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Published on Apr 20, 2026 Updated 23 Hours ago

ताइवान की राजनीति में इस समय एक शांत लेकिन गहरी चाल चल रही है. चीन अब सिर्फ सैन्य दबाव नहीं बल्कि रिश्तों, व्यापार और राजनीतिक संपर्कों के जरिए ताइवान को प्रभावित करने की रणनीति पर काम कर रहा है. पढ़िए पूरी कहानी.

एक दौरा, कई संदेश: ताइवान चुनावों पर बीजिंग की नजर

चेंग ली-वुन, जो कुओमिन्तांग (KMT) की अध्यक्ष और ताइवान की एक प्रमुख विपक्षी नेता हैं, ने क्रॉस-स्ट्रेट संबंधों को फिर से संतुलित करने के प्रयास में 7 से 12 अप्रैल के बीच चीन का दौरा किया. यह यात्रा महत्वपूर्ण थी क्योंकि लगभग एक दशक में यह पहली बार था जब किसी मौजूदा KMT अध्यक्ष ने बीजिंग का दौरा किया. इससे पहले 2016 में तत्कालीन KMT अध्यक्ष हंग ह्सियू-चू चीन गई थीं.

बीजिंग और ताइपे के बीच आधिकारिक बातचीत 2016 में तब टूट गई थी जब डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (DPP)-जो KMT की चुनावी प्रतिद्वंद्वी है-सत्ता में आई. इसके बावजूद, KMT ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के साथ अपने अलग संवाद बनाए रखने की कोशिश की है. KMT के नेता और ताइवान के पूर्व राष्ट्रपति मा यिंग-जियो ने 2015 में सिंगापुर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की थी, जो ताइपे में बीजिंग के साथ बढ़ते आर्थिक संबंधों के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के बाद हुई थी. मा, जो 2008 से 2016 तक ताइवान के राष्ट्रपति रहे, 2024 में फिर चीन में शी जिनपिंग से मिले. KMT के उपाध्यक्ष एंड्रयू ह्सिया ने 2022 में बीजिंग का दौरा किया, जबकि उसी समय चीन ने ताइवान को धमकाने वाले सैन्य अभ्यास भी किए थे.

2022 में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैन्सी पेलोसी ने भी दौरा किया. पेलोसी की यात्रा के जवाब में चीन ने ताइवान के आसपास सैन्य अभ्यास शुरू कर दिए. बीजिंग इन संपर्कों को ताइपे द्वारा अंतरराष्ट्रीय मान्यता पाने और ‘ताइवान की स्वतंत्रता’ की दिशा में बढ़ने के रूप में देखता है.

हाल के वर्षों में वाशिंगटन और ताइपे के बीच उच्च-स्तरीय संपर्क भी बढ़े हैं. 2020 में अमेरिकी स्वास्थ्य सचिव एलेक्स अजार ताइवान गए, और 2022 में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैन्सी पेलोसी ने भी दौरा किया. पेलोसी की यात्रा के जवाब में चीन ने ताइवान के आसपास सैन्य अभ्यास शुरू कर दिए. बीजिंग इन संपर्कों को ताइपे द्वारा अंतरराष्ट्रीय मान्यता पाने और ‘ताइवान की स्वतंत्रता’ की दिशा में बढ़ने के रूप में देखता है.

चेंग ली-वुन की रणनीति  

चेंग ली-वुन ने इस पहल को ‘शांति मिशन’ बताया है, यह संकेत देते हुए कि उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों द्वारा ‘स्वतंत्रता’ की दिशा में उठाए गए कदम द्वीप को खतरे में डाल सकते हैं. 2022 में CPC की राष्ट्रीय कांग्रेस में शी जिनपिंग ने ताइवान के ‘शांतिपूर्ण पुनर्एकीकरण‘ की बात दोहराई, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए बल प्रयोग का विकल्प भी खुला है. उन्होंने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के आधुनिकीकरण को तेज करने का वादा भी किया, ताकि वह क्षेत्रीय युद्ध लड़ने और जीतने में सक्षम हो सके.

चेंग ली-वुन ने इस पहल को ‘शांति मिशन‘ बताया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वियों द्वारा ‘स्वतंत्रता’ की ओर बढ़ना द्वीप के लिए जोखिम भरा है. बीजिंग के साथ शांति स्थापित करने की उनकी कोशिश ऐसे समय में हो रही है, जब KMT और उसके सहयोगी ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते द्वारा प्रस्तावित 40 अरब अमेरिकी डॉलर के रक्षा बजट को रोक रहे हैं. KMT की अध्यक्ष बनने के बाद नवंबर 2025 में चेंग ने कहा कि केवल रक्षा खर्च बढ़ाने से ताइपे की सुरक्षा मजबूत नहीं हो सकती-यह वही मांग है जो ट्रंप अमेरिका के सहयोगी देशों से करते रहे हैं. इसके बजाय उन्होंने तर्क दिया कि सुरक्षा तब बेहतर होगी जब ताइवान प्रशासन 1992 की सहमति को फिर से स्वीकार करे-यह KMT और CPC के बीच एक समझ है कि ‘एक ही चीन’ है, हालांकि उसकी अलग-अलग व्याख्याएं हो सकती हैं. अमेरिकी सीनेटर जिम बैंक्स जैसे नेताओं ने ताइवान की संसद से इस रक्षा प्रस्ताव को मंजूरी देने की अपील की है.

