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हजारों साल पहले जब न ग्लूकोज़ मीटर थे, न टेस्ट स्ट्रिप्स- तब भारत के वैद्य चींटियों की कतार देखकर समझ जाते थे कि मूत्र में मिठास बढ़ चुकी है यानी मधुमेह शरीर में दस्तक दे चुका है लेकिन आज यही बीमारी और डरावनी हो गई है क्योंकि यह अब उम्र ढलने पर नहीं बल्कि बचपन में दस्तक दे रही है.
Image Source: Getty Images
ग्लूकोज़ मीटर और डायग्नोस्टिक स्ट्रिप्स के आविष्कार से बहुत पहले, भारतीय चिकित्सा प्रणाली में चींटियों को देखकर मधुमेह का इलाज किया जाता था. चरक संहिता जैसे शास्त्रीय आयुर्वेदिक ग्रंथों में मधुमेह नामक एक शारीरिक स्थिति का वर्णन किया गया है. चरक संहिता में मधुमेह को "शहद मूत्र" कहा गया है. ये ऐसी स्थिति है जो चींटियों के झुंड को रोगी के बिस्तर के पास खींच लाती थी. संक्षेप में कहें तो इन शुरुआती चिकित्सकों ने आधुनिक ग्लूकोज़ मीटरों की खोज से सहस्राब्दियों पहले ही ग्लाइकोसुरिया (मूत्र में शर्करा) की पहचान कर ली थी. इस बात को समझ लिया था कि बहुत ज़्यादा प्यास लगना और शर्करायुक्त मूत्र ही मधुमेह रोग के प्रमुख लक्षण हैं. इस तरह देखा जाए तो ये बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि इंसुलिन और खून की जांच-ग्लूकोज़ टेस्ट के युग से बहुत पहले ही भारत में मधुमेह यानी डायबिटीज के बारे में ऐतिहासिक जागरूकता मौजूद थी.
दो सहस्राब्दियों बाद, भारत एक बार फिर खुद को मधुमेह की कहानी के केंद्र में पा रहा है लेकिन इस बार ये चिंता में डालने वाली बात है क्योंकि इसकी शुरुआत बचपन से होती है. इस बात के सबूत मिल रहे हैं कि मेटाबॉलिज़्म यानी पाचन क्रिया संबंधी विकार अब युवा वर्ग में भी फैल रहे हैं. उदाहरण के लिए, 'भारत में बच्चे 2025' शीर्षक वाली एक हालिया सरकारी रिपोर्ट से पता चला है कि 5-9 साल की आयु के लगभग एक-तिहाई बच्चों में ट्राइग्लिसराइड का स्तर बढ़ा हुआ है. ये पाचन क्रिया संबंधी बीमारी का एक ख़तरा है. कुछ क्षेत्रों में, हर पांच में से एक से ज़्यादा बच्चों की पहचान प्री-डायबिटिक के रूप में की जाती है. ये ख़तरे की बात इसलिए है क्योंकि उम्र के इस दौर में इलाज मुश्किल होता है. जिस उम्र में औपचारिक रूप से डायबिटीज़ का इलाज शुरू किया जा सकता है, उस स्थिति का पता धीरे-धीरे 10-19 आयु वर्ग में दिखाई दे रहा है.
टाइप-1 डायबिटीज (T1DM) पर अब भी ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा जबकि अंतर्राष्ट्रीय मधुमेह संघ के आंकड़े बताते हैं कि 0-19 की उम्र के लगभग 3,01,000 भारतीय बच्चे टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित हैं.
उपरोक्त परिवर्तन एक बड़े बदलाव को दिखाता है और ये भविष्य में चिंता की बात हो सकता है. अब भारत में होने वाली कुल मौतों में लगभग 60 प्रतिशत लोगों की मृत्यु का कारण गैर-संचारी रोग (एनसीडी) बन गए हैं. मोटापा, उच्च रक्तचाप और टाइप-2 डायबिटीज जैसी बीमारियां अब बच्चों में भी बढ़ रही हैं. एक ज़माने में इन रोगों को सिर्फ वयस्कों की चिंता का विषय माना जाता था. ये सोचा भी नहीं जाता था कि बच्चे भी इस रोग की चपेट में आ सकते हैं, विशेष रूप से उच्च रक्तचाप और मधुमेह. इस साल के विश्व मधुमेह दिवस में भी इस बात का ध्यान रखा गया है. इस बार विश्व मधुमेह दिवस की थीम है: 'जीवन के विभिन्न चरणों में मधुमेह'. ये इस बात पर ज़ोर देता है कि मधुमेह की बीमारी अब उम्र की मोहताज़ नहीं रही. ये बीमारी किसी को भी और किसी भी उम्र में हो सकती है. भारत के मामले में, डायबिटीज से प्रभावित होने वाली जीवन-अवस्था पहले से कहीं ज़्यादा जल्दी शुरू हो रही है.
