकारी कर्ज़ को स्थिर करने जैसे विकल्पों पर विचार करना चाहिए, यानी, ऐसे उपाय अपनाने चाहिए, जो क्षमता बढ़ाए बिना पूंजी निर्माण करें और घरेलू मांग को बढ़ाए. दूसरे शब्दों में कहें, तो उनका कहना यह है कि जहां अमेरिका आपूर्ति श्रृंखलाओं को बदलने की कोशिश कर रहा है, वहां अन्य निर्यातक देशों के साथ सीधे मुक़ाबला करने के बजाय चीन युद्ध का मैदान बदलने की कोशिश करें और अपने कर्ज़ को ज़बर्दस्ती बढ़ाकर ‘वैश्विक ग्राहक’ के खिताब के लिए अमेरिका से सीधे टकराए. यह देश अभी न तो जापान की तरह संपत्ति की कमी से जूझ रहा है, न ही श्रम की कमी का सामना कर रहा है, इसलिए मंदी के चक्र को तोड़ने के लिए उसे नए सिरे से सोचना होगा. आज टैरिफ़ युद्ध में अमेरिका की स्थिति इसलिए मज़बूत दिख रही है, क्योंकि वैश्विक कर्ज़ पर उसका एकाधिकार है, इसलिए चीन को भी उसके कदमों पर चलना चाहिए.
हालांकि, चीन के प्रमुख अर्थशास्त्रियों और रणनीतिकारों की नीतिगत बदलाव की इन चर्चाओं को चीन द्वारा हाल ही में जारी 15वीं पंचवर्षीय योजना में बहुत कम जगह मिली है, लेकिन ऐसा लगता है कि इन चर्चाओं ने आम इंटरनेट उपभोक्ताओं के बीच बड़ी आशंकाएं पैदा की हैं, जो चीन की अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर बहुत ज़्यादा भरोसा नहीं पाल रहे हैं. नीतिगत उलझन चीन में जनमत को और भी अधिक आक्रामक बना रही है, जो नहीं चाहते कि मैन्युफैक्चरिंग इकाइयां विदेशों में चली जाएं, फिर चाहे वे निम्न-स्तरीय उद्योग हों या फिर उच्च-स्तरीय. इसी तरह, दुर्लभ रेयर अर्थ और अन्य रणनीतिक संसाधनों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की वकालत करने वाली आवाज़ें भी उठने लगी हैं, ताकि एक ग्राम भी ये तत्व विदेश न जा सकें.
जैसे-जैसे भारत चीन के साथ अपने आर्थिक रिश्ते को फिर से शुरू करने पर विचार कर रहा है, उसे दुनिया की इस दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की उथल-पुथल को समझने के लिए और अधिक कोशिश करनी होगी. उसे अपनी चीन रणनीति को लेकर सावधान रहना चाहिए. ऐसे में, अच्छा यही होगा कि नई दिल्ली न तो अपनी आंखें बंद करके ‘चीन जीत रहा है’ वाली बात माने, और न ही चीनी अर्थव्यवस्था की मज़बूती या मौजूदा संकट से बाहर निकलने की क्षमता को कमतर करके आंके.
(अंतरा घोषाल सिंह ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में स्ट्रैटेजिक स्टडीज प्रोग्राम की फेलो हैं)
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Antara Ghosal Singh is a Fellow at the Strategic Studies Programme at Observer Research Foundation, New Delhi. Her area of research includes China-India relations, China-India-US ...
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