शी जिनपिंग के साथ अपनी बैठक में चेंग ने CPC और KMT के सहयोग, क्रॉस-स्ट्रेट संपर्कों को बढ़ाने और ‘साझा मातृभूमि‘ की रक्षा करने पर जोर दिया. उन्होंने आपसी ‘राजनीतिक विश्वास‘ बढ़ाने और बीजिंग के साथ विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार करने की भी बात कही. उन्होंने 1992 की सहमति को बनाए रखने और ‘ताइवान की स्वतंत्रता‘ का विरोध करने की प्रतिबद्धता जताई.

KMT की अध्यक्ष बनने के बाद नवंबर 2025 में चेंग ने कहा कि केवल रक्षा खर्च बढ़ाने से ताइपे की सुरक्षा मजबूत नहीं हो सकती-यह वही मांग है जो ट्रंप अमेरिका के सहयोगी देशों से करते रहे हैं. इसके बजाय उन्होंने तर्क दिया कि सुरक्षा तब बेहतर होगी जब ताइवान प्रशासन 1992 की सहमति को फिर से स्वीकार करे-यह KMT और CPC के बीच एक समझ है कि ‘एक ही चीन’ है, हालांकि उसकी अलग-अलग व्याख्याएं हो सकती हैं.

जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची ने नवंबर 2025 में संसद में चर्चा के दौरान चीन द्वारा ताइवान पर संभावित बल प्रयोग को जापान के लिए ‘अस्तित्व का संकट‘ बताया. इस बयान से टोक्यो और बीजिंग के बीच संबंधों में ठंडक आ गई. अपने मुख्यभूमि दौरे के दौरान चेंग ने जापान की आलोचना करते हुए कहा कि उसने चीन और ताइवान को विभाजित करने में भूमिका निभाई. नानजिंग स्थित सन यात-सेन समाधि पर श्रद्धांजलि देने के बाद उन्होंने 1894–95 के प्रथम चीन-जापान युद्ध के बाद जापान द्वारा ताइवान के अधिग्रहण का उल्लेख किया और इसे ‘राष्ट्रीय कमजोरी‘ के दौर का फायदा उठाना बताया. KMT नेता ने कहा कि क्रॉस-स्ट्रेट विभाजन उसी युद्ध की विरासत है और ताइवान जलडमरूमध्य में बना यह ‘घाव‘ अब तक भरा नहीं है.

यह तर्क चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) की ‘राष्ट्रीय अपमान की सदी‘ वाली कहानी से मेल खाता है-वह दौर जब उपनिवेशवादी शक्तियों ने चीन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को नुकसान पहुंचाया था. CPC ताइवान को ‘मुख्य हित‘ और राष्ट्रीय संप्रभुता का मुद्दा मानती है. चेंग ने अपने दल की मुख्यभूमि चीन के साथ बातचीत को ‘युद्ध और शांति‘ तथा ‘विनाश और समृद्धि’ के बीच एक विकल्प के रूप में पेश किया है. यह दृष्टिकोण 2024 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले बीजिंग के उस संदेश जैसा है, जिसमें ताइवानी मतदाताओं से शांति और समृद्धि या संघर्ष और आर्थिक गिरावट के बीच चुनाव करने को कहा गया था. CPC ने मतदाताओं से ‘स्वतंत्रता समर्थक‘ पार्टियों-जैसे DPP और उस समय के उम्मीदवार लाई चिंग-ते-का विरोध करने की अपील की थी, जिन्होंने खुद को ‘ताइवान की स्वतंत्रता के व्यावहारिक समर्थक’ बताया था. मई 2024 में अपने शपथ ग्रहण भाषण में राष्ट्रपति लाई ने बीजिंग से ताइवान (रिपब्लिक ऑफ चाइना) के अस्तित्व को स्वीकार करने और उसके निर्वाचित प्रतिनिधियों से संवाद करने का आग्रह किया.

चुनाव के बाद, चीन के राज्य सुरक्षा मंत्री चेन यीशिन ने ‘ताइवान की स्वतंत्रता’ की साजिश को रोकने और अलगाववाद के खिलाफ सक्रिय कदम उठाने की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने ‘पुनर्एकीकरण को बढ़ावा देने’, ‘देशभक्त ताकतों’ को मजबूत करने, शांतिपूर्ण पुनर्एकीकरण के लिए जन समर्थन का मजबूत आधार बनाने और इन लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए एक ‘गुप्त मोर्चा‘ विकसित करने का प्रस्ताव दिया. इससे साफ है कि बीजिंग लाई चिंग-ते को स्वतंत्रता की ओर झुकाव रखने वाला नेता मानता है और ताइवान की राजनीति के भीतर समर्थक समूहों के साथ काम करके उसे संतुलित करने की कोशिश कर रहा है.