मेटाबॉलिज़्म को समझने के लिए इसे पेट के पीछे स्थित एक सघन औद्योगिक क्षेत्र के रूप में सोचिए, जिसमें अग्नाशय (पैंक्रियास) एक कारखाना है. इसके अंदर, इंजीनियरों की छोटी-छोटी टीमें - आइलेट कोशिकाएं - समानांतर उत्पादन लाइनें चलाती हैं. एक लाइन इंसुलिन हार्मोन बनाती है जो रक्तप्रवाह से ग्लूकोज को मांसपेशियों और यकृत के भंडारों में पहुंचाने वाला डिस्पैच मैनेजर है. दूसरी लाइन ग्लूकॉगन हार्मोन भेजती है, जो एक रिकॉल ऑर्डर है. ये लाइन आपूर्ति कम होने पर ईंधन छोड़ती है. एक तीसरा हार्मोन, सोमैटोस्टैटिन, जो इन लाइनों को एक-दूसरे से टकराने से रोकता है. ये लाइन अन्य हार्मोन/सामान्य के गैर-ज़रूरी स्राव को रोकती है. ये "ऑफ-स्विच" की तरह काम करती है, जब हार्मोन की ज़रूरत होती, तभी इसे रिलीज़ करती है. इन तीनों के अलावा, पाचन प्रक्रिया संबंधी हार्मोनों में एमिलिन भी शामिल है, जो इंसुलिन के साथ ही स्रावित होता है. पैंक्रियास पॉलीपेप्टाइड, और आइलेट कोशिकाओं से निकलने वाला घ्रेलिन भी इस प्रक्रिया में शामिल होता है जबकि आंत के इन्क्रीटिन, ग्लूकोज़ डिपेंडेंट इंसुलिनोट्रॉपिक पॉलीपेप्टाइड और ग्लूकोगॉन लाइक पेपटाइड (GLP-1, GIP) बाहर से कारखाने के उत्पादन को नियंत्रित करते हैं. जब ये पूरी प्रणाली समन्वित रूप से सक्रिय होती है तो इनपुट - कार्बोहाइड्रेट और वसा - शरीर के हर हिस्से में स्थिर ऊर्जा के रूप में ग्रहण किए जाते हैं, प्रोसेस किए जाते हैं और फिर पूरे शरीर में भेजे जाते हैं.
कुपोषण और मोटापा—दोनों साथ बढ़ रहे हैं; भारत पोषण के दोहरे संकट में.
डायबिटीज तब होती है जब ये कारखाना मांग के अनुरूप आपूर्ति नहीं कर पाता. शरीर के लिए पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बन पाती या फिर शरीर इसका पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाता. टाइप-1 डायबिटीज में, इंसुलिन पैदा करने वाली इस मशीनरी पर शरीर के अपने ही सुरक्षा गार्ड हमला करते हैं. इंसुलिन लाइन जाम हो जाती है और लोडिंग डॉक के बाहर ईंधन (रक्त में ग्लूकोज) जमा हो जाता है जबकि अंदर ऊतक भूखे रह जाते हैं. बचपन या किशोरावस्था में अक्सर यही बीमारी पहली बार देखी जाती है. टाइप-2 डायबिटीज ऐतिहासिक रूप से मध्य-आयु वर्ग के लोगों की समस्या थी. पहले ये तीस साल से ज्यादा उम्र के लोगों में होती थी लेकिन अब बीस और यहां तक कि किशोरावस्था में भी भारतीय बच्चे इस रोग की चपेट में आ रहे हैं. डायबिटीज की टाइप-2 अवस्था में कारखाना अभी भी इंसुलिन भेजता है लेकिन शरीर के अंग जवाब देना बंद कर देते हैं. प्रतिरोध बढ़ता है, दक्षता कम हो जाती है और कारखाना गर्म हो जाता है.
शरीर की इस पूरी प्रणाली का परीक्षण उसी तरह किया जाता है जैसे कोई नगरपालिका किसी कारखाने का ऑडिट करती है. सबसे पहले फास्टिंग प्लाज़मा/ब्लड ग्लूकोज़ (एफबीजी) जांच की जाती है. जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, इसमें कम से कम आठ घंटे बिना कैलोरी के रहना पड़ता है यानी एक तरह का उपवास करना पड़ता है. अगर टेस्ट में रीडिंग 126 एमजी/डीएल या उससे ज़्यादा है तो ये डायबिटीज के शुरुआती लक्षण हैं. एमजी/डीएल यानी मिलीग्राम प्रति डेसिलीटर रक्त में सांद्रता या गाढ़ापन नापने की इकाई है. 100-125 एमजी/डीएल प्रीडायबिटीज़ का संकेत देता है. इसके बाद ओरल ग्लूकोज टोलरेंस टेस्ट (ओजीटीटी) 75 ग्राम ग्लूकोज लोड के साथ “बे” को भरता है और दो घंटे में निकासी की गणना करता है. साधारण शब्दों में कहें तो “बे” शरीर की प्रणालियों या रक्तप्रवाह का प्रतिनिधित्व करता है जो तेजी से ग्लूकोज से भर जाते हैं. 200 एमजी/डीएल या उससे ज़्यादा रीडिंग आने पर मधुमेह की पुष्टि मानी जाती है. अगर इसका स्तर 140-199 एमजी/डीएल आता है तो इससे बिगड़ी हुई ग्लूकोज सहनशीलता का संकेत मिलता है. ये किशोरावस्था और गर्भावस्था के दौरान विशेष रूप से उपयोगी है. कई बार आकस्मिक प्लाज़्मा ग्लूकोज टेस्ट भी किया जाता है. इसमें भी अगर जांच का नतीजा 200 एमजी/डीएल आता है तो ये भी मधुमेह का प्रबल संकेत है. HbA1c परीक्षण (ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन) इस बात का त्रैमासिक हिसाब-किताब है कि पाइपलाइन कितनी शुगर रही. ये ग्लूकोज के 2 से 3 महीने के औसत संपर्क की माप है. अगर ये 6.5 प्रतिशत या उससे ज़्यादा है तो डायबिटीज है और अगर इसकी माप 5.7-6.4 प्रतिशत है तो ये प्रीडायबिटीज़ के लक्षण हैं लेकिन भारतीय आबादी में, आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया और हीमोग्लोबिन के विभिन्न प्रकार इस जांच के परिणामों की सटीकता को प्रभावित कर सकते हैं. यही वजह है कि जांच नतीजों की की पुष्टि के लिए नियमित तौर पर फास्टिंग प्लाज़मा/ब्लड ग्लूकोज़ या ओरल ग्लूकोज टोलरेंस टेस्ट कराते रहने चाहिए. अगर संभव हो तो कीटोन टेस्टिंग (रक्त β-हाइड्रॉक्सीब्यूटिरेट) भी करानी चाहिए. ये इंसुलिन की कमी के बारे में बताता है, साथ ही इस बात की चेतावनी देता है कि डायबेटिक कीटोएसिडोसिस होने की आशंका बहुत ज़्यादा है.
हालात कितने खराब हैं, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया में डायबिटीज से पीड़ितों की संख्या के हिसाब से भारत दूसरे नंबर पर आ गया है. देश के लगभग 10.1 करोड़ वयस्क डायबिटीज की चपेट में हैं जो कुल युवा आबादी का 11.4 प्रतिशत है. चिंता की बात ये है कि अब भी जनता का ध्यान और स्वास्थ्य कार्यक्रम में मुख्य रूप से टाइप-2 डायबिटीज (T2DM) की ही बात की जाती है. टाइप-1 डायबिटीज (T1DM) पर अब भी ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा जबकि अंतर्राष्ट्रीय मधुमेह संघ के आकड़े बताते हैं कि 0-19 की उम्र के लगभग 3,01,000 भारतीय बच्चे टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित हैं. इस मामले में अमेरिका के बाद भारत दूसरे स्थान पर है.
अधिकांश स्कूलों में डायबिटीज से पीड़ित बच्चों के लिए इंसुलिन/ग्लूकोज जांच की कोई व्यवस्था नहीं.