ऐसी ‘ट्रोजन-हॉर्स’ रणनीतियों के जरिए शी जिनपिंग, अगले महीने होने वाली बैठक से पहले डोनाल्ड ट्रंप को यह संकेत दे रहे हैं कि ताइवान मुद्दे पर उनके पास अभी भी सौदेबाजी की ताकत है.

ताइवान की राजनीतिक स्वायत्तता

मुख्यभूमि का ताइवान मामलों का कार्यालय, जो क्रॉस-स्ट्रेट संबंधों को संभालता है, ने संबंध सुधारने के लिए कई प्रस्ताव दिए हैं. इसमें KMT के साथ मिलकर ‘ताइवान स्वतंत्रता’ और ‘बाहरी हस्तक्षेप‘ का विरोध करना, CPC-KMT के बीच संस्थागत संवाद तंत्र बनाना, उड़ानों और पर्यटन को फिर से शुरू करना, शंघाई और फुजियान के लोगों को ताइवान जाने की अनुमति देना शामिल है. साथ ही, किनमेन और मात्सु द्वीपों को चीन के फुजियान प्रांत से गैस, बिजली और पानी जैसी सुविधाओं से जोड़ने का प्रस्ताव भी दिया गया है. चीन ने ताइवानी कृषि और समुद्री उत्पादों के लिए निरीक्षण नियम आसान करने, ताइवानी कंपनियों को चीन में काम करने में मदद देने, और ताइवानी टीवी व फिल्म उद्योग के साथ सांस्कृतिक संबंध बढ़ाने की भी पेशकश की है. चीन ने ताइवानी कंपनियों के पंजीकरण को आसान बनाने और उन्हें मुख्यभूमि में अपने कार्यालय खोलने में मदद देने की पेशकश की है. अंत में, बीजिंग ने ताइवानी टीवी सीरियल्स के प्रसारण की अनुमति देने और ऐसे फिल्म व टीवी कार्यक्रमों को बढ़ावा देने का प्रस्ताव रखा है जो ‘क्रॉस-स्ट्रेट संबंधों’ को दर्शाते हों, ताकि ताइवान के प्रभावशाली मनोरंजन उद्योग के साथ संबंध मजबूत किए जा सकें.

चीन न केवल अमेरिका को संकेत दे रहा है, बल्कि ताइवान के व्यापारिक वर्ग को भी अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहा है. साथ ही, वह DPP को शांति में बाधा और KMT को स्थिरता लाने वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत कर रहा है. ऐसी रणनीति ताइवान के भीतर राजनीतिक विभाजन को बढ़ा सकती है, खासकर नवंबर में होने वाले स्थानीय चुनावों के संदर्भ में, जो 2028 के राष्ट्रपति चुनाव की दिशा तय करेंगे.

हालांकि, ताइवान के प्रधानमंत्री चो जंग-ताई ने इन प्रस्तावों को ‘वही पुराना तोहफा पैकेज‘ बताते हुए खारिज कर दिया. राष्ट्रपति लाई पहले ही चीन को ‘विदेशी शत्रुतापूर्ण शक्ति‘ कह चुके हैं और उस पर सैन्य दबाव और समाज में हस्तक्षेप के जरिए ताइवान की संप्रभुता को खतरे में डालने का आरोप लगा चुके हैं. ताइपे का कहना है कि चीन इन आदान-प्रदान कार्यक्रमों का उपयोग जनमत को प्रभावित करने और गलत जानकारी फैलाने के लिए करता है.

इस उच्च-स्तरीय संपर्क के बाद बीजिंग की उम्मीद है कि चेंग अपनी स्थिति मजबूत करेंगी और 2028 में KMT की जीत का रास्ता तैयार करेंगी, जिससे ताइवान की विदेश नीति की दिशा बदल सकती है. इन रणनीतियों के जरिए चीन न केवल अमेरिका को संकेत दे रहा है, बल्कि ताइवान के व्यापारिक वर्ग को भी अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहा है. साथ ही, वह DPP को शांति में बाधा और KMT को स्थिरता लाने वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत कर रहा है. ऐसी रणनीति ताइवान के भीतर राजनीतिक विभाजन को बढ़ा सकती है, खासकर नवंबर में होने वाले स्थानीय चुनावों के संदर्भ में, जो 2028 के राष्ट्रपति चुनाव की दिशा तय करेंगे.

भारत और ताइवान के बीच सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ रहा है, लेकिन ताइवान की राजनीति में संभावित बदलाव इन उपलब्धियों को प्रभावित कर सकता है. इसलिए भारत को ताइवान की आंतरिक राजनीतिक स्थिति पर नजर रखते हुए संभावित बदलाव के लिए तैयार रहना होगा.


कल्पित ए. मनकीकर ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में फेलो हैं.
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