अगर इस पर काबू पाना है तो स्कूल और खाद्य नीति को सबसे ज़्यादा महत्व देना होगा. केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने स्कूलों में चीनी और जंक फ़ूड पर नियंत्रण लगाने के उद्देश्य से नियम जारी किए हैं. 2025 तक, सीबीएसई ने अपने से संबद्ध सभी स्कूलों को 'शुगर बोर्ड' लगाने का निर्देश दिया है. इन शुगर बोर्ड्स में तय सीमा में चीनी का सेवन, आम स्नैक्स और पेय पदार्थों में चीनी की मात्रा के बारे में बताना होता है. इसके साथ ही, ज़्यादा चीनी का इस्तेमाल करने से होने वाले स्वास्थ्य संबंधी ज़ोखिमों के बारे में भी बताया जाता है. स्कूलों को चीनी-जागरूकता कार्यशालाए आयोजित करने और इन्हें लागू किए जाने पर रिपोर्ट देने के लिए कहा गया है. पहले भी इस तरह की कोशिशें की गईं थीं. 2015 के दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के बाद, भारतीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने स्कूलों और उनके आसपास 50 मीटर के दायरे में उच्च वसा, नमक और चीनी (एचएफएसएस) वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे. बाद में इन दिशानिर्देशों को खाद्य सुरक्षा और मानक (स्कूल में बच्चों के लिए सुरक्षित भोजन और संतुलित आहार) एक्ट, 2020 में शामिल किया गया. जुलाई 2020 में इसे लागू भी कर दिया गया लेकिन इसे उम्मीदों के मुताबिक सफलता नहीं मिला. सिद्धांत रूप में, ये स्कूल परिसरों के अंदर और आसपास एचएफएसएस खाद्य पदार्थों की बिक्री और विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाते हैं. ये सुनिश्चित किया जाता है कि स्कूलों की कैंटीन में खाने-पीने का ऐसा सामान हो जो सेहत को नुकसान ना पहुंचाए. हालांकि, इस कानून को देशभर में समान रूप से लागू नहीं किया गया. कुछ राज्य इसका कड़ाई से पालन करवा रहे हैं, कहीं इन पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा. प्रोसेस्ड फूड पैक के सामने लेबल लगाना डायबिटीज पर रोकथाम की एक दीर्घकालिक रणनीति है. बेहतर स्वास्थ्य के लिए अभियान चला रहे लोग लंबे समय से ये मांग कर रहे हैं कि एचएफएसएस खाद्य पदार्थों पर स्पष्ट रूप से चेतावनी लिखी जाए लेकिन उद्योग के विरोध की वजह से इसे कार्यान्वयन में देरी हो रही है.
भारत इस समय पोषण परिवर्तन के दौर से भी गुज़र रहा है. एक तरफ कुपोषण एक समस्या बना हुआ है, दूसरी तरफ बच्चों में ज़्यादा वज़न और मोटापा तेज़ी से बढ़ रहा है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़ों के अनुसार, पांच साल से कम उम्र के भारतीय बच्चों में ज़्यादा वज़न की समस्या चिंताजनक रूप से बढ़ रही है. 2006 में ये करीब 1.5 प्रतिशत थी जो 2019-21 तक बढ़कर 3.4 प्रतिशत हो गई है. किशोरावस्था में, मोटापे की दर तीन गुनी या उससे भी ज़्यादा हो गई है. उदाहरण के लिए, किशोर लड़कों में मोटापे का प्रसार 2006 और 2021 के बीच 1.7 प्रतिशत से बढ़कर 6.6 प्रतिशत हो गया. ये बड़े बदलाव का संकेत है. एक ज़माने में सरकारी की नीतियां मुख्य रूप से कुपोषण से ख़त्म करने के उद्देश्य से बनाई जाती थी, अब भारत दोहरी समस्या का सामना कर रहा है. एक तरफ कुछ बच्चों का कमज़ोर शारीरिक विकास हो रहा, दूसरी तरफ मोटापा भी बड़ी समस्या बन रहा है.
बचपन में ही डायबिटीज का इलाज कर लेना आर्थिक और सामाजिक रूप से भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है. टाइप-1 मधुमेह के प्रबंधन में ज़िंदगी भर इंसुलिन इंजेक्शन और ब्लड शुगर की निगरानी करनी पड़ती है. आर्थिक रूप से कमज़ोर पृष्ठभूमि वाले परिवारों के लिए ये बहुत महंगा साबित हो सकता है. हालांकि, भारत में डायबिटीज रोग की देखभाल का बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है, लेकिन ज़्यादातर किफ़ायती विकल्प वयस्कों या टाइप-2 मधुमेह पर ही ध्यान देते हैं.
सटीक और समान स्वास्थ्य व्यवस्था ही बच्चों में डायबिटीज रोकने की असली ‘दवा’ है.
लागत के मुद्दे के अलावा, स्कूलों में डायबिटीज से पीड़त बच्चों के लिए ज़रूरी स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है. ज़्यादातर भारतीय स्कूलों में छात्रों के इंसुलिन इंजेक्शन, खून में शर्करा की जांच और हाइपोग्लाइसीमिया के दौरों के लिए कोई औपचारिक नीति नहीं है. एक भारतीय बहुकेंद्रीय सर्वेक्षण में पाया गया कि आधे से भी कम बच्चे स्कूल में भोजन से पहले इंसुलिन ले पाते हैं. सिर्फ एक-चौथाई बच्चे ही नियमित रूप से ग्लूकोज की जांच करते हैं. कुछ बच्चे अपने साथियों और शिक्षकों से अपनी मधुमेह की बात छिपाते हैं. उन्हें डर होता है कि मधुमेह के बारे में बताने पर उन्हें बीमार समझ लिया जाएगा और उनके साथ अलग व्यवहार किया जाएगा. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने निर्देश जारी किए हैं कि स्कूलों को डायबिटीज देखभाल की सुविधा प्रदान करनी चाहिए. इन सुविधाओं में बच्चों को नाश्ता/ग्लूकोमीटर ले जाने, दवाएं लेने और परीक्षा के दौरान मदद हासिल करने की अनुमति देना शामिल है. बाल मधुमेह समूह और अभिभावक भी स्कूल में 'स्व-देखभाल के अधिकार' को मान्यता देने पर ज़ोर दे रहे हैं. इसका अर्थ है कि टाइप-1 डायबिटीज जैसी पुरानी बीमारी से पीड़ित हर बच्चे को स्कूल में अपने स्वास्थ्य की निगरानी और प्रबंधन का अधिकार है और इसके लिए उसे ज़रूरी सुविधाएं भी उपलब्ध हों.
आयुष्मान भारत और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी, 2020) के तहत भी इस समस्या के समाधान की बात कही गई है. स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम में दीर्घकालिक देखभाल को एकीकृत करने को कहा गया है. इससे ये सुनिश्चित होगा कि स्कूलों में स्वास्थ्य जांच और शिक्षा सिर्फ आंखों की जांच या पेट में कीड़ों की जांच तक सीमित ना रहे. पाचन क्रिया संबंधी स्वास्थ्य जांच और डायबिटीज जैसी स्थितियों को भी इसमें इस शामिल किया जाए.
बाल दिवस और विश्व मधुमेह दिवस पर ये स्पष्ट है कि हमें क्या करना है. राष्ट्र को इस रोग के प्रति जागरूकता पैदा करने से आगे बढ़कर सटीकता और समानता की ओर बढ़ना होगा. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, पहनने योग्य उपकरण, रीयल-टाइम कीटोन मॉनिटर और डिजिटल ट्विन्स जैसे उपकरण डायबिटीज की देखभाल में कारगर साबित हो सकते हैं. टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित बच्चों के लिए ये ज़्यादा मददगार हो सकते हैं. हालांकि, ये भी सुनिश्चित करना होगा कि डायबिटीज पीड़ित सभी बच्चों की इन उपकरणों तक पहुंच हो. इसके अलावा कुछ और व्यावहारिक उपायों को अपनाना होगा. कम लागत वाले उपकरणों को मान्यता देनी होगी. उन्हें स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों में एकीकृत करना होगा. आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के माध्यम से रोग से जुड़े डेटा को मज़बूत गोपनीयता सुरक्षा के साथ जोड़ना होगा. किफायती पंप, सेंसर और कीटोन मॉनिटर को बाज़ार में लाने के लिए घरेलू अनुसंधान और विकास कार्यक्रम को आर्थिक मदद देनी चाहिए. सटीकता मददगार हो सकती है लेकिन सकारात्मक नतीजे निष्पक्षता से तय होंगे. एक निष्पक्ष व्यवस्था ही इसकी असली दवा है. अगर हम इसमें कामयाब होते हैं तो एक हंसते-खेलते बचपन का मतलब फिर से खुशी होगा, ग्लूकोज नहीं.
केएस उपलब्ध गोपाल ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन की स्वास्थ्य पहल में एसोसिएट फेलो हैं.
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Dr. K. S. Uplabdh Gopal is an Associate Fellow within the Health Initiative at ORF. His focus lies in researching and advocating for policies that ...
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